कोरोना वायरस: मज़दूरों के लिए ट्रेन चलाने में मुश्किल क्या है?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
केंद्र सरकार ने आपदा प्रबंधन अधिनियम में बदलाव करते हुए, राज्यों में फँसे मज़दूरों, छात्रों, टूरिस्ट और तीर्थ यात्रियों की बसों के ज़रिए घर वापसी का रास्ता साफ़ कर दिया है.
केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से जारी दिशा निर्देशों के मुताबिक़ -
• इस प्रक्रिया के लिए राज्यों को नोडल अधिकारियों को नियुक्त करना होगा और एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोटोकॉल तैयार करना होगा.
• जिन राज्यों से सरकारें अपने फँसे लोगों को रोड मार्ग से निकालेंगी, उन्हें दूसरे राज्यों से इसके लिए मंज़ूरी लेनी होगी.
• वापसी की प्रक्रिया शुरू होने के पहले सभी लोगों की स्क्रीनिंग की जाएगी और जिनमें कोरोना के लक्षण नहीं होंगे, सिर्फ़ उन्हें ही इजाज़त मिलेगी.
• इस प्रक्रिया में इस्तेमाल किए जाने वाले बसों को पूरी तरह सैनिटाइज़ करना होगा, सोशल डिस्टेंसिंग का भी पालन करना होगा.
• वापसी के दौरान बीच में आने वाले राज्यों को इन बसों को निकलने की सुविधा देने को भी कहा गया है
• इसके साथ राज्यों में वापसी पर लोगों की दोबारा जाँच की जाएगी. ज़रूरत के हिसाब से घर पर या अस्पताल में क्वारंटीन की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी. समय-समय पर लोगों का हेल्थ चेक भी किया जाए. इसके लिए आरोग्य सेतु ऐप का इस्तेमाल करने को भी कहा गया है.
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हालांकि केंद्र सरकार के इस आदेश के पहले ही उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने अपने छात्रों को घर बुलवाने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी.
लेकिन कुछ राज्य सरकारों को सरकार से अभी भी शिकायत है.
दरअसल केंद्र सरकार के आदेश में दिक्कत ये है कि उसमें सिर्फ़ बसों से फँसे लोगों को लाने की बात की गई है. वो भी सोशल डिस्टेंसिंग का ख़याल रखते हुए. ऐसे में बसों में 20-30 लोगों से ज़्यादा आ नहीं पाएंगे. तो लाखों फँसे लोगों को राज्य सरकारें कैसे बुलाएं.
दूसरी दिक़्क़त है राज्यों में आपसी सहमति. नए दिशा निर्देश में राज्यों में आपसी सहमति से ही बस सेवा चलाने की बात कही गई है.
लेकिन लॉकडाउन-2 में जब कुछ राज्यों में छूट की घोषणा हुई तो यूपी और दिल्ली बॉर्डर सील करने की बात सामने आई. हरियाणा ने भी दिल्ली से आने जाने पर कुछ पाबंदियां लगाई हैं.
ऐसे में दूसरी राज्य सरकारें सड़क मार्ग से अपने यहां लोगों को लाने की इजाज़त देंगी या नहीं इस पर भी राज्यों में दुविधा की स्थिति बनी हुई है.

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राजस्थान सरकार की आपत्ति
राजस्थान सरकार ने अख़बार में विज्ञापन के ज़रिए केंद्र सरकार से बस के साथ ट्रेन चलाने की मांग की है.
उन्होंने विज्ञापन में लिखा है, "इतनी ज़्यादा संख्या में रजिस्टर्ड लोगों का दूरस्थ राज्यों से बिना स्पेशल ट्रेन चलाए राजस्थान आना बहुत कठिन है. अत: हमने 29 अप्रैल 2020 को ही भारत सरकार से स्पेशल ट्रेनों की व्यवस्था के लिए विशेष अनुरोध किया है."
राजस्थान के परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास ने बीबीसी को बताया, "राजस्थान में बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, केरल के मज़दूर हैं. राजस्थान के मज़दूर बाहर अन्य राज्यों में भी हैं."
"राजस्थान के लोग जो अन्य राज्यों में हैं उनमें से लगभग 4 लाख लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया है. अन्य राज्यों के लोग जो राजस्थान में हैं, उनमें से जाने वालों में क़रीब 6 लाख लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया हैं. लेकिन इतनी लंबी दूरी के लिए बसें उपयुक्त नहीं हैं."
स्पेशल ट्रेन चलाने की मांग पर खाचरियावास कहते हैं, "ट्रेन में बाथरूम होता है और सोशल डिस्टेंसिंग का ज़्यादा पालन हो सकता है. रेल एक साथ बहुत मज़दूरों को लेकर गुज़रेगी. रेल के बारे में मज़दूर समझता है कि जयपुर से निकलेगी तो कितने स्टेशन को कवर करती हुई निकलेगी. रेल के मुक़ाबले तो बस कुछ भी नहीं है, रेल बेस्ट है."

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झारखंड सरकार की मांग
कुछ इसी तरह की मांग झारखंड सरकार ने उठाई है.
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने केंद्र के आदेश मिलने के तुरंत बाद संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कहा, "हर राज्य में फँसे मज़दूरों, छात्रों, टूरिस्ट और तीर्थ यात्रियों को अकेले लाने में राज्य सरकार सक्षम नहीं है. हमारे पास सीमित संसाधन है. हमारे पास ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन भी नहीं है. अगर हम कहीं से व्यवस्था भी करते हैं तो हमें तो अपने मज़दूरों को लाने में ही 6 महीने का वक़्त लग जाएगा."
राज्य सरकार का आकलन है कि उनके तकरीबन 5 लाख मज़दूर, छात्र, तीर्थ यात्री दूसरे राज्यों में फँसे हैं.

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महाराष्ट्र सरकार ने भी उठाए सवाल
लेकिन महाराष्ट्र की दिक्कतें थोड़ी अलग हैं. महाराष्ट्र से मज़दूर दूसरे राज्यों में काम की तलाश में कम जाते हैं, लेकिन उनके यहाँ काम करने वाले आप्रवासी मज़दूरों की संख्या बहुत अधिक है.
महाराष्ट्र सरकार ने गृह मंत्रालय के आदेश के बाद अपना अलग से सर्कुलर भी जारी किया है.
इसमें थोड़ा बदलाव करते हुए महाराष्ट्र सरकार ने कहा है कि प्रशासन से अनुमति लेकर फँसे हुए लोग अपना प्रबंध करते हुए रोड मार्ग से भी जा सकते हैं.
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बीबीसी मराठी संवाददाता नीलेश धोत्रे से बात करते हुए महाराष्ट्र के वरिष्ठ मंत्री नवाब मलिक ने कहा कि उन्होंने मज़दूरों को अपने राज्य से भेजने के लिए ट्रेन सुविधा शुरू करने की केंद्र से मांग की है.
एक बस में मात्र 30 लोगों को ही भेजा जा सकता है ऐसे में विशेष ट्रेन सेवा के बग़ैर लाखों मज़दूरों को उनके घर भेजना मुमकिन नहीं है.
केंद्र सरकार ने दिशा-निर्देश जारी करने से पहले राज्यों से सलाह नहीं ली. अगर हमसे राय लेते तो ज़्यादा बेहतर होता.
नवाब मलिक के मुताबिक़ गृह मंत्रालय के इस दिशा निर्देश में कुछ खामियां हैं.
इससे पहले महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री अजित पवार ने भी इससे पहले केंद्र को चिट्ठी लिख कर विशेष ट्रेन चलने की मांग की थी.
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गौरतलब है कि महाराष्ट्र के बांद्रा स्टेशन में लॉकडाउन के दौरान 14 अप्रैल को हज़ारों की संख्या में लोग जमा हो गए थे. जिसके बाद पुलिस को उन्हें हटाने के लिए लाठीचार्ज तक करना पड़ा था.
पश्चिम बंगाल सरकार का रुख़
गृह मंत्रालय के सर्कुलर के दो दिन पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने संवाददाता सम्मेलन में कहा था, "जब तक स्थितियां नार्मल नहीं हो जाती, बॉडर को सील रखना चाहिए, घरेलू उड़ाने भी बंद रखी जाए, अंतरराज्यीय बस और ट्रेन सेवाएं भी ना चलाई जाए."
हालांकि इसी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में उन्होंने कहा कि जिस किसी राज्य को विशेष परिस्थिति में स्पेशल परमिट की ज़रूरत हो, तो राज्य सरकारें इस बारे में बात कर फ़ैसला कर सकती हैं.
पश्चिम बंगाल ने भी कोटा में पढ़ने वाले छात्रों के लिए विशेष बस का इंतजाम करने की बात की थी.
लेकिन लॉकडाउन के पहले अपनी सीमाओं को ट्रेन के लिए बंद करने की भी उन्होंने सबसे पहले वकालत की थी.

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आख़िर ट्रेन चलाने में दिक्कत किया है?
जब हर तरफ से ट्रेन चलाने की मांग उठ रही है, तो सवाल ये है कि आखिर ट्रेन चलाने में दिक्कत क्या है.
रेल मंत्रालय के प्रवक्ता राजेश वाजपेयी ने बीबीसी से कहा है कि 3 मई तक वो कोई पैसेंजर ट्रेन नहीं चलाने जा रहे. स्पेशल ट्रेन चलाने को लेकर अभी कोई निर्देश नहीं आया है. जैसे ही हमारे पास कोई सूचना होगी, हम आपको भी सूचित करेंगे.
ऑल इंडिया रेलवे मेन्स फेडरेशन के जनरल सेक्रेटरी शिव गोपाल मिश्रा ने बताया कि इस समय ट्रेन चलाना बस चलाने के मुक़ाबले ज़्यादा जोख़िम भरा है.
वो इसके पीछे कई कारण गिनाते हैं.
• बस में एक बार में आप मुश्किल से 30 लोग ले जाएंगे. इतने लोगों को कंट्रोल में रखना अधिक आसान है. ट्रेन में लोगों का मूवमेंट कंट्रोल करना मुश्किल है. ट्रेन में एक साथ सैंकड़ों की संख्या में जा सकते हैं. इतने लोगों में कौन किससे मिला ये पता करना मुश्किल होगा.
• एक बस को चलाने में कम लोगों की ज़रूरत होगी. एक ड्राइवर, एक एटेंडेंट और एक गार्ड. लेकिन लंबी दूरी की एक ट्रेन चलाने में स्टेशन पर कर्मचारियों की ज़रूरत होगी, ट्रेन ड्राइवर, गार्ड, आरपीएफ, सिग्नलिंग स्टाफ, साफ़ सफ़ाई के कर्मचारियों को काम पर आना पड़ेगा.
• जानकारों के मुताबिक बीमारी से ज्यादा बड़ी दिक्कत है लोगों की मानसिकता. जिन स्टेशन पर ट्रेन रुकती हुई जाएगी, वहाँ के प्लेटफ़ॉर्म पर आवाजाही होगी. उससे भी दिक्कत बढ़ सकती है. लोग घूमने फिरने से भी बाज़ नहीं आते हैं. रेलवे हर कोच में गार्ड कहां से लाएंगे जो सुनिश्चित करें की आदमी एक ही सीट पर बैठा रहे.
• पानीपत से रेलवे ने एक ट्रेन कर्मचारियों के लिए चलाई थी, उसको हरियाणा सरकार ने रोक दिया. ऐसे में ट्रेन चलाने में एक दिक्कत ये भी है कि सभी राज्य सरकारें पहले इसके लिए सहमत हों.

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लॉकडाउन2 में जब सरकारी कर्मचारियों को आने की छूट दी गई, तो रेलवे ने नई दिल्ली और आसपास के स्टेशनों पर काम करने वाले अपने कर्मचारियों के लिए एक ट्रेन भी चलाई है, क्योंकि ज़्यादातर लोग एनसीआर में रहते हैं.
उसमें एक डब्बे में 25 यात्री ही आई-कार्ड दिखा कर सफ़र कर सकते हैं. लेकिन उसमें भी स्टॉफ को नियंत्रित करने में रेल प्रशासन को दिक्कतें आई. उसमें भी एक दो लोग संक्रमित पाए गए हैं. ऐसे में आम जनता के लिए दिक्कत और अधिक हो जाएगी.
हालांकि शिव गोपाल मिश्रा फँसे मज़दूरों के लिए स्पेशल ट्रेन चलाने की मांग भी करते रहे हैं. उनके मुताबिक़ सरकार को बीच का रास्ता निकालना चाहिए.
वो कहते हैं, "ऐसी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि छोटी दूरी में फँसे मज़दूरों को बसों के ज़रिए पहले अपने घरों तक पहुंचा दिया जाए और फिर लंबी दूरी में फंसे लोगों के लिए स्पेशल ट्रेन सीमित संख्या में चलाई जाए. ऐसा होने पर इस बात की संभावना अधिक है कि वो एक राज्य से चले तो सीधे गंतव्य पर ही रुके वो भी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए."
इसके लिए मंत्रालय के नए आदेश तक इंतज़ार करना पड़ेगा.




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