पाकिस्तान जाकर पढ़ने लगे हैं कश्मीरी छात्र, क्या है वजह?

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    • Author, माजिद जहाँगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए

हर वर्ष जम्मू-कश्मीर से वास्ता रखने वाले दर्जनों छात्र पाकिस्तान के मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में एडमिशन ले रहे हैं. कुछ छात्रों ने वहाँ के कॉलेजों में अन्य कोर्स भी चुने हैं.

बीते दो दशक में सैकड़ों कश्मीरी छात्र पाकिस्तान के कॉलेजों में एडमिशन ले चुके हैं. उन्होंने वहाँ के कॉलेजों में प्रोफ़ेशनल कोर्स चुने हैं और वहीं से उच्च शिक्षा लेने का विकल्प चुना है.

इस वक़्त कई कश्मीरी छात्र पाकिस्तान के कॉलेजों से मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं. इन छात्रों के बारे में बताते हुए एक छात्र के पिता ने भी यह कहा कि कई कश्मीरी छात्रों पढ़ाई के लिए दूसरे पाठ्यक्रमों का चुनाव किया हुआ है.

जब उनसे पूछा गया कि कश्मीरी छात्र क्यों पाकिस्तान के मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों को चुन रहे हैं? तो उन्होंने कहा, "पहले लोगों में यह राय थी कि बच्चों को अगर बाहर से डॉक्टरी की पढ़ाई करानी है तो उन्हें रूस भेजा जाए या कुछ अन्य देशों में भेजा जाए. पर अब वे बच्चों को पाकिस्तान भेज रहे हैं, पर इसमें बुरा क्या है."

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'पाकिस्तान में पढ़ाई सस्ती'

उन्होंने कहा, "पाकिस्तान के जिस कॉलेज में मेरी बेटी को दाख़िला मिला, वो इस वक़्त वहाँ के बेस्ट कॉलेजों की श्रेणी में नंबर तीन पर है. सभी माँ-बाप चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छे से अच्छे कॉलेज में पढ़ें. इसलिए मुझे यह निर्णय सही लगा. ख़ासकर लड़कियों के मामले में हर माँ-बाप चाहता है कि वो सफल हों."

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि "पाकिस्तान में पढ़ाई फ़िलहाल अन्य देशों की तुलना में सस्ती है."

उन्होंने बताया कि उनकी बेटी का दाख़िला सार्क एजुकेशन एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत हुआ है और उन्हें एक सेमेस्टर के क़रीब 36 हज़ार रुपये फ़ीस के तौर पर देने होते हैं.

पाकिस्तान में पढ़ रहे एक अन्य छात्र के भाई जो अपनी पहचान ज़ाहिर नहीं करना चाहते थे, उन्होंने कहा कि वे भी पाकिस्तान में पढ़ाई करना चाहते हैं.

उन्होंने बताया कि "लोगों को लगता है कि बच्चों के वहाँ पढ़ाने का मतलब है, घर जैसी जगह पर रहकर पढ़ना."

उन्होंने कहा कि "पाकिस्तान के कॉलेज भारत से काफ़ी सस्ते हैं, बल्कि कई देशों से सस्ते हैं. वहाँ बेसिक फ़ीस काफ़ी कम है. फिर पाकिस्तान एक मुस्लिम देश है और कश्मीरियों को बाहरी नहीं समझा जाता. इस वजह से वहाँ पढ़ने गये कश्मीरी छात्रों को असुरक्षा का भाव महसूस नहीं होता."

हालांकि, कुल कितनी संख्या में कश्मीरी छात्र पाकिस्तान जाते हैं, हमने इसकी आधिकारिक जानकारी लेने की कोशिश की लेकिन कई कोशिशों के बाद भी अधिकारियों से इसका जवाब नहीं मिल पाया. कश्मीर पुलिस के आला अधिकारी जब भी छात्रों की तादाद के बारे में बताएंगे, हम इस ख़बर को अपडेट कर देंगे. हांलाकि प्राइवेट स्कूल्स एसोसिएशन और कोचिंग सेटंर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष जीएन वार बताते हैं कि साल 2018 में करीब 300 छात्र पाकिस्तान में पढ़ाई के लिए गए. वार कहते हैं कि 2018 में पाकिस्तान में मेडिकल डिग्रियां लेने का मुद्दा उठा था क्योंकि मेडिकल काउंसिल ने कहा था ये डिग्रियां भारत में वैध नहीं होगी. वार के मुताबिक उस समय ही छात्रों की संख्या का अनुमान लगा था.

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कश्मीरी छात्रों के लिए पाकिस्तान में कोटा

बीते दो दशक से पाकिस्तान सरकार जम्मू और कश्मीर से वास्ता रखने वाले छात्रों को प्रोफ़ेशनल कोर्स जैसे मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई में स्पेशल कोटा देती रही है.

यहाँ के जो छात्र पाकिस्तान में एडमिशन लेना चाहते हैं, उन्हें मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बाँटा जाता है.

  • पहली - विदेशी छात्र के तौर पर शिक्षा मंत्रालय के ज़रिये आवेदन करने वाले छात्र.
  • दूसरी - वे छात्र जो किसी स्कॉलरशिप के तहत एडमिशन चाहते हैं.

हाल ही में मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया (एमसीआई) ने घोषणा की, "जो भी छात्र पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) के मेडिकल कॉलेज से डिग्री लेकर आयेगा, उसे नहीं माना जायेगा."

अपने पब्लिक नोटिस में मेडिकल काउंसिल ने कहा है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न अंग हैं. पाकिस्तान ने उसके कुछ हिस्से पर ज़बरन अवैध कब्ज़ा कर रखा है. इसलिए इस क्षेत्र से ली गई कोई भी शिक्षा भारत में मान्य नहीं होगी.

पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से मेडिकल की पढ़ाई करने वाले किसी भी छात्र को इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट, 1956 के तहत रजिस्टर नहीं किया जायेगा.

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कब शुरू हुआ सिलसिला?

पाकिस्तान से मेडिकल की पढ़ाई कर रहे एक छात्र के पिता ने बताया कि "बच्चों को पढ़ाई के लिए पाकिस्तान भेजने का सिलसिला 2002 में शुरू हुआ. 2003 में जम्मू-कश्मीर के छात्रों का पहला बैच पाकिस्तान गया और तब से यह जारी है."

फ़रवरी 2020 में, प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की सरकार ने 1600 कश्मीरी बच्चों को पाकिस्तान के विश्वविद्यालयों में स्कॉलरशिप देने की घोषणा की थी.

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स्कॉलरशिप पर विवाद के बाद गिलानी का इस्तीफ़ा

हाल ही में, जब 91 साल के अलगाववादी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी (पूर्व हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस चेयरमेन) ने अपने इस्तीफ़े की घोषणा की, तो भी यह मामला सामने आया था.

अपने पत्र में, ख़ुद को हुर्रियत से अलग करने की घोषणा के साथ-साथ गिलानी ने मुज़्ज़फ़राबाद चेप्टर पर फ़ंड के दुरुपयोग के आरोप लगाये थे.

सूत्रों के अनुसार, गिलानी ने एक जाँच के बाद पाकिस्तान में कश्मीरी छात्रों की मेडिकल सीटों के संबंध में कुछ खामियाँ पाई थीं. ऐसी बातें कही जा रही थी कि इन सीटों को बेचा गया.

माना जाता है कि कश्मीर के अलगाववादी पाकिस्तान में एडमिशन के लिए छात्रों को अनुशंसा-पत्र दिया करते थे.

हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस के एक सक्रिय कार्यकर्ता ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "ये सही है कि सैय्यद अली शाह गिलानी और मौलवी उमर फ़ारूक़, दोनों के गुट के लोग कश्मीरी छात्रों को पाकिस्तान में एडमिशन के लिए अनुशंसा-पत्र दिया करते थे. कुछ वर्ष पहले तक हुर्रियत के सात एग्ज़ीक्यूटिव मेंबर थे और सभी चार-चार छात्रों को एडमिशन के लिए अनुशंसा-पत्र दिया करते थे."

पार्टी के एक और बाग़ी ने बताया कि ये पत्र ख़ासकर उन छात्रों को दिये जाते थे जिनका कोई सगा-संबंधी भारतीय फ़ौज या अन्य किसी फ़ोर्स के हाथों कश्मीर में मारा जाता था.

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हुक़ूमत की नज़र

कुछ ऐसी रिपोर्टें भी हैं जिनमें दावा किया गया कि जो कश्मीरी छात्र पाकिस्तान पढ़ाई करने जाते हैं, वो भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर रहते हैं.

हाल ही में कुछ रिपोर्टों में ऐसे छात्रों के हवाले से लिखा गया कि उन्हें पुलिस द्वारा समन दिया गया और उनसे एडमिशन, उनकी दिलचस्पी समेत कई अन्य चीज़ों के बारे पूछताछ की गई.

हालांकि, बीबीसी स्वतंत्र रूप से इन दावों और आरोपों की पुष्टि नहीं करता है.

बीबीसी ने इस संबंध में कश्मीर ज़ोन के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस (आईजीपी) विजय कुमार से बात करनी चाही, पर उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला.

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