कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोती लाल वोरा को झटका, संपत्ति कुर्क करने का आदेश

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प्रवर्तन निदेशालय ने शनिवार को अपने एक बयान में कहा कि एसोसिएट जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) और कांग्रेस पार्टी के नेता मोती लाल वोरा की 16.38 करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क करने का आदेश जारी किया गया है.
अधिकारियों ने बताया कि यह कार्रवाई मनी लॉन्ड्रिंग के एक केस के तहत की गई है.
प्रवर्तन निदेशालय ने बताया कि इसके तहत मुंबई में एक नौ-मंज़िला इमारत है, जिसमें दो बेसमेंट भी हैं. यह पूरा निर्माण क़रीब 15 हज़ार स्क्वायर मीटर में बना हुआ है.
इसकी कुल क़ीमत 120 करोड़ रुपए है. इसमें से 16.38 करोड़ रुपए की संपति ज़ब्त की गई है. प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत यह प्रोविज़नल अटैचमेंट ऑर्डर कांग्रेस नेता मोती लाल वोरा और एजेएल के नाम जारी किया गया है. मोती लाल वोरा एजेएल के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर हैं.

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क्या है एजेएल?
कांग्रेस के पैसे से एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड नाम की कंपनी 1938 में बनी और तीन अख़बार चलाती थी- नेशनल हेरल्ड, नवजीवन और क़ौमी आवाज़. एक अप्रैल 2008 को ये अख़बार बंद हो गए.
आज़ादी के बाद 1956 में एसोसिएटेड जर्नल को ग़ैर व्यावसायिक कंपनी के रूप में स्थापित किया गया और कंपनी एक्ट धारा 25 के अंतर्गत इसे कर मुक्त भी कर दिया गया.
वर्ष 2008 में 'एजेएल' के सभी प्रकाशनों को निलंबित कर दिया गया और कंपनी पर 90 करोड़ रुपए का क़र्ज़ भी चढ़ गया.
फिर कांग्रेस नेतृत्व ने 'यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड' नाम की एक नई ग़ैर व्यावसायिक कंपनी बनाई, जिसमें सोनिया गांधी और राहुल गांधी सहित मोतीलाल वोरा, सुमन दुबे, ऑस्कर फर्नांडिस और सैम पित्रोदा को निदेशक बनाया गया.
इस नई कंपनी में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के पास 76 प्रतिशत शेयर थे जबकि बाक़ी के 24 प्रतिशत शेयर अन्य निदेशकों के पास थे.
कांग्रेस पार्टी ने इस कंपनी को 90 करोड़ रुपए बतौर ऋण भी दे दिया. इस कंपनी ने 'एजेएल' का अधिग्रहण कर लिया.
इससे पहले भाजपा के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने साल 2012 में एक याचिका दायर कर कांग्रेस के नेताओं पर 'धोखाधड़ी' का आरोप लगाया था.

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उन्होंने अपनी याचिका में कहा था कि 'यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड' ने सिर्फ़ 50 लाख रुपयों में 90.25 करोड़ रुपए वसूलने का उपाय निकाला जो 'नियमों के ख़िलाफ़' है.
सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर सुनवाई के दौरान राहुल गांधी और सोनिया गांधी को अदालत में पेश भी होना पड़ा था.
याचिका में आरोप था कि 50 लाख रुपए में नई कंपनी बना कर 'एजेएल' की 2000 करोड़ रुपए की संपत्ति को 'अपना बनाने की चाल' चली गई.
दिल्ली की एक अदालत ने इस मामले में चार गवाहों के बयान दर्ज किए और 26 जून, 2014 को अदालत ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी सहित नई कंपनी में निदेशक बनाए गए सैम पित्रोदा, सुमन दुबे, ऑस्कर फर्नांडिस और मोतीलाल वोरा को पेश होने का समन भेज दिया था.
अदालत ने 'यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड' के सभी निदेशकों को 7 अगस्त, 2014 को अपने सामने पेश होने का निर्देश दिया.
मगर कांग्रेस के नेताओं ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की, जिस पर सुनवाई के बाद निचली अदालत की ओर से जारी समन पर रोक लगा दी गई.
कांग्रेस के नेताओं ने अदालत में दलील दी कि 'यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड' नाम की संस्था को 'सामजिक और दान करम' के कार्यों के लिए बनाया गया है.
नेताओं की यह भी दलील थी कि 'एजेएल' के शेयर स्थानांतरित करने में किसी 'ग़ैर क़ानूनी' प्रक्रिया को 'अंजाम नहीं दिया गया' बल्कि यह शेयर स्थानांतरित करने की 'सिर्फ़ एक वित्तीय प्रक्रिया' थी.

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