राजस्थान संकटः वसुंधरा की चुप्पी की क्यों हो रही है चर्चा

    • Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

राजस्थान में जारी सियासी रस्साकशी के बीच - जिसपर कांग्रेस-पार्टी के स्वघोषित प्रवक्ता संजय झा से लेकर फ़ेसबुकिया कल्लू ख़ान तक अपनी राय दे रहे हैं, सूबे की दो बार मुख्यमंत्री रह चुकीं वसुंधरा राजे बिल्कुल ख़ामोश हैं, कुछ इस हद तक कि कई हल्क़ों में पूछा जा रहा है कि ख़ामोशी में आपके क्या राज़ छुपा है?

विरोधी पार्टी की सरकार गिरने और अपने दल के फिर से सत्ता में पहुंचने जैसे अहम मामले में राजे का कोई सीधा बयान आना तो दूर, पिछले हफ़्ते भर में उन्होंने 'सचिन-पॉलिटिकल-अफ़ेयर' पर एक ट्वीट तक नहीं किया है.

शनिवार से जारी इस संकट के दौरान राजे राजधानी तक में नहीं! राजस्थान विधानसभा में विपक्ष के नेता गुलाब चंद कटारिया के हवाले से ख़बर है कि वो शाम तक जयपुर आएंगी.

राजनीतिक विश्लेषक उर्मिलेश वसुंधरा राजे की चुप्पी के सवाल पर उसकी व्याख्या 'उनकी केंद्रीय नेतृत्व को लेकर और मोदी-शाह की उनसे असहज रिश्ते' में करते हैं.

उर्मिलेश के हिसाब से राजे किसी युवा नेता, और वो भी पिछड़ी जाति से ताल्लुक़ रखनेवाले नेता के पार्टी में आने को अपने लिए ख़तरे के तौर पर देख सकती हैं जो आज नहीं तो भविष्य में उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है.

वसुंधरा राजे पार्टी की उन नेताओं में से हैं जो मोदी-शाह की जोड़ी के सामने अभी तक पूरी तरह नतमस्तक नहीं हुई हैं और अपनी बात रखने और उसे मनवाने से गुरेज़ नहीं करतीं.

चुप्पी के मायने

पार्टी ने जब दो साल पहले वर्तमान केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को बीजेपी अध्यक्ष बनाने की कोशिश की थी तो राजे ने इसमें अड़ंगा डाल दिया था और अमित शाह की तमाम कोशिशों के बावजूद मामला लंबे वक़्त तक लटका रहा और आख़िरकार सतीश पुनिया के नाम पर समझौता हो सका.

राजे को मंत्री पद लेकर केंद्र में लाने की कोशिशें भी अबतक नाकाम रही हैं.

एक तरफ़ जहां सचिन-अफ़ेयर पर राजे ख़ामोश हैं, गजेंद्र सिंह शेखावत ख़ूब मुखर हैं.

शेखावत ने कांग्रेस के बीजेपी पर पार्टी तोड़ने के आरोप पर बुधवार दिन में ट्वीट के ज़रिये कहा, 'अपने हर विवाद का ठीकरा पड़ोसी पर फोड़ते हैं, और पड़ोसी से निपटने के समय घर वालों को ही कोसते हैं.'

उन्होंने राजस्थान की हुकूमत के ऑटो पायलट पर होने, और मुख्यमंत्री के पायलट के पीछे भागने की बात दो दिनों पहले कही थी.

मंगलवार को उन्होंने कहा था, 'अपनी कमियों को दूसरों पर थोपना, चुने गए विधायकों को भेड़ बकरी समझना, और विद्रोह हुआ तो भाजपा ज़िम्मेवार, वाह री गहलोत सरकार!'

मगर बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक और राजस्थान की राजनीति को दशकों से क़रीब से जाननेवाले संजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि वसुंधरा राजे को मालूम है कि 'उनको इस पूरे उठापटक से कोई विशेष लाभ नहीं मिलनेवाला तो वो क्यों बोलें'?

संजीव कहते हैं, "वैसे भी बारात सजाने की कोशिश भले ही हो रही हो लेकिन न तो दुल्हा है न दुल्हन. तो वंसुधरा राजे को बाराती थोड़े ही बनना है जो वो तैयार होकर वहां पहुंचे, अगर वो मेन प्लेयर नहीं तो अपने रुतबे के हिसाब से ख़ामोश रहना या वक़्त आने पर बोलना ही बेहतर होगा, वरना हालत सचिन पायलट जैसी हो जाएगी."

हालांकि संजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि पिछले लगभग डेढ़ सालों में राजे की स्थिति तबसे कमज़ोर हुई है जब वो मुख्यमंत्री हुआ करती थीं और केंद्रीय नेतृत्व को अपनी बातें मनवाने पर मजबूर कर सकती थीं.

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लौटेंगे पायलट या नए घर जाएँगे

इस बीच पूरा मामला एक ऐसा रूख़ लेता नज़र आ रहा जिससे ये भी कहना मुश्किल होता जा रहा है कि सचिन कांग्रेस में ही रहेंगे या पार्टी छोड़ देंगे.

हालांकि सचिन अभी भी कांग्रेस के सदस्य हैं. ना तो उन्हें पार्टी से निकाला गया है और न ही उन्होंने इस्तीफ़ा दिया है.

सचिन पायलट ने फिर से दोहराया है कि वो बीजेपी में नहीं जा रहे और साथ ही ये भी कि इस तरह की बातें गांधी परिवार से उनके रिश्ते ख़राब करने के लिए उड़ाई जा रही हैं.

इस बीच कांग्रेस पार्टी में राजस्थान के प्रभारी अविनाश पांडेय ने कहा कि सचिन पायलट के लिए पार्टी के द्वार अभी भी खुले हैं.

उर्मिलेश कहते हैं कि सचिन पायलट मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की बिछाई शतरंज की चाल में फँस गए.

उन्होंने कहा, "मुख्यमंत्री न सिर्फ़ विधायकों को अपने पाले में रखने में कामयाब रहे, बल्कि आलाकमान का समर्थन भी विरोधी को न मिलने दिया, और हालात ये कर दिए कि युवा चैलेंजर को बाहर कर दिया."

वसुंधरा राजे की ख़ामोशी को कुछ लोग गहलोत और उनके बीच के अच्छे रिश्तों में भी देखते हैं.

सचिन पायलट ने कहा है कि अशोक गहलोत ने अदालत के हुक्म के बाद भी वसुंधरा राजे से सरकारी बंगला, जो उन्होंने जीवन भर के लिए नियम बनाकर अपने लिए रिज़र्व करवा लिया था, ख़ाली नहीं करवाया बल्कि इसकी जगह सुप्रीम कोर्ट चले गए.

हिंदू अख़बार में निस्तुला हिब्बर ने वसुंधरा राजे की पूरे मामले में भूमिका को लेकर लिखा है कि अगर बीजेपी में सचिन पायलट का दाख़िला होता है तो वो उतना ही हंगामा भरा होगा जितना कांग्रेस से उनका निकलना होगा.

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