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भारत में कोरोना से हुई मौतों का सही आँकड़ा मिलना क्यों मुश्किल
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
इस समय भारत में कोरोना संक्रमण के कुल मामलों की तादाद एक लाख 73 हज़ार से ज़्यादा है जबकि कुल मौतों का आंकड़ा 4900 पार कर चुका है. कुल मौतों की तादाद को लेकर संशय है जिसकी कई वजहें हैं.
शहरी इलाक़ों में तो ख़ैर फिर भी श्मशान, क़ब्रिस्तान वग़ैरह से मौतों के आंकड़ों को जमा किया जा सकता है लेकिन गांवों के मामलों में ये आसान नहीं. अभी तक बहुत सारे लोग खुली जगहों पर और कई बार तो अपनी ज़मीनों में ही अंतिम क्रियाकर्म कर देते हैं.
आम दिनों में भारत में महज़ 22 प्रतिशत मौतों का रजिस्ट्रेशन हो पाता है. जो मृत्यु गांवों या घरों में होती है उनमें अधिकतर में मेडिकल-सर्टिफिकेट मौजूद नहीं होता जिसकी ग़ैर-मौजूदगी में ये पता चलाना बहुत मुश्किल है कि मौत की वजह क्या थी? मसलन, दिल का दौरा, मलेरिया या कुछ और?
उन्हीं मौतों को कोरोना से हुई मौत के तौर पर गिना जा सकता जो अस्पताल में हुई हों, रोगी का टेस्ट रिज़ल्ट पॉज़िटिव आया हो और मौत किसी अन्य कारण से नहीं, बल्कि श्वसन तंत्र के काम करना बंद करने की वजह से हुई हो.
अलग-अलग मानदंड
कोरोना से हो रही मौतों की तादाद पर हुए विवाद के बाद इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च ने गाइडलाइन में कुछ तब्दीलियां की हैं. इससे पहले अलग-अलग सूबे इन मामलों को अपने-अपने तरीक़े से दर्ज कर रहे थे.
कोविड-19 के मरीज़ों का इलाज कर रहे डाक्टरों से कहा गया है कि वो उन मामलों में 'कोरोना को मौत के बुनियादी कारण' के रूप में दर्ज करें जिसमें मरीज़ निमोनिया, श्वसन तंत्र के बंद होने या हार्ट फेल होने से मरा हो.
इस नए दिशा-निर्देश के मुताबिक़ चिकित्सक को तीन कॉलम्स भरने होंगें जिसमें मौत की तत्काल वजह, पूर्ववर्ती कारण और दूसरी वजहें भरनी होंगी.
कोरोना संक्रमण के मामले में ज़्यादातर मरने वाले लोग डायबिटीज़, हृदय रोग या किसी अन्य गंभीर बीमारी के पहले से शिकार होते हैं, इस स्थिति को को-मॉर्बिडिटी कहते हैं, यानी कोरोना के अलावा दूसरे अन्य रोग जिनकी वजह से मौत हो सकती हो.
कुल मिलाकर, मेडिकल सर्टिफ़िकेट पर जब तक मृत्यु का बुनियादी कारण कोरना संक्रमण न लिखा हो तब तक उसकी गिनती 'कोरोना डेथ' के तौर पर नहीं होती.
जिन मौतों का मेडिकल सर्टिफिकेट मौजूद भी होता है वहां भी मौत की वजह कई बार साफ़ नहीं हो पाती है. ऐसे मामले भारत के अलावा दूसरे मुल्कों में भी सामने आते रहे हैं.
मृत्यु का प्रमाणपत्र
यहां ये ध्यान रखने की ज़रूरत है कि मेडिकल सर्टिफिकेट ऑफ़ डेथ और किसी म्यूनिसिपल एरिया से मिला डेथ-सर्टिफिकेट दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं.
म्युनिसिपल एरिया सर्टिफ़िकेट सिर्फ़ इस बात का प्रमाण है कि अमुक व्यक्ति की मृत्यू हो गई है और इसकी ज़रूरत अधिकतर जायदाद के बंटवारे, पेंशन, बैंक और उस जैसे दूसरे कामों में होता है लेकिन मेडिकल सर्टिफिकेट ऑफ़ डेथ में ये भी दर्ज होता है कि मौत की वजह क्या थी- चिकित्सकीय आधार पर.
पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट डाक्टर सिल्विया कर्पगम कहती हैं कि "अधिकांश मामलों में चिकित्सक इस बात के लिए प्रशिक्षित नहीं होते कि वो सटीक तरीक़े से मौत की वजह लिख सकें. अक्सर किस तरीक़े से मौत हुई और मौत की वजह क्या थी इसे लेकर मेडिकल सर्टिफिकेट में भी अक्सर भ्रम क़ायम रहता है".
ऐसी बातें सामने आ रही है कि जो बुजुर्ग हैं या पहले से ही किसी बीमारी से ग्रसित हैं उनके लिए वायरस के जानलेवा होने का ख़तरा और बढ़ जाता है. जब इस तरह की बीमारियों की वजह से जो लोग अस्पताल में भी भर्ती होते हैं तो उनकी मौतों की वजह क्या लिखी जाएगी? मसलन, कोरोना या फिर दिल के दौरे से मौत?
और फिर सवाल उन मौतों का भी है जिनमें कोरोना संक्रमित होने के बावजूद व्यक्ति में कोई लक्षण नहीं दिखे, टेस्ट नहीं कराया गया और मौत हो गई.
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि सरकारें लोगों का मनोबल बनाए रखने के लिए, और स्थिति संभाल न पाने के आरोपों से बचने के लिए मौत की संख्या को कम से कम बतानी चाहती हैं, यह केंद्र और राज्य सरकार, दोनों पर लागू होता है.
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि सरकारी नियंत्रण भारत में किसी भी बीमारी के फैलाव या मौजूदगी के पूरे आंकड़े सामने नहीं आने देता.
वे कहते हैं कि तमिलनाडु में एक समय मलेरिया से होने वाली मौतों को फीवर डेथ का नाम दे दिया गया और समझ लिया गया कि मलेरिया चेन्नई जैसी जगहों से समाप्त हो गया है. वहीं पश्चिम बंगाल में हैज़ा के मामलों को पहले गैस्ट्रोइंट्राइटिस का मामला बताने का चलन चल पड़ा.
आंकड़ों की विशवसनीयता पर सवाल
कोरोना-काल में पश्चिम बंगाल ने ऐसी मौतों को तय करने के लिए एक ऑडिट-पैनल बनाया गया था जिसे लेकर बहुत विवाद रहा और कहा गया कि कोरोना से हुई कई मौतों को किसी दूसरी बीमारी के खाते में डाल दिया गया.
दिल्ली के मामले में भी कई म्यूनिसिपल क्षेत्रों ने आरोप लगाया है कि उनके इलाक़े में पड़ने वाले श्मशान घाटों और क़ब्रिस्तानों में हुई अंत्येष्टियों की संख्या और अरविंद केजरीवाल सरकार के ज़रिए बताए जा रहे मौत के आंकड़ों में फ़र्क़ है.
अस्पताल से जारी आंकड़ों और दिल्ली स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों में फर्क़ का मामला तो दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री की प्रेस कांफ्रेस में भी उठा और उन्होंने कहा कि ये अस्पताल से आंकड़े भेजने में हुई देरी की वजह से हुआ है.
मौतों के आंकड़ों में फ़र्क़ का मामला पहले भी सामने आता रहा है. साल 2005 में भारत में एचआईवी से जुड़े कारणों से मौतों की जो तादाद दी गई थी वो विश्व स्वास्थ्य संगठन के ज़रिये जारी संख्या से काफ़ी कम थी जबकि मलेरिया के मामले में ये वैश्विक संस्था की तादाद से पांच गुना अधिक थी.
डॉक्टर सिल्विया कहती हैं कि प्राइवेट सेक्टर अब भी सरकार से डेटा शेयर करने को बाध्य नहीं है और कई दफ़ा 'बदनामी' के डर की वजह से इस तरह की संख्या को छुपाया जाता है.
कोरोना-संक्रमण को लेकर जिस तरह की मनोवृति लोगों में फैली है वो भी इसका बड़ा कारण हो सकता है. हालांकि सरकार ने उस दिशा में लोगों में कई माध्यमों से जागरुकता पैदा करने की कोशिश शुरु की है.
लेकिन जानकारों का मानना है कि भारत में दूसरे देशों के मुक़ाबले अभी भी टेस्टिंग का प्रतिशत बहुत कम है और जब तक इसे न बढ़ाया जाएगा तब तक बीमारी के फैलाव को लेकर किसी तरह के सही नतीजे पर पहुंचना बहुत मुश्किल है.
लेकिन कोच्चि में रहने वाले विशेषज्ञ केआर एंथनी कहते हैं कि भारत में कोरोना के कम मामलों को कई दूसरी बातों के परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाना चाहिए.
एंथनी कहते हैं, "भारत दूसरे मुल्कों जैसे इटली या अमरीका की तुलना में युवाओं का देश है इसलिए मरने वालों की तादाद कम है, इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. दूसरे भारत में पश्चिमी देशों की तुलना में अब भी बुज़ुर्गों को साथ रखने और उसकी वजह से उनकी बेहतर देखभाल की संस्कृति है जिसका फ़ायदा उसे मिलेगा".
मगर एंथनी मानते हैं कि ग़लत समय पर की गई तालाबंदी और उसके बाद शुरु हुए प्रवासियों के मूवमेंट से नुक़सान पहुंचा है.
जानकार कहते हैं कि ये भी याद रखने की ज़रूरत है कि ये बीमारी एक नए क़िस्म की है, और भारत ही नहीं, तमाम विश्व इसे और इससे होने वाले प्रभाव को समझने की कोशिश कर रहा है.
हाल के दिनों में चीन ने बीमारी से हुई कुल मौतों के अपने आंकड़ों को अपडेट किया और उसमें पचास फ़ीसदी का इज़ाफ़ा दर्ज किया.
इसी तरह न्यूयॉर्क शहर में ही मौतों की संख्या में 3700 से अधिक की बढ़ोतरी की गई क्योंकि इसमें उन लोगों को भी शामिल किया गया जिनकी मौत संभावित तौर पर इस बीमारी से हई थी मगर किसी वजह से उनका टेस्ट नहीं हो पाया था
क्या कहती है विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइन?
विश्व स्वास्थ्य संगठन के गाइडलाइन के मुताबिक़ अगर किसी को बुख़ार, गले में दर्द, सूखी खांसी और उसके साथ सांस लेने में दिक्क़त हो तो उसे संभावित कोविड-19 पीड़ित समझा जा सकता है. अगर उसने हाल के दिनों में किसी कोरोना से ग्रसित इलाक़े का दौरा किया हो या किसी ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आया हो जो रोग से पीड़ित था, तो उसे भी इस श्रेणी में रखा जा सकता है.
लक्ष्णों के आधार पर की गई तशख़ीस को पक्का करने के लिए आरटी-पीसीआर टेस्ट करवाना चाहिए.
अगर लैब से रिपोर्ट आने के पहले ही मरीज़ की मौत हो जाती है तो उसकी मौत कोविड-19 से हुई मानी जाएगी. डेथ सर्टिफिकेट में भी यही दर्ज किया जाएगा. इसके लिए एक अंतरराष्ट्रीय कोड भी जारी किया गया है.
अगर मरीज को पहले से भी दूसरी बीमारी है तो इसका उल्लेख किया जाना चाहिए.
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