कोरोना संकटः फसल नहीं बिकने से किसानों की मुश्किलें कितनी बढ़ गई हैं?

उपज

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    • Author, जयदीप हर्डीकर
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार

नए कोरोना वायरस की महामारी के दौरान, महाराष्ट्र के सखरू पवार का सामना एक और बड़ी चुनौती से हो गया है.

उनकी इस साल की उपज अब तक नहीं बिकी है. 70 बरस के सखरू पवार, महाराष्ट्र के यवतमाल ज़िले के रहने वाले हैं. वो एक संयुक्त परिवार के मुखिया हैं.

सखरू कहते हैं, "इस साल मेरे घर में 350 क्विंटल कपास, सौ क्विंटल अरहर (तूर) और कम से कम पचास क्विंटल हरा चना रखा हुआ है."

उन्हें आने वाले समय की बहुत फ़िक्र हो रही है. सखरू का गांव परदी नागपुर से क़रीब 250 किलोमीटर स्थित घटांजी तहसील में पड़ता है.

उनकी सारी उपज मिलाकर कम से कम 25-30 लाख रुपये की होगी. सखरू कहते हैं, "यही हमारी सारी कमाई है."

कपास

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लॉकडाउन के आर्थिक दुष्प्रभाव

सखरू अकेले किसान नहीं हैं जिनकी इस साल की फसल नहीं बिकी है. महाराष्ट्र के विदर्भ इलाक़े में सखरू जैसे हज़ारों किसान हैं, जिनकी फसल इस साल नहीं बिकी है.

उपज न बिक पाने से ये हज़ारों किसान आगे आने वाली आर्थिक अनिश्चितता के शिकार हैं. उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि आगे क्या होगा.

कोरोना वायरस की महामारी के चलते पहले से ही वो लॉकडाउन के आर्थिक दुष्प्रभावों का सामना कर रहे हैं.

आम तौर पर महाराष्ट्र के विदर्भ इलाक़े के किसानों की उपज के कई ख़रीदार होते हैं.

केंद्रीय सरकार का कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया किसानों का ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करके थोक के भाव कपास की उपज ख़रीदता है.

लेकिन, सीसीआई के कपास ख़रीदने का सीज़न पहले ही बीत चुका है. इस बार उपज भी उसकी ख़रीद की क्षमता से अधिक हुई है.

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किसानों के सब्र का बांध

राज्य सरकार द्वारा चलायी जाने वाली मार्केटिंग फ़ेडरेशन भी अपनी क्षमता से अधिक उपज नहीं ख़रीद सकती है.

ऐसे में वैश्विक स्तर पर फैली महामारी के चलते बाज़ार बंद होने से विदर्भ के किसान बेहद मुश्किल आर्थिक भंवर में फंस चुके हैं.

हालांकि सरकारी एजेंसियों ने अपने ख़रीद केंद्रों को खुला रखा है. लेकिन, ऑनलाइन लंबी कतारों के चलते, सखरू पवार जैसे किसानों के सब्र का बांध टूट रहा है.

सखरू अगर ऑनलाइन क़तार में अपनी बारी आने का इंतज़ार करते हैं, तो शायद उनकी उपज सितंबर में जा कर बिके. जिसका समर्थन मूल्य 5400 रुपये प्रति क्विंटल होगा.

और अगर सखरू अपनी कपास को किसी निजी कारोबारी को बेचते हैं, तो उन्हें इसे सस्ती दर पर बेचना होगा.

सखरू ने बीबीसी मराठी को फ़ोन पर बताया कि निजी कारोबारी को कपास तब ही बेचा जा सकता है, जब उनकी क़िस्मत अच्छी हो और कोई ख़रीदार मिल जाए.

कपास

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अनिश्चितता का साया

सखरू पवार की मुश्किल इस बात की मिसाल है कि विदर्भ इलाक़े के किसान इस वक़्त कैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं.

उनके भविष्य पर अनिश्चितता का काला साया मंडरा रहा है.

अगर ये मुश्किल दौर जारी रहता है, तो पहले से ही आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था का संकट और बढ़ सकता है. बाज़ार का माहौल ख़राब है.

इस वजह से निजी ख़रीदार किसानों की उपज ख़रीदने से बच रहे हैं. वहीं राज्य और केंद्र सरकार की एजेंसियों के पास पैसे की कमी है.

तो वो बड़े पैमाने पर किसानों की फ़सल ख़रीद पाने की हालत में नहीं हैं. ऐसे में विदर्भ के हज़ारों किसानों की इस साल की उपज का कोई ख़रीदार ही नहीं है.

और अब जबकि ख़रीफ़ की बुवाई सीज़न शुरू होने में एक महीने से भी कम का समय बचा है, तो किसानों के पास नक़दी की भारी कमी है.

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बड़े काश्तकारों के पास

इक्का दुक्का अपवादों को छोड़ दें, तो पूरे विदर्भ के छोटे और मंझोले किसानों ने तो कपास और अपनी अन्य उपजों को बेच लिया है.

लेकिन, बड़े काश्तकारों के पास अभी भी कपास, अरहर, चना और रबी की दूसरी फ़सलों का ढेर लगा हुआ है, जिनके बिकने का उन्हें इंतज़ार है.

सरकारी एजेंसियों और निजी कारोबारियों का आकलन है कि महाराष्ट्र में किसानों की क़रीब चालीस प्रतिशत कपास की उपज अभी तक नहीं बिकी है.

भारतीय कपास एसोसिएशन का आकलन है कि वर्ष 2019-20 में भारत में 355 लाख बेलों का उत्पादन हुआ है (एक बेल में 170 किलो कपास होती है.)

इस साल महाराष्ट्र में कपास की अच्छी उपज हुई है, तो राज्य में 80 लाख बेल कपास का उत्पादन होने का अनुमान लगाया गया है.

महाराष्ट्र में क़रीब 40 लाख हेक्टेयर ज़मीन पर कपास की खेती होती है. इसमें से अकेले विदर्भ में ही 13 से 15 लाख हेक्टेयर ज़मीन पर कपास की खेती होती है.

कपास

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घाटे का सौदा

सखरू पवार कहते हैं कि, 'हमारे आस पास के कई गांवों में कई लोगों के पास भारी तादाद में कपास की उपज बिक्री से बची हुई है.'

ख़ुशक़िस्मती से सखरू ने फरवरी महीने के आख़िर में क़रीब 50 क्विंटल कपास 4500 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से बेच ली थी. हालांकि, उनका ये सौदा घाटे का था.

लेकिन, मज़दूरों को उनकी मज़दूरी देने के लिए सखरू को अपनी कपास घाटे में बेचनी पड़ी थी.

सखरू पवार ने बीबीसी मराठी को बताया कि दो दिन पहले उनके परिवार ने केंद्र की सबसे बड़ी कपास ख़रीद एजेंसी में ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कराया था.

वो कहते हैं कि, 'घटांजी में सीसीआई के ख़रीद केंद्र के बाहर कपास से लदे दो हज़ार से ज़्यादा ट्रक खड़े हैं. हर दिन केवल बीस ट्रकों के कपास को ही ख़रीदा जा रहा है.सैकड़ों और लोग अपनी उपज बेचने के लिए क़तार में हैं. ऐसे में पता नहीं मेरा नंबर कब आएगा.'

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समर्थन मूल्य से काफ़ी कम

महाराष्ट्र के हज़ारों दूसरे कपास किसानों की तरह, सखरू ने भी अपनी कपास की उपज को पहले नहीं बेचा था.

क्योंकि उस समय खुले बाज़ार में कपास के दाम, सरकार द्वारा तय समर्थन मूल्य से काफ़ी कम हो गए थे. इसके कई अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय कारण थे.

इस साल कपास की क़ीमत इसलिए गिरी क्योंकि तेल निकाले हुए कपास के बीजों के दाम में भारी गिरावट आ गई थी.

और इसके कारण कपास के बीज के दाम अंतरराष्ट्रीय और घरेलू बाज़ार में पचास फ़ीसद तक गिर गए थे.

एक क्विंटल कपास में 65 किलो बीज होता है. 34 किलो रुई होती है और एक किलो तक धूल होती है. धागे की मांग घट जाने से रुई की क़ीमत में मामूली गिरावट आ गई थी.

लेकिन, कपास के बीज के दाम में ज़्यादा गिरावट आने से ही कपास के कुल मूल्य में भारी कमी आ गई थी.

कपास

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अंतरराष्ट्रीय बाज़ार

मार्च महीने के मध्य तक किसानों ने अपनी कपास की आधी उपज भी नहीं बेची थी. पिछले दो सालों से अप्रैल महीने में कपास के दाम बढ़ते देखे गए थे.

इलाक़े के किसान नेता और किसानों के शेतकारी संगठन के संस्थापक सदस्य रहे विजय जवंधिया कहते हैं, "अप्रैल में दाम बढ़ने के इंतज़ार में ही किसानों ने अपनी कपास की उपज को नहीं बेचा. जबकि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कपास की कीमतें इस बार नहीं बढ़ीं."

"इसकी पहली वजह तो चीन और अमरीका के बीच छिड़ा व्यापार युद्ध था और दूसरी वजह कपास के बीजों की क़ीमत में आई भारी गिरावट थी.' विजय कहते हैं कि कोरोना वायरस की महामारी के चलते मार्च के बाद से तो बाज़ार ही ठप हो गए."

निजी कारोबारियों के समर्थन मूल्य पर कपास ख़रीदने की संभावना कम ही है. ऐसे में विजय जवंधिया मांग कर रहे हैं कि किसानों की कपास ही नहीं, अरहर, चना और हरे चने की उपज को ख़रीदने के मामले में भी सरकार को दखल देना चाहिए.

धान

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राज्यों की आर्थिक स्थिति

इसके लिए सरकार की तरफ़ से मोटे आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज की ज़रूर होगी. ऐसे में कई राज्यों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वो केंद्र सरकार की मदद के बिना भारी आर्थिक पैकेज का बोझ उठा सकें. निजी कारोबारी, समर्थन मूल्य पर किसानों की फसल ख़रीदेंगे नहीं.

इसकी बड़ी वजह ये है कि विश्व स्तर पर उपज के मूल्यों में गिरावट आई है. विजय जवंधिया कहते हैं कि ऐसे में ये केंद्र और राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वो किसानों की उपज को उचित मूल्य दे कर ख़रीद लें.

इसी दौरान, धान की खेती करने वाले किसानों को थोड़ी राहत मिली है. क्योंकि, केंद्रीय खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्रालय ने महाराष्ट्र सरकार को इस बात के लिए हरी झंडी दे दी कि वो पूर्वी विदर्भ के किसानों से 1800 रुपए प्रति क्विंटल पर रबी और ख़रीफ़ की धान की फ़सल ख़रीद सके.

साथ ही साथ हर एक क्विंटल धान की ख़रीद पर किसानों को तीस अप्रैल तक 700 रुपए बोनस के तौर पर देने की मंज़ूरी भी दे दी गई. इसके अलावा, महाराष्ट्र के पशुपालन विभाग ने राज्य के डेयरी उत्पादक सहकारी संगठनों से दस लाख लीटर अतिरिक्त दूध ख़रीदना भी शुरू कर दिया.

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फसल की आपूर्ति श्रृंखला

आपातकालीन स्थिति को देखते हुए इस दूध को पाउडर में बदला जाएगा. लेकिन, चूंकि लॉकडाउन के पहले दो तीन हफ़्ते तक कृषि उपज मंडी समितियां बंद रहीं, तो उपज के मंडी समितियों तक पहुंचने की प्रक्रिया को पहले ही भारी नुक़सान पहुंच चुका है. कम-ओ-बेश हर फसल की आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो चुकी है.

मार्च महीने की शुरुआत तक सखरू पवार को ऐसा लग रहा था कि उन्हें अपनी कपास की फसल अभी रोक कर रखनी चाहिए और अप्रैल में बेचना चाहिए. क्योंकि, पिछले दो वर्षों से अप्रैल में कपास के दाम में उछाल आता देखा जा रहा था.

लेकिन, सखरू और उनके जैसे विदर्भ के हज़ारों अन्य किसानों ने ये नहीं सोचा था कि दुनिया के सामने कोविड-19 की महामारी के रूप में स्वास्थ्य का ऐसा संकट खड़ा हो जाएगा, जैसा दुनिया ने इससे पहले कभी नहीं देखा था.

किसी को कहां पता था कि नए कोरोना वायरस का प्रकोप पूरी दुनिया को अपने शिकंजे में कस लेगा और अर्थव्यवस्था को तबाह कर देगा.

जो निजी कारोबारी किसानों से कपास और रबी की दूसरी फसलें ख़रीदने का जोखिम ले रहे हैं, वो किसानों की उपज बेहद कम क़ीमतों पर क्रय कर रहे हैं. घटांजी तहसील की मंडी समिति में एक क्विंटल कपास इस समय 4400 रुपये में बिक रहा है. अरहर या तूर 4500 रुपये क्विंटल और हरा चना केवल 3500 रुपये क्विंटल ख़रीदा जा रहा है.

वीडियो कैप्शन, सियासी भंवर जाल में फंसे मसाला किसान

भारत का कृषि क्षेत्र

सखरू पवार ने हमें बताया कि, 'फ़रवरी में फसलों के दाम कम थे. अब तो हाल ये है कि दाम भी कम हैं और उपज के ख़रीदार भी नहीं हैं.' जो हालत सखरू पवार की है, वही विदर्भ के हज़ारों दूसरे किसानों की है.

बिकने के इंतज़ार में लगा फसलों का ढेर, हाथ में नक़दी की कमी, उपज के गिरते दाम से किसान पहले ही मुश्किल में हैं. ऐसे में सिर पर खड़े ख़रीफ़ बुवाई सीज़न (जून 2020) के लिए बैंक से फसली कर्ज़ मिलने की कोई गारंटी न होने के कारण विदर्भ के किसानों के सामने बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हुआ है.

ऐसे में भविष्य में बाज़ार के रुख़ को अनिश्चितता ने पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रहे विदर्भ के किसानों को और बड़ी भंवर में धकेल दिया है. भारत का कृषि क्षेत्र जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है, विदर्भ उसकी सबसे बड़ी मिसाल है. कृषि संकट के इस हॉट स्पॉट के सामने खड़ा ये भयावाह भविष्य बड़ी चिंता का विषय है.

किसानों के अपनी कपास की उपज को कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया (CCI) को बेचने की सबसे बड़ी वजह ये है कि उन्हें सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल जाता है. लेकिन, सीसीआई कपास की ख़राब उपज को नहीं ख़रीदता. उसे केवल उच्च गुणवत्ता की कपास ख़रीदने की इजाज़त है.

दाल

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निजी कपास कारोबारी

लेकिन, इसमें भी एक दुविधा है. अगर आप अपनी उपज को किसी निजी कपास कारोबारी को बेचते हैं, तो आपको पैसे तो तुरंत मिल जाते हैं. लेकिन, फसल की न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम क़ीमत मिलती है. और अगर किसान अपनी फसल सरकारी एजेंसी को बेचते हैं, तो उनकी उपज समर्थन मूल्य पर तो बिक जाती है.

मगर, इसका भुगतान उन्हें देर से होता है. उन सैकड़ों किसानों, जिन्होंने अपनी फसल को मार्केटिंग फेडरेशन के माध्यम से सीसीआई को बेचा था, या फिर अरहत (तूर) और चने की फसल को 15 मार्च से पहले नैफेड (NAFED) को बेचा था, उन्हें अब तक अपनी फसल के दाम के भुगतान का इंतज़ार है.

वर्धा ज़िले के डोरली गांव के रहने वाले धरमपाल जरूंडे के पास 15 एकड़ ज़मीन है.

उन्होंने बीबीसी मराठी को बताया कि, 'मैंने अपनी अरहर/तूर की फ़सल नैफेड (NAFED) को बेची थी. और, मार्च में लॉकडाउन लागू होने से कुछ पहले अपनी कपास की उपज का एक हिस्सा सीसीआई को बेचा था. मुझे अब तक अपनी दोनों फसलों के भुगतान का इंतज़ार है.'

धरमपाल अपनी फसलों का एक हिस्सा निजी कारोबारियों को सस्ते दाम पर बेच देते हैं, ताकि कुछ पैसे जल्दी से हाथ में आ जाएं. और कुछ फसलों को सरकारी एजेंसियों को बेचते हैं, जिनका भुगतान उन्हें बाद में होता है.

वीडियो कैप्शन, करतारपुर साहिब: मुआवज़े के लिए परेशान किसान

उपज की चुनौती

धरमपाल कहते हैं कि, 'हमारे इलाक़े के ज़्यादातर किसान ऐसा ही करते हैं. हमें मॉनसून से पहले खेती का सामान ख़रीदने के लिए पैसों की ज़रूरत होती है. बैंकों से फसली कर्ज़ हासिल करना कोई आसान काम नहीं है.'

अगर कपास का ज़बरदस्त उत्पादन एक समस्या बन गया है. तो, दालों, बाजरा/ज्वार और धान की उपज के ढेर भी बिना बिकी उपज की चुनौती को बढ़ा रहे हैं. अब किसानों को समझ में नहीं आ रहा है कि वो आने वाली ख़रीफ़ की फसल में क्या बोएं और क्या नहीं. पैसे की क़िल्लत तो है ही.

सखरू पवार कहते हैं कि, 'मेरे पास बिल्कुल भी नकदी नहीं है. मुझ पर बैंकों और साहूकारों का कर्ज़ है.'

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आम तौर पर महाराष्ट्र में कपास की ख़रीद 31 मार्च के बाद शुरू होती है.

राहत की बात ये है कि सीसीआई और राज्य सरकार की फ़सल ख़रीदने वाली एजेंसियों ने कहा है कि उनकी मंडी समितियां अभी कई और हफ़्तों तक खुली रहेंगी. इससे पहली इसी हफ़्ते केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री और महाराष्ट्र के अकोला से सांसद संजय धोत्रे ने केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर को ख़त लिखा था.

वीडियो कैप्शन, यहां हर आठ घंटे में होती है एक किसान की मौत

अंदरूनी समस्याओं का समाधान

इसमें उन्होंने कृषि मंत्री से अपील की थी कि वो किसानों की फसल की ख़रीद की राह में आ रही मुश्किलों को दूर करें. और सीसीआई की अंदरूनी समस्याओं का समाधान करके कपास के किसानों की मदद करें.

यवतमाल में कपास की कताई का काम करने वाले पार्वती कोटेक्स्ट कारखाने के मालिक, 55 बरस के विजय निवाल कहते हैं कि, 'सीसीआई के साथ समस्या ये है कि उन्होंने जनवरी महीने के बाद इससे पहले कभी भी कपास की ख़रीद नहीं की.'

विजय के मुताबिक़, यही कपास की क़ीमतों में भारी उतार चढ़ाव का बड़ा कारण है. वो कहते हैं कि, 'जनवरी के बाद कपास को खेतों से तोड़ कर ट्रक में लाद कर मंडी तक लाने के दौरान, इसकी काफ़ी नमी ख़त्म हो जाती है.'

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दुनिया भर में पुष्ट मामले

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स्रोत: जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियां

आंकड़े कब अपडेट किए गए 5 जुलाई 2022, 1:29 pm IST

कपास की मांग

विजय निवाल कहते हैं कि, 'सीसीआई, कपास के वज़न में नमी के कारण दो फ़ीसद गिरावट की इजाज़त देता है. लेकिन, अगर कपास को ख़रीदते वक़्त उसकी तौल और उसके बाद उसकी कताई में वज़न का अधिक फ़र्क़ आ जाता है, तो इससे हमारे कारोबार पर बहुत बुरा असर होता है. आज कोई भी कताई कारखाना चलाने वाला अपने धंधे को चोट नहीं पहुंचाना चाहता. क्योंकि कपास की नमी बहुत कम हो गई है. बाज़ार भी मंदा है. साथ ही साथ आने वाले वक़्त में कपास की मांग भी बहुत कम रहने की आशंका है.'

और बाज़ार में कपास की मांग की यही अनिश्चितता, किसानों को ये सोचने पर मजबूर कर रही है, कि वो अपने उन खेतों में अगर कपास न बोएं, तो किस फसल की बुवाई करें, जहां सिंचाई की सुविधा नहीं है.

आज विदर्भ के हर किसान के ज़हन में ये सवाल उठ रहा है. मगर, इस मुश्किल का कोई आसान हल फिलहाल सामने नहीं दिखता.

भारत में कोरोनावायरस के मामले

यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें.

राज्य या केंद्र शासित प्रदेश कुल मामले जो स्वस्थ हुए मौतें
महाराष्ट्र 1351153 1049947 35751
आंध्र प्रदेश 681161 612300 5745
तमिलनाडु 586397 530708 9383
कर्नाटक 582458 469750 8641
उत्तराखंड 390875 331270 5652
गोवा 273098 240703 5272
पश्चिम बंगाल 250580 219844 4837
ओडिशा 212609 177585 866
तेलंगाना 189283 158690 1116
बिहार 180032 166188 892
केरल 179923 121264 698
असम 173629 142297 667
हरियाणा 134623 114576 3431
राजस्थान 130971 109472 1456
हिमाचल प्रदेश 125412 108411 1331
मध्य प्रदेश 124166 100012 2242
पंजाब 111375 90345 3284
छत्तीसगढ़ 108458 74537 877
झारखंड 81417 68603 688
उत्तर प्रदेश 47502 36646 580
गुजरात 32396 27072 407
पुडुचेरी 26685 21156 515
जम्मू और कश्मीर 14457 10607 175
चंडीगढ़ 11678 9325 153
मणिपुर 10477 7982 64
लद्दाख 4152 3064 58
अंडमान निकोबार द्वीप समूह 3803 3582 53
दिल्ली 3015 2836 2
मिज़ोरम 1958 1459 0

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

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