You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
कोरोना वायरसः खून के थक्के क्यों बन रहे मुसीबत?
- Author, रिचर्ड गैलपिन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
मेडिकल एक्सपर्ट्स का कहना है कि कोरोना वायरस से गंभीर रूप से बीमार 30 फीसदी तक मरीजों को खून के थक्कों के बनने की घातक स्थिति का सामना करना पड़ रहा है.
क्या होते हैं ब्लड क्लॉट या थ्रोंबोसिस?
एक्सपर्ट्स का कहना है कि ये खून के थक्के या क्लॉट्स कई मरीजों के मरने की वजह हो सकते हैं. इन क्लॉट्स को थ्रोंबोसिस कहा जाता है.
इन थक्कों के बनने की वजह से फ़ेफ़ड़ों में गंभीर सूजन पैदा होती है. कोरोना वायरस से शिकार मरीज का शरीर सामान्य प्रतिक्रिया के तौर पर फ़ेफ़ड़ों में सूजन पैदा करता है.
पूरी दुनिया में मरीजों को इस वायरस की वजह से कई तरह की दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. इनमें से कुछ दिक्कतें ऐसी भी हैं जिनसे मरीज की मौत तक हो सकती है.
माइक्रो-क्लॉट्स की समस्या
मार्च में जब कोरोना वायरस पूरी दुनिया में तेजी से पांव पसार रहा था, उस वक्त डॉक्टरों को अस्पताल में भर्ती बड़ी तादाद में ऐसे मरीज मिले जिन्हें खून के थक्के जमने की दिक्कत हो रही थी. ऐसे मरीजों की संख्या डॉक्टरों की आशंका से कहीं ज्यादा थी.
डॉक्टरों को और भी कई चौंकाने वाली चीजों का पता चला. मसलन, कुछ मरीजों के फ़ेफ़ड़ों में सैकड़ों की संख्या में माइक्रो-क्लॉट भी पाए गए थे.
इस वायरस की वजह से डीप वेन थ्रोंबोसिस के मामलों में भी इजाफा दर्ज किया गया है. डीप वेन थ्रोंबोसिस ऐसे खून के थक्के होते हैं जो कि आमतौर पर पैर में पाए जाते हैं. अगर इनके टुकड़े होकर शरीर के ऊपरी हिस्से फ़ेफ़ड़े में पहुंचने लगते हैं तो इससे जान को जोखिम हो सकता है. इनसे रक्त वाहिकाएं अवरुद्ध हो जाती हैं.
गंभीर खतरा
पिछले महीने आर्टिस्ट ब्रायन मैकक्ल्योर को निमोनिया की शिकायत के चलते अफ़रातफ़री में हॉस्पिटल लाना पड़ा था. लेकिन, हॉस्पिटल में भर्ती होने के तुरंत बाद हुए स्कैन में पता चला कि उनके लिए जिंदगी की जंग कहीं ज्यादा मुश्किलभरी है.
वह बताते हैं, "मेरे फ़ेफ़ड़ों की स्क्रीनिंग हुई और इससे पता चला कि मेरे फ़ेफ़ड़ों में खून के थक्के जम गए हैं. मुझे बताया गया कि यह बेहद खतरनाक है."
वह बताते हैं, "तब मुझे वाकई चिंता होने लगी थी. मुझे अंदाजा हो रहा था कि अगर मेरी हालत में सुधार नहीं हुआ तो मैं गंभीर संकट में पड़ जाऊंगा."
अब वह अपने घर पर ही रिकवरी कर रहे हैं.
30 फीसदी तक गंभीर बीमारों को थ्रोंबोसिस
लंदन के किंग्स कॉलेज हॉस्पिटल में थ्रोंबोसिस और हैमोस्टेसिस के प्रोफेसर रूपेन आर्या कहते हैं, "पिछले कुछ हफ्तों से जिस बड़े पैमाने पर आंकड़े आ रहे हैं उससे मुझे लगता है कि थ्रोंबोसिस एक बड़ी समस्या बन गई है."
आर्या कहते हैं, "खासतौर पर क्रिटिकल केयर में कोविड से गंभीर रूप से बीमार मरीजों में यह समस्या ज्यादा दिखाई दे रही है. कुछ हालिया अध्ययनों से पता चल रहा है कि इनमें से करीब आधे मरीज पल्मोनरी एंबोलिज्म या फ़ेफ़ड़ों में खून के थक्के जमने से पीड़ित हैं."
उनका मानना है कि कोरोना वायरस के गंभीर रूप से बीमार कई मरीजों में खून के थक्के जमने के मामले यूरोप में छपे आंकड़े से कहीं ज्यादा 30 फीसदी तक हो सकते हैं.
चिपचिपे या स्टिकी ब्लड से बन रहे खून के थक्के
हॉस्पिटल में प्रोफेसर आर्य की ब्लड साइंसेज की टीम ने मरीजों के सैंपलों का विश्लेषण किया है. इससे पता चला है कि कोरोना वायरस इनके खून में बदलाव कर रहा है जिससे खून और ज्यादा चिपचिपा हो रहा है. चिपचिपे खून की वजह से खून के थक्के बन सकते हैं.
खून में बदलाव फ़ेफ़ड़ों में गंभीर सूजन पैदा हो सकती है. वायरस का शिकार होने के बाद यह शरीर की प्राकृतिक प्रतिक्रिया होती है.
आर्या कहते हैं, "वायरस से गंभीर रूप से संक्रमित मरीजों के खून में हम रसायनों का स्राव देख रहे हैं. और इसकी वजह से खून के थक्के जमना शुरू हो जाते हैं."
इसकी वजह से मरीज की हालत खराब होने लगती है. थ्रोंबोसिस एक्सपर्ट प्रोफेसर बेवरले हंट के मुताबिक, केवल खून के थक्के के मुकाबले चिपचिपे खून के दुष्प्रभाव कहीं ज्यादा व्यापक होते हैं. इसकी वजह से स्ट्रोक्स और हार्ट अटैक्स की दर भी बढ़ जाती है.
वह कहती हैं, "निश्चित तौर पर चिपचिपा खून ऊंची मृत्यु दर की वजह बनता है."
खून को पतला करने का ट्रायल
अब कुछ ऐसे अध्ययन भी सामने आए हैं जिन्होंने पहले से मुश्किलभरी मेडिकल चुनौतियों को और ज्यादा बड़ा बना दिया है.
इन अध्ययनों से पता चल रहा है कि खून के थक्कों का इलाज करने के लिए फिलहाल इस्तेमाल किए जा रहे ब्लड थिनर्स या खून पतला करने वाली दवाएं हर बार काम नहीं करती हैं. साथ ही इनकी डोज़ को बढ़ाने से मरीजों में ब्लीडिंग (रक्त स्राव)शुरू हो सकती है जो कि जान के लिए जोखिम भरा हो सकता है.
फ़ेफ़ड़ों की सूजन घटाने पर हो फोकस
प्रोफेसर आर्या कहते हैं, "थ्रोंबोसिस के इलाज और रक्त स्राव के बीच संतुलन एक अनिश्चित चीज है."
लेकिन, अब इस चीज पर काफी जोर दिया जा रहा है कि पूरी दुनिया की मेडिकल टीमें आपस में सहयोग कर वायरस की वजह से खून के थक्के जमने की समस्या का सुरक्षित और ज्यादा प्रभावी हल निकालने का प्रयास करें.
इस चीज के ट्रायल किए जा रहे हैं ताकि सभी देशों में ब्लड थिनर्स की एक स्टैंडर्ड डोज़ इस्तेमाल करने का तरीका निकाला जा सके.
हालांकि, कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि इसका एक और समाधान हो सकता है. यह समाधान है चिपचिपे खून की वजह बनने वाली समस्या की मूल जड़ फ़ेफ़ड़ों की सूजन को घटाने का तरीका ढूंढा जाए.
- कोरोना वायरस के क्या हैं लक्षण और कैसे कर सकते हैं बचाव
- कोरोना महामारीः क्या है रोगियों में दिख रहे रैशेज़ का रहस्य
- कोरोना वायरसः वो शहर जिसने दुनिया को क्वारंटीन का रास्ता दिखाया
- कोरोना वायरस से संक्रमण की जांच इतनी मुश्किल क्यों है?
- कोरोना संकट: गूगल, फ़ेसबुक, ऐपल और एमेज़ॉन का धंधा कैसे चमका
- कोरोना वायरसः वो छह वैक्सीन जो दुनिया को कोविड-19 से बचा सकती हैं
- कोरोना वायरस: संक्रमण से बचने के लिए इन बातों को गाँठ बांध लीजिए
- कोरोना वायरस: सरकार का आरोग्य सेतु ऐप कितना सुरक्षित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)