कोरोना वायरस: आरोग्य सेतु ऐप क्या हर किसी को डाउनलोड करना अनिवार्य है?

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    • Author, भूमिका राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए दुनिया के तमाम देशों की तरह भारत ने भी लॉकडाउन का तरीक़ा अपनाया है. देश में बीते 25 मार्च से ही लॉकडाउन है. लेकिन सरकार सोशल डिस्टेंसिंग के साथ-साथ संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए तकनीक का भी सहारा ले रही है.

भारत सरकार ने दो अप्रैल को आरोग्य सेतु ऐप लॉन्च किया था.

इस ऐप की मदद से आसपास के कोविड 19 मरीज़ के बारे में जानकारी हासिल की जा सकती है.

पीआईबी की वेबसाइट पर इस ऐप से जुड़ी जो जानकारी दी गई है उसके मुताबिक़, ये ऐप कोविड-19 संक्रमण के प्रसार के जोख़िम का आकलन करने और आवश्यक होने पर आइसोलेशन सुनिश्चित करने में मदद करेगा.

लेकिन क्या यह कोई अनिवार्य ऐप है जिसे देश के हर नागरिक के मोबाइल में होना ही चाहिए?

आरोग्य सेतु ऐप को केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाले कर्मचारियों के लिए अनिवार्य किया गया है.

भारत सरकार ने 29 अप्रैल को एक ज्ञापन जारी किया था. जिसका शीर्षक था, "कोरोना वायरस संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए (चेन ब्रेक) आरोग्य सेतु ऐप का प्रभावी इस्तेमाल."

आरोग्य सेतु ऐप

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इसके तहत सभी सरकारी अधिकारियों की सुरक्षा को और प्रभावी बनाने के लिए निम्नलिखित निर्देशों का सख़्ती से पालन किया जाना चाहिए.

  • केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाले सभी अधिकारियों, कर्मचारियों (आउटसोर्स कर्मचारियों सहित) को अपने मोबाइल पर हाथों हाथ 'आरोग्यसेतु' ऐप डाउनलोड करना चाहिए.
  • ऑफ़िस में काम करना शुरू करने से पहले सभी को 'आरोग्यसेतु' ऐप पर अपनी स्थिति की समीक्षा करनी चाहिए. जब एप्लिकेशन 'सुरक्षित' या 'कम जोख़िम' की स्थिति दिखाए, तभी आना-जाना शुरू करें.
  • अधिकारियों/कर्मचारियों को सलाह दी जाती है कि यदि एप्लिकेशन पर 'मध्यम' या 'उच्च जोख़िम' दिखाए तो उन्हें ऑफ़िस नहीं आना है और उस वक़्त तक ऑफ़िस नहीं आना है जब तक ऐप पर स्थिति 'सुरक्षित' या 'कम जोख़िम' नहीं हो जाती.

इस ज्ञापन में स्पष्ट लिखा है कि आरोग्य सेतु ऐप केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए अनिवार्य है. लेकिन जो केंद्र सरकार के अधीन काम नहीं करते हैं क्या यह उनके लिए भी अनिवार्य है?

इसको लेकर भी जो असमंजस था उसे एक मई, 2020 को जारी सरकारी गाइडलाइंस ने स्पष्ट कर दिया है. गृहमंत्रालय की ओर से जारी गाइडलाइंस के मुताबिक यह ऐप निजी और सरकारी दोनों कंपनियों के कर्मचारियों के लिए अनिवार्य कर दिया गया है. इतना ही नहीं, कंपनी के प्रमुख पर इसकी जवाबदेही भी होगी कि उसके सभी कर्मचारी इस ऐप को डाउनलोड कर लें.

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इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के वकील और साइबर कानून विशेषज्ञ विराग गुप्ता कहते हैं, "अगर इसकी पूरी व्यवस्था को समझा जाए तो कुछ जगहों पर ही इसे अनिवार्य करने के लिए सरकार ने औपचारिक आदेश जारी किये हैं. जैसे केंद्र सरकार के कर्मचारी, डीएमआरसी द्वारा संचालित मेट्रो या फिर प्रवासी मज़दूर जो अपने राज्य वापस जा रहे हैं. लेकिन कुछ जगहों पर इसे पिछले दरवाज़े से अनिवार्य बनाने की कोशिश कानूनन सही नहीं है. अधिकाश जगहों पर जहां ये शर्तें जारी की गई हैं वो एडवाइज़री हैं लेकिन इनएडवाइज़रीज़ का स्वरूप ऐसा है कि इन्हें आदेश के तौर पर लागू कराया जा रहा हैं."

विराग गुप्ता कहते हैं कि ऐप डाउनलोड करने को लेकर जो सबसे बड़ा विवाद है वो निजता के हनन का है लेकिन देश में निजता के हनन को लेकर तस्वीर अब भी बहुत स्पष्ट नहीं है, बावजूद इसके की सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की बेंच ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के तौर पर मान्यता दी थी. लेकिन सरकार अभी तक इस पर कोई क़ानून लेकर नहीं बना सकी है. लेकिन निजता के अधिकार की बात से परे अगर बात करें तो यह बिल्कुल स्पष्ट है कि किसी भी ऐप को इस तरह से अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता है.

विराग आरोग्य सेतु ऐप को आधार को लेकर हुए विवाद की ही तरह देखते हैं.

वो कहते हैं "सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में आधार को कई जगहों पर अनिवार्य नहीं माना था, लेकिन पिछले दरवाज़े से लगातार कोशिश करके इसे अनिवार्य बनाने की जुगतकी गई ."

विराग गुप्ता इसे विधिक विसंगति के मामले के तौर पर देखते हैं लेकिन वो इसे सरकार के क़ानूनी क्षेत्राधिकार के परे जाकर कुछ करने का इकलौता मामला नहीं मानते हैं.

वो कहते हैं, "लॉकडाउन के दौरान कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिनके लिए सरकार के पास पर्याप्त वैधानिक शक्ति नहीं है."

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क्या कोई प्राइवेट कंपनी अपने कर्मचारियों को ऐप डाउनलोड करने को अनिवार्य कर सकती है?

विराग कहते हैं "लॉकडाउन के दौरान बहुत बड़े-बड़े अधिकार (समानता, स्वतंत्रता, जीवन के अधिकार) प्रभावित हुए हैं. लॉक डाउन जनता को बचाने के लिए किया गया है. यह तीन क़ानूनों के तहत लागू किया गया है. एपिडैमिक डिज़ीज़ एक्ट, डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट और सीआरपीसी 144. अदालतों की व्यवस्था भी ठप होने की वजह से सरकारके अधिकांश आदेशों की क़ानूनी वैधता पर अभी सवाल खड़े नहीं हो रहे, जब महामारी का ये दौर जब गुज़र जाएगा, तब इन मुद्दों पर बात और बहस जरूर होगी."

पीआईबी की प्रेस विज्ञप्ति का ज़िक्र करते हुए विराग गुप्ता कहते हैं कि सरकार का कहना है कि गोपनियता बनी रहेगी लेकिन यहां ये ज़रूर स्पष्ट होना चाहिए कि अगर कोई शख़्स इसे मोबाइल में इंस्टॉल करता है तो उसके संभावित ख़तरे क्या हो सकते हैं.

वो मानते हैं कि अगर सरकार को ऐसा कुछ करना ही था तो इसकी शुरुआत अनिवार्य तौर पर उन लोगों के साथ करना चाहिए था जो विदेश से भारत लौटे और संदिग्ध तौर परसंक्रमित थे. कोरोना वायरस शुरू होने के साथ ही बाहर से लौटे लोगों के मोबइल में अगर यह ऐप होता तो शायद स्थिति और बेहतर होती.

क्या कोई इसे करने से इनकार कर सकता है?

विराग कहते हैं कि मना तो बेशक कर सकता है, क्योंकि आम लोगों के लिए यह एडवाइज़री है कोई क़ानून नहीं. लेकिन अगर कोई स्थानीय निकाय या अथॉरिटी अपनेसंरक्षित परिसर में इसे अनिवार्य करती है तो यह उसका विशेषाधिकार है और मानव सुरक्षा के आधार पर इससे इनक़ार नहीं किया जा सकता है. हां कोई चाहे तो इसे क़ानूनीतौर पर चुनौती दे सकता है लेकिन ऐसी चुनौती पर जल्द फैसला आना मुश्किल है और यह पूरी बहस कानूनी पेचीदिगियों में ही फंस सकती है.

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लेकिन कितना उपयोगी है ये ऐप?

डिजिटल एक्सपर्ट निखिल पाहवा कहते हैं कि अभी तक जो समझ आ रहा है उसके आधार पर कहा जा सकता है कि इस ऐप में निजता का ख़याल रखा गया है. लेकिन वो इस बात से बिल्कुल भी इनक़ार नहीं करते हैं कि इसे और बेहतर नहीं किया जा सकता. वो मानते हैं कि ऐप में इम्प्रूवमेंट का स्कोप है.

उनके मुताबिक, 'ऐप में जो सर्विसेज़ जोड़ी जा रही हैं जैसे कि पीएम फंड के लिए पेमेंट और ई-पास के लिए जो सर्विस जोड़ी जा रही है उससे डेटा कलेक्शन काफी हो सकता है.'

निखिल कहते हैं इस ऐप से जुड़ी जो दूसरी प्रमुख बात है वो ये कि इसका फ़ायदा क्या है? असल में ये काम करता है या नहीं? ये वाकई डिटेक्ट करता है या नहीं? ये सारी बातें अभी बहुत अधिक स्पष्ट नहीं हैं और ना ही सरकार ने इसे लेकर कोई डेटा या पेपर ही रिलीज़ किया है.

वो कहते हैं 'एक टर्म होता है फ़ॉल्स पॉज़ीटिव मतलब कि जैसे कि मैं किसी बिल्डिंग के एक फ्लोर पर हूं और ये ऐप ऑन करने के बाद अगर मेरा ब्लूटूथ ऑन हो जाता है और अगर कोई ऊपर वाले फ्लोर पर है तो ऐप में हमारा कॉन्टेक्ट दिख सकता है जबकि असल में हम कॉन्टेक्ट में नहीं हैं. तो ये पता करने के लिए कि कौन किसके कॉन्टेक्ट में आया है, ये पता करने में आरोग्य सेतु ऐप कितना प्रभावी होगा, इसका कोई प्रमाण नहीं है.'

वो कहते हैं कि जिस तरह जगह-जगह इसे अनिवार्य करने की बात की जा रही है, उससे समझ आता है कि प्राइवेसी की समझ का अभाव है.

निखिल भी विराग की बात से मेल खाती हुई बात कहते हैं. वो मानते हैं कि यह आधार के जैसे ही है. जिसे अभी तो कहा जा रहा है कि यह वॉलियंटरी है लेकिन उसे जगह-जगह मेंडेटरी बनाने की कोशिश की जा रही है.

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निखिल कहते हैं कुछ बातें जो इस ऐप से जुड़ी हुई हैं वो समझना अहम है. जैसे 2 अप्रैल को लॉन्च हुए इस ऐप के यूज़र्स को 12 अप्रैल को प्राइवेसी पॉलिसी में बदलाव का नोटिफ़िकेशन मिला. महत्वपूर्ण बात ये है कि जिन लोगों को ये नोटिफिकेशन मिला वो पॉलिसी चेंज होने के पांच दिन बाद मिला.

मतलब, प्राइवेसी पॉलिसी में यूज़र्स को बिना नोटिफ़िकेशन भेजे ही बदलाव हो गया. ऐप में कुछ नए फ़ीचर जुड़ गए.

निखिल कहते हैं कि प्राइवेसी पॉलिसी में ये कहीं भी नहीं लिखा है कि यह एक अस्थाई ऐप है जो कोरोना महामारी संक्रमण के ट्रेसिंग के लिए बनाया गया है.

हालांकि ऐप के ज़रिए कोरोना पर लगाम लगाने की और ट्रेसिंग के लिए तकनीकी मदद लेने वाला भारत इकलौता देश नहीं है. इसराइल की सरकार ने तो कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग को रोकने के लिए रातोंरात एक अस्थायी क़ानून ही बना दिया है.इसराइल के अलावा चीन, दक्षिण कोरिया, अमरीका, सिंगापुर जैसे देशों में भी सरकारें तकनीकी मदद ले रही हैं.

दुनिया भर के साइबर एक्सपर्ट इस पर सवाल और इसे निजता का हनन बता रहे हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना वायरस महामारी से निपटने के लिए भले ही सरकारों का यह क़दम एक हद तक सही लग रहा होलेकिन अगर लोगों की निजता की बात की जाए और जो जानकारी सरकार इकट्ठा कर रही है उसके इस्तेमाल को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है.

हालांकि पीआईबी पर मौजूद विज्ञप्ति में दावा किया गया है कि ऐप का डिज़ाइन सबसे पहले गोपनीयता सुनिश्चित करता है. ऐप द्वारा एकत्र किए गए व्यक्तिगत डेटा को अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग करके एन्क्रिप्ट किया गया है और डेटा चिकित्सा सम्‍बन्‍धी सुविधा की आवश्‍यकता पड़ने तक फोन पर सुरक्षित रहता है.

यह ऐप 11 भाषाओं में उपलब्ध है.

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