कोरोना काल में महिलाएं: रिजॉइस! रिजॉइस! वी हैव नो चॉइस...

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, बिहार से
शारदा देवी पटना के कदमकुआं इलाके में 'नाश्ता' की दुकान लगाती थीं. लेकिन लॉकडाउन के बाद वो घूम-घूम कर अंगूर बेच रही हैं. सुबह 11 बजे ही उनके चेहरे पर थकान पसर गई है जबकि अभी बहुत सारा अंगूर बिकना बाकी है.
शारदा कहती हैं, "एक जगह बैठ कर काम करना थोड़ा आसान था, अब दिन भर घूमना पड़ता है और अंगूर बेचने के लिए चिल्लाना पड़ता है. पूरा शरीर थक जाता है, लेकिन दूसरा उपाय नहीं है."
शारदा की तरह ही बहुत सारी महिलाएं पटना की सड़कों पर अब ठेले पर सब्जी-फल बेचती दिख रही हैं.
ये एक ऐसा दृश्य है जो कोरोना से पहले इस शहर ने कभी नहीं देखा था.
साफ़ है कि कोरोना की इस पूरी त्रासदी ने पहले से ही दोयम दर्जे पर खड़ी महिलाओं के जीवन की मुश्किलों में इज़ाफ़ा किया है.
ऑटो का पहिया रुका, दुनिया बेरंग हुई
शारदा और ऑटो चलाने वाली सरिता को ये मुश्किल की घड़ी एक डोर में बांधती है. पटना शहर में 10 महिलाएं ऑटो चलाती हैं. सरिता उनमें से एक हैं.
21 मार्च तक उनकी बिटिया की दसवीं की परीक्षा के लिए वो उसके सेंटर नालंदा में रहीं और जब पटना वापस लौटीं तो लॉकडाउन हो गया था.
यानी कमाई ठप्प हो गई.
अपने इलाके सिपारा में लोकप्रिय सरिता ने लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में कई संस्थाओं के जरिए कई मज़दूर परिवारों की मदद की. लेकिन अब उनके हाथ खाली हैं और संकट खुद पर है.
सरिता ने फ़ोन पर बताया, "हम दोनों पति पत्नी ऑटो चलाते थे, तब घर का ख़र्च चलता था. राशन कार्ड भी नहीं है कि हम लोग जाकर दुकान से राशन ले लें. हमारा तो ऑटो का पहिया क्या थमा, दुनिया के सारे रंग फीके हो गए."

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उदास पलों में चटकीले रंग
सरिता के लिए जहां दुनिया के सारे रंग फीके हो गए वहीं पूनमश्री इन रंगों के सहारे ही लॉकडाउन की उदासी से उबर रही हैं.
वे थियेटर करती हैं. लोगों से बोलना-बतियाना, उनकी बॉडी लैंग्वेज को सूक्ष्मता से देखना, उनके काम में निखार लाता है.
लेकिन आजकल जब वो सब कुछ बंद है तो उन्होंने रंगों से दोस्ती कर ली है. उनके पति और होली की छुट्टियों के दौरान बेंगलुरु से आया बेटा वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं, तो पूनमश्री खुद पेन्टिंग.
पूनमश्री बताती हैं, "कोरोना जब शुरू हुआ तो मन में बहुत बेचैनी थी. लेकिन अब घर में पड़ी बेकार चीज़ों पर पेन्टिंग कर रही हूं. इस वक्त सभी लोग घर पर हैं, इसलिए खाने की चीज़ों की फरमाइशें भी हैं. मेरी ज़िम्मेदारी बढ़ गई है लेकिन परिवार को काफी दिनों बाद इतने लंबे वक्त तक इकठ्ठा देखने की खुशी भी है."
क्या कोरोना को लेकर कोई डर है? इस सवाल पर पूनम कहती हैं, "कोरोना से क्या होगा, हम ये नहीं जानते. और सच पूछिए तो फिलहाल जानना भी नहीं चाहते."
ये मौका बिन मांगे मिला
अपने बच्चे के साथ लंबे वक्त बाद साथ रहने की खुशी वकील सुधा अम्बष्ठ को भी मिली है. वो बताती है कि उनके बेटे अखिल कीर्ति की प्लेसमेंट हो चुकी है, लेकिन इस दौरान लॉकडाउन हुआ और वो अब घर पर उनके साथ हैं.
पति की मृत्यु के बाद लंबे वक्त से एकल जीवन जी रही सुधा अपनी खुशी को शब्दों में बयां नहीं कर पा रही हैं.
वे कहती हैं, "ये मौका मुझे बिन मांगे मिला है, जिसको मैं पूरी तरीके से जीना चाहती हूं."

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वी हैव नो चॉइस...
पूनमश्री के घर से कुछ दूर ऊषा झा अपने घर में 1970 का मशहूर एल्बम डेजा वू का गाना 'रिजॉइस! रिजॉइस! वी हैव नो चॉइस बट टू कैरी ऑन...' सुन रही हैं. ऊषा बिहार महिला उद्योग संघ की अध्यक्ष हैं. बिहार की 200 से ज़्यादा छोटी-बड़ी महिला उद्यमी इस संगठन से जुड़ी हैं.
ऊषा झा आजकल दुनिया भर की क्लासिक फ़िल्में देख रही हैं और सेहतमंद आदतों को जीवन में अपनाने की कोशिश कर रही हैं.
वे कहती हैं, "क्लासिक फ़िल्म रिसर्च करके बनाई जाती है. आप उससे दुनिया को जानते हैं. जैसे मैं अभी कैथोलिक्स से जुड़ी फ़िल्म देख रही हूं तो धर्म की एक दूसरी धारा को जान रही हूं."
लेकिन फ़िल्मों से जरिए दुनिया को जानने की कोशिश करने वाली ऊषा इस बात से वाकिफ़ है कि आने वाला वक्त महिला उद्यमियों के लिए संकट भरा होगा.
वे कहती हैं, "सरकार को अब महिला उद्यमियों की मदद के लिए कोई पैकेज लाना होगा क्योंकि इन छोटे बड़े उद्योगों को चलाने वाली महिलाओं के साथ रोज़गार पाने वालों की लंबी चेन है."

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व्हाट्सएप से हड़ताली शिक्षकों का मनोबल बढ़ाने की कोशिश
वैसे बिहार राज्य में ये संकट तो अभी शिक्षक भी झेल रहे हैं. फ़रवरी से ही लाखों की संख्या में नियोजित शिक्षक हड़ताल पर हैं और उन्हें वेतन नहीं मिल रहा है.
इस दौरान 62 शिक्षकों की मौत हो चुकी है और शिक्षक संघ का दावा है कि ये मौत आर्थिक तंगी की वजह से हुई है.
नवादा के प्राथमिक विद्यालय, दौलतपुर में पढ़ाने वाली पुष्पा इन हड़ताली शिक्षकों में से एक है.
वे कहती हैं, "इस कठिन वक्त में हड़ताली शिक्षकों का मनोबल बनाए रखना और सबमें संवाद बनाए रखना एक बहुत बड़ी चुनौती है. ये काम हम लोग व्हाट्सएप्प के जरिए कर रहे हैं. बाकी शिक्षक हैं, तो इलाके में ये भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि सबको राशन कार्ड और राशन मिले."

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जादू की झप्पी
इन सबसे इतर कंचनप्रिया कोरोना को लेकर प्रचार कैसेट बना रही हैं. वे बिहार की एकमात्र महिला जादूगर है.
मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले के सकरा प्रखंड की हर पंचायत में उनका कैसेट बज रहा है जिसमें वो लोगों से कोरोना में बचने के उपाय बता रही हैं.
24 वर्षीय कंचनप्रिया ने बीबीसी से कहा, "कुछ वीडियो और कैसेट मैंने जारी किए हैं जिसमें लोगों से तय दूरी बनाकर रखने और घर पर सुरक्षित रहने की अपील की गई है."
लेकिन खुद किसान-मजदूर परिवार से आने वाली कंचनप्रिया के लिए अपने परिवार का राशन, एक बहुत बड़ा सवाल है.
क़रीब 10 साल से जादू का सार्वजनिक मंचन कर रही कंचन कहती हैं, "जादूगरी 'कंटीन्यू' करना मुश्किल है."
संगठित क्षेत्र की महिलाएं ज़्यादा संकट में
ऐसे में ये सवाल उठना लाज़मी है कि कोरोना के बाद महिलाओं की आर्थिक सामाजिक और घरेलू मोर्चे की दुनिया कैसी होगी?

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गौरतलब है कि लॉकडाउन का ये पीरियड ऐसा वक्त भी है जहां एक तरफ घर के पुरुष किचन के काम में अपना हाथ आज़माते सोशल साइट्स पर दिख रहे हैं तो दूसरी तरफ़ महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा के मामले भी लगातार बढ़ रहे हैं.
पटना हाईकोर्ट से उपनिबंधक पद पर रिटायर हुईं और 23 साल से राजनीतिक आर्थिक सामाजिक मसलों पर तलाश नाम की पत्रिका निकाल रही मीरा दत्त कहती हैं, "संकट संगठित क्षेत्र में महिलाओं पर ज़्यादा आएगा. क्योंकि असंगठित क्षेत्र में ज़्यादातर महिलाएं खेतिहर हैं और ये एक ऐसा कार्य है जो निरंतर चल रहा है. आर्थिक रूप से जो संकट महिलाओं के ऊपर आएगा उसका असर सामाजिक, पारिवारिक मोर्चों पर भी दिखेगा."
महिलाओं के फ्रीडम टाइम में कटौती?
लेकिन क्या खाने के लज़ीज़ व्यंजनों के साथ पुरुषों की फ़ेसबुक पर तैर पर रही तस्वीरें परिवार में काम के बंटवारे में भी कोई परिवर्तन लाएगी?
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल सांइसेज, पटना सेंटर के निदेशक पुष्पेन्द्र किसी परिवर्तन की बात को ख़ारिज करते हुए कहते हैं, "ये घर में बैठे लोगों की अपनी ऊब को मिटाने के लिए अलग अलग एक्टिविटी करने जैसा है. और इससे पितृसत्ता के ढांचे में कोई बहुत बदलाव भी नहीं आने वाला. इसके उलट इस पूरे लॉकडाउन पीरियड में स्त्रियों के ऊपर दबाव बढ़ा है. एक तरफ उनका फ्रीडम टाइम घट गया है तो दूसरी तरफ उनके साथ हिंसा बढ़ी है."




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