दिल्ली दंगा: बीजेपी नेताओं के 'आपत्तिजनक' बयान पर बोले मुख़्तार अब्बास नक़वी

मुख़्तार अब्बास नक़वी

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    • Author, दिव्या आर्या
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

हाल ही में दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने दंगों पर एक फ़ैक्ट-फ़ाइंडिग रिपोर्ट जारी की थी.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली में फ़रवरी महीने में दंगों से पहले सांप्रदायिक माहौल बनाने में बीजेपी सांसदों के दिए भड़काऊ बयानों की बड़ी भूमिका थी.

इस रिपोर्ट के बारे में बीबीसी ने मोदी सरकार में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख़्तार अब्बास नक़वी पूछा तो उन्होंने कई चीज़ों को सिरे से ख़ारिज कर दिया. हालांकि उन्होंने अपनी पार्टी के सांसद अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान दिए भाषण को भी ग़लत माना.

बीजेपी सासंद परवेश वर्मा ने 28 जनवरी को एक समाचार एजेंसी से इंटरव्यू में कहा था, "लाखों लोग वहां (शाहीन बाग़) इकट्ठा होते हैं. दिल्ली के लोगों को सोच समझ कर फ़ैसला लेना होगा. वे आपके घरों में घुसेंगे, आपकी बहनों और बेटियों के साथ बलात्कार करेंगे, उन्हें मारेंगे. आज वक़्त है. मोदी जी और अमित शाह कल आपको बचाने नहीं आएंगे".

वहीं 20 जनवरी को एक सभा में बीजेपी सासंद अनुराग ठाकुर ने जनता से पूछा था, "देश के ग़द्दारों को", जिसके जवाब में वहां मौजूद भीड़ ने कहा था, "गोली मारो...को".

इसके अलावा दिल्ली चुनाव में बीजेपी के प्रत्याशी रहे कपिल मिश्रा ने 23 फ़रवरी को कहा था, "जब तक अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप भारत के दौरे पर हैं तब तक हम शांतिपूर्ण तरीक़े से रहेंगे, पर तीन दिन में अगर जाफ़राबाद और चांद बाग़ की सड़कें ख़ाली नहीं की गईं तो उसके बाद हम पुलिस की भी नहीं सुनेंगे, सड़कों पर उतर आएंगे."

अनुराग ठाकुर

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अपने पार्टी नेताओं के इन बयानों पर मुख़्तार अब्बास नक़वी ने कहा, ''ये बयान बिल्कुल सही नहीं हैं, ग़लत हैं. चाहे उन्होंने कहा हो या फिर माइनॉरिटी कमिशन दिल्ली वाले हों, जिन्होंने इस्लामोफोबिया या फॉरेन कंट्रीज़ को चिट्ठी लिखी हो कि बचाओ, बचाओ, बचाओ, मुसलमान हमारे यहाँ ख़तरे में है- ये सब ग़लत है.''

नक़वी ने कहा, ''चाहे वो बयान हो, चाहे इन लोगों के बयान हों. हम उन सभी तरह के बयानों के ख़िलाफ़ हैं जो उकसाने वाले हैं, देश को बदनाम करने वाले हैं और सेक्युलर कैरेक्टर को डैमेज करने वाले हैं. हम इन सबके ख़िलाफ़ हैं. जो किया, ग़लत किया. मैं उसकी मुख़ालफ़त कर रहा हूँ. इस तरह के ज़हरीले बयानों को हमने किसी तरह जस्टीफ़ाई नहीं किया है और न करना चाहिए.''

चुनाव आयोग ने परवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर को आचार संहिता के उल्लंघन का दोषी पाते हुए उनके चुनाव प्रचार पर रोक लगा दी थी.

दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक़, "उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़की हिंसा से पहले बीजेपी नेताओं के कई ऐसे बयान सामने आए, जिनमें खुलेआम नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे लोगों और उनके मक़सद पर बेबुनियाद तरीक़े से सवाल उठाए गए, सांप्रदायिकता से भरी अनुचित टिप्पणियां की गईं, हिंसा की धमकी दी गई और शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों को नकारात्मक दृष्टिकोण से दिखा कर उनके ख़िलाफ़ एक सोच विकसित की गई."

परवेश वर्मा

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'भाषण देने से दंगे भड़काने का आरोप सिद्ध नहीं'

फ़रवरी में राजधानी में हुए दंगों में 53 लोगों की मौत हुई, सैकड़ों घायल हुए और घरों, दुकानों, धार्मिक स्थलों का सामान लूटकर आग लगा दी गई.

इन मामलों की पड़ताल कर रही दिल्ली पुलिस ने पिछले महीनों में कई चार्जशीट दायर की हैं. पीड़ितों ने बयानों में बीजेपी नेताओं के नाम भी दिए हैं पर ये किसी चार्जशीट का हिस्सा नहीं बने हैं.

मुख़्तार अब्बास नक़वी के मुताबिक़ महज़ भाषण देने से दंगे भड़काने का आरोप सिद्ध नहीं होता, उसके लिए जाँच एजेंसियों की तहक़ीक़ात ज़रूरी है.

कपिल मिश्रा

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नक़वी ने कहा, "इस तरह के ज़हरीले बयान को हमने ना कभी सही ठहराया है, ना ठहराना चाहिए, हमने कार्रवाई की है, लेकिन उसे सार्वजनिक करने की ज़रूरत नहीं है."

उन्होंने सांसदों पर की गई कार्रवाई का व्यक्तिगत ब्यौरा देने से इनकार कर दिया.

'विरोध करनेवाले, सभी मुसलमानों के प्रतिनिधि नहीं'

अतंरराष्ट्रीय संस्था, 'ह्यूमन राइट्स वॉच' की एक रिपोर्ट में दिल्ली, असम और उत्तर प्रदेश के लोगों से बात करने के बाद ये कहा गया है कि नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) मुसलमानों से भेदभाव करता है और देश-व्यापी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के ऐलान के बाद ही देश में मुसलमान समुदाय के ख़िलाफ़ हिंसा भड़की.

शाहीन बाग़

बाहरी दुनिया में और देश के भीतर प्रदर्शनों में मोदी सरकार पर मुस्लिम-विरोधी होने के आरोप लगे हैं. मुख़्तार अब्बास नक़वी इसे गुमराह करने वाला बताया है.

उन्होंने कहा, "दो सौ प्रदर्शनकारी, बीस करोड़ मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करते, ये वही लोग हैं जिन्होंने 2014 में असहिष्णुता का मुद्दा उठाया, फिर अवार्ड-वापसी की, फिर देश में किसी ने नहीं सुनी तो दुनिया में कहने लगे कि अल्पसंख्यकओं के अधिकारों को ख़तरा है, पर ये मुट्ठी भर लोग सारे अल्पसंख़्यक नहीं हैं."

'तानाशाही वो थी, ये नहीं'

बहुत से सामाजिक कार्यकर्ता, जैसे- वरवर राव, सुधा भारद्वाज और गौतम नवलखा जेल में बंद हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुछ प्रोफ़ेसरों को भी गिरफ़्तार किया गया है.

इन पर भीमा कोरेगांव की हिंसा भड़काने का आरोप है. इसके अलावा सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों से जुड़े 'पिंजरा तोड़' और 'जामिया कोऑरडिनेशन कमिटी' के सदस्य, जिन पर दिल्ली दंगों की साज़िश का आरोप लगाया गया है.

सुधा भारद्वाज

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ऐक्टिविस्ट्स को आतंकवाद निरोधी यूएपीए (अनलॉफुल एक्टिविटी प्रिवेंशन एक्ट) जैसे कड़े क़ानून के तहत गिरफ़्तार किया गया है.

इनका आरोप है कि इन्हें सरकार से असहमति ज़ाहिर करने की वजह से निशाना बनाया जा रहा है.

मुख़्तार अब्बास नक़वी ने इस सवाल के जवाब में कांग्रेस की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दौर में असहमति के चलते हुई गिरफ़्तारियों का हवाला दे दिया.

उन्होंने उसे 'असहमति पर तानाशाही' बताया और कहा, "इस दौर में ऐसा नहीं हो रहा, जो ऐसा सोचते हैं उन्होंने वो भुगता नहीं है, जिस दिन वो ये समझ लेंगे वो ये भूल जाएंगे कि तानाशाही इस देश में है".

ट्रिपल तलाक़

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तीन तलाक़ क़ानून से पहले थे हज़ारों मामले

एक बार में दिए जाने वाले तीन तलाक़ या 'तलाक़-ए-बिद्दत' को ग़ैर-क़ानूनी क़रार देने वाले क़ानून के एक साल पूरा होने पर नक़वी ने कुछ नए आँकड़े साझा किए.

ये आँकड़े लोकसभा में जुलाई 2019 में बिल पेश करते व़क्त क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद की ओर से दिए आँकड़ों से कहीं ज़्यादा हैं.

प्रसाद ने तब बताया था कि पिछले क़रीब दो साल में देशभर में तीन तलाक़ के 345 मामले सामने आए. ये वो मियाद थी जब सुप्रीम कोर्ट ने 'तलाक़-ए-बिद्दत' को ग़ैर-क़ानूनी क़रार दिया था पर इसको लेकर कोई क़ानून नहीं बनाया गया था.

आख़िर लोकसभा और राज्यसभा में पारित होने के बाद एक अगस्त 2019 से एक साथ तीन तलाक़ देना जुर्म बन गया जिसके लिए अधिकतम तीन साल की सज़ा हो सकती है.

औरत या उसके रिश्तेदार की ओर से शिकायत किए जाने पर मर्द को जेल होगी और मैजिस्ट्रेट के सामने बयान होने के बाद उनकी मर्ज़ी पर ही ज़मानत हो सकेगी.

सरकार ने ये भी साफ़ किया है कि ये क़ानून सितंबर 2018 से देश में लागू माना जाएगा.

अब अल्पसंख्यक कार्य मंत्री के मुताबिक़ बारह राज्यों के व़क्फ़ बोर्ड, अल्पसंख्यक आयोग और स्थानीय प्रशासन से मिली जानकारी के तहत कई राज्यों में तीन तलाक़ के मामलों में पिछले एक साल में औसतन नब्बे प्रतिशत से भी ज़्यादा गिरावट आई है.

उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में 1985 से अगस्त 2019 (जब क़ानून पारित हुआ) यानी क़रीब 34 वर्षों में एक साथ तीन तलाक़ के 63,400 मामले हुए और पिछले एक साल में 281.

पश्चिम बंगाल में यही आँकड़ा 51,800 और 32 बताया गया, यानी क़रीब 97 प्रतिशत की औसतन गिरावट.

तीन तलाक़

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मुख़्तार अब्बास नक़वी ने बताया, "कई मामलों में पुलिस मामला दर्ज करने की जगह सुलह सफ़ाई की कोशिश करती है और साथ ही मैजिस्ट्रेट के सामने बयान देकर ज़मानत का प्रावधान भी मौजूद है."

मुस्लिम महिलाओं के साथ काम करनेवाली ऐक्टिविस्ट्स के मुताबिक़ क़ानून में गिरफ़्तारी का प्रावधान होने की वजह से मर्दों में कुछ डर तो ज़रूर पैदा हुआ है पर इससे बचने के लिए कई, अपनी पत्नीयों को बिना तलाक़ दिए ही छोड़ने का रास्ता भी अपना रहे हैं.

साथ ही पुलिस में क़ानून की जानकारी का अभाव है और कई औरतें अपने पति को जेल नहीं भेजना चाहतीं, बल्कि अपनी शादी बचाना चाहती हैं.

ऐसे में ट्रिपल तलाक़ के मामलों पर क़ानून का पूरा असर समझने के लिए थोड़ा और समय और अनुभव इकट्ठा करने की ज़रूरत है.

मुख़्तार अब्बास नक़वी ने कहा कि मुसलमान उनकी पार्टी को पसंद भी करते हैं और 'सबका साथ सबका विकास' की उनकी नीति की वजह से वोट भी देते हैं पर उनके बारे में नफ़रत और झूठी जानकारी फैलाई जाने की वजह से कुछ लोगों के मन में ग़लत धारणाएं बन गई हैं.

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