कोरोना वायरस: 36 दिन वेंटिलेटर पर बिताकर ज़िंदा बचने वाला शख़्स

कोरोना वायरस: 36 दिन वेंटिलेटर पर बिताकर ज़िंदा बचने वाला शख़्स
इमेज कैप्शन, नितईदास मुखर्जी
    • Author, सौतिक बिस्वास
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

"वो आज रात शायद न बच पाएं. चीज़ें बहुत तेज़ी से बिगड़ी हैं."

कोलकाता में सुनसान सड़कों से अस्पताल लौटते हुए डॉक्टर सास्वति सिन्हा ने अपने मरीज़ की पत्नी से फ़ोन पर ये कहा.

ये 11 अप्रैल की रात थी. उस समय कोरोना वायरस के कारण देशभर में लॉकडाउन बेहद सख़्ती से लागू था.

नितईदास मुखर्जी नामक मरीज़ दो सप्ताह से कोविड-19 से शहर के एएमआएआई अस्पताल में ज़िंदगी-मौत से लड़ रहे थे और यह डॉक्टर वहां क्रिटिकल केयर में कंसल्टेंट थीं.

52 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता मुखर्जी बेघरों के लिए एक ग़ैर-लाभकारी संस्था चलाते हैं और वो कोरोना वायरस के कारण वेंटिलेटर पर थे.

30 मार्च की शाम वो तेज़ बुखार और सांस लेने में परेशानी होने के कारण अस्पताल पहुंचे थे.

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इमेज कैप्शन, अपनी पत्नी के साथ

एक मिनट में 50 बार सांस ले रहे थे

उनका एक्स-रे बेहद ही ख़राब स्थिति की ओर इशारा कर रहा था. उनके फेफड़ों की स्थिति बिलकुल ठीक नहीं थी. हवा के रास्तों में द्रव भर चुका था जिससे बाकी अंगों को ऑक्सीजन नहीं मिल पा रही थी.

उस रात डॉक्टरों ने ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाने के लिए हाई-फ़्लो मास्क का इस्तेमाल किया, उन्हें डायबिटीज़ की दवाएं दीं और कोविड-19 टेस्ट के लिए उनके गले से लार ली.

अगली सुबह मुखर्जी टेस्ट में पॉज़िटिव पाए गए.

अब उनको सांस लेने में बेहद तकलीफ़ हो रही थी और एक घूंट पानी पीना भी बेहद मुश्किल था. अधिकतर लोगों में सामान्य ऑक्सीजन का स्तर 94 फ़ीसदी से लेकर 100 फ़ीसदी तक होता है लेकिन उनमें ये स्तर गिरकर 83 फ़ीसदी रह गया था.

प्रति मिनट 10 से 20 बार सांस लेना छोड़ना सामान्य है लेकिन मुखर्जी एक मिनट में ये 50 बार कर रहे थे.

वो बेहोश हो गए तो उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया. इसके बाद वो तीन सप्ताह से अधिक समय तक वेंटिलेटर पर रहे और आख़िरकार जीवन रक्षक मशीन से उनको अलग किया गया.

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इमेज स्रोत, Ronny sen

इमेज कैप्शन, डॉक्टर सास्वति सिन्हा

बाकी मरीज़ों से कैसे ख़ुशकिस्मत निकले

गंभीर रूप से कोविड-19 से बीमार अधिकतर मरीज़ मुखर्जी की तरह ख़ुशकिस्मत नहीं होते.

एक स्टडी के अनुसार, न्यूयॉर्क में जिन एक चौथाई मरीज़ों को सांस लेने के लिए वेंटिलेटर की ज़रूरत पड़ी, उनकी मौत इलाज के पहले सप्ताह में ही हो गई.

एक ब्रिटिश स्टडी के मुताबिक़, जिन दो तिहाई कोविड-19 मरीज़ों को वेंटिलेटर पर रखा उनकी मौत हो गई थी.

ऐसी भी रिपोर्ट थीं कि कोविड-19 मरीज़ों पर वेंटिलेटर्स ठीक से काम नहीं कर रहे हैं.

बेल्ज़ियम के इराज़मे यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में इंटेसिव केयर मेडिसिन की प्रोफ़ेसर ज़्यां-लुईस विंसेट ने मुझे बताया, "कृत्रिम रूप से सांस देने के कुछ मामले में हमें बेहद ख़राब परिणाम मिले. सांस के लिए वायु देते रहने के दौरान फेफड़ों को नुक़सान हुआ. ख़ासतौर पर यह तब हुआ जब लोग सोचते हैं कि सांस लेने में नाकामी का संबंध सिर्फ़ एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम यानी एआरडीएस से होता है."

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एक रात एकाएक बदल गई चीज़ें

मुखर्जी जब वेंटिलेटर पर थे तो वो 'मसल रिलेक्स्टेंट्स' पर भी थे. इसमें दवाओं के ज़रिए मांसपेशियों को शक्तिहीन बना दिया जाता है ताकि मरीज़ ख़ुद से सांस लेने की कोशिश न करे.

लेकिन एक अप्रैल की रात चीज़ें एकाएक बदल गईं.

उनका बुख़ार बढ़ गया, हृदय गति और ब्लड प्रेशर गिरने लगा. ये सब चीज़ें एक नए संक्रमण की ओर इशारा कर रहे थे.

ऐसे में वक़्त ज़ाया नहीं किया जा सकता था तो डॉक्टर सिन्हा ने अपनी क्रिटिकल केयर टीम को फ़ोन पर ही निर्देश दिए.

जब वो वापस लौटीं तो मुखर्जी को बचाने की लड़ाई दोबारा शुरू हुई.

डॉक्टर सिन्हा और उनकी टीम ने रक्त वाहिकाओं में संक्रमण को ख़त्म करने के लिए एंटिबायोटिक का शक्तिशाली 'आख़िरी सहारा' लिया. साथ ही साथ उन्होंने ब्लड प्रेशर स्थिर करने के लिए मसल रिलेक्स्टेंट्स और दवाओं का भी सहारा लिया.

इस तूफ़ान को टलने में तीन घंटों का समय लगा.

इंटेसिव केयर में 16 साल का वक़्त बिताने वाली डॉक्टर सिन्हा कहती हैं कि यह उनके जीवन का सबसे बड़ा 'हाथ-पांव फुला देने वाला अनुभव' था.

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3 घंटे बिना रुके पीपीई किट में काम

वो कहती हैं, "हमें बेहद तेज़ी से और सही तरीक़े से काम करना था. पीपीई किट में हमें पसीने आ रहे थे और हमें धुंधला दिख रहा था. हम चार लोगों ने उस रात लगातार तीन घंटे बिना रुके काम किया."

"हम हर मिनट मॉनिटर की ओर देख रहे थे और देख रहे थे कि उनमें कितनी तब्दीली आ रही है. मैं ख़ुद से कह रही थी कि हम इस शख़्स को ज़िंदा रखना चाहते हैं. वो पूरी तरह बीमार नहीं हैं बल्कि वो सिर्फ़ एक कोविड-19 मरीज़ हैं जो आईसीयू में हैं."

मुखर्जी जब स्थिर हुए तब रात के दो बज रहे थे. डॉक्टर सिन्हा ने फ़ोन चेक किया तो उस पर मुखर्जी की पत्नी और उनकी रिश्तेदार की 15 मिस्ड कॉल थीं

उनकी रिश्तेदार न्यू जर्सी में सांस संबंधी बीमारियों पर शोध कर रही हैं.

नितईदास मुखर्जी की पत्नी और पेशे से ह्युमन रिसॉर्स मैनेजर अपराजिता मुखर्जी कहती हैं, "वो मेरी ज़िंदगी की बेहद भयानक रात थी. मैं सोच रही थी कि मैंने अपने पति को खो दिया है."

वो लॉकडाउन में अपने घर में 80 वर्षीय सास के साथ क्वारंटीन थीं. उनके साथ आंशिक रूप से विकलांग उनकी चाची भी थी लेकिन इनमें से कोई भी कोविड-19 पॉज़िटिव नहीं पाया गया.

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पूरी तरह नहीं टला था ख़तरा

उस समय आई एक कठिनाई टल तो चुकी थी लेकिन मुखर्जी की स्थिति अभी भी गंभीर थी.

मुखर्जी का वज़न अधिक था और अधिक वज़न वाले मरीज़ों को करवट करने में थोड़ी मुश्किल होती है ताकि उनको सांस मिल सके.

डॉक्टरों ने उन्हें हाइड्रोक्सिक्लोरोक्विन दी जो आमतौर पर मलेरिया के मरीज़ों को दी जाती है. इसके साथ उन्हें विटामिन, एंटिबायोटिक्स और कुछ अन्य दवाइयां दीं लेकिन उनका बुख़ार बना रहा.

आईसीयू में मुखर्जी के बिस्तर से हर रात अलार्म ज़रूर बजता था. कभी ऑक्सीजन की मात्रा गिर रही होती थी तो कभी एक्स-रे मशीन में उनके फेफड़े 'सफ़ेद' दिखने लगते थे.

डॉक्टर सिन्हा कहती हैं, "उनकी सेहत में थोड़ा सुधार था और जब कभी सुधार दिखता भी था तो वो बेहद धीमा होता था."

आख़िरकार अस्पताल में भर्ती होने के एक महीने बाद मुखर्जी में संक्रमण से लड़ने के लक्षण दिखने लगे.

आख़िरकार वो रविवार को होश में आए. उनकी पत्नी ने उन्हें वीडियो कॉल किया तो वो फ़ोन पर टकटकी लगाए देखते ही रहे.

'मुझे लगा कि किसी ने क़ैद किया हुआ है'

मुखर्जी ने मुझे बताया कि उन्हें कोई आइडिया नहीं था कि क्या कुछ चल रहा है.

वो कहते हैं, "मेरे सामने सब धुंधला था. मैंने अपने सामने नीली वेशभूषा में खड़ी एक महिला देखी थी, बाद में मैंने पाया कि वो मेरी डॉक्टर है."

"आप जानते हैं, मैं तीन हफ़्तों तक सोता रहा. मुझे कोई आइडिया नहीं है कि मैं अस्पताल में क्यों था? मेरी पूरी याद्दाश्त ग़ायब है."

"लेकिन मुझे कुछ याद है. मैं जब कोमा में था तब मैं किसी भ्रम में था. मुझे लगता था कि मैं कही क़ैद हूं, मुझे रस्सियों से बांधा हुआ है और लोग मुझे कह रहे हैं कि मैं ठीक नहीं हूं. वो मेरे परिवार से पैसे ले रहे हैं और मुझे छोड़ नहीं रहे हैं. और मैं मदद के लिए लोगों से संपर्क करने की कोशिशें कर रहा हूं."

अप्रैल के आख़िर में मुखर्जी को वेंटिलटर से हटाया गया और उन्होंने तक़रीबन एक महीने बाद ख़ुद सांस ली.

डॉक्टर कहते हैं कि वेंटिलेटर से हटाकर ख़ुद सांस लेना मुखर्जी के लिए मुश्किल भरा था क्योंकि उन्हें अक्सर 'पेनिक अटैक' आ जाया करते थे और वो आपातकालीन घंटी बजा देते थे.

उन्हें लगता था कि वो मशीन के बिना सांस नहीं ले पा रहे हैं.

3 मई को उनका वेंटिलेटर बंद कर दिया गया और पांच दिनों बाद उन्हें घर भेज दिया गया.

डॉक्टर सिन्हा कहती हैं, "यह वास्तव में एक लंबी दौड़ थी. उन्हें गंभीर एआरडीएस था. उन्हें चार सप्ताह तक तेज़ बुख़ार रहा. वो ख़ुद से सांस नहीं ले पा रहे थे. वायरस तेज़ी से उनको अपनी गिरफ़्त में ले रहा था."

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'वायरस को हराया जा सकता है'

अब घर में मुखर्जी अपनी नई ज़िंदगी शुरू कर रहे हैं.

वो अब बिना किसी की मदद के चलना शुरू कर रहे हैं. उनकी बहुत सी याद्दाश्त वापस लौट रही है.

अस्पताल ले जाने से पहले वो कई दिनों तक खांस रहे थे और एक डॉक्टर को उन्होंने दिखाया था जिसने कहा था कि ये गले का संक्रमण है. वो काम पर जा रहे थे, फ़ेस मास्क पहन रहे थे और ग़रीब-बेघरों का ख़याल रख रहे थे.

वो काम के सिलसिले में अस्पताल, पुलिस स्टेशन और शेल्टर होम्स जाते थे.

वो अपनी डायबिटीज़ की दवाएं छोड़ रहे थे जिसके कारण अस्पताल में भर्ती के समय उनका ब्लड ग्लूकोज़ एकदम नीचे आ गया. वो एंटिबायोटिक और नेबुलाइज़र ले रहे थे, क्योंकि हर बार मौसम बदलने पर खांसी होने पर वो इसे लेते थे.

मुखर्जी की पत्नी कहतीं हैं, "लेकिन तब मुझे कुछ ग़लत लगा जब उन्हें डिहाइड्रेशन और घंटों तक सोने की शिकायत हुई. वो बेहद थके हुए थे. और उसके बाद सांस लेने में समस्याएं होने लगीं और हमने उन्हें व्हीलचेयर पर बैठाया और अस्पताल ले गए."

पिछले सप्ताह 82 दिनों तक कोविड-19 मरीज़ों के आईसीयू में रहने के बाद डॉक्टर सिन्हा ने छुट्टी ली.

उनकी टीम ने 100 से अधिक मुखर्जी की तस्वीरें ली हैं ताकि उनकी टीम इस जंग को याद रखे. इन तस्वीरों में पीपीई किट में थकी हुई नर्सें, मुखर्जी के बिस्तर के नज़दीक मुस्तैद स्वास्थ्यकर्मी, जिस दिन मरीज़ को होश आया, जिस दिन उन्हें वेंटिलेटर से हटाया गया और जब उन्होंने अस्पताल छोड़ा, ये सब तस्वीरें हैं.

डॉक्टर सिन्हा कहती हैं, "हम एक टीम के नाते आख़िर में बस अपना काम कर रहे हैं."

मुखर्जी ख़ुश हैं कि वो ख़ुद सांस ले पा रहे हैं.

वो कहते हैं, "मैं जानता हूं कि मैं बीमारी से लड़ा हूं लेकिन डॉक्टरों और नर्सों ने मेरी ज़िंदगी बचाने के लिए लड़ाई की है. ज़िंदा बचे लोगों को अपनी कहानियां सुनाने की ज़रूरत है. इस वायरस को हराया जा सकता है."

सवाल और जवाब

कोरोना वायरस के बारे में सब कुछ

आपके सवाल

  • कोरोना वायरस क्या है?लीड्स के कैटलिन सेसबसे ज्यादा पूछे जाने वाले

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    सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं

    कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.

    ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.

    कोरोना वायरस के अहम लक्षणः ज्यादा तेज बुखार, कफ़, सांस लेने में तकलीफ़

    लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.

  • एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता?बाइसेस्टर से डेनिस मिशेलसबसे ज्यादा पूछे गए सवाल

    जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.

    यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.

    ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.

    यह नया वायरस उन सात कोरोना वायरस में से एक है जो मनुष्यों को संक्रमित करते हैं.
  • कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स

    वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.

    कोविड-19 के कुछ लक्षणों में तेज बुख़ार, कफ़ और सांस लेने में दिक्कत होना शामिल है.

    वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.

    इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.

  • क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक

    दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.

    ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.

    फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.

    • बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
    • जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
    • खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
  • आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता

    हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.

    इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.

    अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.

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मेरी स्वास्थ्य स्थितियां

आपके सवाल

  • अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन

    अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.

    अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.

  • क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड

    ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.

    ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.

  • जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे

    कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.

    लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.

    कोरोना वायरस की वजह से वायरल निमोनिया हो सकता है जिसके लिए अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
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अपने आप को और दूसरों को बचाना

आपके सवाल

  • कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ

    शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.

    क्वारंटीन उपायों को लागू कराते पुलिस अफ़सर

    फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.

  • क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन

    पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.

    मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.

    फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.

    यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.

  • अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट

    अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.

    सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.

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मैं और मेरा परिवार

आपके सवाल

  • मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल

    गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.

    यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.

    गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.

  • मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक

    अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.

    अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.

    ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.

  • बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस

    चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.

    ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.

    हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.

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