भारत-चीन सीमा विवाद: पाकिस्तान और नेपाल की मीडिया ने क्या कहा?

पाकिस्तान के अख़बार

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    • Author, टीम बीबीसी हिंदी
    • पदनाम, दिल्ली

भारत और चीन की सेना के बीच गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प, पाकिस्तान और नेपाल की मीडिया में सुर्ख़ियां बनी रही.

जहां एक ओर पाकिस्तान में ट्विटर पर पूरे दिन ये ख़बर ट्रेंड करती रही वहीं बुधवार को भी सभी अख़बारों और टीवी चैनलों ने प्रमुखता से इसे जगह दी.

नेपाल की मीडिया में इस तनाव को लेकर चिंता दिखी.

पाकिस्तान के तक़रीबन हर अख़बार ने इस ख़बर को अपनी पहली ख़बर बनाई है.

पाकिस्तान के अंग्रेज़ी अख़बार डॉन ने यह ख़बर इस हेडलाइन के साथ लगाई है, "सीमा पर हुए हिंसक टकराव के लिए चीन ने भारत को ज़िम्मेदार ठहराया."

अख़बार ने भारतीय सेना के सूत्र के हवाले से यह लिखा है कि इस टकराव में कोई गोलीबारी नहीं हुई है बल्कि "हिंसक हाथापाई हुई है."

पाकिस्तान के अख़बार

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ख़बर में भारतीय सेना के बयान के साथ-साथ चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का बयान भी है.

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के उस बयान को प्रमुखता से जगह दी है जिसमें कहा गया है, "भारतीय सेना ने दो बार सीमा पार किया और चीनी सेना को उकसाया और उन पर हमला किया. इसके परिणामस्वरूप दोनों तरफ़ की सेना के बीच सीमा पर गंभीर हिंसक टकराव हुआ."

पाकिस्तान टूडे ने अपनी लीड स्टोरी की हेडलाइन बनाई है, "20 भारतीय फ़ौजी सीमा पर चीन के साथ हिंसक झड़प में मारे गए."

पाकिस्तान के फ़ौज समर्थक अख़बार पाकिस्तान ऑबज़र्वर ने लिखा है, "भारत ने चीन के साथ संघर्ष में अपनी नाक तुड़वाई"

पाकिस्तान में मौजूद बीबीसी संवाददाता शुमाइला जाफ़री कहती हैं, "तमाम अख़बारों ने चीनी विदेश मंत्री के प्रवक्ता का बयान अपनी इस ख़बर में प्रमुखता से छापा है. वहीं उर्दू अख़बारों ने आक्रामक भाषा का इस्तेमाल किया है."

पाकिस्तान के उर्दू अख़बार नवा-ए-वक़्त ने आक्रामक लहजे में लिखा है, "लद्दाख में चीनी फ़ौज पर हमला महंगा पड़ गया. कर्नल समेत बीस भारतीय फ़ौजी मारे गए."

पाकिस्तान के उर्दू अख़बार

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अख़बार ने इसी ख़बर में एक बॉक्स बना कर उसमें लिखा है, "घूसों, ठोकरों और डंडों से ठुकाई."

उर्दू के एक दूसरे बड़े अख़बार जंग ने अपने सभी संस्करणों में इस ख़बर की हेडलाइन दी है, "भारतीय दरंदाज़ी: चीन ने कर्नल समेत 20 फ़ौजी मार दिए."

मीडिया में छपी टिप्पणियों में क्षेत्र में तनाव की स्थिति पैदा होने के लिए भारत सरकार और नरेंद्र मोदी के भाषणों और विदेश नीति को दोष दिया गया है.

अंग्रेजी अख़बार डेली टाइम्स ने अपने संपादकीय में - क्षेत्र में ख़तरे को कम करने के लिए तत्काल दोनों ही तरफ़ की सेना को पीछे हटने की ज़रूरत की बात कही है.

संपादकीय में लिखा गया है, "सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के बड़े लोग अपने समर्थकों को संतुष्ट करने के लिए यह दावा करते हैं कि भारत ने साठ के दशक की तुलना में जब चीन ने भारत को नीचा दिखाया था तब से अपनी ताक़त में काफ़ी इज़ाफ़ा कर लिया है लेकिन वो अब ख़ुद अपनी कही बात से किनारा कर रहे हैं."

नेपाल की मीडिया

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नेपाल की मीडिया

नेपाली मीडिया में भी इस ख़बर को काफ़ी प्रमुखता से छापा गया है लेकिन दोनों जगह के कवरेज में भाषा का फ़र्क़ है.

कान्तिपुर ने अपने अख़बार में हेडलाइन लगाई, "20 भारतीय सैनिकों की मृत्यु."

काठमांडू पोस्ट की हेडालाइन है, "भारत-चीन की सेना, हिमालय की सीमा पर भिड़ी, दोनों ही तरफ़ जानें गईं.

काठमांडू स्थित वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र फ़ुयाल बताते हैं कि नेपाल में जितने भी बड़े अख़बार, टीवी चैनल और ऑनलाइन मीडिया हैं, उन सभी ने इस ख़बर को बहुत प्रमुखता से लिया है और चिंता व्यक्त की है.

बीबीसी हिंदी से बातचीत में भी पूर्व राजनयिकों, रणनीतिक विश्लेषकों और वरिष्ठ पत्रकारों ने चिंता व्यक्त की है. हालांकि नेपाल की सरकार की ओर से अब तक कोई टिप्पणी नहीं आई है.

नेपाल की मीडिया

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वहीं प्रमुख टीवी चैनल - नेपाल टेलीविज़न और कान्तिपुर टेलीविज़न ने इस ख़बर को प्रमुखता से दिखाया.

सुरेंद्र फ़ुयाल आगे बताते हैं, "भारत और चीन दोनों ही पड़ोसी देश हैं और मित्र शक्ति भी हैं. अगर ये दोनों लड़ने-झगड़ने लगे तो इसका नुक़सान दक्षिण एशिया क्षेत्र में बड़े पैमाने पर देखने को मिलेगा. इसका असर नेपाल पर भी पड़ेगा. इसलिए नेपाल की मीडिया में इसे लेकर बहुत चिंता व्यक्त की जा रही है और उम्मीद की जा रही है कि कूटनीतिक तौर पर ये समस्या सुलझा लिया जाए."

वो बताते हैं कि नेपाल के लोगों में भी यह चिंता है.

पिछले दिनों नेपाल-भारत सीमा पर हुए तकरार से जोड़कर भी क्या नेपाल में कोई प्रतिक्रिया आ रही है?

इस पर सुरेंद्र फ़ुयाल बताते हैं कि ऐसी कोई भी प्रतिक्रिया ना लोगों की तरफ़ से आ रही है और ना ही मीडिया की ओर से.

वो कहते हैं, "ये दोनों ही अलग-अलग मामले हैं. इसे नेपाल में अलग तरीक़े से देखा जा रहा है और इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया जा रहा है."

वो कहते हैं कि अब तक इसे नेपाल में भारत की विदेश नीति से भी नहीं जोड़कर देखा जा रहा है. इसे मूल तौर पर सैन्य तनाव के तौर पर देखा जा रहा है.

इसके अलावा वो एक और वजह बताते हैं जिससे नेपाल में मौजूदा भारत-चीन के तनाव को लेकर लोग चिंतित हैं. वो कहते हैं, "भारतीय फ़ौज के गोरखा रेजिमेंट में हज़ारों नेपाल के जवान काम करते हैं. इसलिए जब भी दक्षिण एशिया में तनाव होता है तो नेपाल में इसे चिंताजनक तरीके से देखा जाता है फिर चाहे वो करगिल की लड़ाई का वक्त हो या फिर भारत-चीन के बीच मौजूदा तनाव का वक्त हो."

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