कोरोना वायरस: आरबीआई का ईएमआई वाला पैकेज कितना पर्याप्त

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- Author, अभिनव
- पदनाम, बैंकिंग एक्सपर्ट, बीबीसी हिंदी के लिए
अर्थव्यवस्था पर कोरोना वायरस के बुरे असर को कम करने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक(आरबीआई) ने 27 मार्च को कुछ उपायों की घोषणा की थी. इसे 'कोविड-19 रेगुलेटरी पैकेज' नाम दिया गया.
आरबीआई के मुताबिक़, कोविड-19 के फैलने के कारण लॉकडाउन की वजह से कई लोगों को क़र्ज़ चुकाने में परेशानी हो रही है.
कारोबारियों को भी अपने धंधे रुकने की वजह से मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. इन्हीं चीज़ों को ध्यान में रखते हुए यह पैकेज लाया गया.
लॉकडाउन से थम गया अर्थव्यवस्था का पहिया
यह पैकेज देश में कोरोना की शुरुआत के वक़्त में ही पेश कर दिया गया. तब देश में लॉकडाउन को लागू किए महज़ चार दिन ही हुए थे और तब इसे अगले 17 दिन और लागू रहना था.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 मार्च से लेकर 14 अप्रैल तक यानी 21 दिन के लॉकडाउन का एलान किया था.
14 अप्रैल को लॉकडाउन ख़त्म होने पर इसे 3 मई तक के लिए और बढ़ा दिया गया. इस दौरान देश में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या में भी इज़ाफ़ा हुआ है.
साथ ही इस महामारी से मरने वालों की तादाद भी बढ़कर हज़ार के क़रीब पहुंच गई है.
इस बात की भी आशंका जताई जा रही है कि कोरोना वायरस का संक्रमण महाराष्ट्र और गुजरात में अब सामुदायिक स्तर पर पहुंच चुका है.
इस पूरे हालात का बुरा असर लोगों की आवीजिका पर पड़ा है. इस बात का फ़िलहाल कोई अंदाज़ा नहीं है कि यह वायरस कब ख़त्म होगा. ऐसे में यह बता पाना बेहद मुश्किल है कि अर्थव्यवस्था और लोगों की आजीविका पर इसका असर कितना बड़ा होगा.
ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या 27 मार्च को आरबीआई का लाया गया राहत पैकेज पर्याप्त है या देश के केंद्रीय बैंक को अपने पैकेज को और बड़ा बनाना होगा?
तो चलिए सबसे पहले आम भाषा में इस पैकेज को समझते हैं.

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आरबीआई के कोविड-19 राहत पैकेज में क्या है?
मान लीजिए कि आप एक रेस्टोरेंट चला रहे हैं. ऐसे में इसमें दो तरह के ख़र्चे होंगे.
पहला. घटने-बढ़ने वाले ख़र्चे. मसलन, आपके रेस्टोरेंट की बिक्री और सब्ज़ियों और दूसरे सामानों की मात्रा में होने वाले उतार-चढ़ाव की वजह से ख़र्च में होने वाली घटी-बढ़ी.
दूसरा. तयशुदा ख़र्चे. ये ऐसे ख़र्च होते हैं जो आपको करने ही होते हैं चाहे धंधा चले या ना चले. इनमें दुकान का किराया, कर्मचारियों की तनख़्वाह, बैंकों से फ़िक्स्ड एसेट्स के लिए लिए गए टर्म लोन और वर्किंग कैपिटल लोन पर चुकाई जाने वाली ईएमआई (इक्वेटेड मंथली इंस्टॉलमेंट या मासिक किस्त) और दूसरे ख़र्च शामिल होते हैं.
तयशुदा ख़र्च निकालने की मुश्किल
अब कोविड-19 के फैलने और लॉकडाउन के चलते पूरा धंधा बैठ गया है. इससे आपकी कमाई रुक गई है. लेकिन, आपको अपने तयशुदा ख़र्च तो करने ही पड़ेंगे.
ऐसे में आपको अपनी जमापूंजी या आकस्मिक फ़ंड से पैसे निकालकर ख़र्च करने पड़ेंगे.
अगर आपके पास पहले से महज़ इतनी जमापूंजी है कि आप अगले 20-30 दिन का ही ख़र्च निकाल पाएं और साथ ही चूंकि किसी को भी यह पता नहीं है कि ऐसे हालात कब तक जारी रहेंगे तब आपको यह सोचना पड़ेगा कि आप किस तरह से अपने ख़र्चों को कम कर सकते हैं.
अपनी दुकान का किराया आपको देना ही पड़ेगा. साथ ही अपनी क्रेडिट रेटिंग या क्रेडिट स्कोर को बढ़िया बनाए रखने के लिए आपको बैंक के ब्याज़ और ईएमआई का भी भुगतान करना पड़ेगा.
ऐसा नहीं करने पर आपको आगे चलकर बैंकों से पैसा उधार लेने में मुश्किल हो सकती है.
इस तरह से ख़र्च करने की पहली मार आपके कर्मचारियों पर पड़ती है. आपको या तो उनकी सेलरी रोकनी पड़ती है, या इसमें कटौती करनी पड़ सकती है, या फिर सबसे बुरे हालात में आपको अपने कर्मचारियों को नौकरी से भी हटाना पड़ सकता है.
कुछ इसी तरह की चीज़ों को ध्यान में रखते हुए 27 मार्च को आरबीआई ने अपने रेगुलेटरी पैकेज में ये उपाय किए.
पहला प्रावधानः इसमें आपको तीन महीने तक अपनी ईएमआई (मूलधन और ब्याज़) चुकाने से मोरेटोरियम यानी छूट दी गई है.
दूसरा प्रावधानः इसमें यह छूट दी गई है कि आप अपने वर्किंग कैपिटल पर चुकाया जाने वाला ब्याज़ 3 महीने तक टाल सकते हैं.
आप एकसाथ इन दोनों ही प्रावधानों का फ़ायदा उठा सकते हैं. साथ ही अच्छी चीज़ यह है कि इस दौरान आपको अपने क्रेडिट स्कोर को लेकर घबराने की ज़रूरत नहीं है.
तीसरा प्रावधानः इसमें बैंकों को यह इजाज़त दी गई है कि वे वर्किंग कैपिटल फ़ाइनेंस की शर्तों को आसान बनाएं ताकि मौजूदा हालात के हिसाब से आपकी वर्किंग कैपिटल की ज़रूरतों का आकलन हो सके और उस हिसाब से आपको पैसा मुहैया कराया जा सके.
मान लीजिए आपकी वर्किंग कैपिटल लिमिट 10 लाख रुपए है और ऐसे में मौजूदा हालात में बैंक इसका फिर से आकलन कर आपको एक लाख रुपए की अतिरिक्त मदद दे सकता है.
इस पैसे का इस्तेमाल आप अपने तयशुदा ख़र्चों की ज़रूरतें पूरी करने में कर सकते हैं. आप अपनी दुकान का किराया देना जारी रख सकते हैं और अपने कर्मचारियों को भी निकालने का फ़ैसला करने से बच सकते हैं. साथ ही आपको अपनी जमापूंजी के घटने या ख़त्म होने की भी कोई फ़िक्र नहीं होगी.
इस तरह से इस पैकेज का मक़सद काम-धंधों को बचाने पर है. साथ ही यह कोशिश भी की गई है कि लोगों की आजीविका सुरक्षित रहे.
बैंकों के लिए इसमें क्या है?
भारत में बैंक आरबीआई की निगरानी और रेगुलेशन में काम करते हैं. आरबीआई प्रूडेंशियल फ़्रेमवर्क के मुताबिक़, क़र्ज लेने वाले को बैंक के पैसे चुकाने में होने वाली किसी भी दिक़्क़त के चलते लोन एग्रीमेंट के नियम और शर्तों में होने वाला कोई भी बदलाव अकाउंट की रीस्ट्रक्चरिंग मानी जाएगी.
रीस्ट्रक्चिंग वाले खातों के लिए बैंकों को अतिरिक्त प्रावधान करने होते हैं. इस वजह से बैंकों के मुनाफ़े और टियर 1 कैपिटल में कमी आती है. जब ऐसा होता है तो बैंकों के पास क़र्ज़ देने के लिए भी कम पैसे बचते हैं.
ऐसे में किसी भी लोन के लिए पैसे चुकाने की शर्तों में छूट देना, मसलन ईएमआई को टालना या कुछ वक़्त तक न चुकाने की छूट देना या इसके फिर से कैलकुलेशन करने जैसे फ़ैसले के लिए बैंक को आरबीआई की इजाज़त लेनी पड़ती है.
एनपीए से बचने का रास्ता
कारोबार में मुश्किल से बैंकों के लोन न चुकाए जाने का जोखिम बढ़ता है. लोन के एनपीए होने का भी ख़तरा बढ़ जाता है.
इस राहत पैकेज का मक़सद यह है कि कारोबार जारी रहें. इसका मक़सद कारोबारियों को इस मुश्किल वक़्त में मदद देना है ताकि उनके काम-धंधे टिके रहें.
साथ ही लोन भी बैड कैटेगरी में जाने से बच जाएं और बैंकिंग सेक्टर को एनपीए की एक और लहर का सामना न करना पड़े.
मुश्किल वक़्त में बड़े उपाय की ज़रूरत
शुरुआत में 21 दिन के लिए लागू किए गए लॉकडाउन से ही कामकाज पूरी तरह से थम गया.
तब से हालात लगातार बिगड़ ही रहे हैं. इसके बाद लॉकडाउन को 3 मई तक के लिए और बढ़ा दिया गया है.
हमें यह नहीं पता कि 3 मई के बाद यह लॉकडाउन हटाया जाएगा या इसमें आंशिक रूप से छूट दी जाएगी या इसे आगे और बढ़ा दिया जाएगा.
यहां तक कि अगर लॉकडाउन को हटाया भी जाता है तो भी हालात सामान्य होने में महीनों लग सकते हैं.

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किस्त चुकाने की छूट बढ़ाई जाए
ऐसे में कारोबारों के सामने अभी अनिश्चितता का संकट मंडरा रहा है. एक तबके की ओर से यह भी मांग की जा रही है कि ईएमआई और इंटरेस्ट को चुकाने से छह महीने की छूट दी जाए.
मौजूदा हालात को देखते हुए आरबीआई को इस मांग पर ग़ौर करना चाहिए.
किस्त चुकाने से छूट से न केवल कारोबारों को ख़ुद को टिकाए रखने में मदद करेगी, बल्कि इससे बैंकों को भी अपने एनपीए पर भी लगाम लगाने में मदद मिलेगी.
ब्याज़ माफ़ किया जाए
कुछ तबकों से यह भी मांग आ रही है कि ब्याज़ की माफ़ी दी जाए. इनकी मांग है कि ईएमआई में छूट की अवधि के दौरान इकट्ठा होने वाला ब्याज़ सरकार को चुकाना चाहिए.
आरबीआई के राहत पैकेज के मुताबिक़, ईएमआई चुकाने से छूट की अवधि ख़त्म होते ही ब्याज़ को एकमुश्त बैंक में जमा कराना होगा.
कारोबारों के लिए यह मुश्किल भरा होगा क्योंकि शायद वे तत्काल यह पैसा चुकाने की हैसियत में नहीं होंगे.
लेकिन, पूरा ब्याज़ माफ़ करना कोई हल नहीं है. सरकार को दूसरे विकल्पों पर विचार करना होगा.
ब्याज़ में कोई भी छूट ग़लत दिशा में उठाया गया क़दम होगा और इससे एक ग़लत परंपरा पड़ सकती है.
इसकी बजाय आरबीआई 6 किस्तों में बैंकों को यह ब्याज़ वसूलने की इजाज़त दे सकता है. साथ ही इस तरह का कोई भी रीपेमेंट ब्याज़ मुक्त होना चाहिए.

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सबको फ़ायदा मिलना सही?
रेगुलेटरी पैकेज को ख़ासतौर पर ऐसे क़र्ज़ लेने वाले लोगों के लिए बनाया गया है जो कि कोविड-19 से प्रभावित हुए हैं.
ऐसे लोगों को राहत देना इसका मक़सद है जो कि कोरोना वायरस की वजह से आर्थिक गतिविधियां ठप पड़ने का शिकार हुए हैं.
ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि सभी तरह के क़र्ज़ लेने वालों को इसका फ़ायदा देना क्या एक सही फ़ैसला है. मसलन, सरकारी कर्मचारियों की आमदनी पर इस महामारी का कोई असर नहीं है, लेकिन उन्हें भी इसका फ़ायदा मिलेगा.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी कंपनियों से अपील की है कि वे अपने कर्मचारियों की छंटनी न करें.
ऐसे में बड़ी कंपनियों में काम करने वाले लोगों को क्या पर्सनल लोन, ऑटो लोन, होम लोन में ईएमआई चुकाने में छूट नहीं देना एक अच्छा आइडिया हो सकता था. इस प्रक्रिया में बाद में डिफ़ॉल्टरों का डेटा इकट्ठा किया जा सकता था.
328 कंपनियां पहले ही इस पैकेज का फ़ायदा उठा चुकी हैं. ऐसे में क्या यह उनकी ड्यूटी नहीं बनती है कि वे प्रधानमंत्री की अपील पर काम करें.

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ईएमआई चुकाते रहना फ़ायदे का सौदा
आख़िर में, ऐसे लोगों को एक सलाह जिनकी आमदनी पर कोई बुरा असर नहीं पड़ा है. ऐसे लोगों को अपनी ईएमआई चुकाना जारी रखना चाहिए.
ईएमआई चुकाने से छूट का फ़ायदा उठाना आपको महंगा साबित हो सकता है क्योंकि इंटरेस्ट पर आपको ज़्यादा पैसे चुकाने होंगे.
मिसाल के तौर पर, अगर आपकी ईएमआई 50,000 रुपये है और आपने 9 फ़ीसदी सालाना की दर पर क़र्ज़ लिया है तो 3 महीने तक ईएमआई टालने पर आपको बतौर ब्याज़ 2,260 रुपये ज़्यादा चुकाने होंगे.
अगर आप क्रेडिट कार्ड के पेमेंट को टालते हैं तो आपकी जेब पर और ज़्यादा बोझ पड़ने वाला है क्योंकि बैंक मंथली बेसिस पर 1.5 फ़ीसदी से 3 फ़ीसदी ब्याज़ वसूलते हैं.
ऐसे में अगर आप पैसे चुकाने की स्थिति में हैं तो ईएमआई टालने का फ़ैसला न करना ही आपके लिए फ़ायदे का सौदा है.



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