सोनिया गांधी क्यों नरसिम्हा राव को याद करने पर मजबूर हुईं- नज़रिया

पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव

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    • Author, अनिल जैन
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

इसे कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की मजबूरी ही कहेंगे कि उसे पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव को उनकी मृत्यु के क़रीब डेढ़ दशक बाद याद करना पड़ा.

सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने राव को उनकी जन्म शताब्दी के मौक़े पर न सिर्फ़ एक 'समर्पित कांग्रेसी और विद्वान नेता' के तौर पर याद किया, बल्कि उनके साहसिक नेतृत्व की भरपूर सराहना भी की.

दोनों नेताओं ने अलग-अलग जारी अपने संदेश में प्रधानमंत्री के तौर पर राव की उपलब्धियों की चर्चा करते हुए कहा, "आर्थिक मोर्चे पर उनके दूरदर्शी और साहसिक फ़ैसलों से देश ने नए युग में प्रवेश किया और आधुनिक भारत को नया आकार मिला."

पाँच वर्ष तक देश के प्रधानमंत्री और इतने ही समय तक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे राव के योगदान को प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद आठ वर्ष के शेष जीवनकाल में पार्टी ने कभी नहीं सराहा.

अलबत्ता इस दौरान उन्हें पार्टी ने उपेक्षित और अपमानित ज़रूर किया. मरणोपरांत भी उन्हें अपनी पार्टी से सम्मान और मान्यता हासिल करने में पूरे डेढ़ दशक लग गए.

कांग्रेस के प्रथम परिवार को मजबूर होकर दिवंगत प्रधानमंत्री को उनकी मृत्यु के डेढ़ दशक बाद इतनी शिद्दत से याद करना पड़ा, इसकी वजह क्या है?

इस बात की कल्पना करना कठिन है कि अगर कांग्रेस के सितारे बुलंदी पर होते, तो सोनिया गांधी राव या उन जैसे किसी दूसरे नेता के प्रति सम्मान प्रकट कर रही होतीं.

सोनिया गांधी और राहुल गांधी

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विरोधियों में उपजा प्रेम बना संकट

दरअसल, राव के जन्म शताब्दी वर्ष के मौक़े पर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में जिस तरह क्षेत्रीय दलों और भारतीय जनता पार्टी ने उनकी विरासत को राजनीतिक तौर पर भुनाने की कोशिश शुरू कर दी है, उसने कांग्रेस नेतृत्व को भी अपने पूर्व अध्यक्ष के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलने के लिए मजबूर किया है.

इससे पहले तो कभी उनकी जयंती या पुण्यतिथि पर भी उन्हें याद करने की औपचारिकता भी नहीं निभाई गई.

कहा जा सकता है कि यह एक तरह की अवसरवादिता भी है और देश में परवान चढ़ चुकी अस्मिता की राजनीति को क़बूल करने की मजबूरी भी. मृत्यु के बाद पूरी तरह भुला दिए गए राव अस्मिता की राजनीति की वजह से ही अपने जन्म शताब्दी वर्ष में अचानक चर्चा में आ गए हैं.

उनके नाम पर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव यानी केसीआर ने अपनी राजनीतिक ज़मीन मज़बूत करने की दिशा में पहल की है. उन्होंने तेलंगाना सरकार की ओर से पूरे साल भर राव की याद में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करने और उनकी याद को स्थायी बनाने के लिए एक स्मारक बनाने का ऐलान किया है.

इस मौक़े पर केसीआर ने अख़बारों में पूरे-पूरे पेज के विज्ञापन भी दिए, जिनमें राव के बारे में लिखा है, 'तेलंगाना का बेटा, भारत का गौरव.'

तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव

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दरअसल, 1977 में राष्ट्रीय राजनीति में आने से पहले राव उस अविभाजित आंध्र प्रदेश में कई वर्षों तक मंत्री और मुख्यमंत्री भी रहे थे, जिसमें तेलंगाना भी शामिल था.

चूँकि राव का जन्मस्थान तेलंगाना में पड़ता है और वे तैलंग ब्राह्मण समुदाय से संबंध रखते हैं, लिहाजा मुख्यमंत्री केसीआर का मक़सद राव के ज़रिए तैलंग भावनाओं को भुनाना और अपने सूबे के ब्राह्मणों को रिझाना है.

यही मक़सद तेलुगू देसम पार्टी टीडीपी का भी है इसीलिए उसने राव को भारत रत्न से सम्मानित करने की मांग की है. चूँकि भाजपा भी तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में अपनी ज़मीन तैयार करना चाहती है, इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह जब कभी तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के दौरे पर जाते हैं, तो आजीवन कांग्रेसी रहे राव को याद करना नहीं भूलते हैं.

वे जब कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उसे एक परिवार की पार्टी बताते हैं, तब भी राव की महानता का बखान करते हुए कांग्रेस नेतृत्व पर उनके अपमान का आरोप लगाते हैं.

कांग्रेस को लोकसभा और दोनों राज्यों में विधानसभा के पिछले चुनाव में बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा है, दोनों राज्यों में उसकी हार की वजह भले ही राव की उपेक्षा न रही हो, लेकिन मौजूदा हालात में इन राज्यों में उसे तेलंगाना राष्ट्र समिति, वाईएसआर कांग्रेस, टीडीपी और भाजपा की चुनौती का मुक़ाबला अकेले ही करना है.

अपनी इन सभी विरोधी पार्टियों में राव के प्रति उपजे प्रेम के चलते ही कांग्रेस नेतृत्व ने भी पूर्व प्रधानमंत्री को मरणोपरांत अपनाने का फ़ैसला किया.

इस सिलसिले में उसने पहले तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस कमेटी को राव जन्म शताब्दी वर्ष के दौरान पूरे वर्ष भर कार्यक्रम आयोजित करने के निर्देश दिए और फिर उसके शुरुआती कार्यक्रम के लिए जारी अपने संदेश में उनके योगदान की भरपूर सराहना की.

इससे पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की कि प्रधानमंत्री के तौर उनकी उपलब्धियाँ कांग्रेस की उपलब्धियाँ हैं, किसी और की नहीं.

सोनिया गांधी और राहुल गांधी

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फिर तंगदिल रही कांग्रेस

हालाँकि, यह सब करते हुए भी कांग्रेस ने बेहद तंगदिली का परिचय दिया. कांग्रेस नेतृत्व ने राव के जन्म शताब्दी पर पूरे वर्ष भर कार्यक्रम आयोजित करने का निर्देश सिर्फ़ अपनी पार्टी की तेलंगाना इकाई को ही दिया है यानी देश के प्रधानमंत्री और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे दिवंगत नेता की शख़्सियत को एक प्रदेश तक ही सीमित कर दिया गया, जबकि राव का व्यक्तित्व कई मायनों में अखिल भारतीय था.

राव मूल रूप से तेलुगू भाषी होते हुए भी हिंदी और अंग्रेज़ी के अलावा तमिल, कन्नड़, मलयालम, मराठी, ओडिया, बांग्ला, उर्दू, संस्कृत आदि कई भाषाओं के जानकार थे. यही नहीं, वे अपने गृह प्रदेश आंध्र के अलावा महाराष्ट्र और ओडिशा से भी लोकसभा के लिए निर्वाचित हो चुके थे.

कांग्रेस में तीन राज्यों से लोकसभा में पहुँचने वाले वे इंदिरा गांधी के बाद दूसरे नेता थे, इसलिए अगर कांग्रेस उनके जन्म शताब्दी वर्ष को देश भर में मनाती, तो इसका उसे राजनीतिक तौर पर फ़ायदा ही होता.

यह कांग्रेस नेतृत्व और कांग्रेसियों की मानसिकता ही है, जिसके चलते असंख्य नायकों और इतिहास पुरुषों की विरासत वाली 135 साल पुरानी पार्टी हमेशा महात्मा गांधी के अलावा सिर्फ़ एक (नेहरू-गांधी) परिवार के ही दिवंगत नेताओं का स्मरण करती है.

यही वजह है कि उसके विरोधी उसे एक परिवार की पार्टी कहते हैं और इसी वजह से स्वाधीनता संग्राम के कई कांग्रेसी नायकों को भाजपा अपना वैचारिक पुरखा बताती रहती है.

पीएम नरेंद्र मोदी

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भाजपा और कांग्रेस में अंतर

यह जगजाहिर तथ्य है कि बतौर गृह मंत्री सरदार पटेल ने महात्मा गांधी की हत्या के लिए संघ को ज़िम्मेदार मानते हुए उस पर प्रतिबंध लगा दिया था, इसी तरह सुभाषचंद्र बोस ने 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद हिंदू महासभा के कार्यक्रमों में कांग्रेस जनों के शामिल होने पर रोक लगा दी थी, लेकिन इन दोनों को ही भाजपा अपनी विचार परंपरा से जोड़ती है.

यही नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस भी प्रदेश के दौरे पर जाते हैं तो वे वहाँ अपने भाषण में उन बड़े कांग्रेसी नेताओं का नाम अक्सर लेते हैं, जिन्हें कांग्रेस कभी याद नहीं करती. मसलन, वे असम में जाते हैं तो गोपीनाथ बोर्दोलोई, उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह और हरियाणा में चौधरी देवीलाल तक का स्मरण करने और उनसे अपनी विचारधारा का जुड़ाव बताने से संकोच नहीं करते.

बहरहाल, सवाल है कि जब भाजपा को सरदार पटेल और सुभाषचंद्र बोस जैसी शख़्सियत को अपनाने में कोई संकोच महसूस नहीं होता, तो फिर कांग्रेस को अपने इन पुरखों को अपनाने-याद करने में क्यों परेशानी होती है?

सिर्फ़ सरदार पटेल और सुभाष बाबू ही नहीं, एक लंबी फ़ेहरिस्त है स्वाधीनता संग्राम के नायकों की, जिन्होंने आजीवन कांग्रेस में रहते हुए आधुनिक भारत के निर्माण में अपना योगदान दिया है, लेकिन कांग्रेस ने उन्हें भुला दिया.

याद नहीं आता कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने कभी संविधान सभा के अध्यक्ष और देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को या देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना आजाद को उनकी जयंती या पुण्यतिथि पर उसी तरह याद किया हो, जैसे नेहरू, इंदिरा या राजीव गांधी को करती है.

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री
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कभी देखने-सुनने में नहीं आया कि कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी या राहुल गांधी लालबहादुर शास्त्री को उनके जन्मदिवस या पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि देने उनकी समाधि पर गए हों.

राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, क्षेत्रीय स्तर पर भी कांग्रेस के पास ऐसे नायकों की कमी नहीं है, जिन्होंने लंबे समय तक अपने राज्यों को चमकदार नेतृत्व दिया, कांग्रेस की जड़ें मज़बूत कीं और राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की.

इस सिलसिले में उत्तर प्रदेश में संपूर्णानंद, चंद्रभानु गुप्त, चौधरी चरण सिंह, कमलापति त्रिपाठी, हेमवतीनंदन बहुगुणा और बिहार में श्रीकृष्ण सिंह, कृष्ण बल्लभ सहाय, भोला पासवान शास्त्री, केदार पांडेय, ललित नारायण मिश्र आदि को याद किया जा सकता है, लेकिन पार्टी उनका कभी नाम तक नहीं लेती.

मंडल कमीशन वाले बीपी मंडल भी कांग्रेस में रहते हुए ही बिहार के मुख्यमंत्री हुए थे, वे बाद में भले ही कांग्रेस छोडकर फिर से अपनी पुरानी सोशलिस्ट पार्टी और फिर जनता पार्टी में चले गए थे, लेकिन आज पूरे देश में पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में को मिल रहे 33 फ़ीसदी आरक्षण के साथ तो उनका ही नाम जुड़ा हुआ है, लेकिन याद नहीं आता कि कांग्रेस ने कभी उन्हें याद किया हो.

इसी तरह मध्य प्रदेश में द्वारका प्रसाद मिश्र, रविशंकर शुक्ल, प्रकाशचंद्र सेठी, श्यामाचरण शुक्ल और अर्जुन सिंह, राजस्थान में मोहनलाल सुखाड़िया, जयनारायण व्यास, हरिदेव जोशी, महाराष्ट्र में यशवंतराव चह्वाण, वसंतराव नाइक, वसंत दादा पाटिल, कर्नाटक में एस निजलिंगप्पा, देवराज अर्स, आंध्र प्रदेश में टी प्रकाशम, ब्रह्मानंद रेड्डी, तमिलनाडु में सी राजगोपालाचारी, के कामराज, एम भक्तवत्सलम, ओडिशा में हरेकृष्ण महताब और नवकृष्ण चौधुरी जैसे चमकदार नाम हैं, जिनकी विरासत से कांग्रेस अपने को स्वाभाविक तौर पर जोड़ सकती है.

इतने सारे और इतने बड़े नाम बीजेपी के पास नहीं हैं, लेकिन कांग्रेस अपने मौजूदा नेता को परिवार से बाहर की विरासत से काटकर खड़ा करने की मशक्कत में लगी है.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी

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कांग्रेस की बेड़ियाँ

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी कई बार कह चुके हैं कि देश इस समय उसी तरह की चुनौतियों से दो-चार हो रहा है, जैसी चुनौतियाँ स्वाधीनता संग्राम के दौर में थीं. वे यह भी कहते रहते हैं कि जिन मूल्यों को लेकर आज़ादी की लड़ाई लड़ी गई थी, वे सारे मूल्य आज ख़तरे में हैं.

सवाल है कि राहुल गांधी को अगर वाक़ई मौजूदा दौर की चुनौतियों का अहसास है, तो सवाल है कि वे उन चुनौतियों का सामना किस तरह करना चाहते हैं?

यह सच है कि कांग्रेस इस समय अपने इतिहास के सबसे दारुण दौर से गुज़र रही है, वैचारिक तौर पर भी वह भटकाव की शिकार है, नेतृत्व का संकट भी उसके समक्ष बना हुआ है.

लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण संघर्ष यानी जनांदोलन के संस्कार उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं में विकसित ही नहीं हो पाए हैं. इसके अलावा यह भी एक सच्चाई है कि क्षेत्रीय और वर्गीय आकांक्षाओं-अस्मिताओं को हिकारत से देखने की मानसिकता से कांग्रेस अभी भी पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकी है.

इस सबके बावजूद विपक्ष के नाम पर आज वही एक पार्टी है, जो भाजपा की चुनौती का मुक़ाबला कर सकती है, क्योंकि उसके पास देशव्यापी एक संगठनात्मक ढांचा है, देश के हर गाँव-क़स्बे में उसके पास कार्यकर्ता हैं.

अगर राहुल गांधी ईमानदारी से यह महसूस करते हैं कि आज देश वाक़ई गंभीर संकट के दौर से गुज़र रहा है और स्वाधीनता संग्राम के दौरान विकसित हुए राष्ट्रीय मूल्य ख़तरे में हैं तो उन्हें अपनी पार्टी को स्वाधीनता संग्राम के उन सभी नायकों की विरासत से जोडना होगा, जिन्होंने कांग्रेस के झंडे तले आज़ादी की लड़ाई में शिरकत की थी.

उनकी पार्टी को उन समाजवादी और वामपंथी नायकों के बारे में भी अपना दृष्टिकोण बदलना होगा, जो आज़ादी के बाद वैचारिक मतभेदों या व्यक्तित्व की टकराहट के चलते कांग्रेस से अलग हो गए थे.

सवाल यही है कि जिस तरह कांग्रेस ने राव को कुछ हद तक अपनाते हुए उनकी विरासत से अपने को जोड़ने की कोशिश की है, उसी तरह क्या वह अन्य राज्यों में भी अपने दिवंगत पूर्वजों की विरासत से अपने को जोड़ने के लिए कोई पहल करेगी?

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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