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पायलट-गहलोत विवाद: सत्ता के खेल में विधानसभा अध्यक्ष पर क्यों उठते हैं सवाल
- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
राजस्थान में सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच जारी राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई अब राजस्थान हाई कोर्ट तक पहुँच चुकी है.
इस राजनीतिक उठापटक में सचिन पायलट को राजस्थान के उप-मुख्यमंत्री और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के पद से पहले ही हटाया जा चुका है.
लेकिन पिछले हफ़्ते विधान सभा अध्यक्ष सीपी जोशी ने पायलट और उनके समर्थन में खड़े विधायकों को नोटिस भेजकर ये पूछा है कि उनकी सदस्यता क्यों रद्द न की जा जाए.
पायलट खेमे के विधायकों को इस नोटिस का जवाब बीते शुक्रवार तक देना था. लेकिन नोटिस का जवाब देने की जगह पायलट खेमे ने गुरुवार को विधानसभा अध्यक्ष के नोटिस के ख़िलाफ़ हाई कोर्ट में याचिका दाख़िल की.
राजस्थान हाई कोर्ट ने इस मामले में अब तक कोई फ़ैसला नहीं दिया है. ऐसा माना जा रहा है कि अगर पायलट खेमे को हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली है तो वे सुप्रीम कोर्ट जाने पर विचार कर सकते हैं.
लेकिन ये पहला मौक़ा नहीं है, जब विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष के फैसलों के ख़िलाफ़ अदालत की शरण ली हो.
साल 2011 में कर्नाटक में भी इसी तरह का मामला सामने आया था. तब कर्नाटक विधानसभा अध्यक्ष ने बीजेपी के 11 विधायकों की सदस्यता रद्द कर दी थी.
जब ये मामला हाई कोर्ट पहुँचा, तो विधायकों की सदस्यता रद्द किए जाने के पक्ष में फ़ैसला आया.
लेकिन जब ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, तो तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर की अध्यक्षता वाली पीठ ने विधायकों की सदस्यता रद्द नहीं करने का फ़ैसला सुनाया.
इससे पहले साल 1992 में एक विधायक की सदस्यता रद्द किए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट और मणिपुर के विधानसभा अध्यक्ष एच बोडोबाबू के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई थी.
भारत में कई बार ऐसे मौक़े आए हैं, जब विधान सभा अध्यक्षों की भूमिका और उनके अधिकारों को लेकर अदालतों में बहस हुई हैं.
लेकिन इसके बावजूद आज भी सदन के अध्यक्ष पर सवाल उठते रहे हैं.
उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गोवा में छिड़े राजनीतिक संग्राम और उनमें विधानसभा अध्यक्ष की भूमिकाएँ इसके ताज़ा उदाहरण हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि संविधान ऐसी स्थिति पैदा होने पर विधान सभा अध्यक्ष को क्या अधिकार देता है.
सदस्यता रद्द करने का अधिकार
विधानसभा के अध्यक्ष किसी भी राज्य में राजनीतिक उठापटक को देखते हुए साल 1985 में पास किए गए दल बदल क़ानून का सहारा ले सकते हैं.
इस क़ानून के तहत सदन के अध्यक्ष नीचे लिखी स्थितियां उत्पन्न होने पर सदस्यता रद्द कर सकते हैं.
- अगर कोई विधायक ख़ुद ही अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है.
- अगर कोई निर्वाचित विधायक पार्टी लाइन के ख़िलाफ़ जाता है.
- अगर कोई विधायक पार्टी व्हिप के बावजूद मतदान नहीं करता है.
- अगर कोई विधायक विधानसभा में अपनी पार्टी के दिशानिर्देशों का उल्लंघन करता है.
संविधान की दसवीं अनुसूची में निहित शक्तियों के तहत विधान सभा अध्यक्ष फ़ैसला ले सकता है.
लेकिन कई बार इस तरह के फ़ैसले कोर्ट के सामने पहुँचे हैं.
हालांकि, मूलत: इस क़ानून के तहत विधायकों की सदस्यता रद्द करने पर विधानसभा अध्यक्ष का फ़ैसला आख़िरी हुआ करता था.
लेकिन साल 1991 में सुप्रीम कोर्ट ने 10वीं सूची के सातवें पैराग्राफ़ को अवैध करार दिया जिसके तहत इस मामले पर आख़िरी फैसला स्पीकर का हुआ करता था.
सुप्रीम कोर्ट ने ये भी स्पष्ट कर दिया कि स्पीकर के फ़ैसले की क़ानूनी समीक्षा हो सकती है.
लेकिन राजस्थान के मामले में अब तक विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी ने विधायकों की सदस्यता रद्द किए जाने पर कोई फ़ैसला नहीं लिया है.
क्या कोर्ट जल्दी चले गए पायलट
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अभी इस स्थिति में इस मामले को कोर्ट में ले जाया जा सकता है.
संवैधानिक मामलों के जानकार फ़ैजान मुस्तफा मानते हैं कि अभी वो स्थिति नहीं आई थी, जिसमें सचिन पायलट हाई कोर्ट तक जाते.
वे कहते हैं, “राजस्थान के मामले में अभी विधानसभा अध्यक्ष ने नोटिस दिया है. इस नोटिस को चुनौती देने की बजाए सचिन पायलट अपना जवाब देते और स्पीकर उनकी सदस्यता भंग कर देता. ऐसे में न्यायालय को पूरा अधिकार मिल जाता है कि स्पीकर के फ़ैसले की चार आधारों के तहत समीक्षा की जा सके. ये आधार माला फाइड (बुरे इरादे), परवर्सिटी (दुराग्रह), संविधान का उल्लंघन या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन हैं.”
“लेकिन हरीश साल्वे और मुकुल रोहतगी ने कोर्ट से ये कहा है कि हमें सिर्फ़ दो दिन का समय दिया गया है, नोटिस का जवाब देने के लिए. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले हैं, जो ये बताते हैं कि नोटिस का जवाब देने के लिए हफ़्ते भर का समय दिया जाना अनिवार्य नहीं है. बल्कि ऐसा किया जाना चाहिए. ये संविधान में नहीं लिखा हुआ है. लेकिन इस मामले में हाई कोर्ट ने समय कल तक के लिए बढ़ा दिया तो जवाब भेजने के लिए दिया गया समय, एक हफ़्ते का हो जाएगा. मैं ये मानता हूँ कि अभी अगर इस मामले में हाई कोर्ट कोई हस्तक्षेप नहीं करे तो ये संवैधानिक परंपरा के तहत होगा.”
स्पीकर क्या सदस्यता रद्द कर सकते हैं?
ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या स्पीकर सीपी जोशी पायलट समेत 19 विधायकों की ओर से जवाब मिलने के बाद उनकी सदस्यता रद्द कर सकते हैं.
फैज़ान मुस्तफा मानते हैं कि सीपी जोशी विधानसभा अध्यक्ष के रूप में ये क़दम उठाने में सक्षम हैं.
वे कहते हैं, “संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत विधायकों की सदस्यता रद्द करने की पहली बात ये है कि विधायक ने स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दी. और दूसरी बात ये है कि विधायक ने व्हिप का उल्लंघन किया. अब सवाल उठता है कि ये कैसे तय किया जाएगा कि किसी विधायक ने स्वेच्छा से अपनी पार्टी छोड़ दी. ये तय करने का अधिकार असेंबली स्पीकर को दिया गया है."
अब स्पीकर ये देखता है कि कहाँ तक विधायक अभिव्यक्ति के अधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं और कहाँ ये अभिव्यक्ति के अधिकार की लक्ष्मण रेखा छोड़कर पार्टी की सदस्यता छोड़ने की ओर क़दम बढ़ा दिए हैं. ऐसे में स्पीकर परिस्थितिजन्य साक्ष्य देखते हैं.
एक मामले में परिस्थितिजन्य साक्ष्य कुछ इस तरह के थे कि एक व्यक्ति विधायक रहते हुए एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में लोकसभा का चुनाव लड़ने चला गया तो इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये तो आपने बिल्कुल पार्टी की सदस्यता छोड़ दी.
और मान लीजिए कि कोई विधायक विपक्षी दल के सदस्यों के साथ राज्यपाल से मिलने राजभवन चला जाता है तो इसे भी परिस्थितिजन्य साक्ष्य के रूप में लिया जाएगा.
ये सच है कि राजस्थान में इस समय असेंबली सेशन में नहीं है. लेकिन ये भी सच है कि वहाँ इस समय दल बदल का माहौल है. कांग्रेस सरकार ख़तरे में दिख रही है. ऐसे में दो बार कांग्रेस विधायक दल की बैठक होती है जिसमें इन्हें बुलाया जाता है.
सेंट्रल ऑब्जर्वर इन्हें बुलाते हैं. और ये हरियाणा में हैं जहाँ बीजेपी की सरकार है. राजस्थान से जब वॉयस सैंपल लेने के लिए टीम जाती है तो रिसॉर्ट के बाहर हरियाणा पुलिस का भारी जमावड़ा दिखता है.
ऐसे में ये ज़ाहिर है कि ये जमावड़ा सरकार की मर्जी के बिना नहीं होगा. ऐसे में हालात ये बताते हैं कि इन्हें बीजेपी का समर्थन मिला हुआ है. और कांग्रेस से इनकी दूरी बढ़ रही है. और बीजेपी से क़रीबी बढ़ रही है. ऐसे में अभी शायद इन्होंने सदस्यता न छोड़ी हो लेकिन ये रास्ता दूसरी ओर ही जाता है. ऐसे में स्पीकर अगर ये फैसला लेते हैं तो उसे दुराग्रह से प्रेरित या बुरे इरादे से लिया गया फैसला नहीं कह सकते.
पायलट गुट के समर्थकों का मानना है कि विधायकों की सदस्यता रद्द करने की चार शर्तों में से एक भी सचिन पायलट पर लागू नहीं होती है.
क्योंकि न तो पायलट ने पार्टी की सदस्यता से त्यागपत्र दिया है, न ही वे पार्टी लाइन के ख़िलाफ़ गए हैं, न उन्होंने पार्टी व्हिप का उल्लंघन किया है और न ही विधानसभा में अपनी पार्टी के दिशानिर्देशों का उल्लंघन करता है.
फैजान मुस्तफ़ा मानते हैं कि ये बात सही है कि अभी विधानसभा सेशन में नहीं है लेकिन सदस्यता छोड़ने के लिए त्यागपत्र दिया जाना ज़रूरी नहीं है.
वे कहते हैं, “सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट कहते हैं कि पार्टी की सदस्यता छोड़ने के लिए त्यागपत्र ज़रूरी नहीं हैं. बल्कि विधायक के आचरण से देखा जाएगा कि वह पार्टी हितों के विरुद्ध जा रहा है या नहीं.”
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