कोरोना काल में टूट रही है कोचिंग संस्थानों की साँस
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Author, समीरात्मज मिश्र
पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
देवेश तिवारी (बदला हुआ नाम) पिछले पाँच साल से सिविल सेवा की तैयारी कराने वाले कुछ संस्थानों में पढ़ाते हैं.
दिल्ली के अलावा वो लखनऊ, इलाहाबाद और जयपुर भी पढ़ाने जाते थे. कोचिंग संस्थानों से उन्हें हर महीने क़रीब एक लाख रुपए की आमदनी होती थी. लॉकडाउन के बाद कोचिंग संस्थान बंद चल रहे हैं और देवेश तिवारी बेरोज़गार हो गए हैं.
यह हाल अकेले देवेश तिवारी का ही नहीं, बल्कि कोचिंग संस्थानों में पढ़ाने वाले हज़ारों शिक्षकों का है, जो या तो फ़ुल टाइम या फिर पार्ट टाइम इस पेशे से जुड़े हुए हैं.
कोचिंग संस्थानों के संचालक और उनके ज़रिए रोज़गार पाए लोग भी इस समय बेकारी का दंश झेल रहे हैं और आगे भी स्थिति कुछ बेहतर होने की उन्हें उम्मीद नहीं दिख रही है.
कोरोना संकट के चलते अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र की गति मंद पड़ गई है.
देश भर में छाए इस आर्थिक संकट का असर निजी शिक्षण संस्थानों, कोचिंग संस्थानों और इससे जुड़े लोगों पर भी पड़ रहा है.
करोड़ों रुपए का व्यवसाय
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अगर बात उत्तर प्रदेश की करें, तो इलाहाबाद, लखनऊ, गोरखपुर, वाराणसी, बरेली, कानपुर जैसे तमाम शहर ऐसे हैं, जो कोचिंग संस्थानों के बड़े केंद्र के रूप में जाने जाते हैं.
इन कोचिंग संस्थानों की वजह से यहाँ बड़ी संख्या में स्थानीय छात्रों के अलावा आस-पास से भी छात्र आते हैं और इस वजह से ये इन शहरों की अर्थव्यवस्था में भी ख़ासा योगदान देते हैं.
ये कोचिंग संस्थान सिविल सेवाओं के अलावा बैंकिंग, एसएससी, इंजीनियरिंग-मेडिकल जैसी अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराते हैं.
हालाँकि इस बारे में कोई आधिकारिक आँकड़ा तो नहीं है, लेकिन जानकारों के मुताबिक़, देश भर में कोचिंग संस्थानों का हज़ारों करोड़ रुपए का व्यवसाय है.
इन संस्थानों की आय के मुख्य स्रोत छात्र होते हैं और छात्र लॉकडाउन के चलते आ नहीं रहे हैं.
कोचिंग संचालकों ने सरकार से मांग की है कि उन्हें कुछ सहूलियतें दी जाएँ ताकि इस उद्योग से जुड़े लोगों के सामने आए आर्थिक संकट से बचा जा सके.
लॉकडाउन गाइडलाइंस
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उत्तर प्रदेश में कोचिंग संस्थानों के संगठन यूपी कोचिंग एसोसिएशन से राज्य के क़रीब 250 संस्थान जुड़े हैं.
एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय सिंह कहते हैं, "मार्च की शुरुआत से ही क़रीब सारे कोचिंग संस्थान बंद चल रहे हैं. यानी, चार महीने से हमें कोई आमदनी नहीं हुई है. सरकार जो गाइडलाइन जारी करती है, उसमें यूनिवर्सिटी-कॉलेज का ज़िक्र तो होता है लेकिन कोचिंग संस्थानों के बारे में कोई चर्चा नहीं होती. यूनिवर्सिटी-कॉलेजों को सरकार ने कई तरह की छूट दे रखी है, लेकिन हमारी कोई पूछ नहीं है. ज़्यादातर कोचिंग संस्थान किराए के मकानों में चलते हैं. शुरू में तो हमने किराया दिया लेकिन अब असमर्थ हैं और मकान मालिक किराए के लिए दबाव बना रहे हैं."
उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद यानी प्रयागराज में बड़ी संख्या में प्रतियोगी छात्र रहते हैं और सैकड़ों की संख्या में यहाँ कोचिंग संस्थान भी हैं.
एक अनुमान के मुताबिक़, विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले यहाँ क़रीब 500 कोचिंग संस्थान हैं.
हालाँकि प्रयागराज के ज़िला विद्यालय निरीक्षक आरएन विश्वकर्मा के मुताबिक़ उनके यहाँ रजिस्टर्ड संस्थानों की संख्या सिर्फ़ 137 ही है.
ऑनलाइन कक्षाओं का विकल्प
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तमाम कोचिंग संचालकों को लॉकडाउन की वजह से अपना संस्थान बंद करना पड़ा है.
प्रयागराज में डॉक्टर जितेंद्र श्रीवास्तव ख़ुद का कोचिंग सेंटर चलाते थे लेकिन एक महीने पहले उन्होंने संस्थान बंद कर दिया.
वो बताते हैं, "आय का स्रोत सिर्फ छात्र हैं. दो महीने तक तो बिल्डिंग का किराया देते रहे लेकिन अब मुश्किल हो रहा था. दूसरी बात यह कि जल्दी कोई उम्मीद भी नहीं है कि लॉकडाउन खुले और बच्चे पढ़ने आने लगें. प्रयागराज शहर में दर्जनों कोचिंग संस्थान इस वजह से बंद हो गए हैं. जो बड़े संस्थान हैं, वो कुछ दिनों तक तो ख़ुद को बचा सकते हैं लेकिन ज़्यादा दिनों तक उनका भी चल पाना मुश्किल है."
हालांकि कुछ संस्थान छात्रों को ऑनलाइन कक्षाओं का विकल्प दे रहे हैं और कुछ ने इसकी शुरुआत भी कर दी है लेकिन अभी ऑनलाइन माध्यम से पढ़ने वाले छात्रों की संख्या बेहद कम है. दूसरे, ऑनलाइन कक्षाएँ बेरोज़गारी कम करने में बहुत ज़्यादा मददगार भी नहीं हो पाएँगी.
यूपी-बिहार के छात्रों का एक बड़ा समूह प्रयागराज, वाराणसी और लखनऊ में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए आता है.
इन छात्रों और कोचिंग संस्थानों की वजह से इन शहरों में भी हज़ारों लोगों को रोज़गार मिलता है.
छात्रों पर टिकी अर्थव्यवस्था
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प्रयागराज में कई मोहल्ले ऐसे हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था ही छात्रों पर टिकी हुई है. लॉकडाउन के बाद ऐसे ज़्यादातर मोहल्ले ख़ाली हो गए हैं.
शाम को जहाँ छात्रों की भीड़ लगी रहती थी, वो सड़कें वीरान हो गई हैं और वहाँ के तमाम दुकानदारों की आमदनी पर भी काफ़ी प्रभाव पड़ा है.
छात्रों की बड़ी संख्या की वजह से इन शहरों में कई मकान हैं, जहाँ लॉज या पीजी बनाकर छात्रों को किराए पर दिया जाता है.
लेकिन ये मकान अब ख़ाली हो गए हैं और इनके मालिकों के सामने भी रोज़ी रोटी का संकट आ पड़ा है.
प्रयागराज के मम्फ़ोर्डगंज इलाक़े में एक पीजी चलाने वाले एमपी सिंह कहते हैं, "लड़कियों के लिए तीन महीने से हमारे 100 बेड ख़ाली हैं. लेकिन ख़र्च उतना ही है. हमारे पास 12 कर्मचारी हैं जिनको क़रीब एक लाख रुपए प्रतिमाह वेतन देना पड़ रहा है. ऊपर से बैंक से कंस्ट्रक्शन लोन लिया है मैंने, उसका ईएमआई देना पड़ रहा है. सरकार से अनुरोध है कि हमारे लोन पर ब्याज माफ़ कर दिया जाए."
एमपी सिंह कहते हैं कि अगर यही स्थिति कुछ महीने और चलती रही तो उनके जैसे सैकड़ों लोग बर्बाद हो जाएँगे. लखनऊ के अलीगंज इलाक़े में भी ऐसे कई पीजी हैं और ज़्यादातर इन दिनों ख़ाली पड़े हैं.
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इमेज कैप्शन, एक पीजी चलाने वाले एमपी सिंह
प्रतियोगी परीक्षाओं का बड़ा केंद्र
मकान मालिकों को लोन की ईएमआई के अलावा कॉमर्शियल रेट पर बिजली का बिल और रख-रखाव का ख़र्च अलग से भरना पड़ रहा है.
प्रयागराज शहर की अर्थव्यवस्था में एक बड़ा योगदान छात्रों का है.
इसी शहर में पले-बढ़े और कई प्रशासनिक पदों पर रह चुके रिटायर्ड आईएएस बादल चटर्जी कहते हैं, "इस शहर में मध्यम वर्ग और निम्न मध्य वर्ग के लोगों के लिए छात्रों को किराए पर कमरा देना आय का मुख्य स्रोत है जिससे बहुत से परिवारों का भरण-पोषण होता है. विश्वविद्यालय और प्रतियोगी परीक्षाओं का बड़ा केंद्र होने के कारण यहाँ बहुत सारी किताबों की दुकानें हैं. कई मोहल्लों में किराना की दुकानें, सब्ज़ी की दुकानें छात्रों की बदौलत ही चलती हैं. सच तो यह है कि यहाँ का लोकल बाज़ार बहुत हद तक छात्रों पर निर्भर है."
कोचिंग संस्थानों के संचालकों ने अपनी समस्या सरकार तक पहुँचाने की भी कोशिश की है लेकिन फ़िलहाल उन्हें राहत की उम्मीद नहीं दिखती.
क्या कहते हैं यूपी के डिप्टी सीएम
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इमेज कैप्शन, उप मुख्यमंत्री डॉक्टर दिनेश शर्मा
कोचिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय सिंह ने बताया कि उन लोगों ने इस बारे में उप मुख्यमंत्री डॉक्टर दिनेश शर्मा से भी मुलाक़ात की थी और संस्थान चलाने की अनुमति मांगी थी लेकिन उन्होंने साफ़ तौर पर इनकार कर दिया.
डिप्टी सीएम डॉक्टर दिनेश शर्मा बीबीसी से बातचीत में कहते हैं कि कोचिंग संस्थानों को ऑनलाइन जैसे अन्य माध्यमों में अपने को बचाने का रास्ता ढूँढ़ना चाहिए.
डॉक्टर शर्मा कहते हैं, "क्लास रूम टीचिंग का माहौल अभी नहीं है. इसलिए टीचिंग शुरू नहीं हो सकती क्योंकि रिस्क है और बच्चों की ज़िंदग़ी के साथ खिलवाड़ करना ठीक नहीं है. मैंने उन्हें सुझाव दिया है कि विदेशों में भी तमाम कोचिंग संस्थान चल रहे हैं इसलिए इन लोगों को भी नए विकल्पों को तलाशना चाहिए. ऑनलाइन कोचिंग दी जाए. बहुत से लोग चला भी रहे हैं. जहाँ तक आर्थिक मदद की बात है तो यह हम लोग कैसे कर सकते हैं. किसी एक सेक्टर को देने का मतलब है कि फिर दूसरे उद्योग भी इसकी मांग करेंगे. अलग-अलग क्षेत्रों के लिए आर्थिक पैकेज दे पाना संभव नहीं है."
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कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
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जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
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हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
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ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
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कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
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शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.