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भारत और नेपाल में बस 10 गज ज़मीन को लेकर छिड़ा विवादः ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, नीरज प्रियदर्शी
- पदनाम, पूर्वी चंपारण से बीबीसी हिंदी के लिए
"हमारी पीढ़ियां गुजर गईं. हम बच्चे से बुजुर्ग हो गए. लेकिन आज तलक कभी अहसास नहीं हुआ कि यह दो देशों की सीमा है. दोनों तरफ के लोगों का दूसरे के यहां रोज़ का आना-जाना, लेन-देन, खाना-पीना रहा है. रिश्ते-नाते हैं. लेकिन पता नहीं! अब किसकी नज़र लग गई? और देखिए ना! झगड़ा भी हुआ तो उस जगह के लिए जहां दोनों तरफ का साझा बाजार लगता था. इन दिनों सब खत्म हो गया है. आना-जाना तो बंद है ही, अब बातचीत भी बंद हो गई है. लोग एक दूसरे को दुश्मन समझने लगे हैं. आंख से आंख तक नहीं मिलाते."
बिहार के मोतिहारी शहर से करीब 47 किमी दूर भारत और नेपाल की सीमा पर बसे ढाका प्रखंड के गुआबाड़ी गांव के बुजुर्ग लक्ष्मी ठाकुर जमीन के उस झगड़े के बारे में बता रहे थे, जिसकी वज़ह से दोनों देशों के बीच तनाव का माहौल पैदा हो गया है.
नेपाल ने बिहार के पूर्वी चंपारण से सटी सीमा के पास लालबकेया नदी के किनारे भारत की तरफ से बनाए जा रहे तटबंध निर्माण पर आपत्ति जताई और यह दावा किया कि तटबंध का निर्माण नेपाल की ज़मीन पर हो रहा है. इस वजह से तटबंध निर्माण का काम रुक गया है.
पूर्वी चंपारण के ज़िलाधिकारी शीर्षत कपिल अशोक बीबीसी से कहते हैं, "तटबंध निर्माण का लगभग 99 फीसदी काम पूरा हो चुका था. लेकिन अब नेपाली प्रशासन की आपत्ति के बाद हमें आखिरी के हिस्से का काम रोकना पड़ा है. हमारी समझ से पिलरों के इधर-उधर हो जाने से विवाद हुआ है."
डीएम ने आगे कहा ,"शुरुआत में स्थानीय स्तर पर बातचीत कर मामला सुलझाने की तमाम कोशिशें हुईं, लेकिन फिर भी बात नहीं बन पाई. अब एक नया सर्वे कराना होगा. यह अंतरराष्ट्रीय सीमा का मसला है इसलिए हमने वस्तु स्थिति के बारे में राज्य और केंद्र सरकार को अवगत करा दिया है. अब आगे का फैसला उन्हें ही करना है."
यह ताज़ा विवाद तब पैदा हुआ है जब इसके पहले 13 जून को नेपाल की संसद ने देश के एक नए नक्शे को स्वीकृति दे दी और उस नक्शे में तीन इलाके लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी को अपना हिस्सा बताया.
इसके अलावा नेपाल की संसद ने एक नया नागरिकता कानून भी पास किया है जिससे दोनों देशों के बीच रोटी - बेटी के रिश्तों में भी कड़वाहट आई है. नए कानून के मुताबिक किसी भारतीय लड़की की नेपाल में शादी हो जाने के बाद भी उसे नेपाली नागरिकता सात साल बाद ही मिलेगी.
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नो मेन्स लैंड पर निर्माण
पूर्वी चंपारण में भारत और नेपाल की सीमा पर लाल बकेया नदी के किनारे तटबंध बनाने का काम 15 जून से ही रुका हुआ है.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक उस दिन नेपाल के सीमावर्ती जिले रौतहट के सीडीओ बसुदेव घिमरे अन्य अधिकारियों और सुरक्षा बलों को लेकर आए थे और वहां काम करा रहे जल संसाधन विभाग, बिहार के इंजीनियर रणबीर प्रसाद को काम रोक देने के लिए कहा. नेपाली प्रशासन का दावा है कि सीमा पर पिलर 346/6 से पिलर 346/7 के बीच तटबंध का निर्माण "नो मेन्स लैंड" पर हुआ है.
बुधवार की दोपहर हम उस जगह पहुंचे जहां तटबंध बनाने का काम रुका हुआ है. नेपाल से आ रही और बागमती में मिलने वाली लालबकेया नदी के किनारे बना यह तटबंध 2.5 किमी लंबा है.
जिस जगह पर काम रुक गया है वहां तटबंध के एक किनारे भारत का गांव बलुआ गुआबाड़ी है, दूसरे किनारे पर है नेपाल का बंजराहा गांव.
भारत का गाँव तटबंध से ज़्यादा सटा है. कुछ घरों के दरवाज़े भी तटबंध पर ही खुलते हैं. कुछ घरों के मवेशी भी तटबंध पर बंधे मिलते हैं.
दूसरी तरफ़ नेपाल का गांव बंजराहा सीमा से कुछ दूरी पर है. दुकानें और मकान भी नो मेन्स लैंड से क़रीब 25 मीटर दूर है.
नियमों के मुताबिक़ सीमा रेखा से 9.1 मीटर दाहिने और 9.1 मीटर बाएं की जमीन को नो मेन्स लैंड कहा जाता है.
सीमारेखा पर पिलर गड़े हैं. लेकिन जिस जगह पर नेपाल की तरफ़ से दावा किया गया है वहां के पिलर अपनी जगह पर नहीं है.
पूर्वी चंपारण के डीएम शीर्षत कपिल अशोक कहते हैं, "नेपाली प्रशासन की आपत्ति के बाद स्थानीय स्तर पर ज्वाइंट सर्वे का कराया गया था. उसपर सहमति भी बन गई थी. लेकिन, फ़िर लॉकडाउन हो गया. लॉकडाउन के बाद पुनः जब काम शुरू किया गया तो उन्होंने फ़िर से आपत्ति जताई. लिहाज़ा काम रोकना पड़ा. "
नेपाल के दावे के मुताबिक़ क्या तटबंध का निर्माण "नो मेन्स लैंड" में हुआ है?
डीएम शीर्षत कपिल अशोक ने कहा "इसके बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता. अब यह सर्वे के बाद ही क्लियर हो पाएगा."
हालांकि, शुरुआत में स्थानीय स्तर पर जो सर्वे कराया गया था, उसके बाद पिलर की जगह पहचान के लिए जो बांस का खूंटा गड़ा था, उसकी दूरी तटबंध से 9.1 मीटर से कम थी.
बांस के खूंटे को दिखाते हुए गुआबाडी के लक्ष्मी ठाकुर कहते हैं, "यहां से नाप लीजिए 10 गज. इसी में से 2 गज कम या ज़्यादा होगा. किसी साल बाढ़ आई होगी और पिलर इधर-उधर हो गया होगा. गांव के लोगों की ज़मीन होती तो अब तक मामला ख़त्म हो गया होता. पर यह देशों का मामला है."
भारत ने सहमति तोड़ी - नेपाल
वैसे तो इस वक़्त नेपाल में प्रवेश की मनाही है मगर हमें सीमा पर भारत के लोगों से बात करते हुए देखकर नेपाल के बंजराहा गांव की तरफ़ बाजार में बैठे लोगों ने इशारे से बोर्डर के उस पार बुला लिया.
वे लोग भारत के लोगों के साथ अपने संबंधों पर बातचीत करने लगे. उनका आरोप था कि भारत की मीडिया नेपाल का पक्ष सही से नहीं रख रही है.
हमने उनका पक्ष जानना चाहा तो बंजराहा के मुखिया बिगु साह बताते हैं, "वे अपना बांध बनाएं, हमें उससे कोई दिक्कत नहीं है. लेकिन उन्हें इस बात का भी ख्याल रखना होगा कि बरसात में जब पानी हमारी ओर बढ़ जाएगा तब हमलोग क्या करेंगे, कहां जाएंगे?"
बिगु साह आगे कहते हैं,"सहमति बनी थी कि पानी रिलीज़ करने के लिए तटबंध में दो चैनल बनेंगे. लेकिन एक भी चैनल नहीं बनाया गया. ऊपर से इतना ऊंचा बांध बना लिया गया. अब यदि बरसात होती है तो सोचिए कि हमारा क्या हाल होगा."
सहमति बनने और चैनल बनाए जाने की बात मोतिहारी के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रभूषण पांडेय भी कहते हैं.
उन्होंने कहा, "स्थानीय स्तर पर जब सर्वे कराया गया था तब ज़मीन को लेकर सहमति बन गई थी. लेकिन उस सहमति में एक और बात ऑन रिकॉर्ड थी, वो थी पानी के प्रवाह के लिए चैनल बनाना. लेकिन बांध तो बन गया पर चैनल नहीं बना. मेरी समझ से नेपाल को सबसे ज्यादा आपत्ति इसी से है और गुआबाडी में पिलर मिसिंग हो जाने से उन्हें एक प्वाइंट मिल गया."
पहली बार दावा
तटबंध की मरम्मत का काम बाढ़ पूर्व की तैयारियों के तहत किया जा रहा था.
बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग के मंत्री संजय कुमार झा ने सोमवार को बयान दिया कि नेपाल की तरफ से इस तरह की आपत्ति न सिर्फ एक बल्कि तीन तटबंधों की मरम्मत और निर्माण के काम में दर्ज कराई गई है.
चूँकि तटबंधों की मरम्मत का काम हर साल बाढ़ पूर्व की तैयारियों में शामिल होता है. लेकिन नेपाल की की तरफ से ऐसी आपत्ति नहीं दर्ज कराई गई और ना ही ऐसा कोई कदम कभी उठाया गया.
रिपोर्ट्स के मुताबिक पिछली बार भी नेपाल की तरफ से ऐसे दावे किए गए थे, मगर तब स्थानीय स्तर के अधिकारियों ने ही बात करके मसले को सुलझा लिया था.
बगल के सीमावर्ती गांव चंदनबारू के रहने वाले अकरम बीबीसी से कहते हैं, "इसके पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि नेपाल ने इतना सख्त क़दम उठाया हो. यह तटबंध काफ़ी पहले बना था. और बाढ़ पूर्व हर साल मरम्मत का काम चलता है."
अकरम के मुताबिक़ नेपाल की असल नाराज़गी बांध बन जाने और चैनल नहीं बनाए जाने से ही है, क्योंकि उन्हें बाढ़ का ख़तरा सताने लगा है. पिछली बार की बाढ़ में पूरा इलाका जलमग्न हो गया था. हो सकता है कि तटबंध बन जाने से भारत की तरफ़ के लोगों को राहत मिल जाए, मगर चैनल नहीं बनने से नेपाल की तरफ़ के लोगों की परेशानियां बढ़ जाएंगे.
लेकिन बांध बना क्यों नहीं? ज़वाब में डीएम शीर्षत कपिल कहते हैं, "चैनल बनाने की जिम्मेदारी जल संसाधन विभाग, उसके इंजीनियर और ठेकेदारों की थी. लॉकडाउन की वज़ह से काम बंद हो जाने के कारण चैनल का काम पूरा नहीं हो पाया."
नेपाल की तरफ़ के लोगों ने बातचीत के दौरान चाय भी पिलाया और बहुत सारी बातें भी कीं. पर जैसे ही हमने उन्हें रिकॉर्ड करने के लिए कैमरा और माइक निकाला, नेपाली प्रहरी के सैनिकों ने आकर रोक दिया. उन्होंने अपने लोगों को चुप रहने को कहा और हमसे कहा, "आप चाय पीकर लौट जाइए."
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