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कोरोना वायरस: शहरों के बाद गाँवों में बड़ी चुनौती बन जाएगी
- Author, प्रियंका दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में अब तक साढ़े तीन लाख से भी ऊपर कोरोना पॉज़िटिव मामले सामने आ चुके हैं और ग्यारह हज़ार से भी ज़्यादा मौतें हो चुकी हैं.
भारत अब इस महामारी के बहुत ही संवेदनशील चरण में प्रवेश कर चुका है. लाखों की संख्या में महानगरों से देश के ग्रामीण अंचल की ओर लौटे प्रवासी मज़दूरों की मजबूरी ने कोरोना के प्रसार के ख़तरे को भी ग्रामीण भारत की ओर मोड़ दिया है.
सवाल यह है कि क्या ग्रामीण भारत आने वाले दिनों में कोरोना के बढ़ते मामलों से निपटने के लिए तैयार है?
मज़दूरों की वापसी और कोरोना की बढ़ती लहर के ग्रामीण भारत पर पड़ने वाले इस असर को समझने के लिए बीबीसी ने जन-स्वास्थ्य नीति के साथ-साथ वायरोलॉजी से जुड़े विश्वस्तरीय विशेषज्ञों से बात की.
इस बातचीत में जितने जवाब मिले उससे कहीं अधिक सवाल उठ खड़े हुए हैं.
हॉर्वर्ड ग्लोबल हेल्थ इंस्टीट्यूट के निदेशक और जनस्वास्थ नीति के ग्लोबल विशेषज्ञों में शुमार डॉक्टर आशीष झा ने बॉस्टन से एक स्काइप इंटरव्यू के ज़रिए बीबीसी से बातचीत में कहा कि वो ग्रामीण भारत में कोरोना के संक्रमण को लेकर बहुत चिंतित हैं.
क्या लॉकडाउन का इस्तेमाल टेस्टिंग क्षमता बढ़ाने के लिए किया गया?
कोरोना महामारी को महानगरों से गाँवों की ओर बढ़ने वाला संक्रमण बताते हुए आशीष झा कहते हैं, "लॉकडाउन स्वास्थ्य नीति के लिहाज़ से बिल्कुल सही क़दम था और उसकी वजह से हम वायरस के फैलाव को रोकने में भी कामयाब रहे. लेकिन लॉकडाउन की असली सफलता तब मानी जाती जब सरकार इस वक़्त का इस्तेमाल देश भर में टेस्टिंग की क्षमता बढ़ाने, सोशल डिस्टेंसिंग को सुनिश्चित करने और संक्रमित लोगों को एकांत में रखने के पूरी व्यवस्था कर पाती - जो कि अभी तक नहीं हो पाया है."
प्रति दस लाख की जनसंख्या पर हो रहे दो हज़ार से भी कम टेस्ट के साथ कोविड टेस्टिंग रेट के मामले में भारत, अमरीका और यूरोपीय देशों से बहुत नीचे आता है. हालांकि इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) के आँकड़ों के अनुसार भारत अब तक साठ लाख से ऊपर कोविड टेस्ट कर चुका है लेकिन संक्रमण के फैलाव और जनसंख्या के अनुपात में विशेषज्ञ इसे बहुत कम मान रहे हैं.
बिहार के अपने गृह ज़िले मधुबनी का उदाहरण देते हुए आशीष कहते हैं, "अगर मधुबनी में किसी को कोरोना के लक्षण आते हैं तो वह उन स्थानीय स्वास्थ्य कर्मचारियों के पास जाएगा जो दशकों से उसका इलाज करते रहे हैं. कई बार इन्हें 'झोला छाप डॉक्टर' भी कहा जाता है.
ग्रामीण स्तर पर काम करने वाले यह स्वास्थ्य कर्मचारी यूं तो उतने पेशेवर नहीं होते लेकिन इस वक़्त सरकार को उन्हें कोरोना टेस्टिंग में प्रशिक्षण देकर अपने मेडिकल कर्मचारियों की फ़ौज में शामिल करना चाहिए क्योंकि रातोंरात हम ग्रामीण भारत में डॉक्टरों की कमी को नहीं भर सकते."
जर्जर है भारत की जनस्वास्थ्य व्यवस्था
जन स्वास्थ्य दो प्रतिशत से भी कम पैसे ख़र्च करने वाला भारत मूलतः प्राथमिक, सामुदायिक और ज़िला स्वास्थ्य केंद्रों की तीन परतीय प्रशासनिक व्यवस्था के आधार पर काम करता है.
लेकिन नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में यह 'थ्री-टियर' सिस्टम नाकाम रहा है.
सीएमसी वेल्लोर से लंबे समय तक जुड़े रहे भारत के जाने माने वायरोलॉजिस्ट डॉक्टर जैकब जॉन कहते हैं कि जनस्वास्थ्य में दशकों तक निवेश न करने की वजह से आज हमें डॉक्टरों और स्वास्थ्य सुविधाओं की इतनी क़िल्लत झेलनी पड़ रही है.
बीबीसी से बातचीत में वे कहते हैं, "जन स्वास्थ्य नीति के विशेषज्ञ और स्वास्थ्य से जुड़े लोग दशकों से यह बात उठाते रहे हैं कि देश में व्यवस्था को ग्रास रूट से मज़बूत बनाना होगा. ग्रामीण भारत के स्वास्थ्य का भार अपने कंधों पर उठाने वाले प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मज़बूत होने चाहिए. लेकिन असलियत में यहां हालात इतने ख़राब हैं कि इनके पास न कोविड-19 टेस्टिंग की कोई क्षमता है, न संक्रमित लोगों की पहचान करने की और न ही इलाज की."
जैकब कहते हैं, "यूं तो हर साल ही क्षेत्रीय महामारियों और फ़्लू से सैकड़ों लोग इसलिए मर जाते हैं क्योंकि हमारी सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की आधारभूत संरचना ठीक नहीं है. इस साल कुछ हज़ार मौतें अधिक होने की आशंका है. और कई मामलों में तो टेस्टिंग न होने की वजह से हमारे पास ग्रामीण भारत में जान से जाने वाले लोगों के ठीक-ठीक रिकॉर्ड भी नहीं होंगे".
कम्युनिटी ट्रांसमिशन के दौर में है भारत?
डॉक्टर जैकब जॉन और डॉक्टर आशीष झा के साथ-साथ अन्य कई बड़े आपदा विशेषज्ञ डॉक्टरों का मानना है कि भारत अब कोरोना वायरस के कम्युनिटी ट्रांसमिशन के दौर में चल रहा है.
डॉक्टर जैकब कहते हैं, "दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में जिस गति से वाइरस फैल रहा है -उससे साफ़ है कि संक्रमित व्यक्ति के संक्रमण स्रोत का ठीक-ठीक पता लगाना अब उतना सम्भव नहीं रहा. भले ही सरकार आधिकारिक रूप से स्वीकार करे न करे, इसमें कोई शक नहीं की अब हम कम्युनिटी ट्रांसमिशन के दौर में हैं."
दशकों से बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले में काम करने आपदा विशेषज्ञ डॉक्टर अरुण शाह के अनुसार सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क के नियमों का पालन न किया जाना ग्रामीण भारत में संक्रमण के बढ़ने का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण कारण बन कर उभरेगा.
डॉक्टर शाह का कहना है, "हमारे ज़िले में भी दिल्ली से लौटकर आने वाले मज़दूरों की बड़ी संख्या है. लेकिन मेरे क्लिनिक तक पर लोग बिना मास्क के आ रहे हैं. यहां बाज़ार में आपको एक भी आदमी मास्क लगाए या सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन करता नज़र नहीं आएगा. इस स्वास्थ्य आपदा के दौरान हाइजीन के पालन को लेकर अभी लोगों की कोई मानसिक और सामाजिक ट्रेनिंग ही नहीं हुई है. यहां सबसे स्थिति को इतना हल्के में लिया हुआ है जबकि सच यह है कि यह वायरस किसी को नहीं बख्शेगा. सबसे ज़्यादा नुक़सान होगा बुज़ुर्गों, बच्चों और गर्भवती महिलाओं को. इसलिए सरकार को मास्क के इस्तेमाल की अनिवार्य समझते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में सघन प्रचार करना चाहिए".
कम्युनिटी ट्रांसमिशन के इस दौर में कैसे बचाई जा सकती हैं जानें?
जनस्वास्थ नीति में कुछ महत्वपूर्ण फेरबदल करके कोरोना वायरस को ग्रामीण भारत में क़हर बरपाने से रोका जा सकता है. डॉक्टर झा भारत की विस्तृत बायोटेक्नोलॉजी ताक़त की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, "भारत के पास बायोटेक्नोलॉजी में निपुण कर्मचारियों की एक विशाल और मज़बूत टीम है. सरकार इनकी मदद से देश की टेस्टिंग क्षमता को तुरंत बढ़ा सकती है. इस वक़्त हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता देश में टेस्टिंग क्षमता को न सिर्फ़ बढ़ाना - बल्कि टेस्टिंग की सुविधा को पटना के साथ-साथ मधुबनी जैसे छोटे सेंटर पर भी उपलब्ध करवाना होना चाहिए."
प्राइवेट और सरकारी अस्पताल करें मिलकर काम
दूसरी महत्वपूर्ण बात सरकारी अस्पतालों को ज़रूरी सुविधाएँ उपलब्ध करवाना है. डॉक्टर झा कहते हैं, "दवाइयाँ, एंटी-बायोटिक्स, वेंटिलेटिर, पीपीई किट जैसे सभी ज़रूरी उपकरणों की उपलब्धता ग्रामीण क्षेत्रों - या कम से कम ज़िला मुख्यालयों के सभी अस्पतालों में - सरकार को सुनिश्चित करनी चाहिए. डॉक्टरों को काम करने के लिए ज़रूरी सभी सुविधाएँ छोटे से छोटे स्वास्थ्य केंद्र तक पर उपलब्ध करवाई जानी चाहिए.
साथ ही, बड़ा सवाल मरीज़ों को रखने का है. इसके लिए इस आपदा के समय में सरकार को निजी अस्पतालों की मदद लेनी होगी. यह सच है कि निजी अस्पतालों का बिज़नेस मॉडल पैसा ख़र्च कर सकने वाले मरीज़ों पर केंद्रित है.
डॉक्टर झा कहते हैं, "इस आपदा के समय सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि निजी अस्पताल मरीज़ों को दाख़िल करें और सरकारी दर से ज़्यादा पैसे न लें. इस राष्ट्रीय आपदा के वक़्त में स्वास्थ्य सेक्टर से जुड़े लोग और सरकार के नौकरशाह - सभी को अपनी निजी फ़ायदों से ऊपर उठकर व्यवहार करना होगा".
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