कोरोना अपडेट: यूपी, बिहार में इतनी देरी से क्यों पहुंच रही हैं श्रमिक स्पेशल ट्रेनें?
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Author, समीरात्मज़ मिश्र/नीरज प्रियदर्शी/रवि प्रकाश
पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए लगाए गए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के दौरान देश के कई महानगरों और अन्य बड़े शहरों से हज़ारों की संख्या में प्रवासी मज़दूरों ने बोरिया बिस्तर समेट कर अपने गृह राज्यों की ओर पैदल ही जाना शुरू किया क्योंकि इनके लिए कोई परिवहन सुविधा उपलब्ध ही नहीं थी.
ट्रेनें और बसें नहीं चल रही थीं. लेकिन दबाव के बाद केंद्र सरकार ने प्रवासियों को उनके गृह राज्यों में वापस लाने के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाने का फ़ैसला किया.
संक्रमण की हालत जानने के लिए ज़िले का नाम अंग्रेज़ी में लिखें
लाखों लोगों को इन ट्रेनों ने उनके गंतव्य पर उतारा भी. लेकिन बीते कुछ दिनों के दौरान यह देखने को मिला कि कुछ श्रमिक ट्रेनें अपना रास्ता भटक कर गंतव्य की बजाए कहीं और पहुँच गईं. हालांकि बाद में उन्हें वापस उनके गंतव्य तक वापस पहुँचाया गया.
वहीं रेलवे का कहना है कि ये ट्रेनें अपना रास्ता नहीं भटकी हैं बल्कि इनका रूट बदला गया है.
रेल मंत्री पीयूष गोयल ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से एक ट्वीट में लिखा कि हर एक ट्रेन अपने गंतव्य स्थान तक पहुँची है, कुछ कंजेशन की वजह से डाइवर्टेड रूट से लेकर जाना पड़ा है.
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उधर रेलवे मंत्रालय ने पीआईबी फ़ैक्ट चेक की उस ट्वीट को रीट्वीट किया जिसमें ये लिखा गया कि 80 फ़ीसदी श्रमिक ट्रेनें या तो यूपी या बिहार जा रही हैं, इसकी वजह से कंजेशन है. इन ट्रेनों के रूट में बदलाव करना पड़ा है न कि ये अपना रास्ता भटकी हैं.
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अब जिस किसी भी वजह से अपने गंतव्य तक तय समय से क़रीब तीन गुना में पहुँच रही हों, इनमें सफ़र कर रहे यात्रियों का तो गर्मी से बुरा हाल रहा ही वहीं खाने-पीने में भी उन्हें बहुत परेशानी हुई.
इसके अलावा ऐसी रिपोर्ट भी मिलीं कि इन लेट हुई ट्रेनों में सफ़र कर रहे कुछ बीमार लोग की साँसों पर यात्रा के दौरान ही ब्रेक लग गया.
श्रमिक ट्रेनों के यात्रियों को हो रही परेशानियों पर बीबीसी ने उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में अपने सहयोगियों से परेशानियों का जायजा लिया.
वीडियो कैप्शन, दिल्ली से मज़दूरों के लिए चली श्रमिक ट्रेन
यूपी में देर से पहुंचने वाली इन ट्रेनों के यात्रियों का हाल
उत्तर प्रदेश से हमारे सहयोगी समीरात्मज़ मिश्र ने जानकारी दी कि भूख-प्यास से बेहाल यात्री रेलवे की बदइंतज़ामी झेलने को मजबूर हैं.
श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के देरी से चलने और रास्ते में गर्मी से बेहाल यात्रियों के हंगामे करने की घटनाएं लगातार जारी हैं.
यूपी में इस समय सबसे व्यस्त रहने वाले रेलवे स्टेशनों में से एक वाराणसी जंक्शन पर मंगलवार को ट्रेनों का सबसे ज़्यादा दबाव रहा. विभिन्न ट्रेनों से सुबह 8 बजे से लेकर शाम तक क़रीब आठ हज़ार श्रमिक यहां पहुँचे.
वाराणसी कैंट स्टेशन और मंडुआडीह आने वाली ट्रेनें आठ से दस घंटे या इससे भी ज़्यादा देरी से पहुंचीं.
सूरत-जौनपुर स्पेशल ट्रेन निर्धारित समय से 13 घंटे की देरी से वाराणसी कैंट पहुंची. ट्रेन में सवार जौनपुर के रहने वाले त्रिलोचन निषाद अपनी पत्नी और दो छोटे बच्चों के साथ बैठे थे.
बताने लगे, "ट्रेन ऐसी जगहों पर रुकती रही जहाँ न तो पानी उपलब्ध था और न ही कुछ खाने-पीने का सामान. ट्रेन में तो खाने-पीने की कोई चीज़ मिल ही नहीं रही है. चार साल के बच्चे के लिए दूध लेकर चले थे लेकिन वह दूध एक दिन भी नहीं चला. रास्ते भर बच्चे परेशान होते रहे. घर पहुंचने में अभी और पता नहीं कितना समय लगेगा."
वहीं मंडुआडीह स्टेशन पर मुंबई से आई श्रमिक स्पेशल ट्रेन क़रीब 11 घंटे की देरी से यहां पहुंची.
इस ट्रेन में क़रीब डेढ़ हज़ार यात्री थे जो वाराणसी के अलावा आस-पास के ज़िलों के थे. कई यात्रियों ने मीडिया से इस यात्रा में होने वाली परेशानी की ज़िक्र किया.
चंदौली के रहने वाले मोहम्मद यूनुस बताने लगे कि उनके साथ आ रहे एक व्यक्ति के तीन छोटे बच्चे थे. गर्मी से बेहाल और बच्चों के परेशान करने से तंग आकर वो रास्ते में ही कहीं उतर गए. यूनुस बताने लगे कि यात्रियों ने कई जगह हंगामा भी किया लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था.
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तीन दिन पहले चंदौली में ही ट्रेन के रूट बदले जाने और लेट-लतीफ़ी से परेशान होकर सैकड़ों यात्रियों ने रेलवे ट्रैक को ही जाम कर दिया था.
रोज़ हो रहे हंगामों को देखते हुए रेलवे प्रशासन ने वाराणसी जंक्शन से गुज़रने वाली हर श्रमिक स्पेशल ट्रेन में भोजन और पानी का प्रबंध करने का निर्देश दिया है.
वाराणसी ज़ोन के डीआरएम विजय पांजियार बताते हैं, "वाराणसी जंक्शन से गुज़रने वाली हर श्रमिक स्पेशल ट्रेन में यात्रियों को भोजन-पानी जैसी सुविधा मुहैया कराने के लिए रेलवे के अधिकारियों और कर्मचारियों को कहा गया है. इसके अलावा स्थानीय प्रशासन की ओर से भी पानी की बोतलें और केले बांटे जा रहे हैं. आईआरसीटीसी के कर्मचारियों ने भी कुछ ट्रेनों में खाने के पैकेट बांटे."
वहीं मुंबई से प्रयागराज पहुंची एक श्रमिक स्पेशल ट्रेन के यात्रियों ने बताया कि तीन दिन के सफ़र में उन्हें न तो खाने का कुछ मिला और न ही रास्ते में कहीं पानी मिला.
यात्रियों का कहना था कि जिन यात्रियों के पास अतिरिक्त पानी था, उससे ही प्यासे लोगों की मदद की गई. हां, प्रयागराज स्टेशन पर ज़रूर कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से पानी और खाने के पैकेट की व्यवस्था की गई थी.
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गोले प्रत्येक देश में कोरोना वायरस के पुष्ट मामलों की संख्या दर्शाते हैं.
स्रोत: जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियां
आंकड़े कब अपडेट किए गए 5 जुलाई 2022, 1:29 pm IST
बिहार पहुंचे यात्रियों का हाल बेहाल
बिहार से बीबीसी के सहयोगी नीरज प्रियदर्शी ने बताया कि लॉकडाउन में प्रवासी मज़दूरों के लिए घर लौटना जंग जीतने जैसा हो गया है.
जब सड़क के माध्यम से ये मज़दूर आ रहे थे इनमें से कई सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए वहीं पैदल चलते हुए ट्रैक से जा रहे थे तो कुछ पहियों के नीचे आ गए और अब जब उनके लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाई जा रही हैं तो अब वहां से भी मौत की ख़बरें आने लगी हैं.
बीते कुछ दिनों के दौरान कुछ ट्रेनें देर से अपने गंतव्य पर पहुंच रही हैं.
सोमवार को दिल्ली से पटना आई श्रमिक स्पेशल ट्रेन में सवार पश्चिम चंपारण के पिंटू जब मुज़फ्फरपुर स्टेशन से बेतिया की ट्रेन पर चढ़ने का इंतजार कर रहे थे, तभी उनके चार साल के बेटे इरशाद की मौत हो गई.
वीडियो कैप्शन, 12 मई से चलना शुरू होंगी ट्रेन, पहले केवल 15 रेलगाड़ियाँ, आज से मिलेगा टिकट
मोहम्मद पिंटू ने बताया, "उमस भरी गर्मी और पेट में अन्न का दाना नहीं होने के कारण बेटा मर गया."
बच्चे के मौत की तस्दीक मुज़फ़्फ़रपुर के ज़िला सूचना जनसंपर्क पदाधिकारी कमल सिंह ने किया.
उन्होंने बताया, "यात्रा के क्रम में बच्चे की तबीयत बिगड़ी और इसके बाद मौत हो गई. शव के पोस्टमार्टम के बाद शव वाहन से पूरे परिवार को बेतिया भेज दिया गया."
मुज़फ़्फ़रपुर रेलवे स्टेशन पर ही सोमवार को श्रमिक स्पेशल ट्रेन में सवार अरबीना खातून की मौत संदिग्ध परिस्थिति में हो गई.
शव को मुज़फ़्फ़रपुर रेलवे स्टेशन पर ही उतार लिया गया. जीआरपी ने शव को पोस्टमार्टम के लिए एसकेसीएचएम भेज दिया. मुज़फ़्फ़रपुर के डीपीआरओ ने इस मौत की भी पुष्टि की है.
स्थानीय अख़बारों में छपी रिपोर्ट्स की मानें तो सिर्फ़ सोमवार को श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से आए सात प्रवासियों की मौत सफ़र के दौरान हुई है. हालांकि बीबीसी इन ख़बरों की पुष्टि नहीं कर पाया है.
पूर्व मध्य रेल के आँकड़ों के अनुसार अलग-अलग स्टेशनों से चलकर अब तक लगभग 1100 श्रमिक स्पेशल ट्रेनें बिहार आई हैं. इनमें लगभग 15 लाख प्रवासी श्रमिकों को अब तक लाया जा चुका है.
लेकिन इन ट्रेनों में शायद ही कोई अपने निर्धारित समयानुसार आई हों. ट्रेनों के लेट होने की शुरुआत पहले दिन आई पहली श्रमिक स्पेशल ट्रेन से ही हुई थी.
सोमवार को महाराष्ट्र के पनवेल से पटना आई श्रमिक स्पेशल ट्रेन 01886 शुक्रवार को सुबह 10 बजे पनवेल स्टेशन से खुली थी जो 77 घंटे बाद सोमवार को तीन बजे पटना पहुंची.
ट्रेन में सवार सिवान के धर्मेंद्र बताते हैं, "ट्रेन को कई राज्यों से घुमाते लाया गया. इससे काफ़ी परेशानी हुई. ट्रेन में खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं थी, इसलिए बुरा हाल हो गया."
ट्रेन में सवार दूसरे यात्री ने बताया "नागपुर तक ट्रेन में खाने के पैकेट, पानी के बॉटल वगैरह बांटे गए थे. उसके बाद से कहीं कुछ नहीं मिला."
आखिर ट्रेनें लेट क्यों हो रही हैं या रास्ता क्यों भटक जा रही हैं, जबकि अभी सिर्फ स्पेशल ट्रेनों को ही चलाया जा रहा है?
इसके जवाब में गोरखपुर रेल मंडल के सीपीआरओ पंकज सिंह ने बीबीसी को बताया, "कोई ट्रेन रास्ता नहीं भटकी है. ट्रेनें रास्ता नहीं भटकतीं. वे सिग्नल से चलती हैं. ट्रेन का क्रू तय करता है कि किस रूट से जाना है, कहां से डाइवर्ट करना है. कहीं-कहीं समय पर सिग्नल नहीं मिलने के कारण गड़बड़ियां हो जाती हैं."
सिंह आगे बताते हैं, "पायलट, लोको पायलट, गार्ड और स्टेशन मास्टर मिलकर तय करते हैं कि किस स्टेशन से और किस रूट से किस ट्रेन को लेकर जाना है. चूंकि ये स्पेशल ट्रेनें हैं जिनका पहले से कोई रूट या समय निर्धारित नहीं था. ट्रेनें उसी हिसाब से चल रही हैं, जैसा कि उसका क्रू फ़ैसला ले रहा है."
'ट्रैक पर ट्रेनें नहीं 'अव्यवस्था' का परिचालन हो रहा है'
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झारखंड से बीबीसी के सहयोगी रवि प्रकाश बताते हैं कि लातेहार जिले के महिपत सिंह अपने भाइयों के साथ महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग से झारखंड के हटिया के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन पर सवार हुए थे.
वे बीमार थे. चाहते थे कि मनिका स्थित अपने गाँव लौट जाएँ लेकिन उनकी मुराद पूरी नहीं हो सकी. ट्रेन में ही उनकी मौत हो गई.
जबलपुर के पास उनकी तबीयत ज़्यादा बिगड़ गई. उन्हें बचाया नहीं जा सका. जिस ट्रेन से वे हटिया आ रहे थे, वह कई घंटे विलंब से यहाँ पहुँची.
उनके भाई बाबूलाल सिंह ने बीबीसी से कहा कि अगर ट्रेन समय से चल रही होती और उसमें ज़रूरी यात्री सुविधाएँ भी मिलतीं तो शायद महिपत ज़िंदा होते. वे टीबी के भी मरीज़ थे. उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट अभी नहीं मिली है.
ऐसा मेडिकल टेस्ट जिससे साबित हो सके कि किसी शख्स को कोरोना वायरस था और अब उसमें कुछ इम्युनिटी आ गई है. यह टेस्ट खून में एंटीबॉडीज का पता लगाता है, जिन्हें बीमारी से लड़ने के लिए शरीर पैदा करता है.
बिना लक्षण वाले
ऐसा शख्स जिसे बीमारी हुई मगर उसमें कोई लक्षण नहीं दिखाई दिए. कुछ स्टडीज से पता चला है कि कोरोना वायरस का शिकार हुए कुछ लोगों में तेज़ बुखार या कफ़ जैसे आम लक्षण नहीं नज़र आए.
कोरोना वायरस
वायरस समूह में से एक वायरस जिससे मनुष्यों या जानवरों में गंभीर या हल्की बीमारी हो सकती है. पूरी दुनिया में फैले कोरोना वायरस से कोविड-19 बीमारी हो रही है. सामान्य सर्दी या इंफ्लूएंजा (फ़्लू) फैलाने वाले दूसरे तरह के कोरोना वायरस हैं.
कोविड-19
कोरोना वायरस की वजह से फैल रही बीमारी का सबसे पहले पता 2019 के अंत में चीन के वुहान में लगा. यह मूलरूप में फ़ेफ़ड़ों पर असर डालता है.
संक्रमण की तेज़ी को रोकना
ट्रांसमिशन की दर को कम करना ताकि चार्ट पर प्रदर्शित किए जाने पर मामलों की संख्या के आधार पर पीक को फ्लैट कर कर्व को नीचे लाया जाए ताकि स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ते बोझ को कम किया जा सके.
फ़्लू
इंफ्लूएंजा का संक्षिप्त नाम. एक वायरस जो कि सीजनल बीमारियों में मनुष्यों और जानवरों में फैलता है.
सामुदायिक प्रतिरोधक क्षमता
एक बड़ी आबादी तक पहुंचने के बाद किस तरह से एक बीमारी का फैलाव सुस्त पड़ता है.
लड़ने में सक्षम
ऐसा शख्स जिसका शरीर किसी बीमारी के सामने टिक सके या उसे रोक दे वह इससे इम्यून कहा जाता है. एक बार जब कोई शख्स कोरोना वायरस से उबर जाता है तो ऐसा माना जाता है कि वह एक निश्चित अवधि तक इस बीमारी का फिर से शिकार नहीं हो सकता.
वायरस के असर करने की अवधि
किसी बीमारी का शिकार होने और उसका लक्षण दिखाई देना शुरू होने के बीच की अवधि
लॉकडाउन
आवाजाही या रोज़ाना की ज़िंदगी पर पाबंदियां, जिनमें सार्वजनिक इमारतें बंद हैं और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए कहा गया है. कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कई देशों में लॉकडाउन को कड़े उपायों के तौर पर लागू किया गया है."
शुरुआत
किसी क्लस्टर या अलग-अलग इलाकों में तेज रफ्तार से बीमारी के कई मामले सामने आना.
महामारी
किसी गंभीर बीमारी का कई देशों में एकसाथ तेजी से फैलना महामारी कहलाता है.
एकांतवास
किसी संक्रामक बीमारी को फैलने से रोकने के लिए इसकी जद में आए लोगों को अलग रखना.
सार्स
सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम एक कोरोना वायरस का ही प्रकार है जो कि एशिया में 2003 में शुरू हुआ था.
सेल्फ-आइसोलेशन
घर पर ही रहना और अन्य लोगों से सभी तरह के संपर्क से बचना ताकि बीमारी को फैलने से रोका जा सके.
सामाजिक दूरी
अन्य लोगों से दूर रहना ताकि बीमारी के ट्रांसमिशन की रफ्तार कम की जा सके. सरकार की सलाह है कि अपने साथ रह रहे लोगों के अलावा दोस्तों और रिश्तेदारों से न मिलें. साथ ही सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल से भी बचें.
आपातकालीन स्थिति
किसी संकट के वक्त सरकार द्वारा रोज़ाना की जिंदगी पर पाबंदी लगाने के मकसद से उठाए गए कदम. इसमें स्कूलों और दफ्तरों को बंद करना, लोगों की आवाजाही पर पाबंदी लगाना और यहां तक कि सैन्य बलों को तैनात करना ताकि रेगुलर इमर्जेंसी सेवाओं को सपोर्ट किया जा सके."
लक्षण
संक्रमण से लड़ने के लिए शरीर की कोशिश के तौर पर इम्यून सिस्टम से किसी बीमारी के संकेत. कोरोना वायरस का मुख्य लक्षण बुखार, सूखी खांसी और सांस लेने में दिक्कत होना है."
टीका
ऐसा इलाज जिससे शरीर एंटीबॉडीज पैदा करता है, जो कि बीमारी से लड़ता है और आगे के संक्रमण से लड़ने की इम्युनिटी देता है."
वेंटीलेटर
ऐसी मशीन जो कि ऐसे वक्त पर शरीर के लिए सांस लेने का काम करती है जब फ़ेफ़ड़े काम करना बंद करने लगते हैं.
विषाणु
एक छोटा सा एजेंट जो कि किसी जीवित सेल के भीतर अपनी कॉपी बना लेता है. वायरस की वजह से ये सेल मरने लगती हैं और शरीर की सामान्य केमिकल प्रक्रियाओं को अवरुद्ध कर देती हैं जिससे बीमारी हो जाती है.
मुख्य कहानी नीचे जारी है
ट्रांसलेटर
इन सभी शब्दों का क्या मतलब है?
इसी तरह महाराष्ट्र के कोल्हापुर से झारखंड के बोकारो के लिए चली श्रमिक स्पेशल में ओडिशा के यात्रियों को भी चढ़ा दिया गया.
घंटों विलंब से चल कर इस ट्रेन के राउरकेला और झारसुगुड़ा स्टेशनों पर ठहराव के बावजूद नहीं उतरने देने के बाद इन यात्रियों ने झारखंड के चक्रधरपुर और राँची डिविजनों के दो रेलवे स्टेशनों के पास चेन पुलिंग कर दी और क़रीब 500 यात्री ट्रेन से उतर गए.
फिर झारखंड सरकार के अधिकारियों ने उन्हें बसों से ओडिशा भेजा.
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दरअसल, ये घटनाएँ सिर्फ उदाहरणों तक ही सीमित नहीं हैं. अधिकतर श्रमिक स्पेशल ट्रेनें लेट चल रही हैं. उनमें सवार यात्रियों को वक़्त पर पानी-खाना नहीं मिल पा रहा है.
रेलवे अधिकारी आधिकारिक तौर पर इस मुद्दे पर कुछ भी नहीं बोल रहे.
हालांकि, नाम गोपनीय रखने की शर्त पर एक वरिष्ठ रेलवे अधिकारी ने कहा कि रेलवे अधिकारियों और राज्य सरकार के अधिकारियों के बीच तालमेल का अभाव है. ट्रेनें बगैर सूचना खोल दी जा रही हैं. उसके बाद संबंधित डिविज़न को इसकी ख़बर दी जा रही है. इस कारण सारी दिक़्क़तें हैं. उन्होंने कहा कि ट्रैक पर ट्रेनों का नहीं बल्कि अव्यवस्था का परिचालन हो रहा है.
अब चाहे ये ट्रेनें लापरवाही की वजह से या अन्य जिस किसी भी वजह से अपने गंतव्य तक पहुँचने में तय समय से करीब तीन गुना अधिक समय पहुँचाने में ले रही हों इनमें सफ़र कर रहे यात्रियों का एक तरफ जहाँ गर्मी से बुरा हाल हो रहा है, वहीं खाने-पीने में भी उन्हें बहुत परेशानी हो रही है.
कोरोना वायरस क्या है?लीड्स के कैटलिन सेसबसे ज्यादा पूछे जाने वाले
बीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता?बाइसेस्टर से डेनिस मिशेलसबसे ज्यादा पूछे गए सवाल
बाीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.