सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद जो चीज़ें बदल सकती हैं

    • Author, संजय कुमार
    • पदनाम, प्रोफ़ेसर, सीएसडीएस

फ़िल्म स्टार सुशांत सिंह राजपूत की मौत की ख़बर ने मेंटल हेल्थ यानी मानसिक स्वास्थ्य के विषय पर चर्चा को एक बार फिर सार्वजनिक कर दिया है.

इस तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं और ये चर्चा भी है कि लंबे लॉकडाउन के कारण बहुत से लोगों के मन में घर कर गई कई तरह की असुरक्षा से काफ़ी लोग संभवत: अवसाद से गुज़र रहे होंगे.

पिछले तीन महीनों के दौरान, बहुत से लोगों ने असुरक्षित भी महसूस किया होगा क्योंकि उनकी नौकरी चली गई, वेतन में कटौती हुई या उनके काम में बहुत नुक़सान हुआ है जबकि कुछ परिवारों को परिवार में किसी के जीवन का नुक़सान उठाना पड़ सकता है, यह भी असुरक्षा का एक बड़ा कारण है.

अगर लोग भाग्यशाली थे कि उनकी नौकरी नहीं गई या उन्हें वेतन में कटौती का सामना नहीं करना पड़ा, तब भी पूर्ण तालाबंदी के कारण और आवाजाही पर रोक की वजह से बहुत से लोगों को अकेलेपन का सामना करना पड़ा.

पर मानसिक स्वास्थ्य की समस्या पर चर्चा तभी होती है जब किसी हाई प्रोफ़ाइल इंसान की आत्महत्या की ख़बर सबकी जानकारी में आती है.

भारत में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति

दुख की बात ये है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करना भारत में इस समस्या के परिणाम से बहुत कम है.

समस्या ये है कि बहुत से लोग तो यह महसूस ही नहीं कर पाते कि वे अवसाद से ग्रसित हैं, लेकिन इससे भी बड़ी समस्या ये है कि जो लोग अपनी बीमारी के बारे में जानते हैं, वे अन्य लोगों के साथ इस बारे में चर्चा नहीं करना चाहते या परामर्श के लिए डॉक्टर से मिलने नहीं जाते हैं.

क़रीब साल भर पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक 'मन की बात' कार्यक्रम में मेंटल हेल्थ का मुद्दा उठाया था और लोगों से कहा था कि वे खुलकर डिप्रेशन और मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे पर बात करें.

पीएम मोदी ने यह तक कहा था कि 'डिप्रेशन से लड़ने का पहला मंत्र ही ये है कि आप इस समस्या के बारे में बात करें, उसे खुलकर ज़ाहिर करें, उसे दबाकर बैठे ना रहें.' ये बहुत ही महत्वपूर्ण सलाह है.

अब खुलकर बोल रहे हैं लोग?

जब प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे पर बात की, तब कुछ वक़्त तक इस विषय पर थोड़ी चर्चा हुई. लेकिन जल्द ही ये चर्चा हमारे बीच से हवा हो गई.

पर अब ये चर्चा सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के साथ ना सिर्फ़ दोबारा शुरू हुई है बल्कि लोग अब गुज़रे समय में रहे, ख़ुद के डिप्रेशन के बारे में खुलकर बता भी रहे हैं.

भारत के पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस पार्टी के नेता मिलिंद देवड़ा ने खुलकर बोला है कि कैसे उन्हें आत्महत्या के विचार आते थे और उन्होंने बताया है कि किन पाँच तरीक़ों से डिप्रेशन से लड़ा जा सकता है.

अवसाद - यह केवल एक शब्द नहीं है, बल्कि चिंता का विषय भी बन जाना चाहिए. पर जब सिलेब्रिटी इससे पीड़ित होते हैं, ये तभी एक समस्या के तौर पर दिखाई देता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 6.5% भारतीय किसी ना किसी तरह के अवसाद से ग्रसित हैं.

इस रिपोर्ट के अनुसार भारत को दुनिया के सबसे अवसाद ग्रस्त देशों की श्रेणी में चीन और अमरीका से भी ऊपर स्थान दिया गया है.

15-24 वर्ष की आयु वर्ग के छात्रों में डिप्रेशन सबसे अधिक है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि अन्य आयु वर्ग के लोग अवसाद से ग्रस्त नहीं हैं.

लेकिन अवसाद की समस्या से ज़्यादा बड़ी समस्या ये है कि इसके बारे में भारतीय समाज में खुलकर बात नहीं होती.

अवसाद से ग्रस्त लोगों को क्या करना चाहिए?

मिलिंद देवड़ा ने उल्लेख किया है कि जो लोग अवसाद से जूझ रहे हों, उन्हें अपने परिवार, दोस्तों, सहकर्मियों और जान-पहचान वालों से बात करनी चाहिए.

उन्होंने यह भी बताया कि लोगों को मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जानना चाहिए और काउंसलिंग भी करवानी चाहिए.

पर दुर्भाग्य से इसे आज भी एक कलंक के रूप में देखा जाता है और लोग ये बात किसी से साझा नहीं करना चाहते कि वे मानसिक रूप से बीमार हैं और ऐसे में परिस्थितियों के बिगड़ने पर आत्महत्या जैसे क़दम भी उठा लेते हैं.

सुशांत सिंह राजपूत के आत्महत्या करने पर इस समस्या की ओर हमारा ध्यान देना और भी ज़रूरी हो जाता है क्योंकि ये इकलौता मामला नहीं है, बल्कि भारत में ऐसे मामले बढ़ रहे हैं.

नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो (एनसीआरबी) के डेटा के अनुसार साल 2018 में 10,159 छात्रों ने आत्महत्या की थी.

भारत में आत्महत्या की दर बढ़ी है. साल 2017 में 9,905 छात्रों ने आत्महत्या की थी, वहीं साल 2016 में ऐसे मामलों की संख्या 9,478 थी.

भारत में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति कितनी गंभीर?

लोकनीति-सीएसडीएस ने 2016 में एक सर्वे करवाया था जिससे यह बात निकलकर आयी थी कि हर दस में से चार पढ़ने वाले युवा अवसाद ग्रस्त हैं जिसके पीछे अकेलापन सबसे बड़ा कारण है.

इस अध्ययन से यह भी पता चला था कि 6 प्रतिशत युवाओं ने माना कि उन्हें पिछले कुछ सालों में कम से कम एक बार आत्महत्या करने का विचार आया था.

ये स्थिति जितनी दिख रही है, उससे ज़्यादा बुरी है.

मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कलंक की वजह से लोग डॉक्टरों के पास जाने से हिचकिचाते हैं और इस विचारधारा को एक रात में नहीं बदला जा सकता.

सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के बाद बहुत सारे जागरूकता अभियान चलाये गए, पर लोगों को अवसाद को एक बीमारी के तौर पर स्वीकार करने में समय लगेगा.

भले ही सामाजिक परिवर्तन में समय लगे, पर अवसाद से ग्रस्त होने पर लोगों को मदद लेने के लिए आगे आना चाहिए और अपनों के सामने अपनी बात रखनी चाहिए.

ऐसा करने से भारत में आत्महत्या के मामलों में कमी लायी जा सकती है जो पिछले एक दशक में लगातार बढ़े हैं.

(संजय कुमार सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (CSDS) में प्रोफ़ेसर हैं. वो राजनीतिक विश्लेषक और टिप्पणीकार भी हैं. इस लेख में उन्होंने अपने निजी विचार व्यक्त किये हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)