चीन के साथ सीमा विवाद पर आज बातचीत, क्या ख़त्म होगा तनाव?

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद पर बातचीत

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    • Author, प्रो. स्वर्ण सिंह
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

भारत और चीन के बीच सीमा पर सैन्य तनातनी को ख़त्म करने के लिए आज (शनिवार) दोनों देशों के बीच लेफ़्टिनेंट जनरल स्तर की बातचीत हो रही है.

दोनों देशों के बीच ये ताज़ा सीमा विवाद पिछले एक महीने से चल रहा है. ये विवाद मुख्य तौर पर लद्दाख के पैंगॉन्ग झील (कॉनक्लेव झील) और पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी के संवेदनशील इलाक़ों को लेकर है.

दोनों देशों के बीच लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की ये बातचीत भारत की पहल पर हो रही है. इसीलिए बैठक का पहला दौर, भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास चुशूल-मोल्दो पर स्थित भारतीय बॉर्डर प्वाइंट मीटिंग हट में हो रहा है.

इस बैठक में भारत की ओर से, लेह स्थित भारतीय सेना की 14वीं कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह शामिल हुए हैं. इसी हफ़्ते, भारतीय सेना की उत्तरी कमान के कमांडिंग अफ़सर लेफ्टिनेंट जनरल वाई.के. जोशी ने लेह का दौरा किया था.

जनरल जोशी के लेह दौरे का मक़सद, ज़मीनी स्तर पर लगातार परिवर्तित हो रहे हालात की विस्तार से ख़ुद सीधी समीक्षा करना था.

ये मामला कितना गंभीर है, ये इसी बात से समझा जा सकता है कि ऐसा पहली बार है, जब दोनों देशों के बीच लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की बातचीत तय सीमा चौकी पर हो रही है.

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद पर बातचीत

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इस बार मामला गंभीर

हाल के बरसों में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन की फ़ौज के अतिक्रमण की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं. और चीन की ओर से अतिक्रमण की ये घटनाएं अब छुटपुट न रह कर व्यापक स्तर पर हो रही हैं.

आमतौर पर सीमा चौकियों पर ये बातचीत ब्रिगेडियर स्तर की ही होती रही है. ताकि, दोनों देशों की सेनाओं के बीच स्थानीय स्तर पर होने वाले तनाव को दूर किया जा सके.

इन सीमा चौकियों पर शायद ही कभी दोनों देशों के मेजर जनरल स्तर की बातचीत हुई होगी. लेकिन, इस बार चीन और भारत के बीच सीमा विवाद कितना गंभीर है, ये इसी बात से समझा जा सकता है कि अब तक दोनों तरफ़ से सीमा चौकियों पर लोकल कमांडर के बीच दस दौर की बातचीत हो चुकी है.

इनमें से तीन बैठकें तो मेजर जनरल स्तर की हुई थीं. दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच पिछली बार मंगलवार को बातचीत हुई थी. जिसमें मेजर जनरल रैंक के अधिकारियों ने हिस्सा लिया था. मगर, इन बैठकों के बावजूद दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव ख़त्म नहीं हो सका है.

सीमा पर पैदा हुए गतिरोध को देखते हुए अगर आज भारत और चीन के लेफ्टिनेंट जनरल बातचीत कर रहे हैं, तो इसमें उनको चौंकाने जैसा कुछ नहीं है.

ख़ासतौर से तब और जब हमें ये पता हो कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के अतिक्रमण की घटनाएं साल में सौ बार से बढ़ कर छह सौ बार तक पहुंच गई हैं.

यही नहीं दोनों देशों के सैनिकों के बीच जहां तीन साल में कभी एक बार भिड़ंत होती थी. वहीं, अब भारत और चीन के सैनिकों के बीच एक साल में तीन बार हाथापाई की घटनाएं हो चुकी हैं. और इतनी तनातनी के बावजूद, अगर दोनों देशों के बीच टकराव नहीं बढ़ा है, तो इसका श्रेय इन लेफ्टिनेंट जनरलों को ही दिया जाना चाहिए, जिन्होंने अपने सैनिकों को क़ाबू में रखने का काम किया है.

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लद्दाख में हालात नाज़ुक

मिसाल के तौर पर इस बार भारत और चीन के सैनिक नियंत्रण रेखा पर चार संवेदनशील इलाक़ों में आमने-सामने हैं.

पूर्वी लद्दाख में तो ख़ासतौर से हालात बड़े नाज़ुक हैं. जहां पैंगॉन्ग झील (कॉनक्लेव लेक) और गलवान घाटी के इलाक़े, दोनों तरफ़ से दावेदारी के कारण ख़ासतौर से चर्चा में हैं.

हालांकि, ये भारत और चीन के बीच तनातनी के सिलसिले की नई कड़ी के तौर पर ही देखा जा सकता है. क्योंकि, हाल के वर्षों में पूर्वी लद्दाख, दोनों देशों के बीच सीमा विवाद का मुख्य केंद्र बनकर उभरा है.

यहां के डेमचोक, चुमार और त्रिग की पहाड़ियों में पहले भी भारत और चीन के सैनिकों के बीच टकराव हो चुका है.

हालांकि, इस बीच राहत भरी ख़बर ये आई है कि चार मई को गलवान घाटी में जिस जगह पर चीन और भारत के सैनिक भिड़े थे, चीन की सैनिक टुकड़ियां वहां से क़रीब दो किलोमीटर पीछे हटी हैं.

इसी तरह, भारत के सैनिक भी तनातनी वाले इलाक़े से क़रीब एक किलोमीटर पीछे हटे हैं.

भारत ने खुलकर अपना ये इरादा भी ज़ाहिर कर दिया है कि अगर चीन, सभी हालिया विवादित क्षेत्रों से अपने सैनिकों को पीछे हटाता है, तो भारत भी अपने सैनिकों को 4 मई से पहले वाली स्थिति में लौटाने को तैयार है.

अब ये स्पष्ट नहीं है कि चीन इस तरह की पैकेज डील के लिए तैयार होगा या नहीं. क्योंकि, चीन के सैनिक अभी भी पूर्वी लद्दाख के फिंगर 4 के उस इलाक़े में डटे हुए हैं, जहां पर पहले भारत का नियंत्रण रहा था.

इसीलिए, सरकार द्वारा निर्देशित, 'संयम के साथ सख़्त रुख़' की नीति पर चलते हुए भारत ने भी इस विवादित इलाक़े में अपनी सैनिक टुकड़ियों की संख्या बढ़ा दी है. और पूर्वी लद्दाख के विवादित इलाक़े में अतिरिक्त सैन्य टुकड़ियां, बख़्तरबंद गाड़ियां और तोपें भेजी गई हैं.

भारत सरकार ने ये भरोसा भी दिया है कि दोनों ही देश सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर आपसी संवाद कर रहे हैं. ताकि, 2017 के डोकलाम संकट के बाद के सबसे बड़ी और गंभीर सैन्य तनातनी को जल्द से जल्द ख़त्म किया जा सके.

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फिंगर-4 का भूगोल

आज भारत और चीन के लेफ्टिनेंट जनरलों के बीच बातचीत में पैंगॉन्ग झील की चुनौती को समझने के लिए पूर्वी लद्दाख में स्थित फिंगर-4 के भूगोल को समझना सबसे ज़रूरी है.

फिंगर 4 इलाक़ा पैंगॉन्ग त्सो के किनारों को छूता है. असल में कराकोरम के पहाड़ के पूर्वी इलाक़े यानी चैंग चेनमो से आठ पहाड़ी रास्ते निकलते हैं. जिन्हें फिंगर कहते हैं.

इन रास्तों में से वास्तविक नियंत्रण रेखा कहां से गुज़रती है, इसे लेकर चीन और भारत के दावे अलग-अलग हैं. भारत के सैनिक फिंगर 8 के इलाक़े तक गश्त लगाते आए हैं.

पर, वास्तविकता ये है कि भारत का फिंगर 4 से आगे असल क़ब्ज़ा कभी नहीं रहा. वहीं, चीन का दावा है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा फिंगर 2 से गुज़रती है. और चीन के सैनिक फिंगर 4 तक गश्त लगाते रहे हैं.

कभी कभार चीन के सैनिक फिंगर 2 तक भी आ जाते हैं. हालांकि, ऐसा बहुत कम ही होता है.

1999 में भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध के दौरान, चीन ने इस इलाक़े में पांच किलोमीटर लंबी एक सड़क बना ली थी. जबकि, भारत की ओर से इस पर सख़्त ऐतराज़ जताया गया था. बाद में चीन ने वर्ष 2014 में फिंगर 4 के पास कुछ स्थायी निर्माण भी किए थे.

लेकिन भारत के ऐतराज़ के बाद चीन ने इन्हें ढहा दिया था. इस निर्माण को ढहाने के साथ चीन को, इस क्षेत्र में भारत के दावे का अंदाज़ा हो गया था.

फिर भी, 2017 के डोकलाम संकट के दौरान चीन की सेना ने आगे बढ़ कर फिंगर 4 तक अपना दावा ठोकते हुए निर्माण कार्य किया था और चीन के सैनिक यहां गश्त करने लगे थे.

अब दोनों ही देशों के सैकड़ों सैनिक फिंगर 4 के इलाक़े में आमने-सामने डटे हुए हैं.

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पांच मई को इसी जगह पर भारत और चीन के सैनिकों के बीच झड़प भी हुई थी. लेकिन, बात एक दूसरे को धक्का देने, ठोकर मारने और पथराव करने से आगे नहीं बढ़ी थी.

और उसके बाद से भारत और चीन के सैनिक अपने प्रोटोकॉल के हिसाब से एक दूसरे से टकराव की स्थिति से पीछे हट गए थे.

लेकिन, पूर्वी लद्दाख के कई इलाक़ों जैसे कि पैंगॉन्ग झील, गलवान घाटी, डेमचोक और दौलत बेग ओल्डी जैसे क्षेत्रों में चीन ने आक्रामक तरीक़े से अपनी फ़ौज की मौजूदगी कई गुना बढ़ा दी है.

साथ ही चीन ने नियंत्रण रेखा पर विवादित क्षेत्रों में कई स्थायी निर्माण कार्य भी किए हैं. ये भारत के लिए चिंता की बात है. मई महीने की शुरुआत से चीन की सेना ने पूर्वी लद्दाख के कई संवेदनशील ठिकानों पर पांच हज़ार से अधिक सैनिक तैनात किए हैं.

अब नियंत्रण रेखा पर मौजूद इन सैनिकों की मदद के लिए चीन ने अस्थायी निर्माण भी कर लिया है. और टैंक, तोप व अन्य हथियार भी इन सैनिकों की मदद के लिए तैनात कर दिए हैं.

चीन ने हथियारों और रिज़र्व सैनिकों की ये तैनाती नियंत्रण रेखा के बहुत पास कर रखी है. सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि पैंगॉन्ग झील के पास से गुज़रने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा से क़रीब 180 किलोमीटर दूर चीन के एक सैन्य ठिकाने पर गतिविधियां बहुत बढ़ गई हैं.

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चीन की बड़ी चिंता

भारत और चीन के बीच सीमा पर इस तनातनी की प्रमुख वजह, सीमा के पास भारत द्वारा सड़क बनाने को लेकर चीन की नाराज़गी है.

गलवान घाटी को दारबुक, शयोक, दौलत बेग ओल्डी से जोड़ने वाली 255 किलोमीटर लंबी सड़क पर चीन को ख़ासतौर से ऐतराज़ है. इस सड़क के बन जाने से लेह से दौलत बेग ओल्डी तक पहुंचने में अब बहुत कम समय लगेगा.

दौलत बेग ओल्डी में दुनिया का सबसे ऊंचा सैनिक हवाई अड्डा है. ये नियंत्रण रेखा के सबसे क़रीब स्थित एयर फील्ड है.

इस सड़क के बन जाने से लेह से दौलत बेग ओल्डी पहुंचने में पहले के दो दिनों के मुक़ाबले अब केवल छह घंटे लगेंगे. चीन ने पहले ही अपने इलाक़े में हज़ारों किलोमीटर सड़कें बना डाली हैं.

और उन्हें इस बात का अच्छे से अंदाज़ा है कि सीमा पर ऐसी सड़कों के बन जाने से मोर्चे तक सैनिकों और भारी सैन्य हथियारों की आवाजाही में कितनी सहूलियत और आसानी होती है.

इसी कारण से सीमा पर इस तरह के विवाद खड़े करके चीन, भारत को उलझाए रखना चाहता है. इसका मक़सद, ख़ासतौर से भारत को नियंत्रण रेखा से लगी अपनी सीमा के भीतर बुनियादी ढांचे का विस्तार करने से रोकना है और न रोक पाने पर कम से कम उसमें देरी कराना है.

पूर्वी लद्दाख में चीन की इस प्रतिक्रिया के पीछे उसकी बड़ी चिंता असल में कुछ और है.

चीन को डर है कि भारत अक्साई चिन इलाक़े पर उसके अवैध क़ब्ज़े को चुनौती देने के लिए ये सड़क बना रहा है. फिर, नियंत्रण रेखा के क़रीब स्थित चीन के मशहूर ल्हासा काशगर हाइवे को भी भारत के सीमावर्ती इलाक़ों में सड़क बनाने का ख़तरा लगता है.

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लेफ्टिनेंट जनरल की बातचीत चुनौतीपूर्ण

इस इलाक़े के इतिहास और भूगोल से इतर, भारत के लिए लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की ये बातचीत तब और चुनौतीपूर्ण हो जाती है.

जब हम ये समझते हैं कि ये दो देशों के बीच सीमा विवाद भर नहीं है. बल्कि, साम्राज्यवाद के बाद उभरे दो देशों की क्षेत्रीय अखंडता से जुड़ा मसला है.

और दोनों ही देश अपने-अपने हिस्से की एक इंच ज़मीन भी न छोड़ने की क़समें खाते आए हैं. पर, दोनों ही देशों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर कई ऐसे हिस्से हैं, जो पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं. और दोनों देशों के अलग अलग दावे हैं, जिनमें बहुत फ़र्क़ है.

भारत का कहना है कि चीन से उसकी सीमा 3488 किलोमीटर लंबी है. मगर, चीन का कहना है कि दोनों देशों के बीच केवल 2000 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा है.

भारत और चीन के बीच सीमा का जितना क्षेत्र विवादित और परस्पर दावेदारी वाला है, वो क़रीब एक लाख तीस हज़ार वर्ग किलोमीटर का बताया जाता है.

ये इलाक़ा उतना ही है जितना बांग्लादेश, निकारागुआ या ग्रीस का क्षेत्रफल है. संयुक्त राष्ट्र के सौ से अधिक ऐसे सदस्य देश होंगे, जिनका इलाक़ा भारत और चीन के बीच इस विवादित क्षेत्र से भी कम होगा.

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चीन के नेता देंग शाओ पेंग का मंत्र

भारत और चीन, सीमा विवाद के इस ऐतिहासिक बोझ को चीन के नेता देंग शाओ पेंग के मंत्र के अनुसार संभालते आए हैं.

देंग का मंत्र था -अपनी ताक़त छुपाकर रखो, अपना समय आने का इंतज़ार करो और नेतृत्व पर दावेदारी न करो.

देंग के इसी मंत्र के चलते भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा आमतौर पर शांत रही है. लेकिन, 'नए युग' की आमद के साथ ही चीन की सेना, अलग-अलग क्षेत्रों में अपने पड़ोसियों के क्षेत्रों पर दावेदारी का कांटा चुभोने की रणनीति पर अमल कर रही है.

दक्षिणी चीन सागर, चीन की सेना की 'कैबेज रणनीति' की सबसे बड़ी मिसाल है. यहां पर चीन क़दम दर क़दम बढ़ाते हुए अपनी ऐतिहासिक दावेदारी को अमली रूप देने में जुटा हुआ है.

ये चीन के उस आत्मविश्वास का हिस्सा है, जिसके तहत वो ये सोचता है कि अब चीन इतना ताक़तवर हो गया है कि वो हाथ से निकल गए उन हिस्सों पर दोबारा क़ब्ज़ा कर सके.

ये वो क्षेत्र हैं, जो चीन के अनुसार उसके 'अपमान की सदी' के दौरान दूसरे देशों के क़ब्ज़े में चले गए थे. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के 'चाइना ड्रीम' की नीति के तहत अब राष्ट्रीय पुनर्जागरण का अभियान छेड़ दिया गया है.

भारत के साथ चीन का ये टकराव उसके बढ़ते वैश्विक प्रभुत्व का ही एक हिस्सा है. जिसके कारण आज अमरीका और चीन के बीच नया शीत युद्ध छिड़ने के कगार पर है.

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वास्तविकता ये है कि गलवान घाटी से चीन के सैनिकों के पीछे हटने की एक वजह ये भी हो सकती है कि इस विवाद में अमरीका ने दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी थी.

पहले अमरीकी विदेश मंत्रालय की अधिकारी एलिस वेल्स और फिर उसके बाद ख़ुद अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और चीन के बीच 'मध्यस्थता करने की इच्छा' ज़ाहिर की थी.

गुरुवार को ट्रंप ने अपने इस इरादे को फिर से दोहराया था. इसी कारण से शुक्रवार को भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को खुलकर अमरीकी रक्षा मंत्री से ये स्पष्ट करना पड़ा कि भारत और चीन के बीच विवाद सुलझाने की सैन्य और कूटनीतिक व्यवस्थाएं हैं.

और इनकी मदद से ये तनातनी दूर करने की कोशिश की जा रही है. लेकिन, इस मामले पर चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान की प्रतिक्रिया तो और भी चौंकाने वाली थी.

झाओ लिझियान ने अमरीका के मध्यस्थता के प्रस्ताव पर ज़ोर देकर कहा था कि, 'भारत और चीन आपसी विवाद को संवाद और सलाह मशविरे से उचित तरीक़े से सुलझाने में सक्षम हैं. और चीन व भारत के बीच किसी तीसरे देश को मध्यस्थता करने की कोई ज़रूरत नहीं है.'

और इसी के बाद गलवान घाटी से चीन के सैनिक पीछे हटे थे. हालांकि, भारत ने भी सैनिकों की आक्रामक रूप से तैनाती करके सीमा पर अपने सख़्त रवैये का संकेत दे दिया था. इसी कारण से तेज़ी से आक्रामक हो रहा चीन, बातचीत की टेबल पर आने को मजबूर हुआ.

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क्या विवाद ख़त्म होंगे

हालांकि, ऐसा नहीं है कि इस बातचीत से दोनों देशों के बीच सभी विवाद ख़त्म हो जाएंगे. चूंकि, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन की घुसपैठ और अतिक्रमण का ये पैटर्न अन्य क्षेत्रों में उसके भौगोलिक विस्तार की रणनीति का ही एक हिस्सा है.

ऐसे में भारत और चीन के बीच ये आख़िरी सीमा विवाद तो नहीं ही है. एक क़दम पीछे और दो क़दम आगे चलने की ड्रैगन की ये चाल उसकी व्यापक रणनीति का ही एक अंग है. ऐसे में भारत को इसकी काट के लिए हमेशा तैयार रहना होगा.

(लेखक, दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हैं और वो स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ के सेंटर फॉर इंटरनेशनल पॉलिटिक्स, ऑर्गेनाइज़ेशन ऐंड डिसआर्मामेंट के अध्यक्ष भी हैं)

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