कोरोना वायरस: कोविड मरीज़ों की होगी टीबी जाँच, टीबी मरीज़ों की होगी कोविड जाँच

अस्पताल में महिला

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    • Author, टीम बीबीसी
    • पदनाम, दिल्ली

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना वायरस से संक्रमित सभी मरीज़ों की टीबी जाँच करने के दिशानिर्देश जारी किए हैं. इसके साथ ही ऐसे सभी मरीज़ों की कोविड जाँच किए जाने के भी निर्देश दिए हैं जिनकी टीबी से संक्रमित होने की पुष्टि पहले ही हो चुकी है.

बीते छह महीनों में कोरोना वायरस की वजह से अब तक 60 हज़ार लोगों की मौत हो चुकी है.

लेकिन अगर इसकी तुलना टीबी से की जाए तो टीबी कोरोना वायरस से ज़्यादा ख़तरनाक नज़र आती है. टीबी की वजह से भारत में हर दिन 1300 से ज़्यादा लोगों की मौत होती है.

लेकिन बीते छह महीनों में टीबी रिपोर्टिंग के मामलों में अप्रत्याशित गिरावट दर्ज की गई है.

ऐसे में जब भारत में टीबी को पूरी तरह ख़त्म करने का लक्ष्य 2025 है तब 2020 में ही ऐसे आँकड़े सामने आना चौंकाने वाला है.

लेकिन ज़मीन पर उतरें तो पता चलता है कि टीबी मरीज़ों की रिपोर्टिंग से जुड़े आँकड़े कम होने के लिए लॉकडाउन ज़िम्मेदार है.

बिहार के टीबी अधिकारी डॉक्टर केएन सहाय ने हाल ही में बीबीसी के साथ हुई एक बातचीत में इसकी पुष्टि की थी.

इसके बाद अब केंद्र सरकार की ओर से टीबी के मामलों की रिपोर्टिंग कम होने की आधिकारिक पुष्टि की गई है.

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कोविड नोटिफ़िकेशन में भारी कमी

बीबीसी ने हाल ही में इस मुद्दे पर अपनी एक विस्तृत रिपोर्ट में पाया था कि लॉकडाउन के दौरान टीबी के नोटिफ़िकेशन में भारी गिरावट आई है.

बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव ने अपनी इस रिपोर्ट में पाया था कि जनवरी के आख़िरी हफ़्ते के बाद से भारत में कोरोना वायरस के मामले मिलना शुरू हुए थे जिसके बाद 24 मार्च को लॉकडाउन का ऐलान किया गया था.

लेकिन लॉकडाउन के दौरान टीबी मरीज़ों के नोटिफ़िकेशन में भारी गिरावट दर्ज की गई. कुछ जगहों पर रिपोर्ट किए गए मामलों की संख्या में लगभग आधे का अंतर देखा गया.

बीबीसी से बात करते हुए बिहार के प्रमुख टीबी अधिकारी डॉक्टर केएन सहाय ने बताया था कि कोविड की वजह से टीबी की नोटिफ़िकेशन के मामलों में 30 फ़ीसद से ज़्यादा की कमी आई.

केमिस्ट स्टोर

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हरकत में आई केंद्र सरकार

केंद्र सरकार ने इस समस्या की गंभीरता को समझते हुए ज़रूरी क़दम उठाए हैं.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस बारे में दिशानिर्देश जारी करते हुए कहा है कि आने वाले समय में कोविड-19 से पीड़ित मरीज़ों की टीबी जाँच की जाए और टीबी के मरीज़ों की कोविड जाँच की जाए.

स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपने दिशानिर्देश में लिखा है, “टीबी और कोविड-19 संक्रामक रोग हैं जो कि मुख्यत: फेफड़ों पर हमला करते हैं. दोनों ही बीमारियां कफ़, बुख़ार, और साँस लेने में दिक़्क़त जैसे लक्षणों के साथ आती है. हालांकि, टीबी का इनक्यूबेशन पीरियड लंबा और बीमारी के सामने आने की रफ़्तार धीमी है. अलग-अलग अध्ययनों में कोविड-19 के मरीज़ों में टीबी की मौजूदगी 0.37 से 4.47 फ़ीसद देखी गई है. साल 2020 में कोविड-19 महामारी की वजह से जनवरी महीने से लेकर जून महीने तक टीबी के नोटिफ़िकेशन में पिछले साल के मुक़ाले 26 फ़ीसद की कमी आई है.”

अस्पताल

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इसमें आगे लिखा है, “अध्ययनों में सामने आया है कि सक्रिय और सुप्त अवस्था में टीबी की मौजूदगी कोरोना वायरस संक्रमण के लिहाज़ से काफ़ी ख़तरनाक है. ऐसा होने पर मरीज़ की संवेदनशीलता बढ़ती है, और लक्षणों में विकास तेज़ी से होता है एवं बीमारी तेज़ी से बढ़ती है जिसके नतीजे ख़राब होते हैं."

कोविड-19 से गंभीर रूप से ग्रस्त मरीज़ों में टीबी होने पर जोख़िम 2.1 गुना बढ़ जाता है. इसके साथ ही टीबी मरीज़ों में कुपोषण, डायबिटीज़, स्मोकिंग और एचआईवी आदि के होने की आशंका रहती है जिससे उनके प्रति जोख़िम बढ़ जाता है.

इस दो तरफ़ा टीबी और कोविड बीमारी का सामना करने के लिए तीन क़दम उठाने चाहिए – टीबी और कोविड में से किसी एक बीमारी से संक्रमित होने वाले व्यक्ति की जाँच दोनों बीमारियों के लिए करनी चाहिए, सभी इंफ़्लूएंजा जैसी बीमारियों के मामलों में टीबी की जाँच की जानी चाहिए और साँस लेने में गंभीर दिक़्क़त के मामलों में टीबी की जाँच की जानी चाहिए.”

बीमार महिला

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2025 तक ख़त्म करनी है टीबी

ट्यूबरकुलोसिस यानी टीबी एक ऐसी बीमारी है जो कि हर साल भारत में 4.80 लाख लोगों की जान लेती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़, दुनिया भर में साल 2018 में इस बीमारी की वजह से 15 लाख लोगों की मौत हुई थी.

वहीं, भारत सरकार का आकलन है कि देश में टीबी से रोज़ाना 1,300 लोगों की मौत होती है.

एक्सरे

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भारत सरकार साल 2025 तक टीबी का ख़ात्मा करना चाहती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2018 के मार्च महीने में कहा था, "भारत को 2025 तक टीबी से मुक्त करने का लक्ष्य कुछ लोगों को मुश्किल भले ही लग रहा हो. लेकिन ये असंभव नहीं है. पिछले चार साल से हमारी सरकार नई अप्रोच के साथ काम कर रही है. उससे इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. ये मेरा पूरा विश्वास है."

प्रधानमंत्री मोदी ने ये बात साल 2018 में कही थी लेकिन इसके बाद भारत ने कोरोना वायरस महामारी का कहर देखा है. और इस दौरान टीबी जैसी बीमारी की रोकथाम में लगे स्वास्थ्य तंत्र को अंडर रिपोर्टिंग यानी कम मामलों की रिपोर्टिंग होने की समस्या से दो चार होना पड़ा है.

साल 2020 में सरकार का इस बीमारी के मामलों की रिपोर्टिंग का लक्ष्य 29 लाख से ज़्यादा था लेकिन बीती 10 अगस्त तक सिर्फ़ 10 लाख मामले सामने आए हैं.

इन सभी स्थितियों को देखते हुए स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञ मानते हैं कि वर्तमान परिस्थितयों को देखते हुए सरकार को अपनी समयसीमा में पाँच साल का इज़ाफ़ा करना होगा.

एपीडेमियोलॉजी एंड ग्लोबल हेल्थ में कनाडा रिसर्च चेयर और मैकगिल अंतरराष्ट्रीय टीबी सेंटर के प्रमुख डॉक्टर मधु पाई इस पूरे घटनाक्रम पर स्टडी कर रहे हैं.

उनके मुताबिक़, "भारत का टीबी को 2025 तक ख़त्म करने का लक्ष्य कम से कम पाँच साल आगे बढ़ाना पड़ सकता है. कोविड की वजह से लोगों को घरों में बैठना पड़ा और उनमें लाखों मरीज़ टीबी के तो थे ही, साथ ही सैकड़ों हज़ार ऐसे भी जिन्हें ये पता नहीं रहा होगा कि वे टीबी संक्रमित हैं. अब डेटा भी बता रहा है कि टीबी के नोटिफ़िकेशन में क़रीब 40% गिरावट दिखी. समस्या गंभीर है".

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