कोरोना महामारी के दौरान अलग तरह की दिक़्क़तें झेल रहा है कश्मीर

    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए

केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में 24 जून तक 6,422 लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हो चुके हैं. स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक़ अब तक 88 लोग इस वायरस से संक्रमित होकर मर चुके हैं.

लेकिन एक लंबे समय से लॉकडाउन की मार झेल रहे कश्मीरी लोग इस महामारी के दौर में कई अन्य तरह की समस्याएं भी झेल रहे हैं.

व्यापारिक समुदाय के सामने चुनौती

दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग ज़िले में एक दुकानदार चलाने वाले रईस अहमद कहते हैं कि कोरोना काल की सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक तंगी है.

वह कहते हैं, "हम बीते दस महीनों से लॉकडाउन झेल रहे हैं. एक तरफ़ तो हम कोरोना वायरस का सामना कर रहे हैं. वहीं दूसरी ओर हमारे सामने कई तरह की दुश्वारियां हैं. मैं एक मज़दूर हूँ. सुबह कमाता हूँ तब शाम को खाता हूँ. हाल ही में मेरे लड़के ने कहा कि उसे साइकिल चाहिए. लेकिन मैं उसे साइकिल देने में सक्षम नहीं हूँ. शारीरिक रूप से अक्षम मेरे बेटे को सरकार की ओर से हर महीने कुछ पैसे मिलते हैं. मेरे बेटे ने उन्हीं पैसों से साइकिल ख़रीदी है. ये उन चुनौतियों का एक उदाहरण है, जो हम झेल रहे हैं."

"हमारी स्थिति काफ़ी जोख़िमपूर्ण है. हमारे बच्चे पिछले 5 अगस्त, 2019 से स्कूल नहीं जा पा रहे हैं जब सरकार ने आर्टिकल 370 को हटा दिया था. वे सिर्फ़ कुछ दिनों के लिए स्कूल जा पाए. पूरी दुनिया बीते चार महीनों से ये (लॉकडाउन) झेल रही है. हमें ये नहीं पता है कि हमारे साथ क्या होगा. यहां पर स्थिति हमेशा ही तनावपूर्ण बनी रहती है. हमें नहीं पता है कि हमारा राजनीतिक भविष्य क्या होगा. हम बेहद निराश हैं."

कश्मीर चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज़ के अध्यक्ष शेख़ आशिक़ हुसैन ने बीबीसी को एक इंटरव्यू में बताया था कि "कश्मीर की स्थिति और चुनौतियां शेष भारत से अलग हैं. जब हम 5 अगस्त, 2019 से शुरू हुए लॉकडाउन से बाहर आ पाए तो उसके बाद हम कोरोना वायरस लॉकडाउन में चले गए. हर कोई विशेषत: व्यावसायिक समुदाय बेहद दबाव में है."

छात्रों की समस्या

अनुच्छेद 370, लॉकडाउन और कड़ी सर्दियों के बाद कश्मीरी छात्र आने वाले दिनों को लेकर आशावान थे. लेकिन कोरोना ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है.

कश्मीर यूनिवर्सिटी के छात्र आक़िब कहते हैं, "छात्रों के लिए कोरोना वायरस सिर्फ़ एक समस्या नहीं है. उनके पास हाई स्पीड इंटरनेट नहीं है. वे स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी नहीं जा पा रहे हैं."

"ये कमी सिर्फ़ हमारी शैक्षणिक गतिविधियों को प्रभावित नहीं कर रही है. बल्कि हमें मानसिक आघात भी पहुंचा रही हैं. अगर हमारे पास हाई स्पीड इंटरनेट रहता तो हम इतना परेशान नहीं होते. हम वीडियो खोलने और डाउनलोड करने में सक्षम नहीं हैं और हम इंटरनेट की दुनिया का आनंद नहीं उठा पा रहे हैं. हमें ये भी पता नहीं चल रहा है कि कोरोना के ख़िलाफ़ जंग कैसे लड़ें. हमारे पास तेज़ इंटरनेट होता तो हम अन्य गतिविधियों में समय बिताकर अपना तनाव कम कर पाते. पहले आर्टिकल 370 था, फिर ख़राब सर्दियां और अब कोरोना वायरस आ गया है."

वह बताते हैं, "शोपियां ज़िले में पिछले पंद्रह दिनों में सात एनकाउंटर हो चुके हैं. हर एनकाउंटर के दौरान इंटरनेट बंद कर दिया जाता है. ऐसे में क्या हम पढ़ाई कर सकते हैं?

वहीं, एक निजी स्कूल के मालिक और प्रिंसिपल आर्शिद बाबा कहते हैं कि इंटरनेट कनेक्टिविटी की कमी से हम ऑनलाइन क्लासेज़ नहीं दे पा रहे हैं.

उन्होंने कहा कि हमने वॉइस कॉन्फ्रेंस कॉल शुरू कर दी हैं.

डॉक्टरों को भी झेलनी पड़ रही है समस्याएँ

दक्षिणी कश्मीर के एक सरकारी अस्पताल में काम करने वाले एक डॉक्टर ने बीबीसी को बताया कि कई वजहों से कोरोना से संबंधित काम करने में परेशानी हो रही है.

उन्होंने बताया, "लोग कोरोना महामारी के बारे में ज़्यादा नहीं जानते. कभी-कभी हमें लोगों की नाराज़गी झेलनी पड़ती है. कुछ दिन पहले हम निगरानी के लिए फ़ील्ड में गए थे. लोगों ने जब हमें देखा तो नाराज़ हो गए. दूसरी बात ये है कि दक्षिणी कश्मीर में हर दिन एनकाउंटर्स होते हैं. जब भी हम घर से बाहर जाते हैं, कई तरह के ख़तरे होते हैं. हम यही सोचते रहते हैं कि बस हम वहाँ सुरक्षित पहुँच जाएँ. ये सिर्फ़ कोरोना ड्यूटी नहीं है, हमें और भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है."

भारत सरकार ने पिछले साल पाँच अगस्त को कश्मीर से अनुच्छेद 370 ख़त्म कर दिया था और जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया गया था.

अनुच्छेद 370 हटाने से पहले भारत सरकार ने कई राजनेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार कर लिया था, जिनमें तीन पूर्व मुख्यमंत्री भी थे.

इन तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों और अन्य राजनेताओं के ख़िलाफ़ पब्लिक सेफ़्टी एक्ट लगा दिया था.

एक अलग तरह की चुनौती

पुलिस का दावा है कि सिर्फ़ जून महीने में दक्षिण कश्मीर में दो से ज़्यादा चरमपंथी मारे गए हैं.

इस इलाक़े के एक गाँव में रहने वाले गुल मोहम्मद कहते हैं कि कश्मीर में दो तरह की चुनौतियाँ हैं. यहाँ हर दिन एनकाउंटर होते हैं और कोरोना के मामले में हर दिन रिपोर्ट किए जाते हैं.

वे कहते हैं, ''हम एनकाउंटर की मौत पर आवाज़ उठाएँ या हम कोरोना संकट से लड़ें?''

कोरोना से होने वाली मौत की गुत्थी

हर गुज़रने वाले दिन के साथ कश्मीर के लोग कोरोना से होने वाली मौतों को लेकर भ्रम में हैं. वे इस पर आश्वस्त नहीं है कि कोरोना के तहत जिन लोगों की मौत की रिपोर्ट दी जा रही है, वे वाक़ई कोरोना पॉज़िटिव थे या नहीं.

लोग उन मौतों पर सवाल उठा रहे हैं, जिन्हें अस्पताल में कोरोना पॉज़िटिव घोषित किया जा रहा है.

हाल का ही एक मामला हिंदवाड़ा के 18 वर्षीय एक लड़के का है, जिसकी मौत श्रीनगर के एसएमएचएस अस्पताल में चोट के कारण हो गई.

स्थानीय मीडिया के मुताबिक़ उनके परिजनों का दावा है कि उनके बेटे का अपहरण किया गया था और वो गंभीर रूप से घायल हो गए थे.

परिजनों के मुताबिक़ लड़के को सिर में चोट के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

लड़के के चाचा लियाक़त अली ने स्थानीय मीडिया को जानकारी दी कि उन्हें बताया है कि लड़का कोरोना पॉज़िटिव था. उन्होंने दावा किया कि लड़के को कोई स्वास्थ्य संबंधी परेशानी नहीं थी और परिवार के विवाद में उसे कुछ लोगों ने अग़वा कर दिया और पिटाई की.

उन्होंने रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि अब ये कैसी रिपोर्ट आई है. लियाक़त अली ने कहा कि उस वार्ड में अन्य मरीज़ भी थे, जिनकी कोरोना रिपोर्ट का इंतज़ार किया जा रहा था, लेकिन उनके लड़के की रिपोर्ट इतनी जल्दी कैसे आ गई. उन्होंने इसकी निष्पक्ष जाँच की माँग भी की है.

दूसरी ओर कश्मीर के डॉक्टर्स एसोसिएशन (डीएके) ने कश्मीर में कोविड से होने वाली मौतों के लिए ऑडिट कमेटी गठित करने की माँग की है.

डीएके के अध्यक्ष डॉक्टर सुहियाल नाइक ने बीबीसी को बताया, "कश्मीर में कोविड से इस तरह हो रही मौतों पर लोग भ्रम में हैं. उन्हें जानकारी नहीं कि मौत कोविड से हो रही है या किसी अन्य बीमारी से. हमारे पास ऐसे कई मामले हैं, जिनमें मौत को लेकर लोगों के मन में भ्रम पैदा हो जाता है. इसलिए हमने माँग की है कि एसडीसीए कोरोना से हो रही मौतों की घोषणा करे. कश्मीर में मौजूदा समय में एक बड़ी समस्या है. "

हालांकि शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस (एसकेआईएमएस) के डायरेक्टर एजी अहंगर ने कहा कि वे हर सप्ताह कोविड से हो रही मौतों की समीक्षा करते हैं.

उन्होंने कहा, "मैं डॉक्टरों या ग़ैर-सरकारी संगठनों की ऐसी बातों को अच्छी तरह समझता हूँ. लेकिन हर सप्ताह हम ऐसी मौतों की समीक्षा करते हैं. हम एक ख़ास मरीज़ के मामले को चुनते हैं, जिनकी मौत पर कोई संदेह होता है और फिर हम उसका विश्लेषण करते हैं. मरीज़ के दाख़िले से लेकर आख़िर समय तक की समीक्षा होती है."

सामुदायिक संक्रमण की चुनौती

हाल के महीनों में 200 से ज़्यादा गर्भवती महिलाएँ कोरोना पॉज़िटिव पाई गई हैं, इससे आम लोगों में चिंता है.

डॉक्टर सुहियाल नाइक कहते हैं कि हम कम्युनिटी ट्रांसमिशन के दौर में पहुँच चुके हैं. हमें सच्चाई स्वीकार कर लेनी चाहिए. उन्होंने कहा, "आप गर्भवती महिलाओं में कोरोना के मामलों को देख लीजिए. वे कहीं नहीं गई हैं. तो उन्हें संक्रमण कैसे हो गया."

लेकिन एजी अहंगर कहते हैं जिस तरह कोरोना फैल रहा है, हमें इसके साथ जीना होगा.

वे कहते हैं, "जहाँ तक कम्युनिटी ट्रांसमिशन की बात है, मैंने पिछली बार कहा था कि ये हमारे इलाक़े में है. ये उन लोगों की वजह से है, जो लोग बाहर से आए हैं, जो कई देशों से यहाँ आए हैं और जो संक्रमित इलाक़ों से आए हैं. ऐसी स्थिति में कम्युनिटी ट्रांसमिशन होता ही है. भारत की दो बड़ी संस्थाओं ने भी कहा है कि कोरोना फैल रहा है और जिस तरह ये फैल रहा है, हमें इसके साथ रहने की आदत डालनी होगी."

गर्भवती महिलाओं के कोरोना पॉज़िटिव होने के बारे में उन्होंने कहा कि ये चिंता की बात है. हमें सावधान रहने की आवश्यकता है.

लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं के डायरेक्टर डॉक्टर समीर मट्टू का कहना है कि अभी कम्युनिटी ट्रांसमिशन नहीं शुरू हुआ है.

आयोग्य सेतु के कम यूज़र्स

अभी तक कश्मीर क्षेत्र में सिर्फ़ तीन लाख 11 हज़ार लोगों ने आरोग्य सेतु ऐप डाउनलोड किया है.

श्रीनगर स्थित नेशनल इन्फ़ॉर्मेटिक्स सेंटर में काम करने वाले एक वैज्ञानिक अशफ़ाक़ अहमद के मुताबिक़ पूरे जम्मू-कश्मीर में अयोग्य सेतु डाउनलोड करने वालों की संख्या 11 लाख 57 हज़ार 52 है.

वैसे ये ऐप इंटरनेट कनेक्शन पर ही काम करता है. उन्होंने बताया कि कश्मीर में बड़ी संख्या में ये ऐप डाउनलोड नहीं किया गया है और कई लोगों को इस बारे में जानकारी भी नहीं है.

एक आम कश्मीरी तौसीफ़ अहमद ने बताया कि उन्हें नहीं पता कि आरोग्य सेतु ऐप है क्या.

दूसरी ओर डॉक्टर समीर मट्टू का कहना है कि उनका विभाग इस ऐप के बारे में जागरुकता अभियान चला रहा है. उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में ऐप का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या बढ़ेगी.

कश्मीर में मौजूदा स्थिति में कई बार इंटरनेट डाउन रहता है यानी काम नहीं करता है.

डॉक्टर्स एसोसिएशन कश्मीर के एक अन्य गुट के अध्यक्ष डॉक्टर निसार उल हसन का कहना है कि लॉकडाउन में दी जा रही ढील आने वाले समय में कश्मीर के लिए एक और चुनौती है.

हाल ही में श्रीनगर में प्रशासन ने लॉकडाउन में ढील की घोषणा की थी और इस दौरान नियमों के बारे में भी जानकारी दी थी.

पूंछ के सीमावर्ती ज़िले में लोग सिर्फ़ कोरोना का ही सामना नहीं कर रहे बल्कि अन्य कई मुश्किलों से दो चार हो रहे हैं.

पूंछ के पूर्व विधायक शाह मोहम्मद तंत्रे ने बीबीसी को फ़ोन पर बताया कि उनके ज़िले के लोग कई तरह से परेशान हैं.

उन्होंने बताया, "सीमा पर तनाव है. हमारे ज़िले की 80 फ़ीसद आबादी मज़दूरों की है. हमें आपात स्थिति में पूंछ से जम्मू जाना पड़ता है. जम्मू और पूंछ के बीच की दूरी 200 किलोमीटर है. सरकारी अस्पताल कोरोना के अलावा अन्य बीमारियों के मरीज़ों को भर्ती नहीं कर रहे हैं. जबकि हमारे यहाँ कोई प्राइवेट अस्पताल नहीं है."

हालांकि पूंछ के उपायुक्त राहुल यादव का कहना है कि जो लोग कह रहे हैं, वैसा कुछ भी नहीं है. हम उतनी ही सर्जरी कर रहे हैं, जितनी कोरोना से पहले कर रहे थे. कोई बड़ा अंतर नहीं है.

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