भारत चीन तनाव: एलएसी की निगरानी कैसे करता है भारत

भारतीय जवान

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    • Author, जुगल पुरोहित
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

आमतौर पर भारत में लोग एलओसी यानी लाइन ऑफ कंट्रोल के बारे में ज़्यादा जानते हैं, इसकी कई वजहें भी हैं.

एलओसी भारत और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर को दो हिस्सों में बांटने वाली 740 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा है. एलओसी पर युद्ध हुए हैं. फिल्म और डॉक्यूमेंट्रीज बनी हैं. इसके अलावा इस सीमा पर नियमित तौर पर गोलीबारी होती रहती है, लिहाज़ा यह हमेशा सुर्खियों में भी होती है.

लेकिन ये बातें एलएसी यानी भारत और चीन को अलग करने वाली लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल के बारे में लागू नहीं होती.

एलएसी, एलओसी की तुलना में पांच गुना बड़ी सीमा रेखा है. 3488 किलोमीटर लंबी यह सीमा रेखा चार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख से गुजरती है. इसके बावजूद इसके बारे में लोग ज्यादा नहीं जानते हैं. वैसे वास्तविकता यह है कि यह कोई सीमा रेखा भी नहीं है. दरअसल इस इलाके में भारत और चीन की अपनी-अपनी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल हैं.

ऐसे में इस इलाके में भारत चीन के बीच हुए मौजूदा विवाद ने लोगों को चौंकाया नहीं है. एलएसी पर छोटी मोटी झड़प से लेकर हिंसक झड़प और यहां तक कि एक युद्ध भी हो चुका है.

ऐसे में सवाल यह है कि भारत एलएसी की निगरानी कैसे करता है.

भारत के गृह मंत्रालय ने 2004 से एलएसी की निगरानी की ज़िम्मेदारी इंडो तिब्बतन बोर्डर फ़ोर्स यानी भारत-तिब्बत सीमा सुरक्षाबल (आईटीबीपी) को सौंपी. इससे पहले आईटीबीपी की मदद असम रायफल्स के जवान भी किया करते थे. वैसे आईटीबीपी का गठन भारत-चीन युद्ध के दौरान ही 24 अक्टूबर, 1962 को हुआ था.

जयवीर चौधरी आईटीबीपी के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल (डीआईजी) पद से 2010 में रिटायर हुए हैं. 37 साल की सेवा के दौरान वे उन सभी राज्यों में तैनात रहे हैं जिससे एलएसी गुजरती है.

एलएसी पर भारत की निगरानी व्यवस्था के बारे में पूछे जाने पर जयवीर चौधरी ने बताया, "हमने आईटीबीपी के तौर पर एक सुरक्षा बल को खड़ा तो किया है लेकिन उसकी ज़रूरतों को ठीक से पूरा नहीं किया गया है. सीमा की निगरानी करने वाले सुरक्षा बल के तौर पर जो हमें मिलता है और जिसकी हमें ज़रूरत है, उसमें काफी अंतर है."

चीन - भारत सीमा पर भारतीय जवान

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हालांकि हाल के दिनों में एलएसी के इलाके में भारत ने अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने पर ध्यान दिया है.

भारत सरकार के गृह मंत्रालय के 2018-19 की सालाना रिपोर्ट (2019-20 की सालाना रिपोर्ट अभी उपलब्ध नहीं है) के मुताबिक भारत चीन सीमा की निगरानी के लिए आईटीबीपी की 32 बटालियन तैनात हैं. प्रत्येक बटालियन में कम-से-कम एक हज़ार जवान मौजूद होंगे.

यानी प्रत्येक बटालियन पर 110 किलोमीटर सीमा की सुरक्षा का जिम्मा है. ये सीमा दुनिया के सबसे जोखिम भरा इलाके से गुजरती है, 9000 फीट से लेकर 18750 फीट की ऊंचाई पर दुर्गम पर्वत और जंगलों का इलाका है.

जयवीर चौधरी कहते हैं, "मुझे मालूम है कि सीमा रेखा पर ज़्यादा सुरक्षाबलों को तैनात किया गया है लेकिन सीमा पर प्रभावी निगरानी करने के लिए मौजूदा संख्या से तीन गुना ज़्यादा जवानों की जरूरत है."

भारत के गृह मंत्रालय के 2018-19 की रिपोर्ट के मुताबिक 3488 किलोमीटर लंबी सीमा पर 178 बॉर्डर पोस्ट हैं, यानी दो पोस्ट के बीच की दूरी 20 किलोमीटर है. ज़मीनी स्तर पर इसके क्या मायने हैं?

चीन - भारत सीमा पर भारतीय जवान

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जयवीर चौधरी ने कहा, "क्या मुझे इसका जवाब देने की ज़रूरत है? पर्वतीय इलाकों में कई बार किसी भी दिशा में 100 मीटर तक देख पाना मुश्किल होता है. उत्तर पूर्व के जंगलों में कई बार दो फीट आगे की चीज दिखाई नहीं देती है. दरअसल हमें साइंटफिक और सिस्टेमेटिक अप्रोच की जरूरत है और अभी इसकी कमी है."

लेकिन इन मुद्दों के बारे में सरकार और गृह मंत्रालय अनजान कैसे रह सकती है? इस बारे में गृह मंत्रालय से कई बार पूछे जाने पर भी हमें अब तक कोई जवाब नहीं मिला है.

जयवीर चौधरी ने बताया, "सरकार इन कमियों के बारे में जानती है, लेकिन कई बार बजट कम होने को कारण बताया जाता है, इससे बात वहीं समाप्त हो जाती है. कैसे काम होता है, उसका एक उदाहरण देता हूं. मान लीजिए कि आपको 10 वाहन और उसके ईंधन के लिए फंड मिला. बाद में आपको पांच और वाहन के लिए फंड दिया जाता है लेकिन इन गाड़ियों के लिए अतिरिक्त ईंधन खरीदने की अनुमति नहीं मिलती. आप बताइए कि उन पांच वाहनों का आप क्या करेंगे?"

मैंने जयवीर चौधरी को ध्यान दिलाया कि आईटीबीपी का बजट 2009-10 में 1134.05 करोड़ रुपये हुआ करता था जो 2018-19 में बढ़कर 6190.72 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है.

इस पर जयवीर चौधरी ने कहा, "लेकिन इस दौरान सुरक्षा बलों की संख्या भी तो बढ़ी है. मैंने आपको कार और ईंधन का उदाहरण दिया है, आप उस पर सोचिए तो आपको अपने सवाल का जवाब मिल जाएगा. समस्या केवल बजट की नहीं है, बजट का इस्तेमाल कैसे करते हैं, उससे भी जुड़ी हुई है."

इसके अलावा जयवीर चौधरी एक और पहलू पर ध्यान दिलाते हैं.

उन्होंने कहा, "आईटीबीपी गृह मंत्रालय को रिपोर्ट करती है. हमारे पीछे सेना तैनात होती है, जिसके साथ आईटीबीपी कई बार ज्वाइंट पेट्रोलिंग का काम करती है. सेना रक्षा मंत्रालय को रिपोर्ट करती है. गृह मंत्रालय अपने चार्टर के मुताबिक सीमा की निगरानी, आंतरिक सुरक्षा और अन्य पहलूओं पर काम करता है. ऐसे में सीमा की निगरानी और उसके मुद्दों पर ध्यान देने के लिए एक अलग से मंत्रालय क्यों नहीं होना चाहिए? ऐसा होने पर मुझे भरोसा है कि हमारा नज़रिया कहीं ज्यादा केंद्रित और साइंटिफिक होगा."

भारत का लड़ाकु विमान

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सेना का नज़रिया

पूर्व नॉर्दन आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डा (रिटायर्ड) जब जम्मू कश्मीर स्थित उधमपुर के अपने मुख्यालय में बैठते थे, तब उन्हें एलओसी और एलएसी, दोनों पर काम करने का मौका मिला था.

उनका भी मानना है कि एलएसी पर कहीं ज़्यादा निगरानी रखे जाने की ज़रूरत है.

वे स्पष्ट करते हुए ये भी कहते हैं, "मैं ऐसा इसलिए नहीं कह रहा हूं क्योंकि गलवान घाटी में सीमा पर हिंसक झड़प हुई है." डीएस हुडा हमेशा से तकनीक में निवेश बढ़ाने की बात करते रहे हैं. उन्होंने कहा, "इस इलाके की भौगोलिक स्थिति ऐसी है यहां जितनी भी सुरक्षा बल के जवान तैनात कर दिए जाएं, वे पर्याप्त नहीं हो सकते."

ऐसे में मुश्किल क्या है, क्या फंड की कमी है या समस्या की समझने में मुश्किल हो रही है या फिर एलएसी को उतनी प्राथमिकता नहीं मिल रही है जितनी मिलनी चाहिए?

यह पूछे जाने पर लेफ़्टिनेंट जनरल हुडा ने बताया, "समस्या को लेकर समझ भी है, स्पष्टता भी है, लेकिन चुनौती यह है कि उस इलाके में आप जो करते हैं उसे सतत जारी रखने की चुनौती है. इलाका ऐसा है जहां तकनीक को भी आसानी से स्थापित नहीं किया जा सकता."

चीन की सेना की ताकत

चीन की सेना के बारे में पूछे जाने पर जयवीर चौधरी बताते हैं, "चीन के सैनिक जहां भी होते हैं उनके साथ एक राजनीतिक प्रतिनिधि तैनात होता है. सेना को उस प्रतिनिधि के निर्देशों के मुताबिक काम करना होता है. इस नज़रिए से देखें तो उनकी कमजोरी यह है कि वे खुद से कोई फैसला नहीं ले सकते हैं."

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग

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लेकिन जयवीर चौधरी ने चीन की सेना के मज़बूत पक्षों के बारे में भी विस्तार से बताया.

उन्होंने कहा, "उनके पास ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर है कि वे पूरी कमांड को एक जगह से दूसरी जगह महज 12 घंटे के अंदर ट्रेन लाइन के ज़रिए तैनात कर सकते हैं, हमें ऐसा करने के लिए हज़ारों वाहन की जरूरत होगी. उन्होंने अपने उपकरण विकसित कर लिए हैं, ज़रूरत के मुताबिक इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया है. उनकी सीमा पर ऐसी सड़कें हैं जहां वे जेट विमान उतार सकते हैं. उनकी ट्रेन और हवाई पट्टी सालों भर सेवा में रहती है. हम उनसे अपनी तुलना नहीं कर सकते हैं. हमारा काम इधर बढ़ा है, हम तेजी से भी काम कर रहे हैं लेकिन काफी कुछ किए जाने की ज़रूरत है. इलाके में आवाजाही या गतिविधि को लेकर चीन के मुकाबले हम कमज़ोर हैं."

जयवीर चौधरी आईटीबीपी मुख्यालय के डीआईजी इंचार्ज रहने के अलावा आईटीबीपी एकेडमी के निदेशक भी रह चुके हैं. उन्होंने बताया, "जो उपलब्ध हो उसमें से सबसे अच्छे विकल्प का चुनाव करना, यह हमारी आदत है. लेकिन यह उपयुक्त नज़रिया नहीं है. हमें हर सुरक्षा बल के साथ रिसर्च एंड डेवलपमेंट की टीम बनानी चाहिए और ज़रूरतों का आकलन और उसे पूरा करने पर ज़ोर देना चाहिए. हमें अपनी सोच में बदलाव लाने की जरूरत है."

आईटीबीपी और भारतीय सेना किस तरह से एकसाथ काम करती है, इस बारे में पूछे जाने पर चौधरी ने बताया, "ज़मीनी स्तर पर हमारा तालमेल काफी बेहतर है. मेरा ख्याल है कि सुरक्षा बल जितनी स्वतंत्र होगी हमारा तालमेल उतना ही बेहतर होगा. कई स्रोतों से सूचनाएं मिलने पर देश को ही फायदा होता है."

वैसे सेना के कई अधिकारियों का मानना है कि उस इलाके में आईटीबीपी पर ऑपरेशनल नियंत्रण सेना का होना चाहिए. ये मांग कितनी उचित है?

ये पूछे जाने पर जयवीर चौधरी ने कहा, "मैं इससे सहमत नहीं हूं. किसी एक को तरजीह देना सही नहीं होगा. हर सुरक्षा बल की अपनी भूमिका है. किसी को भी बड़े भाई जैसा बर्ताव करने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए. लेकिन आज भारतीय सेना लगातार बड़े भाई जैसा बर्ताव करने की कोशिश कर रही है. इसके बावजूद हममें बेहतर तालमेल हैं. लेकिन आईटीबीपी को किसी दूसरे सुरक्षा बल के नियंत्रण में लाना, यह हमारा उद्देश्य नहीं होना चाहिए."

इस पहलू पर रक्षा मंत्रालय ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.

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