मोदी 2.0 अपने पहले के पांच सालों से कैसे अलग है?

नरेंद्र मोदी

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला साल पूरे होने पर विदेश नीति में पहले कार्यकाल के मुक़ाबले में कोई फ़र्क़ आया है?

और क्या दूसरे कार्यकाल के बचे हुए चार सालों में कोरोना वायरस की महामारी के बाद की दुनिया में भारत एक वर्ल्ड पावर बन कर उभर सकेगा जैसा कि दावा किया जा रहा है?

किसी भी मुल्क की विदेश नीतियों में एक साल के अरसे में कोई भारी बदलाव नहीं आता है. लेकिन एक साल की अवधि में कुछ नए रुझानों को टटोला जा सकता है.

मोदी 2.0 के पहले साल के रुझान कुछ इस तरह से हैं.

- आत्मनिर्भरता की पुकार

- पीएम के विदेशी दौरों में भारी कमी

- कश्मीर पर पाकिस्तान से बढ़ा तनाव

- सीएए पर विदेश में चिंता

- दिल्ली में दंगों पर विदेश में कड़ी आलोचना

- राष्ट्रपति ट्रंप का भारत का पहला दौरा

- भारत में इस्लामोफ़ोबिया को लेकर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में तीखी प्रतिक्रियाएं

- पड़ोसी देशों से बिगड़ते रिश्ते

- कोरोना महामारी के दौर की कूटनीति

नरेंद्र मोदी

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आत्मनिर्भरता

मोदी 2.0 के एक साल पूरे होने से कुछ पहले प्रधानमंत्री की ज़बान पर एक नया शब्द आने लगा है- आत्मनिर्भरता. उन्होंने 12 मई को देश के नाम 33 मिनट के संबोधन में आत्मनिर्भरता और आत्मनिर्भर शब्द का इस्तेमाल 33 बार किया. आत्मनिर्भरता को स्वदेशी से जोड़ कर देखा जाता है.

बाहर से ये बदलती आर्थिक नीतियों की तरफ़ इशारा करता है लेकिन आज की इस परस्पर जुड़ी हुई दुनिया में कोई बड़ी अर्थव्यवस्था संरक्षणवादी नीति अपना कर कामयाब नहीं हो सकती. कोरोना वायरस से हुई बर्बादी के बाद एक नई विश्व व्यवस्था की स्थापना की संभावना की बातें की जा रही हैं.

आत्मनिर्भरता को अपनाने के बाद भारत के पूर्व विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर के विचार में ये एक ऐतिहासिक शिफ़्ट है, "(नए) वर्ल्ड ऑर्डर का मतलब निर्भरता नहीं होना चाहिए. जिस दिन निर्भर हो गए उस दिन नई आर्थिक ग़ुलामी आ जाएगी. हम पहले गेहूं, चावल और ग़ल्ला मंगाते थे (विदेश से). जब 1967-68 में बहुत बड़ा अकाल पड़ा था तो हम घुटनों पर आ गए थे. हमारे किसानों ने खाद्यान्न उत्पादन में हमें आत्मनिर्भर बनाया तभी तो हम आज अपना सर उठा कर चलते हैं."

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वो आगे दवाओं में भारत की आत्मनिर्भरता की मिसाल देते हुए कहते हैं, "इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री हैं. उन्होंने हिंदुस्तान से सभी निर्यात पर प्रतिबन्ध लगाया हुआ था. लेकिन उन्होंने बग़ैर किसी को बताए भारत से दवाइयां खरीदी."

भारत के विदेश सचिव हर्ष वर्धन श्रींगला ने हाल में नेशनल डिफेंस कॉलेज के अफ़सरों को संबोधित करते हुए कहा, "एक तरफ़ हम दुनिया से जुड़े हैं लेकिन हमें वर्तमान संकट से उबरने के लिए आत्मनिर्भर बनने की भी जरूरत है, जैसा कि हाल ही में राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भरता की बात की थी. जब हम आत्मनिर्भरता की बात करते हैं तो हमारा मतलब ये नहीं है कि हम आत्मकेंद्रित या दुनिया से कट कर रहने लगेंगे. एक आत्मनिर्भर भारत स्वाभाविक रूप से एक अधिक अंतरराष्ट्रीयवादी भारत होगा."

मोदी विदेशी नेताओं के साथ

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विदेश दौरे

मोदी सरकार के पहले पांच साल पर नज़र डालें तो ये कार्यकाल प्रधानमंत्री के विदेश दौरों से भरा पड़ा है. पिछले साल भारी बहुमत से सत्ता में लौटने के बाद से पिछले एक साल में प्रधानमंत्री की विदेशी यात्राओं में भारी कमी आई है. एमजे अकबर के अनुसार पहले कुछ साल नीतियों में जो कमियां थीं उन्हें ठीक करने में लग गए.

मोदी 1.0 में विदेश राज्य मंत्री रह चुके अकबर कहते हैं कि नेपाल और खाड़ी जैसे पड़ोसी देशों में सालों से भारत के किसी प्रधानमंत्री का दौरा नहीं हुआ था. मोदी 1.0 के दौरान इन रिश्तों को मज़बूत किया गया. इसके अलावा प्रधानमंत्री ने अधिकतर उन देशों की यात्रा की जिनसे भारत के पारम्परिक संबंध थे या उन देशों का जहाँ भारत के प्रधानमंत्रियों ने दौरा नहीं किया था.

विदेशी मामलों पर रिपोर्टिंग करने वाले फ़्रांस के पत्रकार मुसिन एनैमि के अनुसार, "मोदी की विदेश यात्राओं ने भारत को वर्ल्ड मैप पर लाकर खड़ा कर दिया. भारत से छोटे देशों की आशाएं बढ़ गईं. हमारे देश का फ़्रांस से संबंध घनिष्ठ हुआ और आपसी व्यापार में तेज़ी से बढ़ोतरी होने लगी."

ब्रिटेन की पत्रकार वेनेसा वारीक भारत की विदेश नीतियों पर सालों से लिखती आ रही हैं.

वो कहती हैं मोदी के पहले पांच सालों में विदेश यात्राओं की वजह से वर्ल्ड स्टेज पर उनकी चर्चा होने लगी. प्रवासी भारतीयों ने उनका जिस तरह सभी देशों में जिस धूम-धाम से स्वागत किया वो सराहनीय था. लेकिन पिछले एक साल में उनकी यात्राएं कम हो गईं और भारत के अंदर हुई कुछ घटनाओं से उनकी साख पर असर पड़ा है."

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कश्मीर

पिछले साल पांच अगस्त को जम्मू कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जे को ख़ारिज करने और पूरे राज्य लॉकडाउन के अंतर्गत लाने के बाद दुनिया भर में कश्मीर एक बार फिर चर्चा में आया.

पाकिस्तान ने आपत्ति जताई और संयुक्त राष्ट्र गया लेकिन बड़े देशों ने पाकिस्तान की न सुनी.

अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इसकी चर्चा कुछ दिनों तक जारी रही और कई इंटरनेशनल मीडिया आउटलेट्स ने मोदी सरकार की जम कर आलोचना भी की.

खुद भारत के अंदर इसे मोदी सरकार की एक बड़ी उपलब्धि की तरह से देखा गया.

मोदी और इमरान ख़ान

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सीएए पर विदेश में क्या कहा गया

दिसंबर में संसद द्वारा पारित नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) की विपक्ष ने जम कर आलोचना की और कहा कि ये क़ानून मुस्लिम विरोधी और संविधान के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों का उल्लंघन है.

यह भी आशंका जताई गयी कि एनआरसी (नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर) और एनपीआर (राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर) के साथ इस्तेमाल किए जाने वाले सीएए का इस्तेमाल मुसलमानों को टारगेट करने के लिए किया जा सकता है।

इस को लेकर मोदी सरकार पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी दबाव बनने लगा. संयुक्त राष्ट्र ने सीएए के स्पष्ट भेदभावपूर्ण प्रावधानों की असामान्य रूप से तीखे शब्दों में निंदा की.

भारत ने जवाब में कहा कि ये भारत का "आंतरिक मामला" है और किसी विदेशी सरकार या संस्था को इसके अंदरूनी मामलों में दखल देने की ज़रूरत नहीं

अंतरराष्ट्रीय मामलों की एक रूसी कौंसिल के लिए लिखते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर नरेंद्र नागरवाल कहते हैं कि इस क़ानून से विदेश में भारत की छवि ख़राब हुई है.

"अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने सीएए के बाद भारत की तय विदेश नीति और वैश्विक स्थिति में क्या नुकसान हुआ है इसका जायज़ा लिया. महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि भारत लगातार वैश्विक अलगाव की ओर बढ़ रहा है, और इसके विश्वसनीय सहयोगियों ने अल्पसंख्यकों के अधिकारों के प्रति देश की संवैधानिक प्रतिबद्धता पर भी सवाल उठाया है."

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दिल्ली दंगे और विदेश में हुई प्रतिक्रियाएं

मलेशिया के मुहातिर मुहम्मद ने प्रधानमंत्री की हैसियत से सीएए और दिल्ली में हुए दंगों पर भारत की खुल का आलोचना की. उन्हों ने कश्मीर के मुद्दे पर बोल कर मोदी सरकार को पहले ही नाराज़ कर रखा था.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने दिल्ली के दंगों के बारे में ट्वीट किया जिससे मोदी सरकार की सेहत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा.

लेकिन ईरान और तुर्की ने इसका कड़ा विरोध किया और बांग्लादेश में विरोध प्रदर्शन निकाले गए

इस बात को रेखांकित करने के लिए कि भारत में उनकी मुस्लिम विरोधी छवि एक घरेलू राजनीतिक साज़िश है नरेंद्र मोदी ने खाड़ी देशों के साथ अपने अच्छे संबंधों पर हमेशा ज़ोर दिया है.

उनका कहना है कि भारत के इतिहास में खाड़ी देशों के साथ सबसे अच्छे संबंध उनके काल में हैं और मालदीव और बहरीन ने उन्हें अपना सर्वोच्च सम्मान दिया है.

लेकिन दिल्ली दंगों और फिर कोरोना वायरस के समय मुसलमानों को टारगेट करने पर खाड़ी देशों में तीखी आलोचना हुई है. भारत सरकार इसे गंभीरता से लिया है या नहीं इसके संकेत ठीक से नहीं मिले हैं.

मोदी और ट्रंप

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राष्ट्रपति ट्रंप का भारत का पहला दौरा

यात्रा एक दिन की थी लेकिन 25 फ़रवरी को उनकी भारत की यात्रा मोदी 2.0 के पहले साल की बड़ी कामयाबियों में से एक है.

वाशिंगटन में भारतीय मूल के पत्रकारों के मुताबिक़ ट्रंप के इस दौरे को भारत की कूटनीति की जीत की तरह से देखा जा सकता है. वहां सालों से रह रहे एक पत्रकार चिदानंद रजघट्टा ने अपने कॉलम में इसे मोदी की उपब्धि बताया.

इस दौरे में रक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर भी किए गए जिसकी घोषणा राष्ट्रपति ट्रंप ने खुद दी, "आज हमने भारत के लिए अपाचे और एमएच-60 आर हेलीकॉप्टरों सहित तीन अरब डॉलर से अधिक अमरीकी रक्षा उपकरण खरीदने के लिए समझौतों के साथ अपने रक्षा सहयोग का विस्तार किया."

उन्होंने आगे कहा कि ये सौदे "हमारी संयुक्त रक्षा क्षमता को बढ़ाएंगे क्योंकि हमारे आतंकवादी एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं."

लेकिन अहमदाबाद के एक बड़े क्रिकेट स्टेडियम में उनका स्वागत हज़ारों भारतीयों ने तब किया जब दुनिया के कई देशों में कोरोना वायरस फैल चुका था.

इसे लेकर दोनों नेताओं की आलोचना भी हुई. भारतीय प्रधानमंत्री मोदी और अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप एक दूसरे को क़रीबी दोस्त कहते हैं लेकिन मोदी अमरीकी राष्ट्रपति की नाराज़गी से भी वाक़िफ़ हैं.

डोनल्ड ट्रंप उस समय भारत से नाराज़ हो गए जब भारत ने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन की निर्यात पर प्रतिबन्ध लगा दिया. ट्रंप ने बदला लेने की धमकी भी दे डाली.

मोदी सरकार ने अमरीका को दवाई भेजने का तुरंत एलान किया और इस तरह से मामला दब गया.

वीडियो कैप्शन, भारत सरकार ने विदेशों में फंसे भारतीयों को लाने का अभियान चलाया है.

खाड़ी देशों में खटास

कोरोना वायरस के फैलाव में तब्लीग़ी जमात की भूमिका के बाद होने वाली मुस्लिम विरोधी घटनाओं पर खाड़ी देशों से तीखी प्रतिक्रियाएं आईं.

सोशल मीडिया पर मुस्लिम और इस्लाम विरोधी कमेंट लिखने वाले कुछ भारतीय हिन्दुओं को नौकरियों से निकाल दिया गया.

वहां के शाही परिवार की एक सदस्य शहज़ादी हिन्द ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि उन्हें इन घटनाओं पर दुःख होता है क्योंकि उनकी नज़र में भारत एक विशाल लोकतंत्र है और इस तरह की घटनाओं से उनके देशवासियों को धक्का लगा है.

वो कहती हैं, "दोनों देशों के बीच रिश्तों में खटास पर मैं टिप्पणी नहीं करूँगी मगर यहाँ के निजी व्यापारी और कॉरपोरेट के लोग ऐसे बाहरियों को नौकरियां नहीं देंगे जिन पर मुस्लिम या इस्लाम विरोधी होने का इल्ज़ाम है."

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेपाल के प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली

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पड़ोसी देशों से बिगड़ते रिश्ते

मोदी 2.0 के पहले साल का अंत पड़ोसी देश नेपाल और चीन के साथ संबंधों में बिगाड़ से हो रहा है.

नेपाल ने एक नया राजनीतिक नक्शा जारी किया है जिसमें दावा किया गया है कि कालापानी, लिम्पियाधुरा और उत्तराखंड के लिपुलेख नेपाल में हैं.

भारत ने इस पर आपत्ति जताते हुए नेपाल से ज़ोर देकर कहा है कि वो भारत के इलाक़ों को अपने नक़्शे में शामिल करने की गुस्ताख़ी न करे.

भारत ने नेपाल से दोबारा बातचीत की पेशकश भी की है.

नेपाल ने ये क़दम भारतीय रक्षा मंत्रालय द्वारा उस सड़क के उद्धघाटन के बाद उठाया है जो भारत और चीन को जोड़ता है. जिन इलाक़ों से होकर ये सड़क गुज़रती है, नेपाल का दावा है कि वो इलाक़े उसके हैं.

भारत और चीन की सरहदों पर एक बार फिर से खटपट शुरू हो गई है जिससे भारत में चिंता है.

वीडियो कैप्शन, कोरोना काल में पड़ोस का हाल

मोदी 2.0 के पहले साल के अंत में एक अच्छी ख़बर ये मानी जा सकती है कि मालदीव ने इस्लामी देशों के संगठन ओआईसी में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भारत का साथ दिया है.

लेकिन इस सच से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि मोदी 2.0 के बचे सालों में पड़ोसी देशों से, ख़ास तौर से नेपाल और चीन से संबंधों को सुधारना बड़ी चुनौतियों में से एक होगी.

प्रधानमंत्री ने इस महामारी के दौरान G-20 देशों से संपर्क बनाया और पड़ोसी देशों से भी बात की. इसके अलावा विदेश सचिव के अनुसार भारत ने कोरोना महामारी के रोकथाम के लिए 133 देशों को दवाइयां सप्लाई की है.

मोदी सरकार के बचे चार सालों में उनकी कोशिश यही होगी कि आने वाले समय में विदेश नीतियों में लचक दिखाएं.

एमजे अकबर कहते हैं कि 21वीं शताब्दी में भारत उन गिने-चुने फ्रंट लाइन देशों में होगा जो दुनिया का नेतृत्व करेंगे और शायद यही प्रधानमंत्री की अगले चार सालों में कोशिश होगी.

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