भारत-चीन सीमा विवाद: डंडों और पत्थरों से संघर्ष के बाद असाधारण तनाव

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- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
लद्दाख़ में सोमवार रात भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़पों पर रक्षा विशेषज्ञ विपिन नारंग कहते हैं, "ये बुरा दिख रहा है, बहुत बुरा."
दुनिया की सबसे लंबी विवादित सीमा पर क़रीब आधी सदी बाद आमने-सामने का सबसे गंभीर संघर्ष हुआ, जिसमें 20 भारतीय सैनिकों की जान चली गई. भारत का कहना है कि दोनों पक्षों को नुक़सान हुआ है.
मासाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में रक्षा मामलों के प्रोफ़ेसर डॉ नारंग कहते हैं, "जानी नुक़सान के बाद दोनों पक्षों के लिए हालात सामान्य करना मुश्किल हो जाता है. ऐसा लगता है कि सीमा पर इतना दबाव पहले कभी नहीं रहा."
इन दो परमाणु शक्तियों वाले पड़ोसी मुल्कों को अलग करने वाली 3,440 किलोमीटर लंबी विवादित लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल पर संघर्षों का इतिहास रहा है.
दोनों तरफ़ के सीमा गश्ती दल में अक्सर टकराव हो जाता है, और हाथापाई की स्थिति बन जाती है. लेकिन चार दशकों में एक भी गोली नहीं चली.
इसलिए महीनों से चल रहे तनाव के बाद हुई ताज़ा झड़प ने सबको हैरान किया है.
द इकोनॉमिस्ट मैगज़ीन के रक्षा संपादक शशांक जोशी कहते हैं, "ये तनाव में असाधारण बढ़ोतरी है."
वो कहते हैं, "45 साल में एक गोली नहीं चली, और एक शाम में ही पत्थरबाज़ी और मारपीट में कम से कम 20 सैनिकों को जान चली गई."
मई में शुरुआती ख़बरों में कहा गया था, भारत लद्दाख़ में गलवान घाटी के जिस इलाक़े को अपना बताता है, वहाँ चीनी सैनिकों ने टेंट लगा लिए, गड्ढे खोदे और कई किलोमीटर अंदर तक भारी उपकरण ले आए.
भारतीय रक्षा विश्लेषक अजय शुक्ला ने दावा किया कि पिछले एक महीने में चीन ने भारतीय गश्त वाले इलाक़े के 60 वर्ग किमी हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया.
भारत दावा करता है कि चीन ने पहले ही उसके 38,000 वर्ग किमी (लगभग 14,700 वर्ग मील) क्षेत्र पर क़ब्ज़ा किया हुआ है.
ये क़दम तब उठाया गया जब भारत ने अधिक ऊंचाई पर स्थित एक फॉरवर्ड एयर बेस को कई सौ किलोमीटर लंबी एक सड़क से जोड़ दिया, इस बेस को भारत ने 2008 में फिर से एक्टिवेट किया था.
'कई सालों बाद इतना गंभीर संघर्ष'

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सोमवार को हुई झड़प की पूरी जानकारी फ़िलहाल सामने नहीं आई है.
भारत और चीन दोनों ही एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं कि गलवान घाटी में दोनों पक्षों को अलग करने वाली लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल की यथास्थिति का उल्लंघन किया गया है.
भारत ने कहा कि दोनों पक्ष तनाव कम करने के लिए सैन्य और राजनयिक विकल्पों पर विचार कर रहे हैं और वरिष्ठ कमांडरों के बीच 6 जून को सकारात्मक बैठक हुई.
भारतीय विदेश मंत्रलाय के मुताबिक़, वो 'तनाव कम करने की प्रक्रिया पर राज़ी हुए हैं' और स्थानीय कमांडरों ने इस प्रक्रिया को लागू करने के लिए कई बैठकें की हैं.
भारत ने कहा कि "चीन एकतरफ़ा रूप से यथास्थिति बदलने की कोशिश कर रहा था", जिसके बाद बने हालात में दोनों पक्षों को जानी नुक़सान हुआ है.
वहीं चीन का आरोप है कि भारतीय सैनिकों ने आम सहमति का "उल्लंघन" किया है और दो बार सीमा पार की. साथ ही "चीनी सैनिकों पर उकसाने वाले हमले किए."
द डिप्लोमेटिक मैगज़ीन के वरिष्ठ संपादक अंकित पांडे कहते हैं, "मौजूदा तनाव दोनों देशों के बीच का सबसे गंभीर मसला है. शायद 2017 के डोकलाम विवाद या उससे भी पहले के विवाद से भी ज़्यादा गंभीर."
2017 में भारत, चीन और भूटान के बीच पड़ने वाले एक जंक्शन पर चीन की तरफ़ से सड़क निर्माण के बाद 73 दिन लंबा विवाद चला था.
चीन मामलों के विशेषज्ञ और पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन कहते हैं, "लेकिन इस बार चीन का रवैया पिछली बार से बहुत अलग है."
द वायर के लिए करन थापर को दिए इंटरव्यू में मेनन ने कहा, "हमने कई घटनाएँ देखीं, चीन को कई क़दम आगे बढ़ाते हुए देखा और चीन ने एलएसी के नज़दीक उन इलाक़ों पर क़ब्ज़ा किया, जहाँ इससे पहले उसने कभी क़ब्ज़ा नहीं किया था. ये चिंतित करने वाले संकेत हैं, क्योंकि ये चीन के पिछले रवैए से अलग है."
इलाक़े में चीन की कार्रवाई के कई कारण बताए जाते हैं.
जोशी कहते हैं- रणनीति तौर पर जब भारत ने बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना शुरू किया तो चीनी सेना ने भी लद्दाख़ में हलचल शुरू कर दी. महामारी की आड़ में चीन ने क़दम आगे बढ़ाए होंगे, क्योंकि मार्च में भारतीय सेना ने अपने अभ्यास को टाल दिया था.
हालाँकि जोशी मानते हैं कि इस सबकी "सिर्फ़ ये वजह नहीं रही होगी."
डॉ नारंग कहते हैं, "क्या ये सड़क को लेकर हुआ? क्या अनुच्छेद 370 को लेकर हुआ? (इस अनुच्छेद के तहत भारत ने पिछले साल कश्मीर की स्थिति में एकतरफ़ा बदलाव कर दिया था) क्या ये आक्रामकता की वजह से हुआ? हम नहीं जानते. लेकिन तनाव है और ये अभी ख़त्म नहीं हुआ है."
चीन में भारत के राजदूत रहे मेनन मानते हैं, "चीन अपने अंदरूनी घरेलू और आर्थिक तनाव के चलते कड़े राष्ट्रवाद का सहारा ले रहा है. इसे आप येलो सी में ताइवान को लेकर उसके रवैए से भी समझ सकते हैं, साथ ही वो हॉन्ग कॉन्ग में बिना सलाह लिए क़ानून बनाने, भारत के साथ लगने वाली सीमा पर मुखर होने और ऑस्ट्रेलिया के साथ टैरिफ़ वार जैसे क़दम उठा रहा है."
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मंगलवार शाम को भारत ने कहा कि सैनिक, झड़प वाली जगह से पीछे हट गए हैं. शुरुआती ख़बरें बताती हैं कि दोनों पक्षों ने तनाव कम करने की कोशिश की और बातचीत के लिए सैन्य चैनलों का इस्तेमाल किया.
पांडा कहते हैं, "भारत के लिए ये अच्छी ख़बर है, क्योंकि उसके पास मौजूदा वक़्त में जवाबी कार्रवाई के कम विकल्प हैं."
जोशी मानते हैं कि सोमवार को हुई झड़प का नतीजा ये हो सकता है कि दोनों देशों के राजनयिक रिश्तों में लंबे वक़्त तक खटास रहे.
वो कहते हैं, "बीते 10 साल में चीन और भारत के बीच प्रतिद्वंद्विता लगातार बढ़ी है, हालांकि मोटे तौर पर ये स्थित रही है."
हालांकि इन सालों में भारत और चीन एक दूसरे से ज़्यादा जुड़े भी हैं. दोनों के बीच 1998 से 2012 में व्यापार 67 गुना बढ़ा. और चीन सामान के मामले में भारत का सबसे बड़ा साझेदार है.
भारत के छात्र चीन की यूनिवर्सिटी में पढ़ने जाते हैं. दोनों देश संयुक्त सैन्य अभ्यास करते हैं.
जोशी कहते हैं, "अब दोनों के बीच अविश्वास और मनमुटाव भी बहुत बढ़ सकता है, जिससे उस पर बहुत हद तक पानी फिर सकता है, जो 2018 के वुहान समिट में देखने को मिली थी."
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