कोरोना: कश्मीर के ये शख़्स अपनी फ़ैक्टरी में बना रहे हैं पीपीई किट

- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना वायरस फैलने के दौरान स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है. ये फ्रंट लाइन पर काम करने वाले वो लोग हैं जिनका सीधे कोरोना के मरीज़ों से संपर्क होता है.
ऐसे में डॉक्टर, नर्स और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के लिए पीपीई (पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्यूपमेंट) किट की कमी को लेकर कई बार चिंता जताई गई है. सरकार भी इस कमी को पूरा करने की लगातार कोशिश कर रही है.
लेकिन, इस काम में आम लोगों के सहयोग से कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ लड़ाई को और मज़बूती मिल गई है.
ऐसा ही सहयोग दे रहे हैं जम्मू-कश्मीर में सोपोर के रहने वाले मोहम्मद मुज़फ़्फ़र बाबा जिन्होंने अपनी कपड़ों की फ़ैक्ट्री को पीपीई किट बनाने वाली फ़ैक्ट्री में तब्दील कर दिया है.
पीपीई का इस्तेमाल वायरस के संक्रमण से बचने के लिए होता है. इसमें फुल बॉडी सूट, मास्क, दस्ताने, जूते और पहनने वाले अन्य सुरक्षात्मक उपकरण आते हैं.
अब वो स्वास्थ्यकर्मियों के लिए रोज़ाना पीपीई किट बनाते हैं और उन्हें अस्पतालों तक पहुंचाते हैं. इस किट में हो फुल बॉडी सूट और सर्जिकल व कपड़े के मास्क बनाते हैं. फिर इन्हें वो सोपोर और बारामूला के अस्पतालों में पहुंचाते हैं.
मोहम्मद बाबा की सोपोर में एक कपड़ों की फ़ैक्ट्री है ‘बाबा रेडीमेड एंड स्कूल यूनिफॉर्म’ और वो ‘कौशर ब्रांड’ से कपड़े बनाते हैं.
कैसे हुई शुरुआत

34 साल के मोहम्मद मुज़फ्फ़र बाबा ने अपनी कपड़ों की फ़ैक्ट्री को पीपीई किट की फ़ैक्ट्री में बदलने का फ़ैसला एक डॉक्टर से मुलाक़ात के बाद लिया.
वैसे तो मोहम्मद बाबा क़रीब पाँच सालों से कपड़ों के कारोबार में हैं. वह आमतौर पर स्कूल यूनिफॉर्म और स्पोर्ट्स वियर बनाया करते थे. लेकिन, लॉकडाउन के बाद उन्हें फ़ैक्ट्री को बंद करना पड़ा.
फिर उनकी मुलाक़ात एक डॉक्टर से हुई जिन्होंने कोविड-19 के दौरान पीपीई किट नहीं पहना हुआ था. उन्हें पता चला कि अचानक लॉकडाउन होने से पीपीई किट की आपूर्ति में दिक्क़तें आ रही हैं.
मोहम्मद बाबा ने बताया, “लॉकडाउन के तीन दिनों बाद मैं एक डॉक्टर से मिला था. उन्होंने ये सुरक्षात्मक गाउन (फुल बॉडी सूट) नहीं पहना था. पीपीई किट संक्रमण से बचने के लिए ज़रूरी मानी जाती है लेकिन उसकी उपलब्धता कम थी.”
“तब मैंने सोचा कि क्यों ना इस बुरे दौर में कुछ ऐसा काम किया जाए जिससे हमारे डॉक्टर और नर्स की मदद हो सके. हमारे पास हुनर है और कपड़े बनाने का सेटअप भी तो हम कोशिश करके कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई में अपना योगदान दे सकते हैं.”
मोहम्मद बाबा फ़िलहाल वॉटरप्रूफ फुल बॉडी सूट बनाते हैं जिन्हें धोकर या कीटाणुरहित करके फिर से इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन उनके काम की शुरुआत डिस्पोज़ेबल गाउन से हुई थी.

मोहम्मद बाबा बताते हैं कि उन्होंने डॉक्टरों से बात करके पीपीई किट का डिज़ाइन तैयार किया जिसमें दो से तीन दिन लग गए. डॉक्टरों को ये डिज़ाइन पसंद भी आया. उनका कहना था पीपीई किट का बेसिक मक़सद होता है संक्रमण से बचाना और एक बाहरी आवरण तैयार करना. ऐसे में ये गाउन इस काम को पूरा कर रहा था.
वह बताते हैं कि इस काम में बारामूला के डिप्टी कमिश्नर से भी मदद मिली. उनके सहयोग से फैक्ट्री में आने वाले कामगारों के लिए पास ज़ारी हो पाए ताकि वो लॉकडाउन में आ-जा सकें. उसके बाद काम शुरू हो गया और बढ़ता गया. धीरे-धीरे हमने इसमें और सुधार किया. साथ ही कुछ नया भी करते रहने की कोशिश की.
डिस्पोज़ेबल गाउन से वॉटरप्रूफ किट तक
मोहम्मद बाबा के डिस्पोज़ेबल गाउन के साथ एक समस्या थी कि वो एक बार इस्तेमाल के बाद फेंकने पड़ते थे. वो इसके समाधान की भी कोशिश करने लगे और फिर वॉटरप्रूफ फुल बॉडी सूट (पीपीई किट का हिस्सा) बनाने शुरू किए. ये फुल बॉडी सूट वॉटरप्रूफ हैं यानी पानी अंदर नहीं जाता.
मोहम्मद बाबा का कहना है, “डिस्पोज़ेबल गाउन का इस्तेमाल कम था और लागत ज़्यादा थी. वो ज़्यादा सुरक्षा भी नहीं करता था. इसलिए फिर मैंने वॉटरप्रूफ और धोकर इस्तेमाल होने वाले फुल बॉडी सूट बनाने शुरू किए. हमारी ये कोशिश भी सफल रही और सभी को नया डिजाइन पसंद आया. फिलहाल 90 फीसदी पीपीई किट सोपोर और बारामूला के अस्पतालों में दिए जाते हैं. अगर कोई और आता है जिसे सीधे तौर पर बीमारी का ख़तरा है तो उसे भी उपलब्ध करा रहे हैं.”
सोपोर के ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर डॉक्टर आसिफ़ खांडे ने बीबीसी को बताया कि सोपोर के अस्पतालों में इन पीपीई किट का इस्तेमाल हो रहा है.
उन्होंने बताया, “हम अस्पतालों में उनके जीएसएम 120 और जीएसएम 180 किट इस्तेमाल करते हैं. ये बॉडी सूट की चौड़ाई के प्रकार हैं. वैसे तो ये किट कीटाणुरहित होकर आते हैं. लेकिन, जब ऐसा नहीं होता है तो हमें कीटाणुरहित करने की ज़रूरत होती है.”
“जब एकदम से लॉकडाउन हुआ था तब दिक्कत होने लगी थी. ऐसे में स्थानीय स्तर पर हमें इससे काफ़ी मदद मिली और अब भी इसका इस्तेमाल हो रहा है. साथ ही बाहर से भी आपूर्ति होनी शुरू हो चुकी है.”
एक हफ़्ते में 200 से 300 किट
मोहम्मद बाबा की फैक्ट्री में इस वक़्त 5 से 6 कामगार ही आते हैं. ये लोग पूरे हफ़्ते में 200 से 300 किट तक बना लेते हैं.
इस किट को बनाने की जितनी लागत आती है मोहम्मद बाबा उसे बहुत कम मार्जिन के साथ अस्पतालों को आपूर्ति करते हैं. उन्होंने पहले ये किट निशुल्क देने की कोशिश की थी लेकिन इस तरह फैक्ट्री चला पाना ही मुश्किल था.
उन्होंने बताया, “मैंने कोशिश की थी मैं कहीं से कच्चा माल लाकर स्वास्थ्य कर्मियों के लिए कुछ किट मुफ़्त में बनाकर दे दूं. लेकिन, जब मैंने कच्चा माल खरीदा तो मुझे लगा कि निशुल्क देकर हम ये काम ज़्यादा दिन नहीं चला पाएंगे. अधिकारियों के साथ भी इस पर मशवरा किया. उन्होंने बताया कि पीपीई की ज़रूरत तो है लेकिन इस तरह आप दो-तीन दिनों से ज़्यादा नहीं चला पाओगे. इसके बाद मैंने बहुत कम कीमत पर ये किट देने शुरू किये.”
“इसमें मेरा इतना मार्जिन है जिससे कि मैं इस यूनिट को चला सकूं. हम बाजार से 50 प्रतिशत कम कीमत पर ये किट देते हैं. जैसे डिस्पोज़ेबल गाउन को दूसरे सप्लायर 450 रूपये में देते हैं लेकिन मैं इन्हें 150 से 170 रूपये में देता था. अभी बना रहे पीपीई की बात करें वो 25 से 50 प्रतिशत कम कीमत पर दे रहे हैं.
उन्होंने बताया, “इसकी कीमत का अंदाज़ा इस बात से लगा सकत हैं कि अगर सामान्य दिनों की बात होती तो हम इसे अभी की क़ीमत से दुगनी कीमत पर बेचते. लेकिन, कोविड की वजह से हम इसे कम क़ीमत पर देना चाहते हैं.”
कैसे बनते हैं पीपीई

ये वो पीपीई किट तो नहीं हैं जो बड़े स्तर पर अस्पतालों में इस्तेमाल किए जा रहे हैं लेकिन ये भी इंफेक्शन से सुरक्षा करते हैं. इन्हें बनाने में भी बहुत ज़्यादा मुश्किल नहीं आती.
इसे बनाने के लिए वॉटरप्रूफ मटीरियल (हायपोरा और पैराशूट फैब्रिक) का इस्तेमाल होता है. वॉटरप्रूफ और मोटा होने के कारण इसे एक ही लेयर में बनाया जाता है.
ये सिर से लेकर पांव तक की एक पूरी ड्रेस है जिसमें ऊपर से नीचे तक एक चेन लगी होती है. पहले कपड़े को फैलाकर उसकी नाप के अनुसार कटिंग की जाती है और फिर उसकी सिलाई होती है.
वहीं, डिस्पोज़ेबल गाउन में नॉन-वोवन फैब्रिक का इस्तेमाल किया जाता है.
“ख़तरा हमें भी है”
जम्मू-कश्मीर पिछले साल से ही चर्चा में बना हुआ है. धारा 370 हटाए जाने के बाद यहां पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए थे. उन प्रतिबंधों में ढील दी ही जा रही थी कि कोरोना वायरस का प्रकोप और लॉकडाउन हो गया.
इसका राज्य के लोगों के कारोबार पर काफ़ी प्रभाव पड़ा है. उन्हें आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है.
मोहम्मद बाबा बताते हैं, “कश्मीर में कुछ ना कुछ होता रहता है. उसका असर कारोबार और आम ज़िंदगी पर पड़ता ही है. ये फैक्ट्री तीन महीने बंद रहने के बाद फिर से खुली थी और स्कूल यूनिफॉर्म के लिए अप्रैल-मई हमारा पीक सीजन था. लेकिन, तभी कोरोना वायरस आ गया, लॉकडाउन हो गया और फिर से फैक्ट्री बंद हो गई. इस सबसे आर्थिक दिक्कत तो हो ही जाती है.”
“लेकिन, हमारे लिए उससे ज़्यादा बड़ी चुनौती है काम के दौरान खुद को संक्रमण से बचाना. हमारा काम स्वास्थ्य कर्मियों से जुड़ा हुआ है. हम उनसे मिलते हैं. सामान की डिलिवरी करते हैं. बाहर कच्चा माल लेने जाते हैं. ऐसे में हमें भी बेहद सावधानी बरतते हुए संक्रमण से बचना होता है.”
इसके लिए मोहम्मद बाबा अपनी फैक्ट्री में सेनिटाइजेशन का भी पूरा ख़्याल रख रहे हैं. वो कामगारों को घर से आने-जाने की सुविधा उपलब्ध कराते हैं. साथ ही फैक्ट्री में भी सेनिटाइजर और हैंडवॉश रखते हैं.
मोहम्मद बाबा ने बताया, “मैंने सोशल डिस्टेंसिंग को भी ध्यान में रखते हुए कम लोगों को फैक्ट्री में बुलाया था. फिर मैं सोपोर के ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर के पास गया. उन्होंने वहां से एक टीम भेजी जिसने फैक्ट्री को सेनिटाइज किया. 10 दिनों बाद फिर से फैक्ट्री का सेनिटाइजेशन हुआ. ऐसा वो समय-समय पर करते रहते हैं.”
वह कहते हैं कि अभी तक तो वो इस काम में सफल रहे हैं और इसमें नए प्रयोग की कोशिश कर रहे हैं. उन्हें उम्मीद है कि आगे भी ये ज़ारी रहेगा.

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