राहुल गांधी के आरोपों पर निर्मला सीतारमण को क्यों करने पड़े 13 ट्वीट्स

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- Author, विभुराज
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
राहुल गांधी के एक ट्वीट के जवाब में अगर देश की वित्त मंत्री को 13 ट्वीट करने पड़े तो उसकी राजनीतिक अहमियत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के ट्वीट्स में से एक कुछ इन शब्दों में था, "राहुल गांधी और कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने निहायत ही बेशर्मी से लोगों को गुमराह करने की कोशिश की है. ये कांग्रेस की शैली है, वे तथ्यों को संदर्भ से हटकर सनसनीखेज़ बना देते हैं."
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मंगलवार रात को 10 बजकर 58 मिनट पर सिलसिलेवार तरीक़े से पोस्ट किए गए ये ट्वीट्स बता रहे थे कि विपक्ष जब-जब नीरव मोदी और मेहुल चौकसी का नाम लेगा, सरकार ख़ामोश नहीं रहेगी.
दरअसल, मंगलवार दोपहर के तीन बजकर 20 मिनट पर राहुल गांधी ने भी सरकार पर हल्ला बोलने के लिए ट्विटर का ही सहारा लिया था, "संसद में मैंने एक सीधा सा प्रश्न पूछा था- मुझे देश के 50 सबसे बड़े बैंक चोरों के नाम बताइए. वित्त मंत्री ने जवाब देने से मना कर दिया. अब RBI ने नीरव मोदी, मेहुल चोकसी सहित भाजपा के 'मित्रों' के नाम बैंक चोरों की लिस्ट में डाले हैं. इसीलिए संसद में इस सच को छुपाया गया."
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इस सियासी महाभारत की शुरुआत उस समय हुई जब आरटीआई एक्टिविस्ट साकेत गोखले की एक आरटीआई के जवाब में रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने बैंकों का क़र्ज़ दबाकर बैठे 50 बड़े कारोबारियों के नाम सार्वजनिक कर दिए.
वित्त मंत्री ने क्या-क्या कहा, पढ़िए-
- आज कांग्रेस नेताओं ने 'विलफुल डिफॉल्टर', 'बैड लोन', और 'राइट ऑफ़' को लेकर गुमराह करने की कोशिश की है. साल 2009-10 और 2013-14 के बीच बैंकों ने 145226 करोड़ रुपये के कर्ज 'राइट ऑफ़' किए. राहुल गांधी को मनमोहन सिंह से पूछना चाहिए था कि ये 'राइट ऑफ़' किस बारे में था.
- आरबीआई ने हर चार साल पर 'एनपीए खातों' को लेकर दिशा निर्देश दिए है. बैंक 'एनपीए खातों' का नियमित रूप से 'राइट ऑफ़' करती है और साथ ही उधार लेने वाले से वसूली की प्रक्रिया भी शुरू की जाती है. कोई लोन 'वेव ऑफ़' नहीं किया गया है.
- पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के शब्दों को याद करना उपयोगी रहेगा, "साल 2006-08 के दौरान बड़ी संख्या में 'बैड लोन' दिए गए... इनमें से बहुत सारे कर्ज ऐसे लोगों को दिए गए जिनकी उनकी ऊंची पहुंच थी और कर्ज न चुकाने का जिनका इतिहास रहा था. सरकारी बैंकों ने ऐसे लोगों को लोन देना जारी रखा जबकि प्राइवेट बैंक इससे बाहर निकल गए."
- नीरव मोदी के मामले में सरकार ने 2387 करोड़ रुपये से ज़्यादा की चल और अचल संपत्तियां ज़ब्त की हैं. नीरव मोदी इस समय ब्रिटेन की जेल में हैं. मेहुल चौकसी की 1936.95 करोड़ रुपये की प्रोपर्टी ज़ब्त की गई है. एंटीगुआ की सरकार से उनके प्रत्यर्पण का आग्रह किया गया है. विजय माल्या की 8040 करोड़ रुपये की प्रोपर्टी ज़ब्त हुई है. उनके प्रत्यर्पण के लिए भारत सरकार के आग्रह को ब्रिटेन के हाई कोर्ट ने भी मंजूरी दी है.

'राइट ऑफ़' और 'वेव ऑफ़' से क्या मतलब है
वित्त मंत्री के जवाब में 'विलफुल डिफॉल्टर', 'बैड लोन', 'राइट ऑफ़', 'वेव ऑफ़' और 'एनपीए खाते' जैसे कई बैंकिंग और एकाउंटिंग टर्म्स इस्तेमाल किए गए हैं.
'राइट ऑफ़' यानी बट्टा खाता से मतलब उन कर्जों से है, जिसकी रिकवरी की बैंक को अब उम्मीद नहीं है. बैंक इसकी वसूली के लिए क़ानूनी प्रक्रिया का सहारा लेती है. इसमें कर्ज माफी नहीं होती है, वसूली की प्रक्रिया जारी रहती है.
'वेव ऑफ़' या क़र्ज़ माफ़ी तब होती है जब सरकार या बैंक क़र्ज़ माफ़ कर देते हैं. ये मजबूरी या क़र्ज़ न चुका पाने के हालात में किया जाता है. इससे उधार लेने वाले की देनदारी ख़त्म हो जाती है. वसूली की प्रक्रिया पर रोक लग जाती है और क़र्ज़ माफ़ी की स्थिति में सरकार इस पैसे की भरपाई करती है.
निर्मला सीतारमण ने अपने स्पष्टीकरण में 'विलफुल डिफॉल्टर' को समझाया है. लोन चुकाने में नाकाम रहने वाले वैसे लोग जिनके पास क़र्ज़ अदा करने की क्षमता है, लेकिन वे इस पैसे को कहीं और लगा देते हैं, या हेराफेरी करते हैं, या बैंक की इजाज़त के बिना सुरक्षित संपत्ति को बेच देते हैं, उन्हें विलफुल डिफॉल्टर की कैटगिरी में रखा जाता है.
पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट अंकुर गुप्ता बताते हैं कि 'बैड लोन' वो क़र्ज़ है जिसकी रिकवरी की बैंक को उम्मीद नहीं रह गई है और जब उधार लेने वाला लंबे समय तक ये क़र्ज़ नहीं चुकाता, यानी इस लोन एकाउंट में 90 दिनों तक अगर कोई पैसा न जमा हो तो बैंक की बैलेंस शीट में ये एकाउंट 'एनपीए खाता' (नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स) बन जाता है.

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विपक्ष क्यों हमलावर है?
बुधवार को कांग्रेस ने सरकार को 'बैड लोन' को लेकर हमलावर रुख़ अपनाया. कांग्रेस का आरोप है कि सरकार देश की बैंकिंग सिस्टम को कमज़ोर कर रही है.
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कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा, "6,66,000 करोड़ रुपये के क़र्ज़ राइट ऑफ़ को 'सिस्टम की सफ़ाई' नही, बैंक में जमा 'जनता की गाढ़ी कमाई की सफ़ाई' कहते हैं."
निर्मला सीतारमण के जवाबों पर कांग्रेस ने तथ्यों को 'तोड़मरोड़ कर' पेश करने का आरोप लगाया है.
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"देश को भटकाने की बजाय निर्मला सीतारमण जी को सत्य बताना चाहिए, क्योंकि यही राज धर्म की कसौटी है-: 1. मोदी सरकार ने 2014-15 से 2019-20 के बीच डिफ़ॉल्टरों का 6,66,000 करोड़ रुपये क़र्ज़ क्यों राइट ऑफ़ किया? 2. क्या 95 डिफ़ॉल्टरों का 68,607 करोड़ रुपये क़र्ज़ माफ़ करने का RBI का RTI जबाब सही है?"
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"मोदी सरकार देश का पैसा ले कर भाग गए घोटालेबाज़ों - नीरव मोदी+मेहुल चोकसी (8,048 करोड़ रुपये), जतिन मेहता (6,038 करोड़ रुपये), माल्या (1,943 करोड़ रुपये) - और अन्य मित्रों का क़र्ज़ क्यों राइट ऑफ़ कर रही है? इतना बड़े 6,66,000 करोड़ रुपये के बैंक क़र्ज़ राइट ऑफ़ की अनुमति सरकार में किसने दी और क्यों?"
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पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने भी ये सवाल उठाया है कि सरकार नीरव मोदी, मेहुल चौकसी और विजय माल्या जैसे भगोड़ों के लिए लोन 'राइट ऑफ़' का तकनीकी रास्ता क्यों अपना रही है.
आरबीआई ने क्या कहा
आरटीआई एक्टिविस्ट साकेत गोखले ने आरबीआई से सूचना के अधिकार क़ानून के तहत 16 फ़रवरी, 2020 तक विलफुल डिफॉल्टर घोषित किए गए 50 सबसे बड़े क़र्ज़दारों के नाम और उन्होंने कितना क़र्ज़ ले रखा है, की जानकारी मांगी थी.
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आरबीआई द्वारा जारी की गई इस लिस्ट में सबसे पहला नाम मेहुल चौकसी की कंपनी गीतांजलि जेम्स का है, जिसके 5492 करोड़ रुपये का क़र्ज़ 'राइट ऑफ़' किया गया है. दूसरे नंबर संदीप झुनझुनवाला कंपनी आरईआई एग्रो लिमिटेड है जिसके 4314 करोड़ रुपये का क़र्ज़ 'राइट ऑफ़' हुआ है. लिस्ट में तीसरे नंबर पर जतिन मेहता की कंपनी विनसन डायमंड्स है.
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साकेत गोखले ने ट्विटर पर उनकी आरटीआई को लेकर मचे हंगामे के बाद कहा, "सच को ज़्यादा दिनों तक दबाया नहीं जा सकता है. निर्मला सीतारमण को कल रात मजबूर होकर आरबीआई की डिफॉल्टर लिस्ट पर जवाब देना पड़ा. अगर मंत्री और उनके डिप्टी ने संसद में ईमानदारी से राहुल गांधी के सवाल का जवाब दिया होता तो ऐसी नौबत नहीं आती."

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इनकार से इक़रार तक
विपक्ष के आरोपों पर सरकार ने जो जवाब दिए हैं, उसके दो अहम पहलू हैं. पहला ये कि लोन 'राइट ऑफ़' करने का फ़ैसला आरबीआई की गाइडलाइंस के तहत ही लिया गया है और दूसरा ये कि विलफुल डिफॉल्टर्स को लेकर विपक्ष की तरफ़ से पूछे गए सवालों के जवाब सरकार ने दिए थे.
तो आरबीआई की आरटीआई रिप्लाई में ऐसा नया क्या है जिसे लेकर हंगामा मच गया?
समाचार एजेंसी पीटीआई के नेशनल बिज़नेस एडिटर अम्मार ज़ैदी कहते हैं, "विलफुल डिफॉल्टर्स के नाम तो पहले से पब्लिक डोमेन में थे लेकिन कोई कंपाइल लिस्ट नहीं थी और ये नहीं पता था कि किस का कितना लोन 'राइट ऑफ़' किया गया है."
सरकार पर विपक्ष के राजनीतिक हमले पर ज़ैदी कहते हैं, "सरकार ने हमेशा ही इस बात से इनकार किया है कि किसी की क़र्ज़ माफ़ी नहीं की गई है. सरकार का कहना है कि विपक्ष एक आरटीआई रिप्लाई को औज़ार बनाकर उस पर हमला कर रहा है कि ये जानकारी छुपाई जा रही थी. पहले भी सरकार ने संसद में और संसद के बाहर भी कई बार कहा है कि कोई क़र्ज़ माफ़ी नहीं की गई है. लोन की रिकवरी की कोशिश की जा रही है."
चार साल पहले यही आरबीआई बैंकों का पैसा चुका पाने में नाकाम हो रहे क़र्ज़दारों का नाम सार्वजनिक करने से बच रही थी.
तब रिज़र्व बैंक ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफ़नामा दायर करके कहा था, "क़र्ज़ नहीं चुकाने वाले खातों के ब्योरे सार्वजनिक करने से उनके बिज़नेस पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, चाहे क़र्ज़ न चुका पाने की उनकी कोई भी वजह रही हो."
ऐसा लगता है कि चार साल में गंगा में बहुत सारा पानी बह गया है. ना-ना करते-करते आरबीआई ने भी अब मान लिया. लोगों को अब पता है कि किन लोगों के पास बैंकों का कितना पैसा डूबा हुआ है और जैसा कि अम्मार ज़ैदी कहते हैं, "सरकार के रवैये में ये बड़ा बदलाव है..."
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