सऊदी अरब से अमरीका ने अपना समर्थन वापस ले लिया तब क्या होगा?

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अक्टूबर 2018 में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने मिसीसिपी में एक रैली को संबोधित करते हुए कहा था कि सऊदी अरब के किंग बिना अमरीकी सैनिकों के समर्थन के सत्ता में दो हफ़्ते भी नहीं रह सकते हैं.
पिछले हफ़्ते एक बार फिर से ख़बर आई कि अमरीका सऊदी से एंटी मिसाइल सिस्टम हटाने जा रहा है. सऊदी और अमरीका के बीच की इस तनातनी के पीछे तेल है.
व्हॉइट हाउस ने कहा है कि राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और सऊदी अरब के किंग सलमान ने शुक्रवार को फ़ोन पर बात की और दोनों देशों के बीच मज़बूत रक्षा साझेदारी के संकल्प को दोहराया.
दोनों राष्ट्र प्रमुखों के बीच यह बातचीत तेल उत्पादन को लेकर जारी तनाव के बीच हुई है.
अभी ख़बर आई थी कि अमरीका सऊदी अरब से अपनी दो पैट्रीअट एंटी-मिसाइल बैटरी हटाने जा रहा है जो ईरान से सुरक्षा के लिए थी.
पिछले महीने ट्रंप ने सऊदी अरब को इस बात पर राज़ी किया था कि वो तेल उत्पादन में कटौती करे.
कोरोना वायरस के संक्रमण की शुरुआत में सऊदी ने तेल का उत्पादन बढ़ा दिया था जिससे अमरीकी तेल कंपनियों पर काफ़ी दबाव था.

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तेल के मसलों पर दबाव
व्हॉइट हाउस के प्रवक्ता जड डीर ने कहा, "दोनों नेताओं के बीच वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में स्थिरता की अहमियत को लेकर सहमति है. इसके अलावा दोनों नेताओं ने रक्षा साझेदारी की अहमियत को भी रेखांकित किया. राष्ट्रपति ट्रंप और किंग सलमान के बीच इलाक़े के जटिल और द्विपक्षीय मुद्दों पर भी बात हुई."
हालांकि व्हॉइट हाउस के बयान में सऊदी अरब में लगी पैट्रीअट मिसाइल का कोई ज़िक्र नहीं था.
अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने शुक्रवार को इस बात की पुष्टि की थी कि अमरीका अपनी मिसाइल सऊदी अरब से हटा सकता है.
पॉम्पियो ने बाद में ये भी जोड़ा था कि इसका मतलब यह नहीं है कि अमरीका सऊदी अरब के समर्थन में कोई कमी करने जा रहा है या यह तेल के मसलों पर दबाव बनाने के लिए है.
अमरीकी विदेश मंत्री ने ये भी कहा था कि इसका मतलब यह भी नहीं है कि ईरान पूरे इलाक़े में शांति और स्थिरता के लिए ख़तरा नहीं है.

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ट्रंप की चेतावनी
पॉम्पियो ने बेना शापिरो के रेडियो शो में कहा था, "पैट्रीअट मिसाइल बैटरी सीमित समय के लिए लगाई गई थी. अब इसे वापस लाने की ज़रूरत है. यह सेना का सामान्य फ़ैसला है."
सऊदी अरब ने ट्रंप से फ़ोन पर हुई बातचीत को लेकर अपने बयान में कहा है कि अमरीका ने अपने सहयोगियों के हित और सुरक्षा को लेकर प्रतिबद्धता जताई है. ट्रंप ने यमन संकट में राजनीतिक समाधान की बात भी दोहराई है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़ अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन-सलमान को फ़ोन कर कहा था कि वो तेल उत्पादन में कटौती करें नहीं तो सऊदी से अमरीकी सैनिकों को वापस बुला लिया जाएगा. ट्रंप ने कहा था कि वो कांग्रेस में सऊदी के ख़िलाफ़ बिल पास होने से नहीं रोक पाएंगे.
रॉयटर्स के अनुसार, "जब अमरीका की ओर से सऊदी अरब और रूस के बीच जारी तेल युद्ध को ख़त्म करने के लिए प्रयास किए जा रहे थे तभी अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की ओर से मोहम्मद बिन सलमान को ऐसा संदेश भेजा गया जिससे वे बुरी तरह हिल गए. अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सऊदी अरब के नेता मोहम्मद बिन सलमान को एक अंतिम चेतावनी जारी की थी. ये चेतावनी ट्रंप ने स्वयं सलमान के साथ फोन वार्ता के दौरान दी थी."
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अमरीकी धमकी का असर?
इस पूरे घटनाक्रम से अवगत एक सूत्र ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बीते दो अप्रैल को हुई इस फ़ोन वार्ता के बारे में बताया है.
इस फ़ोन कॉल में राष्ट्रपति ट्रंप ने सलमान से कहा कि अगर तेल निर्यातक देशों का संगठन (ओपेक) अपने तेल उत्पादन स्तर में कमी नहीं लाता है तो उनके पास अमरीकी सांसदों को वह क़ानून पास करने से रोकने की शक्ति नहीं होगी जिससे सऊदी अरब में तैनात अमरीकी सैन्य टुकड़ियां वापस बुलाई जा सकती हैं.
इस पूरे मामले में अब तक ये सामने नहीं आया था कि अमरीका ने सऊदी अरब पर दबाव बनाने के लिए 75 साल पुराने रणनीतिक गठबंधन को तोड़ने की धमकी को मुख्य रूप से इस्तेमाल किया.
अमरीका की ओर से बनाए जा रहे इस दबाव के चलते तेल की आपूर्ति कम करने के लिए एक वैश्विक समझौता हुआ है.
इस समझौते के पीछे कोरोना वायरस के कारण लगाया गया लॉकडाउन ज़िम्मेदार है क्योंकि आवाजाही घटने की वजह से दुनिया भर में तेल की खपत में भारी कमी आई है. इससे तेल के दामों में भी भारी गिरावट जारी है.
अमरीकी प्रशासन के लिहाज़ से ये समाझौता एक रणनीतिक जीत है. राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से सैन्य समर्थन वापस लेने की बात ये समझौता होने से दस दिन पहले क्राउन प्रिंस से कही गई थी.

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जब हिल गए सलमान
रॉयटर्स के अनुसार ट्रंप की धमकी सुनकर सऊदी अरब के नेता इस कदर हिल गए थे कि उन्होंने अपने सभी सहायकों को कमरे से बाहर जाने का निर्देश दिया ताकि वह ट्रंप से अकेले में बात कर सकें.
इन प्रयासों से पता चलता है कि अमरीकी राष्ट्रपति कोरोना वायरस के दौर में जन्मे इस तेल संकट के दौरान अमरीकी तेल उद्योग के हितों की रक्षा करने के लिए कितने गंभीर हैं.
सामान्यत: तेल संगठनों को लेकर राष्ट्रपति ट्रंप का रुख आलोचनात्मक रहा है. वे तेल संगठनों की ओर से आपूर्ति में कमी लाने की निंदा करते आए हैं क्योंकि उसकी वजह से अमरीकी जनता को ऊंचे दामों में गैसोलिन ख़रीदनी पड़ती है.
लेकिन अब ट्रंप ने अपने पुराने रुख़ में बदलाव करके तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक से आपूर्ति में कमी करने के लिए कहा है.
एक वरिष्ठ अमरीकी अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया है कि अमरीकी प्रशासन ने सऊदी नेताओं को स्पष्ट रूप से सूचना दी कि तेल उत्पादन घटाए बिना "अमरीकी कांग्रेस को वो क़ानून लाने से नहीं रोक सकता है जिसके चलते अमरीकी सैन्य टुकड़ियों की वापसी हो सकती है."
इस वरिष्ठ अधिकारी ने अमरीका से अलग-अलग कूटनीतिक मंचों के रास्ते सऊदी अरब पहुंचे इस संदेश को एक लाइन में बयां किया. उन्होंने कहा है कि अमरीका ने सऊदी अरब से कहा है, "हम आपकी इंडस्ट्री को बचा रहे हैं जब कि आप हमारी इंडस्ट्री को तबाह कर रहे हैं."
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क्या बोले ट्रंप
रॉयटर्स ने बुधवार शाम ट्रंप के साथ एक इंटरव्यू के दौरान ये सवाल पूछा कि क्या उन्होंने मोहम्मद बिन सलमान को अमरीकी सैन्य टुकड़ियां वापस आने को लेकर चेतावनी दी थी.
इस पर ट्रंप ने कहा, "मुझे उनसे ये कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी. मुझे लगता है कि उन्होंने और राष्ट्रपति पुतिन ने बहुत समझदारी का परिचय दिया है. उन्हें पता था कि उनके सामने एक समस्या है और इसके बाद ये (समाधान निकल) आया."
जब ट्रंप से ये पूछा गया कि उन्होंने मोहम्मद बिन सलमान से क्या कहा है तो उन्होंने कहा, "उन लोगों को किसी समाधान तक पहुंचने में दिक्क़त हो रही थी. इसके बाद मेरी उनसे फ़ोन पर बात हुई और तेल उत्पादन में कमी को लेकर समाधान निकल आया."
सऊदी अरब की सरकार ने इस बारे में कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.
लेकिन एक सऊदी अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर रॉयटर्स से कहा है कि इस समाधान में ओपेक देशों और रूसी संगठन के देशों की मर्जी शामिल है.

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क्या बोला सऊदी अरब?
सऊदी अरब और अमरीका के बीच हुई बातचीत पर टिप्पणी करने से इनकार करते हुए इस सऊदी अधिकारी ने बताया कि सऊदी अरब, अमरीका और रूस ने तेल उत्पादन में कमी करने के फैसले में अहम भूमिका निभाई है लेकिन इस समझौते में शामिल 23 अन्य देशों के सहयोग के बिना ये संभव नहीं था.
ट्रंप और मोहम्मद बिन सलमान के बीच बातचीत के एक हफ़्ते पहले अमरीकी रिपब्लिकन सीनेटर केविन क्रेमर और डेन सुलिवेन ने एक विधेयक पेश किया था जिसमें ये शर्त थी कि अगर सऊदी अरब अपना तेल उत्पादन कम नहीं करता है तो अमरीकी सैन्य टुकड़ियों, पेट्रियट मिसाइलों और एंटी मिसाइल डिफेंस सिस्टम को सऊदी अरब से हटा लिया जाए.
रिपब्लिकन सांसदों की ओर से पेश किए गए इस विधेयक को समर्थन भी मिलने लगा था क्योंकि अमरीकी कांग्रेस पहले से ही ग़लत समय पर रूस और सऊदी अरब के बीच जारी तेल की कीमतों को लेकर संघर्ष से नाराज़ है.
सऊदी अरब ने रूस की ओर से एक अन्य ओपेक तेल आपूर्ति करार के उल्लंघन होने पर बीती अप्रैल में तेल की वैश्विक आपूर्ति में बढ़त कर दी थी. इसके बाद 12 अप्रैल को ट्रंप के दबाव में दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों के बीच एक करार हुआ जिसके तहत तेल उत्पादन में कमी लाए जाने का फ़ैसला किया गया.
ओपेक, रूस और अन्य सहयोगी तेल उत्पादक देश प्रति दिन के लिहाज़ से 9.7 मिलियन बैरल प्रति दिन (दस फीसदी वैश्विक उत्पादन) की कमी कर रहे हैं. इसमें से 2.5 मिलियन बैरल प्रति दिन की कमी सऊदी अरब और रूस से आ रही है. इन देशों के बजट का बड़ा हिस्सा तेल और गैस से आने वाले रेवेन्यू से निकलता है.
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गिरावट का दौर जारी
वैश्विक तेल उत्पादन की मात्रा को दस फीसदी से कम करने के समझौते के बावजूद दुनिया भर में तेल कीमतों में कमी होना जारी है.
अमरीका में तेल बेचने वालों ने खरीदारों को भुगतान करके आने वाले दिनों में सिर्फ उतना तेल खरीदने की सलाह दी है जितना कि वे स्टोर कर सकें.
इसी बीच तेल का फ़्यूचर बाज़ार ज़ीरो डॉलर से भी नीचे गिर गया है.
ब्रेंट फ़्यूचर्स नाम की वैश्विक तेल कमोडिटी 15 डॉलर प्रति बैरल तक गिर गई है जो कि साल की शुरुआत में 70 डॉलर प्रति बैरल पर थी.
ये वो स्तर है जो कि साल 1999 में सामने आए तेल के दामों से जुड़े संकट के बाद से नहीं देखा गया है.

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अमरीकी सांसदों का रुख़
आपूर्ति में कमी को लेकर हुआ समझौता आख़िरकार तेल के दामों में बढ़ोतरी कर सकता है क्योंकि दुनिया भर में सरकारों ने लॉकडाउन में ढील देना शुरू कर दिया है. और आवाजाही बढ़ने से तेल की मांग के साथ साथ दामों में भी बढ़त देखी जाएगी.
इस समझौते का असर कुछ भी हो लेकिन एक बात तय है कि इस समझौते ने वैश्विक तेल आपूर्ति पर अमरीकी प्रभाव के बारे में बताया है.
उत्तरी डिकोटा से आने वाले रिपब्लिकन सांसद क्रेमर ने रॉयटर्स को बताया है कि उन्होंने 30 मार्च को सऊदी अरब से अमरीकी सैन्य टुकड़ियों को हटाने के लिए ट्रंप से बात की थी. और इसके तीन दिन बाद ट्रंप ने मोहम्मद बिन सलमान को फ़ोन किया.
जब अमरीकी ऊर्जा मंत्री डेन ब्रुलेटे से ये पूछा गया कि क्या ट्रंप ने सऊदी अरब से अमरीकी सैन्य समर्थन वापस लेने के बारे में बात की थी.
तो उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के पास अमरीकी उत्पादकों के हितों की रक्षा करने के लिए सभी उपाय सुरक्षित हैं. इसमें "उनकी सुरक्षा से जुड़ी ज़रूरतों के लिए हमारा समर्थन" भी शामिल है.
अमरीका और सऊदी अरब के बीच जारी रणनीतिक गठबंधन अमरीकी राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी रूज़वेल्ट और सऊदी किंग अब्दुल अजीज़ बिन सऊद की यूएसएस क्विंसी नाम के समुद्री जहाज (नेवी क्रूज़र) पर हुई थी.
इस मुलाक़ात में अमरीका और सऊदी अरब के बीच एक समझौता हुआ. इस समझौते के तहत अमरीका ने सऊदी तेल भंडार के बदले अपने सैनिक तैनात करने की बात तय हुई थी.
फिलहाल सऊदी अरब में तीन हज़ार सैन्य टुकड़ियां मौजूद हैं. और अमरीकी नौसेना का पांचवा बेड़ा इस क्षेत्र से होने वाले तेल निर्यात की सुरक्षा करता है.

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