सुशांत सिंह राजपूत: आत्मविश्वास से भरे युवा अभिनेता का यूं जाना

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- Author, वंदना
- पदनाम, टीवी एडिटर (भारतीय भाषाएं)
अगर आप बहुत ही बारीक नज़र रखते हों या बेहरतीन यादाश्त तो आप में किसी को शायद 2006 के कॉमनवेल्थ गेम्स में भारतीय दल का डांस परफॉर्मेंस याद हो. ऐश्वर्या राय की प्रस्तुति थी और बैंकग्राउंड में थे बहुत सारे डांसर्स.
उनमें से एक डांसर को ऐश्वर्या राय को उठाना था. वो दुबला पतला शर्मिला सा नौजवान था सुशांत सिंह राजपूत. वहीं सुशांत सिंह राजपूत जो आगे चलकर टीवी का सुपरस्टार बना और हिंदी फ़िल्मों का हीरो.
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अब पुलिस ने उनके आत्महत्या करने की बात कही है...दुर्भाग्यवश उन कलाकारों की फ़ेहरिस्त में एक और नाम जुड़ा गया है जो युवा थे, होनहार थे, संघर्ष के बावजूद कामयाब भी थे. लेकिन जिन्होंने बहुत पहले अलविदा कह दिया.
सुशांत टीवी से सफलतापूर्वक फ़िल्मों में क़दम रखने वाले चंद एक्टर्स में शुमार थे.
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1986 में पटना में जन्मे सुशांत वैसे कहने को तो दिल्ली कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग में मकैनिकिल इंजीनियरिंग कर रहे थे लेकिन उनका दिल डांस से होते हुए एक्टिंग में जा टिका था.
कोई 10-11 साल पहले की बात है जब सुशांत सिंह राजपूत को लोगों ने पहली बार छोटे पर्दे पर देखा. 'किस देश में है मेरा दिल' नाम का एक सीरियल था. और फिर 2009 में आया टीवी सीरियल पवित्र रिश्ता जिसमें उन्होंने मुंबई की चॉल में रहने वाले मानव देशमुख का रोल किया. यही वो सीरियल था जिसने सुशांत को रातों-रात युवा दिलों की धड़कन बना दिया.
पिछले 10 सालों में अगर मैंने दो-तीन सीरियल देखें हैं तो इनमें से एक था पवित्र रिश्ता -वजह थी सुशांत सिंह और अंकिता लोखांडे की एक्टिंग और जोड़ी जो उस वक्त असल में भी रिश्ते में थे.
सुशांत की बड़ी ख़ूबी थी रिस्क लेने की उनकी काबिलियत और माद्दा. जब हाथ में कुछ नहीं था तो इंजीनियरिंग छोड़ कर एक्टिंग में कूद गए और मुंबई में नादिरा बब्बर के थिएटर ग्रुप में आ गए.
रिस्क लेने वाले कलाकार थे सुशांत
जब दूसरे ही टीवी सीरियल को अपार सफलता मिली, तो 2011 में पवित्र रिश्ता में मेन रोल को छोड़ उन्होंने एक बार सब को चौंका दिया था.
करीब दो साल तक उनका कोई ख़ास अता-पता नहीं था. नए नए सितारों से भरे टीवी और फ़िल्मों की दुनिया में दो साल की ग़ैर मौजूदगी काफ़ी लंबा वक़्त होता है.
फिर 2013 में आई उनकी पहली हिंदी फ़िल्म काई पो चे. गुजरात दंगों के बैकग्राउंड में बनी इस फ़िल्म में ईशांत के किरदार को सुशांत ने बेहतरीन तरीक से निभाया था. और किसी नए कलाकार के लिए ये आसान किरदार नहीं था.
रिस्क लेने के अलावा सुशांत की दूसरी ख़ूबी थी विविधता से एक्सपेरिमेंट करना. इसमें वो कभी सफल भी हुए और कई बार असफल भी हुए.
महज़ छह साल के फ़िल्मी करियर में सुशांत पर्दे पर कभी महेंद्र सिंह धोनी हो गए तो कभी ब्योमकेश बख़्शी तो कभी शादी के रिश्ते पर सवाल उठाने वाले शुद्ध देसी रोमांस के रघु राम भी.

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सुशांत को सबसे ज़्यादा सफलता और वाहवाही शायद मिली फ़िल्म धोनी: एन अनटोल्ड स्टोरी के लिए. ख़ुद धोनी ने इस बात की तारीफ़ की थी कैसे सुशांत ने धोनी का बैटिंग स्टांस, चाल-ढाल को अपना लिया था. ख़ासकर जिस तरह से उन्होंने धोनी के हेलिकॉप्टर शॉट फ़िल्म में लगाए.
फ़िल्मों से परे असल ज़िंदगी में भी वो मुद्दों पर स्टांस लेने वाले युवा कलाकार थे जो उन्हें दूसरों से अलग बनाती थी.
जब संजय लीला भंसाली का करणी सेना लगातार विरोध कर रही थी और हमला कर रही थी, तो सुशांत सिंह राजपूत ने विरोध स्वरूप अपना सरनेम ट्विटर से हटा दिया था और सिर्फ़ सुशांत नाम रख लिया था.
ट्रोल्स का जवाब देते हुए उन्होने लिखा था, ''मूर्ख मैंने अपना सरनेम बदला नहीं है. तुम यदि बहादुरी दिखाओगे तो मैं तुमसे 10 गुना ज़्यादा राजपूत हूं. मैं कायरतापूर्ण हरकत के ख़िलाफ़ हूं."
थिंकिंग एक्टर

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एक्टिंग से परे उनके शौक भी निराले थे. सुशांत को एस्ट्रोटॉमी का बहुत शौक़ था और लॉकडाउन के दौरान वो इंस्ट्राग्राम पर पोस्ट डालते रहते थे कभी जूपिटर तो कभी मार्स की.
फ़ैन्स उन्हें एक थिंकिंग एक्टर के तौर पर याद करेंगे जो अपने रोल के लिए बहुत बारीकी से तैयारी करते थे.
हालांकि फ़िल्म चंदा मामा दूर के बन नहीं पाई लेकिन जिसमें सुशांत अंतरिक्ष यात्री का रोल करने वाले थे और इसके लिए वो बाकायदा नासा जाकर तैयारी करने वाले थे.
मैंने थिएटर में उनकी आख़िरी फ़िल्म देखी थी सोनचिड़िया जो पिछले साल की बेहतरीन फ़िल्मों में से थी.
ये उनके कम्फ़र्ट ज़ोन के बाहर की फ़िल्म थी जिसमें वो लाखन नाम के डाकू का रोल करते हैं- डाकुओं की बीच का सबसे दरियादिल और उसूलों वाला डाकू और ज़मीर वाला भी.
"गैंग से तो भाग लूँगा वकील, अपने आप से कैसे भागूँगा" - सुशांत जब अपने ही गैंगवालों से ये डायलॉग बोलते हैं तो बतौर दर्शक आप उनकी साइड हो लेते हैं.
ऐसा नहीं है कि सुशांत सिंह ने हर फ़िल्म में बेहतरीन काम किया, या उनकी सारी फ़िल्में हिट रहीं या औसत काम के लिए उनकी आलोचना नहीं हुई. जैसे राब्ता और केदारनाथ.
थिएटर में आने वाली उनकी आख़िरी फ़िल्म छिछोरे थे जिसने ठीक-ठाक कमाई की थी जबकि पर्दे पर वे आख़िरी बार 2019 में नेटफ़्लिक्स फ़िल्म ड्राइव में नज़र आए थे.
आत्मविश्वास से लबरेज एक युवा कलाकार

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लेकिन उनमें एक ग़ज़ब किस्म का आत्मविश्वास था.
बीबीसी से इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, "मुझे फ़िल्में नहीं मिलेंगी तो मैं टीवी करना शुरू कर दूंगा और अगर टीवी नहीं मिलेगा तो थिएटर की तरफ़ लौट जाऊँगा. थिएटर में मैं 250 रुपए में शो करता था. मैं तब भी ख़ुश था क्योंकि मुझे अभिनय करना पसंद है. ऐसे में असफल होने का मुझे डर नहीं है."
सोचकर हैरत होती है कि आत्मविश्वास से भरा एक नौजवान जिसे असफलता का डर नहीं था, कामयाबी जिसके कदम चूम रही थी, जिसके आगे सारी ज़िंदगी पड़ी थी, ऐसा क्या हुआ होगा जो उसने ज़िंदगी से हार मान ली जैसा कि पुलिस का दावा है. हालांकि वो अभी जाँच कर रही है.
सुशांत सिंह का पहला सीरियल था किस देश में है मेरा दिल जिसमें उन्हें शुरूआत में मार दिया जाता है. लेकिन छोटे से रोल में ही वो इतने लोकप्रिय हो गए थे कि सीरियल में आख़िर में उन्हें एक प्रेत-आत्मा बनाकर सीरियल में वापस लाया गया था.
पर वो फैंटसी की दुनिया थी और ये हक़ीक़त जहाँ सुशांत कभी लौट के नहीं आएँगे.
सब सोनचिड़िया का ये डायलॉग याद रहा है जब मनोज बाजपेयी सुशांत से पूछते हैं क्या उन्हें मरने से डर लगा रहा है तो सुशांत यानी लाखन कहता है, "एक जन्म निकल गया इन बीहड़ों में दद्दा, अब मरने से काहे डरेंगे."
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