कोरोना वायरस के कारण हुए चार लॉकडाउन से क्या हासिल हुआ?

    • Author, गुरप्रीत सैनी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत में कोरोना के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं और अब भारत सबसे ज़्यादा मामलों वाले शीर्ष 10 देशों में शामिल हो गया है. इसी डर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो महीने पहले लॉकडाउन लागू किया था. अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या लॉकडाउन फ़ेल हो गया है?

ये सवाल विपक्षी कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी उठाया है. उन्होंने कहा, "नरेंद्र मोदी जी ने कहा था कि 21 दिन में कोरोना की लड़ाई जीती जाएगी. चार लॉकडाउन हो गए, तकरीबन 60 दिन हो गए. लॉकडाउन का लक्ष्य पूरा नहीं हुआ. उल्टा बीमारी बढ़ती जा रही है."

लेकिन भारत सरकार लॉकडाउन को लगातार कामयाब बता रही है. स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में लॉकडाउन की कई उपलब्धियां भी गिनाईं और कहा कि मामले भले ही बढ़ रहे हों, लेकिन देश में इस बीमारी से मौतों की संख्या दुनिया में सबसे कम रही है.

तो अब दोनों दावों में से कौन-से दावे में दम है? ये समझने के लिए सबसे पहले ये जानना होगा कि लॉकडाउन आख़िर लगाया क्यों गया था, उसका मक़सद क्या था?

लॉकडाउन से क्या थी उम्मीद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब लॉकडाउन की घोषणा की थी तो इस बात पर ज़ोर दिया था कि "हमें कोरोना संक्रमण के साइकल को तोड़ना है."

दूसरा, सरकार लॉकडाउन के ज़रिए कुछ वक़्त चाहती थी, ताकि वो लॉकडाउन के बाद कोरोना के प्रकोप को संभालने के लिए तैयारी कर सके.

तो क्या ये मक़सद पूरे हो सके हैं? इस पर दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के मेडिसिन डिपार्टमेंट के वाइस चेयरमैन डॉक्टर अतुल कक्कड़ कहते हैं कि शुरुआती वक़्त में मामलों को स्लो डाउन करने में तो लॉकडाउन से कुछ मदद मिली ही थी, नहीं तो पीक बहुत पहले आ सकता था.

वहीं जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉक्टर डीएस मीणा कहते हैं कि ये नया वायरस था.

"लॉकडाउन से इस वायरस को समझने और जानने का वक़्त मिला. कोरोना मरीज़ों का इलाज किस तरह से करना है, टेस्टिंग किस तरह से करनी है, इसे लेकर स्वास्थ्य कर्मियों को पहले जानकारी नहीं थी. इस दौरान इस पर प्रोटोकॉल बनाए गए. ज़रूरत के हिसाब से इनमें बदलाव किया गया. अब इस वायरस से निपटने के लिए पहले से ज़्यादा समझ और ज़्यादा संसाधन हैं."

'सकारात्मक नहीं नकारात्मक कामयाबी'

क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज वेल्लोर से वायरोलॉजी के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर टी जैकब जॉन मानते हैं कि आप ये नहीं कह सकते कि ये लॉकडाउन पूरी तरह से फ़ेल हो गया है, क्योंकि जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि इस लॉकडाउन की आर्थिक क़ीमत चुकानी होगी, "ये ज़रूर हुआ - चाहे कुछ और हुआ हो या ना हुआ हो."

"लॉकडाउन से तीन नतीजे मिलने की बात कही जा रही थी. उम्मीद थी कि इससे महामारी स्लो डाउन हो जाएगी. साथ ही लॉकडाउन के बाद के वक़्त के लिए तैयारी कर ली जाएगी. तीसरी बात कही गई थी कि लॉकडाउन की वजह से अर्थव्यवस्था को नुक़सान भी हो सकता है."

डॉक्टर जैकब जॉन मानते हैं कि "लॉकडाउन जिस एक चीज़ में पूरी तरह कामयाब रहा है वो है सिर्फ़ अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुंचाने में."

साथ ही डॉक्टर जैकब जॉन कहते हैं कि, "इस बात के कोई सबूत नहीं मिलते कि भारत में संक्रमण फैलने की स्पीड कम हुई है. भारत में हर रोज़ संक्रमण के मामले पिछले दिन से ज़्यादा होते हैं और ये तेज़ी से बढ़ रहे हैं."

लेकिन क्या घटी मृत्यु दर

मंगलवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल जब प्रेस कॉन्फ्रेंस करने आए तो उन्होंने लॉकडाउन की कई उपलब्धियां गिनाईं.

उन्होंने दावा किया कि लॉकडाउन की वजह से भारत ने दूसरे देशों के मुक़ाबले हालात को बहुत बेहतर तरीक़े से संभाला. इससे रिकवरी रेट बढ़ा, मृत्यु दर या मौतों की संख्या बहुत कम हो गई.

लव अग्रवाल ने बताया कि मार्च में जो रिकवरी रेट क़रीब 7.1 प्रतिशत था, "वो दूसरा लॉकडाउन शुरू होने के वक़्त बढ़कर 11.42 हो गया था. वहीं तीसरा लॉकडाउन शुरू करने के समय पर बढ़कर 26.95 प्रतिशत हुआ और आज हम देख रहे हैं कि फ़ील्ड में कोशिशें करने की वजह से वो लॉकडाउन के इस मौजूदा वक़्त में बढ़कर 41.61 प्रतिशत हो चुका है."

साथ ही उन्होंने ये भी दावा किया कि भारत में कोरोना संक्रमित व्यक्तियों में मृत्यु दर दुनिया में सबसे कम यानी क़रीब 2.8 प्रतिशत हो गई है, जबकि दुनियाभर में मृत्यु दर औसतन 6.4 प्रतिशत है.

स्वास्थ्य मंत्रालय ने इन सब उपलब्धियों का मुख्य कारण लॉकडाउन को बताया - उन्होंने कहा कि इस दौरान हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया गया, लॉकडाउन में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हो सका, साथ ही कंटेनमेंट के क़दमों के ज़रिए चेन ऑफ़ ट्रांसमिशन को कमज़ोर किया जा सका.

लेकिन आगे की तैयारी क्या है?

लेकिन डॉ जैकब जॉन सरकार के इन दावों पर सवाल उठाते हैं. वो कहते हैं कि सरकार दावे तो कर रही है लेकिन आंकड़े पेश नहीं कर रही कि उन्होंने कितने बेड तैयार कर लिए हैं, कितने वेंटिलेटर तैयार कर लिए हैं.

वो कहते हैं कि मुंबई से अब भी बेड कम पड़ने की ख़बरे आ रही हैं, वहीं पश्चिम बंगाल में बेड हैं तो स्वास्थ्य कर्मियों की कमी है.

"सरकार को बताना चाहिए कि इसके लिए उनकी क्या तैयारी है? सरकार कह रही है कि लॉकडाउन में प्लानिंग की, पर क्या प्लानिंग की है? एक नागरिक के तौर पर हमें इसमें से कोई जानकारी नहीं दी गई है."

उनका ये भी कहना है कि लॉकडाउन ने मामलों को उस तरह स्लो डाउन नहीं किया, जिस तरह हम चाहते थे.

जबकि स्वास्थ्य मंत्रालय का दावा है कि अगर दुनिया में प्रति लाख आबादी पर 69.9 केस रिपोर्ट हुए हैं, तो भारत में ये क़रीब महज़ 10.7 केस प्रति लाख रिपोर्ट हुए हैं.

हालांकि, डॉक्टर जैकब जॉन कहते हैं कि मामले इसलिए कम दिख रहे हैं, क्योंकि पर्याप्त टेस्टिंग नहीं हो रही है.

उनका कहना है कि भारत की महज़ एक फ़ीसदी आबादी का टेस्ट हुआ है, इसलिए कोई नहीं जानता कि 99 फ़ीसदी आबादी में क्या चल रहा है, वहां हो रही मौतों को भी नहीं गिना जा रहा, क्योंकि मौतों की गिनती भी इसी एक फ़ीसदी आबादी में से की जा रही है.

'मृत्यु दर कम नहीं, बल्कि बहुत ज़्यादा'

डॉक्टर जैकब जॉन दावा करते हैं कि "भारत सरकार के दावों से उलट भारत की असल केस फ़ेटेलिटी 17.8% है, जो दुनिया में कहीं ज़्यादा है. वहीं भारत की इंफ़ेक्शन फ़ेटेलिटी भी 3.6 प्रतिशत है."

डॉक्टर जैकब जॉन का कहना है कि केंद्र सरकार केवल फ़ेटेलिटी बताती है, वो ये नहीं बताती कि ये इंफ़ेक्शन फ़ेटेलिटी रेट है या केस फ़ेटेलिटी रेट है, "ये दोनों ही अलग हैं और केस फ़ेटेलिटी बहुत ही चिंताजनक स्तर पर है."

ये मृत्यु दर उन्होंने किस आधार पर निकाली है? इस पर डॉ जैकब जॉन ने बताया, मृत्यु दर दो तरह से देखी जाती है. एक इंफ़ेक्शन फ़ेटेलिटी, दूसरी केस फ़ेटेलिटी.

मान लीजिए 1000 लोगों को इंफ़ेक्शन हुआ, तो उनमें से जितने लोगों की मौत होगी, वो इंफ़ेक्शन फ़ेटेलिटी होगी.

केस फ़ेटेलिटी मतलब - 1000 लोगों को इंफ़ेक्शन होता है तो उनमें से 800 ख़ुद ही ठीक हो जाते हैं. बचे हुए 200 को बीमारी होती है. तो उन 200 लोगों में से जितने लोगों की मौत होगी वो केस फ़ेटेलिटी मानी जाएगी.

भारत में कोरोना मृत्यु दर को समझाते हुए डॉक्टर जैकब जॉन कहते हैं, "कल इंफ़ेक्ट होने वाला कोई शख़्स आज नहीं मरेगा. पहले 7 से 10 दिन का इनक्यूबेशन पीरियड होता है. फिर लक्षण आते हैं. फिर व्यक्ति बहुत बीमार हो जाता है. उसके बाद उनकी मौत हो जाती है. इस सब में 3 से 4 हफ्ते का वक़्त लगता है."

"इसलिए इंफ़ेक्शन फ़ेटेलिटी और केस फ़ेटेलिटी निकालने के लिए चार या तीन हफ़्ते पहले के संक्रमित मामलों की संख्या को लिया जाता है और उन्हें आज की मौतों की संख्या से कैलकुलेट करके मृत्यु दर का प्रतिशत निकाला जाता है."

डॉक्टर जैकब जॉन दावा करते हैं कि भारत की असल मृत्यु दर बेहद चिंताजनक और दुनिया में दूसरे देशों के मुकाबले कहीं ज़्यादा है. वो कहते हैं कि भारत की मृत्यु दर बहुत कम होनी चाहिए थी, क्योंकि यहां 80 प्रतिशत आबादी 50 साल से कम उम्र की है.

वो दावा करते हैं कि अमरीका जैसे देश में एक लाख से ज़्यादा मौतों का आंकड़ा इसलिए दिखता है, क्योंकि वो लोग सारी आबादी में हुई मौतों को गिन रहे हैं, जबकि भारत महज़ अपनी एक फ़ीसदी आबादी का टेस्ट कर उनमें ही हुई मौतों को गिन रहा है, बाकी 99 प्रतिशत आबादी में क्या चल रहा है, किसी को नहीं पता.

वो कहते हैं कि भारत सरकार इसलिए कहीं ना कहीं इस बात से लगातार इनकार कर रही है कि देश में कम्युनिटी ट्रांसमिशन नहीं हुआ है.

डॉक्टर जैकब जॉन मानते हैं कि लॉकडाउन से की गई दो सकारात्मक उम्मीदें - कि महामारी धीमी हो जाए और हमें प्लानिंग के लिए वक़्त मिल जाए, दोनों ही नहीं हो पाया.

"एक देश के तौर पर हमने महामारी से निपटने में अच्छा काम नहीं किया, लेकिन हम कर सकते थे. क्योंकि भारत विकासशील देशों का लीडर है, हमारे पास स्किल है, नॉलेज है, टेलेंट है, इंटेलेक्चुअल पावर है, ख़ुद को ऑर्गेनाइज़ करने की एबिलिटी है, लेकिन उसका सही इस्तेमाल नहीं किया गया."

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