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कोरोना काल में टूट रही है कोचिंग संस्थानों की साँस
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
देवेश तिवारी (बदला हुआ नाम) पिछले पाँच साल से सिविल सेवा की तैयारी कराने वाले कुछ संस्थानों में पढ़ाते हैं.
दिल्ली के अलावा वो लखनऊ, इलाहाबाद और जयपुर भी पढ़ाने जाते थे. कोचिंग संस्थानों से उन्हें हर महीने क़रीब एक लाख रुपए की आमदनी होती थी. लॉकडाउन के बाद कोचिंग संस्थान बंद चल रहे हैं और देवेश तिवारी बेरोज़गार हो गए हैं.
यह हाल अकेले देवेश तिवारी का ही नहीं, बल्कि कोचिंग संस्थानों में पढ़ाने वाले हज़ारों शिक्षकों का है, जो या तो फ़ुल टाइम या फिर पार्ट टाइम इस पेशे से जुड़े हुए हैं.
कोचिंग संस्थानों के संचालक और उनके ज़रिए रोज़गार पाए लोग भी इस समय बेकारी का दंश झेल रहे हैं और आगे भी स्थिति कुछ बेहतर होने की उन्हें उम्मीद नहीं दिख रही है.
कोरोना संकट के चलते अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र की गति मंद पड़ गई है.
देश भर में छाए इस आर्थिक संकट का असर निजी शिक्षण संस्थानों, कोचिंग संस्थानों और इससे जुड़े लोगों पर भी पड़ रहा है.
करोड़ों रुपए का व्यवसाय
अगर बात उत्तर प्रदेश की करें, तो इलाहाबाद, लखनऊ, गोरखपुर, वाराणसी, बरेली, कानपुर जैसे तमाम शहर ऐसे हैं, जो कोचिंग संस्थानों के बड़े केंद्र के रूप में जाने जाते हैं.
इन कोचिंग संस्थानों की वजह से यहाँ बड़ी संख्या में स्थानीय छात्रों के अलावा आस-पास से भी छात्र आते हैं और इस वजह से ये इन शहरों की अर्थव्यवस्था में भी ख़ासा योगदान देते हैं.
ये कोचिंग संस्थान सिविल सेवाओं के अलावा बैंकिंग, एसएससी, इंजीनियरिंग-मेडिकल जैसी अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराते हैं.
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हालाँकि इस बारे में कोई आधिकारिक आँकड़ा तो नहीं है, लेकिन जानकारों के मुताबिक़, देश भर में कोचिंग संस्थानों का हज़ारों करोड़ रुपए का व्यवसाय है.
इन संस्थानों की आय के मुख्य स्रोत छात्र होते हैं और छात्र लॉकडाउन के चलते आ नहीं रहे हैं.
कोचिंग संचालकों ने सरकार से मांग की है कि उन्हें कुछ सहूलियतें दी जाएँ ताकि इस उद्योग से जुड़े लोगों के सामने आए आर्थिक संकट से बचा जा सके.
लॉकडाउन गाइडलाइंस
उत्तर प्रदेश में कोचिंग संस्थानों के संगठन यूपी कोचिंग एसोसिएशन से राज्य के क़रीब 250 संस्थान जुड़े हैं.
एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय सिंह कहते हैं, "मार्च की शुरुआत से ही क़रीब सारे कोचिंग संस्थान बंद चल रहे हैं. यानी, चार महीने से हमें कोई आमदनी नहीं हुई है. सरकार जो गाइडलाइन जारी करती है, उसमें यूनिवर्सिटी-कॉलेज का ज़िक्र तो होता है लेकिन कोचिंग संस्थानों के बारे में कोई चर्चा नहीं होती. यूनिवर्सिटी-कॉलेजों को सरकार ने कई तरह की छूट दे रखी है, लेकिन हमारी कोई पूछ नहीं है. ज़्यादातर कोचिंग संस्थान किराए के मकानों में चलते हैं. शुरू में तो हमने किराया दिया लेकिन अब असमर्थ हैं और मकान मालिक किराए के लिए दबाव बना रहे हैं."
उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद यानी प्रयागराज में बड़ी संख्या में प्रतियोगी छात्र रहते हैं और सैकड़ों की संख्या में यहाँ कोचिंग संस्थान भी हैं.
एक अनुमान के मुताबिक़, विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले यहाँ क़रीब 500 कोचिंग संस्थान हैं.
हालाँकि प्रयागराज के ज़िला विद्यालय निरीक्षक आरएन विश्वकर्मा के मुताबिक़ उनके यहाँ रजिस्टर्ड संस्थानों की संख्या सिर्फ़ 137 ही है.
ऑनलाइन कक्षाओं का विकल्प
तमाम कोचिंग संचालकों को लॉकडाउन की वजह से अपना संस्थान बंद करना पड़ा है.
प्रयागराज में डॉक्टर जितेंद्र श्रीवास्तव ख़ुद का कोचिंग सेंटर चलाते थे लेकिन एक महीने पहले उन्होंने संस्थान बंद कर दिया.
वो बताते हैं, "आय का स्रोत सिर्फ छात्र हैं. दो महीने तक तो बिल्डिंग का किराया देते रहे लेकिन अब मुश्किल हो रहा था. दूसरी बात यह कि जल्दी कोई उम्मीद भी नहीं है कि लॉकडाउन खुले और बच्चे पढ़ने आने लगें. प्रयागराज शहर में दर्जनों कोचिंग संस्थान इस वजह से बंद हो गए हैं. जो बड़े संस्थान हैं, वो कुछ दिनों तक तो ख़ुद को बचा सकते हैं लेकिन ज़्यादा दिनों तक उनका भी चल पाना मुश्किल है."
हालांकि कुछ संस्थान छात्रों को ऑनलाइन कक्षाओं का विकल्प दे रहे हैं और कुछ ने इसकी शुरुआत भी कर दी है लेकिन अभी ऑनलाइन माध्यम से पढ़ने वाले छात्रों की संख्या बेहद कम है. दूसरे, ऑनलाइन कक्षाएँ बेरोज़गारी कम करने में बहुत ज़्यादा मददगार भी नहीं हो पाएँगी.
यूपी-बिहार के छात्रों का एक बड़ा समूह प्रयागराज, वाराणसी और लखनऊ में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए आता है.
इन छात्रों और कोचिंग संस्थानों की वजह से इन शहरों में भी हज़ारों लोगों को रोज़गार मिलता है.
छात्रों पर टिकी अर्थव्यवस्था
प्रयागराज में कई मोहल्ले ऐसे हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था ही छात्रों पर टिकी हुई है. लॉकडाउन के बाद ऐसे ज़्यादातर मोहल्ले ख़ाली हो गए हैं.
शाम को जहाँ छात्रों की भीड़ लगी रहती थी, वो सड़कें वीरान हो गई हैं और वहाँ के तमाम दुकानदारों की आमदनी पर भी काफ़ी प्रभाव पड़ा है.
छात्रों की बड़ी संख्या की वजह से इन शहरों में कई मकान हैं, जहाँ लॉज या पीजी बनाकर छात्रों को किराए पर दिया जाता है.
लेकिन ये मकान अब ख़ाली हो गए हैं और इनके मालिकों के सामने भी रोज़ी रोटी का संकट आ पड़ा है.
प्रयागराज के मम्फ़ोर्डगंज इलाक़े में एक पीजी चलाने वाले एमपी सिंह कहते हैं, "लड़कियों के लिए तीन महीने से हमारे 100 बेड ख़ाली हैं. लेकिन ख़र्च उतना ही है. हमारे पास 12 कर्मचारी हैं जिनको क़रीब एक लाख रुपए प्रतिमाह वेतन देना पड़ रहा है. ऊपर से बैंक से कंस्ट्रक्शन लोन लिया है मैंने, उसका ईएमआई देना पड़ रहा है. सरकार से अनुरोध है कि हमारे लोन पर ब्याज माफ़ कर दिया जाए."
एमपी सिंह कहते हैं कि अगर यही स्थिति कुछ महीने और चलती रही तो उनके जैसे सैकड़ों लोग बर्बाद हो जाएँगे. लखनऊ के अलीगंज इलाक़े में भी ऐसे कई पीजी हैं और ज़्यादातर इन दिनों ख़ाली पड़े हैं.
प्रतियोगी परीक्षाओं का बड़ा केंद्र
मकान मालिकों को लोन की ईएमआई के अलावा कॉमर्शियल रेट पर बिजली का बिल और रख-रखाव का ख़र्च अलग से भरना पड़ रहा है.
प्रयागराज शहर की अर्थव्यवस्था में एक बड़ा योगदान छात्रों का है.
इसी शहर में पले-बढ़े और कई प्रशासनिक पदों पर रह चुके रिटायर्ड आईएएस बादल चटर्जी कहते हैं, "इस शहर में मध्यम वर्ग और निम्न मध्य वर्ग के लोगों के लिए छात्रों को किराए पर कमरा देना आय का मुख्य स्रोत है जिससे बहुत से परिवारों का भरण-पोषण होता है. विश्वविद्यालय और प्रतियोगी परीक्षाओं का बड़ा केंद्र होने के कारण यहाँ बहुत सारी किताबों की दुकानें हैं. कई मोहल्लों में किराना की दुकानें, सब्ज़ी की दुकानें छात्रों की बदौलत ही चलती हैं. सच तो यह है कि यहाँ का लोकल बाज़ार बहुत हद तक छात्रों पर निर्भर है."
कोचिंग संस्थानों के संचालकों ने अपनी समस्या सरकार तक पहुँचाने की भी कोशिश की है लेकिन फ़िलहाल उन्हें राहत की उम्मीद नहीं दिखती.
क्या कहते हैं यूपी के डिप्टी सीएम
कोचिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय सिंह ने बताया कि उन लोगों ने इस बारे में उप मुख्यमंत्री डॉक्टर दिनेश शर्मा से भी मुलाक़ात की थी और संस्थान चलाने की अनुमति मांगी थी लेकिन उन्होंने साफ़ तौर पर इनकार कर दिया.
डिप्टी सीएम डॉक्टर दिनेश शर्मा बीबीसी से बातचीत में कहते हैं कि कोचिंग संस्थानों को ऑनलाइन जैसे अन्य माध्यमों में अपने को बचाने का रास्ता ढूँढ़ना चाहिए.
डॉक्टर शर्मा कहते हैं, "क्लास रूम टीचिंग का माहौल अभी नहीं है. इसलिए टीचिंग शुरू नहीं हो सकती क्योंकि रिस्क है और बच्चों की ज़िंदग़ी के साथ खिलवाड़ करना ठीक नहीं है. मैंने उन्हें सुझाव दिया है कि विदेशों में भी तमाम कोचिंग संस्थान चल रहे हैं इसलिए इन लोगों को भी नए विकल्पों को तलाशना चाहिए. ऑनलाइन कोचिंग दी जाए. बहुत से लोग चला भी रहे हैं. जहाँ तक आर्थिक मदद की बात है तो यह हम लोग कैसे कर सकते हैं. किसी एक सेक्टर को देने का मतलब है कि फिर दूसरे उद्योग भी इसकी मांग करेंगे. अलग-अलग क्षेत्रों के लिए आर्थिक पैकेज दे पाना संभव नहीं है."
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