ईविद्या योजना: क्या हर स्कूली बच्चे को मिल सकेगा इसका फ़ायदा

- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"जब मुझे कोविड19 हुआ तो मैंने यही सोचा कि अब मैं अपने स्टूडेंट्स को कैसे पढ़ाऊंगा. मैं जानता था कि मैं तो ठीक हो जाऊंगा लेकिन बच्चों की गणित की पढ़ाई पर खलल नहीं पड़ना चाहिए. इसलिए मैंने प्रिंसिपल से अनुमति मांगी और उन्होंने ऑनलाइन क्लास के सभी इंतज़ाम अस्पताल में ही करवा दिए."
लेह के रहने वाले किफ़ायत हुसैन कोरोना पॉजिटिव होने के बाद भी अपने स्टूडेंट्स को आईसोलेशन सेंटर से ऑनलाइन क्लास दे रहे हैं.
किफ़ायत हुसैन लेह के एक स्कूल में गणित के शिक्षक हैं और वह तीन मई को कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे.
लेकिन, फिर भी उन्होंने बच्चों की ऑनलाइन क्लास ज़ारी रखी क्योंकि वो मानते हैं कि लॉकडाउन में बच्चों की पढ़ाई का एकमात्र ज़रिया ऑनलाइन क्लास है.
उनकी इस कोशिश में इंटरनेट की समस्या रुकावट बनकर बार-बार सामने आती है. वो बताते हैं कि इस इलाक़े में हमेशा इंटरनेट नहीं आता इसलिए सभी बच्चे ऑनलाइन क्लास नहीं ले पाते. वो कुछ वीडियो रिकॉर्ड करके यूट्यूब और व्हाट्सऐप के ज़रिए बच्चों तक पहुंचाते हैं.
किफ़ायत हुसैन के स्टूडेंट्स को इंटरनेट कनेक्टिविटी की समस्या से आए दिन दो-चार होना पड़ता है.
नौंवी कक्षा में पढ़ने वाले स्टेंज़िन रंगदोल ने हमें बताया कि ऑनलाइन क्लास लेना अच्छा तो लगता है लेकिन कई बार पहाड़ पर जाकर नेटवर्क मिलता है.
क्लास में 40 के करीब स्टूडेंट हैं और 20-22 ही क्लास में आते हैं.
वहीं, किफ़ायत हुसैन के दूसरे स्टूडेंट स्टेंज़िन चॉस्बेल का भी कहना है कि वो भी नेटवर्क के कारण स्कूल की तरफ से दी जा रहीं सभी क्लासेस नहीं ले पाते.
क्या असरदार होगी ई-विद्या योजना
एक तरफ लॉकडाउन में डिजिटल पढ़ाई एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर सामने आई है, तो दूसरी तरफ उससे जुड़े संसाधनों की कमी भी अब उभकर सामने आने लगी है. डिजिटल पढ़ाई को ही बढ़ावा देने के लिए ही हाल ही में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आर्थिक पैकेज के तहत पीएम ई-विद्या कार्यक्रम की घोषणा की थी.
इसके तहत ई-कोर्सेज, शैक्षणिक चैनल और सामुदायिक रेडियो का इस्तेमाल करके बच्चों तक पाठ्य सामग्री पहुंचाई जाएगी. इसमें की गई घोषणाएं हैं-
- केंद्र सरकार ने देश के 100 शीर्ष विश्वविद्यालयों को ऑनलाइन कोर्स शुरू करने की मंजूरी दी है.
- पहली से लेकर 12वीं तक की कक्षाओं के लिए एक-एक डीटीएच चैनल शुरू किया जाएगा. हर कक्षा के लिए छह घंटे का ई-कंटेंट तैयार किया जा रहा है. रेडियो, सामुदायिक रेडियो और पॉडकास्ट सेवाओं का भी इसमें उपयोग होगा. दृष्टिबाधित और श्रवण बाधित बच्चों के लिए भी विशेष ई-केंटट तैयार किया जाएगा.
- छात्रों, परिजनों और शिक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य में सहयोग के लिए मनोदर्पण नाम का कार्यक्रम भी शुरू किया जाएगा जो मुख्य तौर पर काउंसलिंग पर आधारित होगा.
सरकार की घोषणाओं में विभिन्न माध्यमों से ऑनलाइन पढ़ाई के लिए सामग्री और कोर्सेज उपलब्ध कराने पर ज़ोर दिया गया है.
लेकिन, सवाल ये है कि सीमित संसाधनों और कमज़ोर इंटरनेट कनेक्टिविटी के बीच कितने बच्चे इस पाठ्य सामग्री का इस्तेमाल कर पाएंगे? आज भी जहां देश में हर किसी के पास स्मार्ट फोन नहीं है और इंटरनेट कनेक्टिविटी बहुत सीमित है, तो ई-विद्या कार्यक्रम कितना कारगर साबित होगा?
पहल अच्छी पर मंजिल दूर
इंटनरेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आईएएमएआई) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में शहरी क्षेत्रों के मुक़ाबले ग्रामीण इलाक़ों में इंटरनेट की पहुंच लगभग आधी है.
साल 2019 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 12 साल से ज़्यादा उम्र के 38 करोड़ 50 लाख इंटरनेट यूज़र हैं. इनमें से 51 प्रतिशत शहरी इलाक़ों में और 27 प्रतिशत ग्रामीण इलाक़ों में मौजूद हैं. वहीं, पांच से 11 साल के छह करोड़ 60 लाख बच्चे इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं.
जानकारों का मानना है कि डिजिटल शिक्षा को बढ़ाने के लिए ईविद्या योजना एक महत्वपूर्ण कदम है लेकिन इसके सामने चुनौतियां बहुत हैं. डीडी नेशनल पर पहले भी ज्ञान दर्शन जैसे कार्यक्रम आया करते थे. अब फिर से सरकार ने कोशिश की है लेकिन ऑनलाइन पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराने के साथ-साथ उसे पहुंचाना भी ज़रूरी होगा.
यूनिसेफ़ के साथ जुड़े शिक्षा विशेषज्ञ शेषागिरी कहते हैं, "ऑनलाइन पढ़ाई का जो ये तरीका विकसित हो रहा है वो अब हमेशा हमारे साथ रहेगा. इसके तीन अहम पहलू हैं. पहला बच्चों तक पहुंच, दूसरा कंटेंट की गुणवत्ता और तीसरा माता-पिता को जागरुक करना. दरअसल, डिजिटल माध्यम के ज़रिए स्कूल की क्लासेज की कमी को पूरा किया जा रहा है. लेकिन, समस्या ये है कि डिजिटल माध्यम के ज़रिए हर बच्चा क्लास नहीं ले पाता जबकि स्कूल हर बच्चा जा सकता है."
"जैसा की एचआरडी मंत्री ने कहा कि स्कूलों में सोशल डिस्टेंसिंग को देखते हुए सिर्फ़ 30 प्रतिशत बच्चों के साथ ही क्लासेज शुरू करनी पड़ सकती हैं. अब इसमें दो विकल्प होंगे. या दो पाली में क्लास कराएं या ऑनलाइन क्लास दें. आप हर बच्चे तक इंटरनेट कनेक्टिविटी, टीवी और मोबाइल की सुविधा कैसे पहुंचाएंगे. इसलिए पहल अच्छी है लेकिन उसके पूर्ण लाभ के लिए आधारभूत ढांचे में सुधार करना होगा."

इमेज स्रोत, Qamar Sibtain/The India Today Group/Getty Images
दिल्ली यूनिवर्सिटी का उदाहरण
ऑनलाइन पढ़ाई की चुनौतियों का हालिया उदाहरण दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में सामने आया है.
दिल्ली विश्वविद्यालय ऑनलाइन ओपन बुक परीक्षा आयोजित कराने वाला है. लेकिन, कई स्टूडेंट इसका विरोध कर रहे हैं क्योंकि उनके पास ऑनलाइन पढ़ाई से लेकर परीक्षा तक के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं. इस संबंध में स्टूडेंट्स और शिक्षकों की ओर से मानव संसाधन मंत्रालय को एक पत्र भी लिखा गया है.
डीयू के हिंदू कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर डॉक्टर जगदीश चंदर कहते हैं, "कई बच्चे इस वक़्त अपने घर पर गए हुए हैं और वहां उनके पास ना तो अपनी किताबें हैं और ना इंटरनेट की सुविधा. इसी तरह दृष्टिबाधित और अन्य विकलांग स्टूडेंट भी ठीक से ऑनलाइन क्लास नहीं ले पाए हैं. उनके लिए ओपन बुक परीक्षा देना भी मुश्किल है क्योंकि वो दूसरे बच्चों की तरह आसानी से किताब से खोजकर जवाब नहीं लिख सकते. उन्हें बार-बार रिकॉर्डिंग सुननी होगी."
सेंट स्टीफन कॉलेज में एमए इंग्लिश के अंतिम वर्ष के छात्र दीपक गुप्ता दृष्टिबाधित हैं. वह बताते हैं कि इस वक़्त स्क्राइबर मिलना भी मुश्किल है क्योंकि कोरोना के डर से कोई हमारे साथ नहीं आना चाहेगा.
ऐसे में स्टूडेंट और शिक्षकों की ओर से कुछ तात्कालिक समाधान भी सुझाए गए हैं. लेकिन, जानकार कहते हैं कि ये एक लंबे समय की प्रक्रिया है और इस पर गंभीरता से काम करने की ज़रूरत होगी.

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रूचिकर बनाना होगा कंटेट
शेषागिरी बच्चों को ऑनलाइन या अन्य माध्यमों से मिल रहे कंटेट को रुचिकर बनाने की बात भी कहते हैं.
वो मानते हैं कि अगर बच्चा क्लास में हो तो टीचर उसका ध्यान भटकने से रोक सकती है लेकिन, घर पर वो अनुशासन और रोचकता नहीं आ पाती. ऐसे में पढ़ाई की सामग्री इतनी रूचिकर होनी चाहिए कि बच्चा उसे देखना चाहे और कुछ सीख पाए. खासतौर पर छोटे बच्चों के लिए क्योंकि वो बड़े बच्चों की तरह सेल्फ स्टडी नहीं कर सकते.
तीसरी बात है माता-पिता को पढ़ाना यानी उन्हें ये बताना कि वो बच्चे को डिजिटल शिक्षा के लिए कैसे प्रोत्साहित करें.
शेषागिरी बताते हैं, "हमने अपने कार्यक्रम ‘सीख’ के तहत कई उदाहरण देखें हैं कि माता-पिता बच्चे को फोन तो देते हैं लेकिन ये नहीं देखते कि वो बच्चा पढ़ रहा है या नहीं. ऐसे में साधन की उपलब्धता भी काम नहीं आती."
वह कहते हैं कि पहले माता-पिता में बच्चों की पढ़ाई के लिए गंभीरता लानी होगी. उनके लिए भी कार्यक्रम बनें और उन्हें पढ़ने का महत्व समझाएं. साथ ही बताएं कि इस नए माध्यम के लिए बच्चे को कैसे सहज करें.


इमेज स्रोत, MoHFW_INDIA

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