भारत-चीन में सरहद पर तनाव क्या अब हाथ से निकल गया है?

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- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत और चीन ने लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर हुई झड़प के लिए एक-दूसरे पर आरोप लगाया है. इस झड़प में भारतीय सेना के 20 जवान मारे गए हैं.
रिपोर्टों के मुताबिक़ दोनों ही तरफ़ से कोई गोलीबारी नहीं हुई है बल्कि लंबे समय तक हाथापाई हुई है जिसकी वजह से जवान गंभीर रूप से जख़्मी हुए और फिर उनकी मौत हुई.
बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव ने भारत के पूर्व सेना अध्यक्ष जनरल वीपी मलिक से बात की और जानना चाहा कि इस वक़्त सीमा पर हालात कितने गंभीर हैं.
जनरल वीपी मलिक का कहना है कि घटनास्थल के ऊपर जहाँ पहले तनाव था, वो और भी बढ़ गया होगा इस दुखद घटना के बाद और इसके साथ ही ग़ुस्सा भी आ गया होगा दोनों तरफ़ की सेना में.
उनके अनुसार, 'आज तो देश भर में ग़ुस्सा होगा कि हमारे बीस जवान शहीद हो गए.'
जनरल मलिक का कहना है कि जब इसतरह के मुठभेड़ या फिर झड़प की नौबत आ जाती है तो मैं समझता हूँ कि इसका कोई मिलिट्री समाधान नहीं होता है.
उनका कहना है, ''मिलिट्री का काम होता है कि लाइन तय है उस लाइन के दायरे में देश की रक्षा करना. इस वक़्त कूटनीतिक और राजनयिक बात होनी चाहिए. मैंने पहले भी कहा था कि सेनाओं के आपस में बात करने से यह काम नहीं चलेगा और वैसा ही हुआ है. जो भी मिलिट्री के स्तर पर बातचीत हुई है, उसमें चीनियों ने जो बोला है कि हम पीछे हट रहे हैं या तो उसे माना नहीं है और अगर मानी भी है तो जो फ्रंटलाइन पर तैनात जवान हैं, उन तक पहुँचाई नहीं है. इसलिए ये जो झड़प हुई है, इसकी ये दो ही वजहें हो सकती हैं.''
सवाल- रिपोर्ट्स के मुताबिक़ निहत्थे जवानों की एक टुकड़ी गलवान घाटी में जाकर चीनी बॉर्डर पोस्ट पर बात करने जाती है और फिर वहाँ बातचीत के दौरान स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती है. आख़िर ये फ़ैसला किसने लिया कि चीनी पोस्ट पर निहत्थे जवान बात करने जाएं. कहाँ चूक हुई?

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इस पर वीपी मलिक कहते हैं, "इसमें कुछ ग़लतियाँ हुई हैं. पिछले कई सालों से हम लोग फ़ायरिंग नहीं कर रहे हैं और मिलिट्री के स्तर पर एक-दूसरे से बातचीत करना शुरू कर दिया है. पिछले दो-तीन साल में भी कई बार गुत्थमगुथा होने की स्थिति पैदा हो गई थी. 1967 से मेरा अनुभव है. नाथुला में जब लड़ाई हुई तब भी उस वक़्त ऐसे ही गुत्थमगुथा से शुरुआत हुई थी और उसके बाद गोलियां चलीं. चार दिन तक दोनों तरफ़ से गोलीबारी होती रही. तो मेरी राय है कि गुत्थमगुथा की स्थिति से बचना चाहिए. अगर कमांडर लेवल या किसी भी लेवल के ऊपर बातचीत भी करनी है तो उसे औपचारिक तौर पर लेना चाहिए. सफ़ेद झंडे लेकर और अपने स्कॉट को दूर रखकर यह बातचीत होनी चाहिए ताकि ऐसे हालात ना पैदा हों."

सवाल- इस तरह के आदेश किस स्तर से आता है, क्योंकि ज़ाहिर है जो फ्रंटलाइन पर मौजूद जवान हैं, वो तो अपने कमांडिंग अफ़सर के आदेश को ही मानेंगे?
जनरल वीपी मलिक बताते हैं, "मिलिट्री के स्तर पर ही किसी ने देखा होगा कि इस तरह का समझौता हुआ है कि हथियार लेकर नहीं जाएंगे तो ये आदेश दिए होंगे. लेकिन चीनी फ़ौज के दस्ताने लकड़ी के बने हुए थे और उनमें तार या नाख़ून लगे हुए थे. बात यह है कि लकड़ी के दस्ताने हों या फिर पत्थर, अगर किसी की जान जाती है तो वो गोली से जाए या ऐसे जाए उससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. ये ग़लत है और नहीं होना चाहिए. इसलिए बिल्कुल औपचारिक तरीक़े से बात की शुरुआत होनी चाहिए जिसमें वीडियो और तस्वीरें ली जा रही हों. इसे पालन नहीं करने की ग़लती दोनों ही तरफ़ से हो रही है."
सवाल- 45 साल हो गए जब चीन के साथ सीमा पर हुई किसी तकरार में भारतीय जवान की जान गई है. इससे मिलिट्री के अफ़सरों में कितना रोष होगा?
एलएसी के ऊपर तनाव पहले भी था लेकिन ऐसी घटनाओं के बाद तनाव और बढ़ जाता है. निश्चित तौर पर इस घटना के बाद सेना में ग़ुस्सा है. कोई भी अगर थोड़ी सी ग़लती करता है तो फिर ये तनाव की स्थिति बढ़ जाती है और गोलीबारी के आसार बन जाते हैं.
सवाल- इस वक़्त क्या कूटनीतिक-राजनीतिक स्तर पर बातचीत की शुरुआत नहीं करनी चाहिए और दोनों देशों के प्रमुखों को बातचीत कर मामले में दख़ल देना चाहिए?
बिल्कुल बात होनी चाहिए. सिर्फ़ कूटनीतिज्ञों को ही नहीं बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी बात होनी चाहिए. इस तरह की स्थिति के आसार पहले ही नज़र आ रहे थे इसलिए मैंने दो हफ़्ते पहले ही बोला था कि राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर बात होनी चाहिए. सेना के स्तर पर बातचीत करके इसका समाधान निकालना मुश्किल है.

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सवाल- भारत की तरफ़ से एक कर्नल समेत 20 जवानों के मारे जाने की पुष्टि हुई है लेकिन चीन की तरफ़ से ऐसी कोई पुष्टि नहीं हुई है. उनकी तरफ़ से ये बयान आया है कि भारत अपने सीमा के अंदर जवानों को रोके. तो चीन ऐसी प्रतिक्रिया पहले भी देता रहा है या फिर चीन ने अपनी रणनीति में कुछ बदलाव लाया है?
चीन पर इस वक़्त यक़ीन करना मुश्किल है जब तक कि और जानकारी नहीं मिल जाती है. हमारे जवानों में अभी काफ़ी धैर्य है. उनको जैसा आदेश दिया जाता है, वो वैसे ही काम करते हैं. लेकिन चीन की जो रणनीति रही है वो यह है कि जब सब कुछ सामान्य चल रहा है तो ठीक है लेकिन जैसे ही मौक़ा मिलता है, वो कठोर तरीक़ा अख़्तियार करते हैं. इसको आप टैक्टिकल स्ट्राइक कह सकते हैं. इस बार भी ऐसा ही हुआ है कि कूटनीतिक और राजनीतिक स्तर पर उन्होंने हमें रिलैक्स होने की स्थिति में ला दिया. लेकिन सच तो यह है कि जो तनाव बढ़ना शुरू हुआ है तो वो बढ़ता ही जा रहा है.
सवाल- क्या अब परिस्थितियाँ और भी अलार्मिंग हो गई हैं और अगर ऐसा हो गया है तो क्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीति में और किसी पक्ष की भी ज़रूरत पड़ेगी?
चीन के साथ जो हमारी बातचीत है राजनीतिक स्तर पर वो एक टर्निंग प्वाइंट पर आ गई है. मीडिया, सोशल मीडिया और लोगों के बीच अब 1962 की बात होने लगी है. 1962 के बाद क्या-क्या हुआ है और यह राय बन रही है कि चीन के साथ बातचीत करना बेकार है. उनकी कथनी कुछ और है और करनी कुछ और है तो जो विश्वास पैदा हुआ था या फिर करने की कोशिश की गई थी, उसे एक बड़ा धक्का लगा है. राजनीतिक स्तर पर भी ऐसा ही है और जहाँ तक कार्रवाई के स्तर पर बात है तो हम लोगों को अभी हमेशा अलर्ट रहना पड़ेगा. जहाँ-जहाँ विवाद होने की गुंजाइश है वहाँ और फ़ौज भी भेजी जा सकती है.
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