कोरोना, बारिश और बेरोज़गारी ने मुसहर समुदाय के लोगों की बद से बदतर ज़िंदगी - ग्राउंड रिपोर्ट

मठिया माफ़ी मुसहर पट्टी गाँव

इमेज स्रोत, Priyanka Dubey/BBC

इमेज कैप्शन, अपने नाती के साथ खड़ी चनवा
    • Author, प्रियंका दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मठिया माफ़ी मुसहर पट्टी गाँव के मुहाने पर बैठे सभी बड़े, बूढ़ों और जवान उदास नज़र आते हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुशीनगर ज़िले के इस गाँव में तकरीबन 350 मुसहर दलित परिवारों को बीते 3 महीने से रोज़गार नहीं मिला है.

पहली बारिश में ही गाँव के कच्चे घर और रास्ते पानी में डूब गए हैं. कोरोना, लॉकडाउन और बारिश - तीनों ने इस गाँव के लोगों पर कितना सितम ढाया है, मठिया माफ़ी के निवासी इसकी जीती जागती मिसाल हैं.

मठिया माफ़ी मुसहर पट्टी गाँव

इमेज स्रोत, Priyanka Dubey/BBC

इमेज कैप्शन, पहली बारिश के बाद गांव का हाल

बेरोज़गारी के बारे में पूछने पर मुन्ना कहते हैं, "इस गाँव के कई लोग दिल्ली, चंडीगढ़ और पंजाब जैसी जगहों पर काम कर रहे थे लेकिन मई की शुरुआत में सारे ही वापस आ गए. तब से ना तो मनरेगा में काम मिला और ना ही कोई दूसरा काम."

वही मुन्ना के सामने ज़मीन पर बैठी सत्तर साल की फूलमति सबसे ज़्यादा अपनी झोपड़ी में भर आए बारिश के पानी की वजह से चिंतित हैं. बिना सवाल पूछे ही कहती हैं, "आप चल कर देखिए, पूरे घर में पानी घुस गया है. घर तक का रास्ता भी पानी में डूबा है. एक ही बारिश में सारा गांव डूब जाता है".

तभी उनके पीछे बैठी एक और दूसरी महिला की आवाज़ आती है - "एक तो पानी भर गया है और ऊपर से गाँव में किसी को काम नहीं मिल रहा है, न ही मर्दों को और न महिलाओं को".

ज़िला प्रशासन का कहना है कि वह एक नया सर्वे कराकर सभी ज़रूरतमंद ग्रामीणों को काम दिलवाने का प्रयास कर रहे हैं.

मठिया माफ़ी मुसहर पट्टी गाँव

इमेज स्रोत, Priyanka Dubey/BBC

कुशीनगर के मुसहर

सामजशास्त्रियों द्वारा दलितों में भी दलित कहे जाने वाले मुसहर समुदाय के तक़रीबन 3 लाख लोग, उत्तर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में सदियों से हाशिए पर रहते और जीते आए हैं.

मूलतः भूमिहीन रहे इस समुदाय के लोग दशकों से शिक्षा, पोषण और पक्के घरों जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहे हैं.

कुशीनगर की 138 ग्राम पंचायतों में रहने वाले इस समुदाय के तक़रीबन 50 हज़ार नागरिकों का जीवन तो ख़ासतौर पर कभी न ख़त्म होने वाली अनगिनत चुनौतियों का एक अंतहीन सिलसिला है.

मठिया माफ़ी मुसहर पट्टी गाँव

इमेज स्रोत, Priyanka Dubey/BBC

कुशीनगर के मुसहर समुदाय के दर्द का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां से 'भूख से मरने' से जुड़े विवादित ख़बरों का आना सामान्य बात है.

सबसे ताज़ा उदाहरण अगस्त 2019 का है. इस ज़िले में हुई 5 मुसहरों की मौत 'भूख' से हुई. ऐसा स्थानीय लोगों का और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं का दावा है. लेकिन प्रशासन ने उनकी मौत का कारण 'बीमारी' बताया. 'भूख' को मौत की वजह मानने से इनकार कर दिया.

हालाँकि क्षेत्र के तत्कालीन भाजपा विधायक गंगा सिंह कुशवहा ने 'कुपोषण और दवाईयों की कमी' को इनकी मौत के लिए ज़िम्मेदार माना है.

मठिया माफ़ी की कहानी भी कुपोषण के इस इतिहास से अछूती नहीं है.

स्थानीय निवासियों और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार 28 दिसंबर 2016 को इस गाँव में मुसहर समुदाय के सुरेश और गंभा नाम के दो सदस्यों की मौत हो गई थी.

उनका दावा है कि कुपोषण और इलाज की कमी की वजह से ऐसा हुआ. हालांकि इस बार भी प्रशासन ने बीमारी को ही इन मौतों के जिम्मेदार ठहराया.

मठिया माफ़ी की वर्तमान तस्वीर

बांस और सूखी घास से बनी अपनी झोपड़ी के सामने एक साल के नाती को गोद में लिए खड़ी सुरेश की पत्नी चनवा के चेहरे से ही झलकता है कि उनका जीवन कितना मुश्किल भरा है.

कुपोषण और भुखमरी से हुई सुरेश की मौत के बाद गुज़रे चार सालों में वक़्त का पहिया तो आगे बढ़ गया लेकिन चनवा और उनके पांच बच्चों की ज़िंदगी वहीं खड़ी है. पीली साड़ी पहने चनवा की भूरी आंखों में एक सख़्त उदासी है.

गांव

इमेज स्रोत, Priyanka Dubey/BBC

इमेज कैप्शन, अपने पति सुरेश की तस्वीर दिखाती चनवा

कोरोना और लॉकडाउन के बाद के जीवन के बारे में वह कहती हैं, "इस गांव में किसी को यह बीमारी नहीं हैं लेकिन बंदी (लॉकडाउन) के बाद से काम मिलना बंद हो गया है. हम रोज़ कमाने खाने वाले लोग हैं. तो इतने महीनों से जब कोई मज़दूरी नहीं मिली तो घर चलाना और बच्चे पालाना बहुत मुश्किल हो रहा है. सिर्फ़ सरकारी राशन पर ज़िंदा हैं".

सुरेश और गंभा की मौत के बाद प्रशासन और मीडिया की कई गाड़ियां इस गांव के दौरे पर आयीं थीं.

इस घटना के बाद आए गाँव में कई सुधार हुआ. अब यहाँ बिजली है, कुछ परिवारों को गैस भी दिया गया है, लगभग सभी परिवारों को सरकारी राशन भी समय पर मिलता है.

मंगरी देवी बताती हैं, "हर परिवार को हर महीने चावल और गेहूं के साथ साथ एक किलो चना भी दिया जा रहा है. उसी को खा कर ज़िंदा है. लेकिन मज़दूरी न मिलने की वजह से हाथ में एक पैसा नहीं है. इसलिए सब्ज़ी तरकारी और चटनी मिलने का सवाल नहीं".

सुरेश और गंभा की मौत के बाद स्थानीय नेताओं ने गाँव में इंदिरा गांधी आवास योजना के तहत पक्के घर बनवाने का वादा भी किया था.

इस बीच दो परिवारों के घर बनाना शुरू भी हुए थे लेकिन बीच में ही वह प्रक्रिया रुक गई. गांव की 90 प्रतिशत से ज़्यादा जनसंख्या आज भी मिट्टी और घास-फूस के बने कच्चे घरों में रहने को मजबूर हैं.

स्थानीय ग्रामीण

इमेज स्रोत, Priyanka Dubey/BBC

इमेज कैप्शन, स्थानीय ग्रामीण

कोरोना का असर :

सरकारी राशन की वजह से यहां के लोगों को दो जून की रोटी तो नसीब हो रही है लेकिन कोरोना के बाद हुई देश-व्यापी बंदी ने ग्रामीणों की आम जीवन की कमर तोड़ दी है.

अपनी झोपड़ी के सामने खड़े सुखहारी कहते हैं, "बीमारी के बाद से तो कटाई रोपाई के लिए भी कोई स्थानीय किसान हमें मज़दूरी देने के लिए नहीं बुलाता. तीन महीने से किसी को कोई काम नहीं मिला है.

पहले जब काम मिलता था तो आदमी औरत सब काम करते थे, हर किसी को रोज़ की सौ रुपये की मज़दूरी मिल जाती थी. लेकिन अब कुछ नहीं. बीमारी से मरे न मरे, बेरोज़गारी ज़रूर ज़िंदगी दूभर बना रही है".

अपना ख़ाली जॉब कार्ड दिखाते हुए गमली कहती हैं, "सरकारी सड़के बन रहीं हैं, गड्ढे भरे जा रहे हैं लेकिन हमें मनरेगा में कोई काम नहीं देता. गांव में सभी के जॉब कार्ड ख़ाली हैं".

ग्रामीण

इमेज स्रोत, Priyanka Dubey/BBC

इमेज कैप्शन, अपना जॉब कार्ड दिखाती महिलाएं

कुशीनगर के मुख्य विकास अधिकारी आनंद कुमार बीबीसी से बातचीत में कहते हैं कि कुशीनगर की मुसहर बस्तियों में रोज़गार का स्तर जानने के लिए प्रशासन की टीमें सर्वे कर रही हैं. "लॉकडाउन से पहले तो यह लोग मनरेगा की जगह प्राइवेट काम करना ज़्यादा पसंद करते थे लेकिन अब लॉकडाउन की वजह से बाक़ी सब जगह काम मिलना बंद है."

आनंद आगे बताते हैं, "कोरोना के बाद से हम लोग मुसहर समुदाय के लिए अलग से एक सर्वे करवा रहे हैं जिसकी प्रक्रिया जारी है. जो भी काम करने का इच्छुक हैं, उन्हें काम दिया जाएगा. बारिश के कारण निर्माण कार्य नहीं हो रहे लेकिन बाकी बहुत से काम हैं जो दिए जा सकते हैं. हम सभी को कम से कम सौ दिन का रोज़गार दिलवाएंगे."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)