कोरोना वायरस: भारत में 'होम आईसीयू' कैसे कर रहे हैं मदद

राज कुमार मेहता
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    • Author, नितिन श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

घनी आबादी वाले पश्चिमी दिल्ली के नज़दीक एक परिवार अस्पताल के एक बेड की व्यवस्था करने के लिए जूझ रहा था.

शुरुआती जून का वक़्त था और भारत में आठ हफ़्ते लंबे चले सख़्त लॉकडाउन को हटाने का फ़ैसला लिया गया था.

साठ वर्षीय राज कुमार मेहता याद करते हैं, "अनलॉक-1 हुए दो दिन हुए थे और हल्के लक्षणों के चलते मैंने अपना टेस्ट कराया. टेस्ट पॉज़िटिव आया और हमने कोई अस्पताल ढूंढना शुरू किया जहां मुझे भर्ती कराया जा सके."

मेहता परिवार ने कई अस्पतालों में पता किया लेकिन हर जगह से उन्हें निराशा हाथ लगी, "क्योंकि सभी अस्पताल मरीज़ों से भरे पड़े थे और हर जगह भीड़ ही भीड़ थी."

लेकिन एक दोस्त के सुझाव ने उनके लिए उम्मीद जगाई. राज कुमार मेहता के बेटे मनीष ने फ़ोन उठाया और उस कंपनी से संपर्क किया जो "घर पर ही हॉस्पिटल बेड उपलब्ध कराने का वादा करती है, जिसके साथ ऑक्सीजन सपोर्ट और पूरी निगरानी की सुविधा भी दी जाती है."

कुछ घंटों में घर पहुंच जाता है 'होम आईसीयू'

घर में आईसीयू

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सहमति बनने और एडवांस पैसा देने के कुछ घंटों के अंदर ही मेहता परिवार के घर मेडिकल उपकरण पहुंचा दिए गए, जिनमें कार्डिएक मॉनिटर शामिल था जिसके साथ ऑक्सीमीटर जुड़ा हुआ था, साथ में एक ऑक्सीजन सिलेंडर और एक पोर्टेबल वेंटिलेटर भी भेजा गया. इन सब उपकरणों के साथ एक प्रशिक्षित पैरामेडिक भी आईं.

होम आइसोलेशन की सुविधा मुहैया कराने वाली एचडीयू हेल्थकेयर नाम की कंपनी चलाने वाले अंबरीश मिश्रा कहते हैं, "हमने उन्हें पूरी प्रक्रिया समझाई और होम केयर फ़ैसिलिटी में आने वाले ख़र्च और ज़रूरी लॉजिस्टिक के बारे में बताया. और अगले दिन से राज कुमार मेहता हमारी देखरेख में थे. उन्हें अपने ही घर में आइसोलेशन में रखा गया था. उन्होंने बहुत अच्छे से रिकवर किया."

भारत में अबतक संक्रमण के साढ़े आठ लाख से ज़्यादा मामले सामने आ चुके हैं और 23 हज़ार से ज़्यादा मौतें हुई हैं.

यहां कोविड-19 संक्रमितों की संख्या बढ़ती जा रही है, जिसके साथ ही भारत कोरोना वायरस की वैश्विक सूची में अब तीसरे नंबर पर आ गया है.

जून के आख़िर में चेन्नई स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैथेमेटिकल साइंसेज़ के शोधकर्ताओं ने एक सांख्यिकीय विश्लेषण के आधार पर कहा था कि "भारत में जुलाई के अंत तक या इससे पहले 10 लाख से ज़्यादा सक्रिय मामले हो सकते हैं."

अस्पतालों पर बढ़ता बोझ

घर में आईसीयू

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सरकार दावा करती है कि वो सभी प्रभावित लोगों को स्वास्थ्य सुविधा मुहैया करा रही है, लेकिन बिस्तरों की कमी की वजह से सैंकड़ों लोगों को अस्पतालों से लौटाए जाने की ख़बरें आती रही हैं.

अब अपने सामर्थ्य के हिसाब से लोग अन्य विकल्पों की तलाश कर रहे हैं, जैसे कुछ लोग अपने ही घर में प्राइवेट इलाज करा रहे हैं.

लगातार बढ़ते मामलों और अस्पतालों पर पड़ते दबाव की वजह से ही शायद केंद्र सरकार ने ये निर्देश दिया है कि "कोविड-19 के एसिम्पटोमैटिक और सिंप्टोमेटिक मरीज़ों को जल्द से जल्द क्वारंटीन किए जाने की ज़रूरत है."

सरकार ने अपने आइसोलेशन वार्ड बढ़ाने के लिए कई होटलों, स्पोर्ट्स स्टेडियम और यहां तक कि रेल सेवा को अपने नियंत्रण में ले लिया है. लेकिन जिन परिवारों में एक या एक से ज़्यादा सदस्य पॉज़िटिव हैं, वो होम फ़ैसिलिटी के विकल्प पर विचार कर रहे हैं.

कोरोना से ठीक हो चुके एक 56 वर्षीय मरीज़ की बेटी भारती सिंह कहती हैं, "घर में ही आईसीयू सेट-अप लगाना एक अच्छा फ़ैसला था क्योंकि मैं अपने पिता के स्वास्थ्य पर नज़र रख सकती थी. इसमें अस्पताल में जाने का रिस्क जुड़ा हुआ नहीं था."

उन्हें लगता है कि "अस्पतालों के कोविड-19 वार्ड में सैकड़ों मरीज़ होते हैं, और सभी पर ध्यान देना होता है, सभी को वक़्त देना होता है, ऐसे में संक्रमण बढ़ने का ख़तरा भी होता है."

मरीज़ के साथ रहती है एक नर्स

नर्स

अपने घर में इलाज के लिए मरीज़ के साथ एक नर्स रहती हैं, जो एक डॉक्टर की देखरेख में काम करती हैं. कोविड-19 के मरीज़ों के साथ रहने वाले पैरामेडिक या नर्सों का किसी नए मरीज़ के पास जाने से पहले और बाद में टेस्ट किया जाता है. और उन्हें ये भी ध्यान रखना होता है कि मरीज़ों के परिवार वाले भी निर्धारित आइसोलेशन का पालन करें.

कोविड केयर देने वाली एक प्राइवेट हेल्थकेयर कंपनी के साथ काम कर रही एक नर्स केऐ वोरसेमला कई मरीज़ों की देखभाल कर चुकी हैं. उन्हें लगता है कि ये काम वाक़ई में ज़िम्मेदारी वाला है, क्योंकि उस वक़्त कमरे में मेडिकल प्रोफ़ेशनल के तौर पर सिर्फ़ वो ही वहां होती हैं.

वो कहती हैं, "अस्पतालों में इमरजेंसी के दौरान हर तरह के मेडिकल उपकरण और डॉक्टर मौजूद रहते हैं. लेकिन घरों में डॉक्टर तो होते नहीं, इसलिए नर्स को इतना सक्षम होना होता है कि किसी भी आपात स्थिति को हैंडल कर लें. इस बात पर भी सही समय पर फ़ैसला लें कि डॉक्टर को कब और कैसे अपडेट देनी है."

नर्स और पैरामेडिक एक विशेषज्ञ डॉक्टर को जानकारी देते रहते हैं कि मरीज़ को कितनी ऑक्सीजन दी गई है, मरीज़ के शरीर का तापमान और अन्य लक्षण कैसे हैं.

एक हेल्थ केयर प्रोवाइडर के लिए काम कर रहे विशेषज्ञ डॉक्टर दीक्षित ठाकुर मानते हैं कि, "सबसे अहम है कि डॉक्टर का सही वक़्त पर कॉल लेना."

वो कहते हैं, "अब तक हमारे पास कोविड-19 का कोई प्रमाणिक इलाज नहीं है, लेकिन जो सपोर्टिव थेरेपी हम अस्पतालों में दे रहे हैं वही घरों पर भी मुहैया करा रहे हैं. सबसे अहम ये है कि डॉक्टर ज़रूरत पड़ने पर सही वक़्त पर मरीज़ को अस्पताल के प्रोपर आईसीयू में शिफ्ट करने का कॉल ले."

होम आईसीयू की क़ीमत

घर में आईसीयू

ज़ाहिर है घर में मिलने वाली सुविधा की एक क़ीमत भी है. इस मिनी आईसीयू जैसे सेट-अप के लिए 10 हज़ार से लेकर 15 हज़ार प्रतिदिन का किराया देना पड़ता है. ज़्यादातर लोगों के लिए ये महंगा सौदा है, लेकिन फिर भी माँग बढ़ रही है.

घर में क्रिटिकल केयर की सुविधा मुहैया कराने के कारोबार में 'एचडीयू हेल्थकेयर' या 'हेल्थकेयर एट होम' बड़े नाम रहे हैं, लेकिन कोविड-19 से पहले इस सुविधा की माँग इतनी ज़्यादा कभी नहीं रही.

क़ीमत और एडवांस पैसे की पूछताछ को लेकर आ रहे फ़ोन कॉल के बीच अंबरीश ने मुझे बताया, "हर दिन पाँच परिवार हमारे साथ जुड़े रहे हैं, यानी 20 से 25 मरीज़."

भारत के बड़े शहरों में मल्टी-स्पेशियलिटी हॉस्पिटल की चेन रेसिडेंट वेल्फ़ेयर एसोसिएशन और ग्रूप हाउसिंग सोसाइटी के साथ मिलकर वहां 'होम आइसोलेशन सेंटर' सेट-अप कर रही हैं.

दिल्ली जैसी कई राज्य सरकारें बिना लक्षणों वाले या हल्के लक्षणों वाले कोविड मरीज़ों को घर में ही आइसोलेशन में रहने की सलाह दे रही हैं. उनके घरों में मुफ़्त में ऑक्सीमीटर पहुंचाए जा रहे हैं, ताकि वो अपने ऑक्सीजन लेवल को ख़ुद माप सकें.

सलाह दी गई है कि वो तभी अस्पताल जाएं अगर उन्हें सांस लेने में दिक़्क़त या अन्य कॉम्प्लिकेशन हों.

कुछ वक़्त पहले तक भारत की 'कोरोना राजधानी' कही जा रही मुंबई भी अस्पताल की भीड़ से जूझ रही थी. फिर सरकार ने होटलों और स्टेडियम में मेक शिफ़्ट कोविड सेंटर बना दिए.

अपार्टमेंट

रिहायशी अपार्टमेंट में बने वार्ड इस बीच इस शहर के घनी आबादी वाले इलाक़ों में कई रिहायशी अपार्टमेंट्स ने अपने क्लब हाउस या ढंके हुए प्ले एरिया को आइसोलेशन ज़ोन में बदलने का फ़ैसला किया. इसके लिए उन्हें ना सिर्फ़ बड़ी हेल्थ केयर कंपनियों बल्कि कई वरिष्ठ डॉक्टरों से भी सहयोग मिला.

एक अपार्टमेंट में रहने वाले डॉक्टर और रेडियोलॉजिस्ट विवेक देसाई को 'हेल्थ केयर एट होम' से भी सहयोग मिला.

वो कहते हैं, "हमारे पास और कोई विकल्प नहीं था, क्योंकि मरीज़ों को अस्पतालों में बेड नहीं मिल रहे थे और इस तरह की घटनाएं मुंबई में बढ़ती जा रही थीं. हमने अपार्टमेंट में एक सैनेटाइज़्ड एरिया को चुना, जहां आठ-दस मरीज़ रह सकते थे और वहां उन्हें आइसोलेट करना शुरू किया."

लेकिन कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि कोई मरीज़ भले ही अपने घर में हों या किसी प्राइवेट अपार्टमेंट बिल्डिंग के वार्ड में - ये रिस्की हो सकता है.

लेकिन ख़तरा भी है

घर में आईसीयू

ज़्यादातर को लगता है कि कोविड-19 मरीज़ों के ऑक्सीजन लेवल में अचानक और बहुत ज़्यादा कमी आ सकती है. ऐसे में वहां एक विशेषज्ञ डॉक्टर और पूरी तरह से फ़ंक्शनल इंटेंसिव केयर यूनिट होना ज़रूरी है, जिसके साथ एडवांस वेंटिलेटर भी हों.

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के डॉ संदीप शर्मा कहते हैं, "अगर कोई कहता है कि मैंने एक सामुदायिक केंद्र या एक जिमख़ाना को एक मेडिकल सेंटर या कोविड केयर सेंटर या आईसीयू में बदल दिया है, तो उसमें एक ही समस्या है कि वहां उसे मॉनिटर करने के लिए मेडिकल विशेषज्ञ नहीं हैं. अगर वहां 10 मरीज़ हैं और कुछ हो जाता है तो कौन ज़िम्मेदार होगा."

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दिल्ली के मैक्स अस्पताल में कोविड-19 मरीज़ों का इलाज कर रहे विशेषज्ञ डॉक्टर मनोज सिन्हा कहते हैं, "किसी को अस्पताल में भर्ती कराना एक मुश्किल फ़ैसला होता है क्योंकि इसके साथ एक सोशल स्टिग्मा जुड़ा होता है. लेकिन अगर किसी को मेडिकल हस्तक्षेप और देखरेख की ज़रूरत है तो अस्पताल के आईसीयू का कोई विकल्प नहीं हो सकता."

आर्थिक रूप से सक्षम ऐसे लोगों की तादाद बढ़ रही है, जो घरों में मिनी आईसीयू चाहते हैं. लेकिन ज़्यादातर लोगों के पास ये विकल्प है ही नहीं और उन सभी को सरकारी या फिर निजी अस्पतालों में अपना नंबर आने का ज़्यादा इंतज़ार रहता है.

लेकिन देश भर के इन तमाम अस्पतालों में से कुछ बेड, कर्मचारियों और उपकरणों की कमी से जूझ रहे हैं. लेकिन उन 'कुछ' लोगों के सामने ये स्थिति नहीं है, जो अपने ख़ुद के घर में किसी को ठीक होते देख रहे हैं.

जैसा कि भारती सिंह कहती हैं, "मैं इसे किसी और तरीक़े से नहीं कर सकती थी."

सवाल और जवाब

कोरोना वायरस के बारे में सब कुछ

आपके सवाल

  • कोरोना वायरस क्या है?लीड्स के कैटलिन सेसबसे ज्यादा पूछे जाने वाले

    कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है

    सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं

    कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.

    ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.

    कोरोना वायरस के अहम लक्षणः ज्यादा तेज बुखार, कफ़, सांस लेने में तकलीफ़

    लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.

  • एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता?बाइसेस्टर से डेनिस मिशेलसबसे ज्यादा पूछे गए सवाल

    जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.

    यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.

    ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.

    यह नया वायरस उन सात कोरोना वायरस में से एक है जो मनुष्यों को संक्रमित करते हैं.
  • कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स

    वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.

    कोविड-19 के कुछ लक्षणों में तेज बुख़ार, कफ़ और सांस लेने में दिक्कत होना शामिल है.

    वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.

    इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.

  • क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक

    दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.

    ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.

    फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.

    • बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
    • जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
    • खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
  • आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता

    हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.

    इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.

    अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.

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मेरी स्वास्थ्य स्थितियां

आपके सवाल

  • अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन

    अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.

    अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.

  • क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड

    ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.

    ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.

  • जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे

    कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.

    लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.

    कोरोना वायरस की वजह से वायरल निमोनिया हो सकता है जिसके लिए अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
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अपने आप को और दूसरों को बचाना

आपके सवाल

  • कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ

    शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.

    क्वारंटीन उपायों को लागू कराते पुलिस अफ़सर

    फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.

  • क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन

    पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.

    मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.

    फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.

    यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.

  • अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट

    अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.

    सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.

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मैं और मेरा परिवार

आपके सवाल

  • मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल

    गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.

    यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.

    गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.

  • मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक

    अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.

    अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.

    ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.

  • बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस

    चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.

    ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.

    हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.

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