कंगना की 'तू-तड़ाक' पर शिवसेना की ख़ामोशी की वजह क्या है?

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- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत ने बीएमसी की कार्रवाई के बाद से शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के ख़िलाफ़ तीख़े शब्दों के साथ मोर्चा खोल दिया है.
बुधवार को कंगना रनौत ने अपने वीडियो में कहा, “उद्धव ठाकरे तुझे क्या लगता है तूने फ़िल्म माफ़िया के साथ मेरा घर तोड़ कर मुझसे बहुत बड़ा बदला लिया है. आज मेरा घर टूटा है कल तेरा घमंड टूटेगा.”
कंगना ने अपने बयान में कश्मीरी पंडितों के दर्द को महसूस करने की बात भी कही.
लेकिन उन्होंने जिस तरह उद्धव ठाकरे के ख़िलाफ़ अपने गुस्से का इज़हार किया है, वो महाराष्ट्र और ठाकरे परिवार की राजनीति को क़रीब से समझने वाले पत्रकारों और विशेषज्ञों के लिए काफ़ी चौंकाने वाला था.
क्योंकि ऐसा कभी नहीं हुआ कि मुंबई में रहने वाले किसी व्यक्ति ने ठाकरे परिवार के किसी शख़्स और वो भी शिव सेना प्रमुख के ख़िलाफ़ इस तरह की भाषा का प्रयोग किया हो. वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले मानते हैं कि 'कंगना ने जिस भाषा का प्रयोग एक मौजूदा मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ किया है, वैसा कभी नहीं हुआ.'
वे कहते हैं, “कंगना ने अपने वीडियो में कल उद्धव ठाकरे के लिए तुझे और तूने जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था. मुझे तो मालूम नहीं है कि पिछले चालीस सालों में ऐसा कभी हुआ है. कोई भी इनका आलोचक हो, विपक्षी दल हो, या इनके ख़िलाफ़ लड़ने वाला कोई भी इंसान हो, उन्होंने ठाकरे परिवार या महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के बारे में ऐसी भाषा का इस्तेमाल कभी नहीं किया है.”

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कंगना के हमले पर चुप क्यों है शिव सेना?
कंगना ने गुरुवार को भी उद्धव ठाकरे पर हमला जारी रखा. उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “जिस विचारधारा पर श्री बाला साहेब ठाकरे ने शिव सेना का निर्माण किया था, आज वो सत्ता के लिए उसी विचारधारा को बेचकर शिव सेना से सोनिया सेना बन चुके हैं.”
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कंगना ने यह भी लिखा, “तुम्हारे पिताजी के अच्छे कर्म तुम्हें दौलत तो दे सकते हैं, मगर सम्मान तुम्हें ख़ुद कमाना पड़ता है. मेरा मुँह बंद करोगे मगर मेरी आवाज़ मेरे बाद सौ फिर लाखों में गूंजेगी, कितने मुँह बंद करोगे? कितनी आवाज़ें दबाओगे? कब तक सच्चाई से भागोगे, तुम कुछ नहीं हो, सिर्फ़ वंशवाद का एक नमूना हो.”
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लेकिन इस सबके बाद भी शिवसेना की ओर से किसी तरह की प्रतिक्रिया सामने नहीं आई.
महाराष्ट्र के इतिहास में संभवत: यह भी पहली बार हो रहा है कि किसी ने शिवसेना प्रमुख से इस तरह की अपमानजनक भाषा में बात की हो और शिवसेना की ओर से इसकी कोई प्रतिक्रिया ना आये.
क्योंकि इससे पहले शिवसेना की आलोचना मात्र करने वालों के ख़िलाफ़ भी शिवसेना के समर्थकों के हमले, विरोध प्रदर्शन और तोड़फोड़ करने जैसी घटनाएं सामने आती रही हैं.

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क्या बदल रही है शिव सेना?
निखिल वागले मानते हैं कि इस मौके पर शिवसेना ने वैसी प्रतिक्रिया नहीं दी है, जैसी वह पहले दिया करती थी.
वागले स्वयं भी उस दौर के साक्षी रहे हैं जब शिवसेना ज़रा सी आलोचना पर तीव्र ढंग से प्रतिक्रिया किया करती थी.
वे कहते हैं, “बाला साहेब ठाकरे के वक़्त जो शिवसेना थी, वह सिर्फ़ बाला साहेब ठाकरे के आदेश पर चलती थी. और वह बहुत ज़्यादा आक्रामक थी. उदाहरण के लिए, बाला साहेब ठाकरे ने ये पब्लिकली कहा था कि वह हिटलर के प्रशंसक थे और आज के लोकतंत्र में यक़ीन नहीं करते. वो हमेशा प्रतिक्रिया दिया करते थे.”
वागले एक वाकये का ज़िक्र करते हैं, “एक घटना मुझे याद आती है कि शाहरुख ख़ान की एक फ़िल्म आई थी-माई नेम इज़ ख़ान. तब शिवसेना ने इस फ़िल्म का काफ़ी विरोध किया था. क्योंकि शाहरुख ख़ान ने कुछ बोला था, पाकिस्तान के बारे में. इस मुद्दे पर शिवसेना सड़क पर उतरकर आई थी. तब महाराष्ट्र में कांग्रेस सरकार थी और उसे फ़िल्म और शाहरुख ख़ान को सुरक्षा देनी पड़ी थी.''
''इसके अलावा आपको मालूम है कि मैं जिस अख़बार का संपादक था – महानगर और मैं जिस चैनल का संपादक था - आईबीएन लोकमत, उसके ऊपर हमेशा हमले हुए हैं. क्योंकि हम लोगों ने शिव सेना और बाला साहेब ठाकरे की आलोचना की थी. तो खुलेआम चार पाँच हमलों का अनुभव मैंने खुद किया था. तो ये उस दौर की शिवसेना थी.”
कंगना पर शिवसेना की प्रतिक्रिया नहीं होने के मुद्दे पर वागले कहते हैं, “इस बार पहले जैसे प्रतिक्रिया होती है, वैसा कुछ नहीं दिखा है. पहले अगर कोई ऐसे बोलता तो कम से कम उसके ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन करते, पथराव करते जो शिवसेना की टर्मिनोलॉजी है. लेकिन इस बार वो सब नहीं हुआ क्योंकि शिवसेना अभी बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना नहीं है. उतनी आक्रामक नहीं है. अभी ये उद्धव ठाकरे की शिवसेना है.”
कब तक कंगना को बर्दाश्त करेगी शिवसेना?
महाराष्ट्र और शिवसेना की राजनीति को बेहद क़रीब से देखने समझने वाली वरिष्ठ पत्रकार सुजाता आनंदन भी निखिल वागले के तर्क से सहमत नज़र आती हैं.
सुजाता आनंदन को महाराष्ट्र में उन पत्रकारों में गिना जाता है जिन्होंने सबसे पहले शिवसेना में आ रहे इस बदलाव पर टिप्पणी की थी.
आनंदन बताती हैं, “संभवत: मैंने सबसे पहले ये लिखा था कि उद्धव ठाकरे का अंदाज़ अपने पिता जैसा नहीं है. उस वक़्त मुझ पर लोगों ने काफ़ी आरोप लगाए कि मैं ठाकरे के समर्थन में ऐसी ख़बरें लिख रही हूँ. लेकिन अब साफ़ दिख रहा है.”
शिवसेना में आये परिवर्तन को समझाते हुए आनंदन कहती हैं, “आज के दिन में ये बाल ठाकरे की पार्टी नहीं रह गई है. ये उद्धव ठाकरे की पार्टी है. हाँ, अगर उद्धव की जगह पर राज ठाकरे होते और वह स्टेट के मुख्यमंत्री होते तो बिलकुल शिवसेना टाइप की प्रतिक्रिया नज़र आती. शिवसेना की महिला विंग कंगना पर कालिख़ पोतने जैसा काम करती. लेकिन ये पुरानी वाली शिवसेना नहीं है. और इस पार्टी के नेता उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे हैं जो कि बाल ठाकरे जैसे नहीं हैं.”
“आदित्य ठाकरे एक सौम्य स्वभाव के नेता हैं. उनके बॉलीवुड में, बिज़नेस कम्युनिटी आदि में लोगों से अच्छे संबंध हैं. और वह तो उद्धव ठाकरे से भी ज़्यादा सौम्य स्वभाव वाले हैं. ऐसे में आज के दौर वाली शिवसेना से पहले जैसी अपेक्षा नहीं की जा सकती क्योंकि इससे पहले ठाकरे परिवार चुनाव जीतकर सत्ता में नहीं पहुंचे हैं. और अब पहली बार ठाकरे सरकार का एक शख़्स सत्ता के शीर्ष पर है.''
''प्रतिक्रिया की बात करें तो शिव सेना अपने पुराने अंदाज़ में कंगना के ख़िलाफ़ प्रतिक्रिया देगी. वह बॉलीवुड में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए उन्हें अलग थलग कर देगी. ऐसे में शिवसेना प्रतिक्रिया देगी लेकिन अपने पुराने स्टाइल में नहीं देगी. क्योंकि ये पुराने दौर की शिवसेना नहीं है.”

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आगे क्या हो सकता है? इस सवाल के जवाब में निखिल वागले कहते हैं कि "शिवसेना को कंगना को बर्दाश्त करना पड़ेगा क्योंकि उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री है, क़ानून व्यवस्था का सवाल है. और केंद्र में बीजेपी की सरकार है. वहाँ गृह मंत्री अमित शाह है. और ये पार्टियां जो महाराष्ट्र की सत्ता में हैं वो अमित शाह से तो डरती हैं. ऐसे में मुझे लगता है कि ये सब कुछ ज़्यादा लंबे समय तक नहीं चलेगा. और किसी न किसी स्तर पर इसका राजनीतिक समाधान निकल आएगा."
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