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सचिन पायलट को 'महत्वाकांक्षा की उड़ान' कहाँ लेकर जाएगी
- Author, नारायण बारेठ
- पदनाम, जयपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए
राजस्थान में लंबे समय से जारी सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी की अंतर्कलह और बढ़ गई है. कांग्रेस ने सचिन पायलट से राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष का पद छीन लिया है. साथ ही उनका उप मुख्यमंत्री पद भी चला गया है.
जानकार कहते हैं कि अब पायलट के सामने बहुत कम विकल्प बचे हैं. क्या वे क्षेत्रीय दल की नींव डाल कर आगे बढ़ सकते हैं? हालाँकि राजनीति के जानकार ये कहते हैं कि राजस्थान की ज़मीन किसी तीसरे दल के लिए कभी उर्वरा नहीं रही.
कुछ लोगों का ये भी मानना है कि अब उनके लिए बीजेपी ही एक मकाम रह गया है. लेकिन इससे बीजेपी के भीतर समीकरण काफ़ी उलट-पुलट जाएँगे.
राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस की यह सियासी जंग तब खुले में सामने आ गई, जब सचिन पायलट अपने समर्थक विधायकों के साथ दिल्ली चले गए और विद्रोह का ऐलान कर दिया. उनके समर्थक मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को हटाने की मांग कर रहे थे.
लेकिन इसके लिए कांग्रेस नेतृत्व तैयार नहीं हुआ. सत्तारुढ़ कांग्रेस ने सुलह सफ़ाई की कोशिश की, लेकिन इसमें कांग्रेस को सफलता नहीं मिली. कांग्रेस ने आक्रामक रुख़ अख़्तियार करते हुए मंगलवार को सचिन पायलट को सभी ज़िम्मेदारीयो से मुक्त कर दिया.
रास्ता तंग
उनके साथ ही दो मंत्रियों- रमेश मीणा और विश्वेंद्र सिंह को भी बर्ख़ास्त कर दिया गया है. जयपुर में सियासी घटनाक्रम पर नज़र रख रहे पत्रकार अवधेश अकोदिया कहते हैं, "पायलट के सामने रास्ता बहुत तंग रह गया है. अगर वो बीजेपी में जाते हैं, तो उनकी कितनी स्वीकार्यता होगी, यह देखने की बात होगी."
अकोदिया कहते हैं कि सचिन पायलट बीजेपी के लिए तभी उपयोगी नेता हो सकते हैं, अगर वे कांग्रेस सरकार को धराशाई कर सकें. पायलट के समर्थक राज्य मे तीसरा घटक बनाने की बात भी कहते रहे हैं, लेकिन प्रोफ़ेसर संजय लोढ़ा कहते हैं कि राजस्थान में ऐसा प्रयास कभी सफल नहीं हुआ.
प्रोफ़ेसर लोढ़ा कहते हैं, "पायलट के सामने बीजेपी में जाने के अलावा अब कोई विकल्प नहीं बचा है. क्योंकि कोई क्षेत्रीय दल खड़ा करना आसान नहीं है. अगर बीजेपी में जाते हैं, तो वहाँ पहले से मौजूद नेताओं से क्या उनका तालमेल बैठ पाएगा, यह बड़ा सवाल है."
राज्य में वरिष्ठ बीजेपी नेता और प्रतिपक्ष के नेता गुलाब चंद कटारिया ने बीबीसी से कहा, "अभी इस बारे में कोई बात नहीं हुई है. सचिन पायलट के बारे में अगर कोई बात होगी, तो पार्टी सामूहिक रूप से बैठ कर चर्चा करेगी."
कटारिया कहते हैं कि जो कुछ चल रहा है वो कांग्रेस का आंतरिक संघर्ष है. लेकिन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इसके लिए बीजेपी को ज़िम्मेदार बताते हैं, वे कहते हैं कि बीजेपी के इशारे पर राज्य में कांग्रेस सरकार को अस्थिर करने का प्रयास किया जाता रहा है. जब राज्य सरकार कोरोना से लड़ रही है, ऐसे समय इस तरह का षडयंत्र करना निंदनीय है.
लंबे समय से चल रही है सियासी जंग
राजस्थान में कांग्रेस के भीतर यह सियासी जंग लंबे समय से चल रही थी. यह विधान सभा चुनावों से पहले ही शुरू हो गई थी. उस वक्त प्रत्याशी चयन में संगठन से अधिक व्यक्तिगत निष्ठा को परख कर उम्मीदवारी का फ़ैसला करने जैसी बातें होती रही.
विधान सभा चुनाव प्रचार में भी कांग्रेस बँटी-बँटी सी नज़र आती थी. राजनीतिक विश्लेषक संजय लोढ़ा कहते हैं, "हम लोगों का आकलन था कि राज्य में कांग्रेस को 130 से 150 सीट मिल सकती हैं. लेकिन पार्टी ने आपस की लड़ाई में यह अवसर गँवा दिया. परिणाम आए, तो पार्टी 99 सीटों पर सिमट गई. जबकि राज्य में व्यवस्था विरोधी रुझान साफ़ दिख रहा था."
सियासी पंडित कहते हैं कि राजस्थान कांग्रेस में गुटबाज़ी पहले भी रही है. लेकिन पार्टी इतनी विभाजित पहले कभी नहीं रही. पार्टी संगठन में गुटों की दरारें साफ़ दिखाई देती थी. लेकिन यह सब दिल्ली को नहीं दिख रहा था.
पत्रकार अकोदिया कहते हैं, "जो कुछ हुआ, उसके लिए कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व ज़िम्मेदार है. क्योंकि पार्टी हाई कमान ने राजस्थान में सत्ता के दो शक्ति केंद्र खड़े कर दिए. इससे दोनों केंद्रों में लगातार मनमुटाव और वर्चस्व की लड़ाई चलती रही. लेकिन हाई कमान ख़ामोशी से देखता रहा."
वे कहते हैं कि कांग्रेस ने इसे कार्य संस्कृति बना लिया है. यह बाक़ी राज्यों में भी देखा जा सकता है. सचिन पायलट के साथ दे रहे विधायकों की संख्या 19 के क़रीब मानी जा रही है. इनमें गुर्जर मीणा समुदाय के विधायक हैं, तो अन्य वर्गो के विधायक भी शामिल हैं.
क्या यह जातिगत गठजोड़ एक मज़बूत राजनीतिक विकल्प खड़ा करता है? प्रोफ़ेसर संजय लोढ़ा कहते हैं, "यह जातिगत गठजोड़ का मामला नहीं है. क्योंकि पायलट के साथ गए विधायकों में अन्य जातियों के भी हैं. यह इससे अधिक सत्ता पर क़ब्ज़े की लालसा के रूप में देखा जाना चाहिए."
पश्चिमी राजस्थान में सियासत और समाज की बारीकियों पर नज़र रखते रहे आईदान सिंह भाटी कहते हैं कि बेशक जातियों का अपना प्रभाव है, लेकिन राजस्थान में 'छत्तीस कौम' का मुहावरा ही कारगर होता है.
वे कहते हैं कि जातियों को छत्तीस में नहीं समेटा जा सकता है. लेकिन यह लोक आख्यान है, जिसमें उदारता, विशालता और विविधता का भाव शामिल है. इसीलिए हर राजनीतिक मंच से यह दावा किया जाता है कि उनके साथ छत्तीस कौम हैं. फिर कोई जाति अगर पूर्वी राजस्थान में प्रभावी है, तो ज़रूरी नहीं कि उसका वैसा ही असर उत्तरी राजस्थान में हो.
जातियों का समीकरण
राज्य में गुर्जर आरक्षण आंदोलन के दौरान गुर्जर और मीणा समुदायों में फासला हो गया था और कुछ स्थानों पर दोनों समुदायों में यह कटुता खुल कर सामने आ गई थी. लेकिन उसके बाद काफ़ी कुछ बदल गया है.
गुर्जर आरक्षण आंदोलन में अगुवाई करते रहे हिम्मत सिंह गुर्जर ने बीबीसी से कहा, "अब दोनों समुदायों में पहले जैसी ही निकटता है. पिछले चुनावों में दोनों ने एक दूसरे के उम्मीदवारों को वोट दिए हैं. वे कहते हैं कि राजेश पायलट इस एकता की धुरी बन कर उभरे थे. उनके रहते दोनों समुदाय एकमेव होकर काम करते थे.
लेकिन गुर्जर आंदोलन में समुदाय ने जब अपने लिए अनुसूचित जनजाति का दर्जा मांगा, तो दोनों में दूरियाँ पैदा हो गई. इसकी परिणीति में जनजाति के लिए आरक्षित विधान सभा की दो सीटों पर धानका समुदाय के लोग जीत गए. ऐसे ही दौसा लोकसभा सीट पर कश्मीर से आए गुर्जर मुस्लिम समुदाय के कमर रब्बानी चेची को खड़ा कर दिया गया था. लेकिन यह अब बीती बात है.
गुर्जर कहते हैं कि अब पहले जैसी फ़िज़ा बहाल हो गई है. सचिन पायलट ने भी इसे आगे बढ़ाया है. पश्चिमी राजस्थान में खेतिहर जाट समुदाय प्रभावशाली है. जाट समुदाय के लोग राज्य के दोनों प्रमुख दलों में अपना असर रखते हैं. इसी समुदाय से जुड़े हनुमान बेनीवाल ने अपने दम पर राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी खड़ी की और बीजेपी से गठबंधन कर विधानसभा की तीन सीटें जीत ली.
वे खुद नागौर से लोकसभा के सदस्य चुने गए. विश्लेषक कहते हैं कि क्षेत्रीय पार्टियों को एक हद तक जाति वर्गो का समर्थन ज़रूर मिलता है, लेकिन एक मकाम पर जाकर यह यात्रा रुक जाती है. पूर्वी राजस्थान में प्रोफ़ेसर जीवन सिंह मानवी कहते हैं कि अगर कोई समग्र समाज को साथ लेकर चलने की बात करे, तभी जाति समूह राजनीतिक ताक़त में बदल पाते हैं.
ऐसा न करने पर समाज का बाक़ी हिस्सा हाथ खींच लेता है. प्रोफ़ेसर संजय लोढ़ा के मुताबिक़ राजस्थान में राजनीति दो ध्रुवी रही है. ऐसे में सचिन पायलट अगर कोई क्षेत्रीय पार्टी खड़ी करना चाहते हैं, तो इसमें कठिनाई होगी. प्रो. लोढ़ा कहते हैं कि अतीत में बहुत प्रभावशाली नेता इस तरह का प्रयास कर चुके हैं. लेकिन अथक प्रयास करने के बाद भी इसमें कोई कामयाबी नहीं मिली.
पत्रकार अकोदिया कहते हैं कि अगर पायलट बीजेपी में शामिल होते हैं, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि वहाँ पहले से मौजूद पूर्व मुख्य मंत्री वसुंधरा राजे और मुख्य मंत्री पद के दूसरे दावेदार पायलट की आमद को किस रूप में देखते हैं.
कहाँ जाएगी ये जंग
इस सियासी जंग में पायलट के साथ विश्वेंद्र सिंह और रमेश मीणा को भी अपने-अपने पद गँवाने पड़े हैं. विश्वेंद्र सिंह भरतपुर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य हैं.
वे जाट समुदाय से हैं. विश्वेंद्र सिंह का ससुराल पक्ष गुर्जर समुदाय से है. पत्रकार अकोदिया कहते हैं कि सिंह और मीणा दोनों अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभावशाली हैं, लेकिन राज्य के सियासी फलक पर उनकी ताक़त का अभी इम्तिहान होना बाक़ी है.
सत्तारूढ़ कांग्रेस ने जातिगत समीकरणों की नज़ाकत समझते हुए शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया है, वे जाट समुदाय से हैं. इसके साथ संगठन में कुछ और नियुक्तियाँ भी की गई हैं. इन नियुक्तियों में भी सामाजिक समीकरणों का ख़्याल रखा गया है.
राजस्थान में सत्ता और संगठन में यह लड़ाई लंबे समय से चल रही थी. कोटा में जब सरकारी अस्पताल में शिशुओं की मौत का मामला सामने आया, तो सचिन पायलट ने सरकार को घेरा था. ऐसे ही कुछ अन्य मामलों में सरकार और पायलट के स्वर अलग-अलग सुनाई देते थे.
प्रोफ़ेसर लोढ़ा कहते हैं कि सरकार में सामूहिक ज़िम्मेदारी का भाव कभी दिखाई नहीं दिया. इससे प्रशासन पर बुरा प्रभाव पड़ा.
थार मरुस्थल में मानसून के बादलों का मिजाज रहा है कि वे थोड़े वक़्त के लिए आते हैं और बरस कर चले जाते हैं. लेकिन राज्य के सियासी फलक पर छाए बादल कब तक रहेंगे और किस घर-आंगन पर बरसेंगे और किस छत को सूखा छोड़ देंगे, अभी कहना मुश्किल है. अब इन्हीं बादलों के घटाटोप में पायलट को अपनी उड़ान भरनी है.
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