कोरोना वायरस: युद्ध से ज़्यादा ख़तरनाक रही है भारत में महामारी

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- Author, प्रोफ़ेसर बद्री नारायण
- पदनाम, समाजशास्त्री
भारत के मानचित्र में कई अनुपस्थितियाँ दर्ज हैं. यह अनुपस्थितियाँ महामारियों में बर्बाद हो गए उन गाँवों की भी है जहाँ कोई नहीं बचा था.
उत्तर भारत मे विभिन्न सामाजिक शोध परियोजनाओं के तहत क्षेत्र अध्ययन के लिए हम लोगों को गाँवों में जाना होता था. गाँवों-देहातों के अध्ययन के सिलसिले मे घूमते वक़्त दूरस्थ क्षेत्रों में कुछ गाँवों से थोड़े दूर पर कुछ टीले दिखते थे.
आस-पास के लोगों से पूछने पर कहीं-कहीं यह सुनने को मिलता था कि इन टीलों पर कभी गाँव था, आबादी बसती थी. किन्तु महामारी मे बर्बाद हो गया. लोग या तो मर गए या गाँव छोड़ कर चले गए. कई जगह इन्हें 'बीमारी का टिला' कहते हैं. गाँवों में महामारी को लोग 'हैजा, चेचक' के नाम से याद करते हैं.
कहीं-कहीं यह भी सुनने को मिलता था कि कुछ टीले 1857 के आंदोलन में बर्बाद हुए गाँवों के अवशेष हैं. उस समय जहाँ भी लोगों के मुँह से महामारी से तबाह हुए गाँवों के बारे में सुनने को मिला, उन्हें तब गहरा अध्ययन कर उनके इतिहास को हम उकेर नहीं पाए थे. किन्तु आज कोरोना महामारी का वर्तमान हमें उस अतीत की तरफ़ ले जाता है. विशेषकर उस औपनिवेशिक अतीत की तरफ़ जब महामारियों ने भारतीय आबादी की एक बड़ी संख्या को तबाह कर दिया था.
भारत में हैजा, प्लेग, चेचक (स्मॉल पॉक्स), मलेरिया, टायफाइड, टी0बी0 इत्यादि आते रहे हैं. भारतीय इतिहास में 1870 से 1910 के काल खण्ड को 'महामारी एवं आकाल का युग' ही कहा जाता है. आकाल ने तो किया ही महामारियों ने भी भारत मे व्यापक जनसंहार किया.
1892-1940 के बीच बताया जाता है कि भारत में प्लेग से एक करोड़ के आस-पास लोग मरे. 1880 में प्रति हज़ार मे 40 लोग मृत्यु के आगोश में समा जाते थे. इसी तरह कॉलरा, मलेरिया सबमें मरने वालों के अपने-अपने आँकड़े मौजूद हैं.

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इन महामारियों ने भारतीय समाज की जनसंख्या में भारी फेर बदल किया. उन महामारियों के कारण अनेकों गाँव हमारे मानचित्र से ग़ायब हो गए. इतिहासकारों ने वर्णन किया है कि किस प्रकार 1880 के आस-पास लोग गाँव छोड़-छोड़ भाग रहे थे. तब महामारियाँ गाँवों में ज्यादा फैली थी. शहरों में कम. वहीं अब नया कोरोना महामारी शहरों में ज्यादा दिख रहा है. गाँवों में इसका प्रसार अभी काफ़ी कम है.
गोवा में सैन्गुएम तालुका पर हुए एक अध्ययन से पता चलता है कि महामारी के कारण 1900-1910 के बीच वहाँ से 15 गाँव मानचित्र से ही ग़ायब हो गए. वहीं उसी कालखण्ड में दक्षिणी गोवा के कोना-कोना क्षेत्र में इसी कालखण्ड में चार गाँवों के हमारे भौगोलिक मानचित्र से ग़ायब हो जाने की भी सूचना मिलती है.
इसी के कारण इसी महामारियों के कालखण्ड में भारत में जनसंख्या प्रतिशत दर 0.37 प्रतिशत से ज्यादा नहीं थी. 1920 के बाद भारतीय जनसंख्या वृद्धि दर में बढ़ोतरी पाई गई.
न केवल गोवा और उत्तर भारत में बल्कि पंजाब में हुए अध्ययनों में भी पाया गया है कि वहाँ के भी अनेक गाँव महामारियों के कारण ख़त्म हो गए थे. इतिहासकारों ने अपने अध्ययनों से दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु में बताया है कि किस प्रकार महामारियों के कारण वहाँ के अनेक गाँव तबाह हो गए थे.
युद्ध के वक़्त लोग आस-पास के पहाड़ियों और जंगलों में शरण ले लेते थे. युद्ध ख़त्म होने पर गाँवों में वापस लौट आते थे. किन्तु महामारियों से बच कर कहीं शरण लेना भी मुश्किल था. ऐसे में या तो बीमारी से अपने भीतर की प्रतिरोध शक्ति और देशज जीवनचर्या के कारण वे किसी तरह बच जाएं या बर्बाद हो जाए, दो ही रास्ते थे.

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दक्षिण भारत में 68 प्रशासनिक इकाइयों के 32 हज़ार 993 स्थलों के अध्ययन में लगभग 12.8 प्रतिशत ऐसे स्थल पाए गए हैं, जो पहले गाँव थे, जहाँ आबादियाँ बसती थी. लेकिन 1800-1825 दौर में वे तबाह हो गए थे. न केवल भारत में बल्कि अफ्ऱीकी मुल्कों में भी महामारियों के कारण गाँवों या समुदायों के समूल नाश की सूचनाएँ भी मिलती हैं. इबोला और स्मॉल पॉक्स से चिली, अमेजन के साथ कई मुल्कों में कई गाँव मिट गए. कई जातीय समुदाय बर्बाद हो गए.
महामारियों से गाँव के गाँव उजड़ जाने की सूचना हमें कई पश्चिमी मुल्कों के सामाजिक इतिहासों के अध्ययन करने पर भी मिलती है. कई बार युद्ध से ज़्यादा महामारियों ने तबाही बरपाई है. पहले विश्व युद्ध से ज़्यादा 1918-20 में आए फ्लू ने दुनिया भर में तबाही मचाई थी
जब आधुनिक मेडिकल प्रणाली और विज्ञान इतना सशक्त नहीं था, तो लोगों ने अपने देशज रहन-सहन, देशज क्वॉरंटीन और देशज चिकित्सा पद्धति से इन रोगों का प्रतिकार किया.
पूजा, पाठ, लोक विश्वास सबका सहारा तब मानवीय समाज ने लिया होगा. किसी तरह से इन विपदाओं का सामना करते हम यहाँ पहुँचे हैं. 1600 ई0 में बंगाल में पहला आधुनिक चिकित्सा पद्धति का डॉक्टर ईस्ट इन्डिया कम्पनी के जहाज से एक जहाजी डाक्टर के रूप में उतरा था. धीरे-धीरे अंग्रेज़ों ने भारत में आधुनिक चिकित्सा पद्धति जिसे अंग्रज़ी चिकित्सा कहा गया, का विकास एवं विस्तार किया.
19वीं शताब्दी में बंगाल से होकर भारत के अन्य भागों में फैले एक महत्वपूर्ण घातक महामारी मलेरिया को 'बर्द्धवानफीवर' का नाम दिया गया था.
अंग्रेज़ी चिकित्सा पद्धति अभी भारत में ठीक से विकसित भी नहीं हो पाई थी, उसे 18वीं-19वीं शताब्दी में भारत के गाँवों में फैल रहे प्लेग, मलेरिया जैसे महामारियों का मुक़ाबला करना पड़ा.
यह चिकित्सा पद्धति भारत में महामारियों से लड़ने में तब कितना सक्षम हो पाई, यह तो कहना मुश्किल है, किन्तु मानव समाज इन आपदाओं से उबर कर निकल ही आया. यह ठीक है कि हमने इन आपदाओं में एक बड़ी आबादी को खोया. हमारे अनेक गाँव नेस्तनाबूद हो गए. वे हमारी मानचित्र एवं स्मृतियों से भी ग़ायब हो गए. किन्तु भारतीय समाज ने हर महामारी से कुछ सीखा और अपनी जीवन शैली में कुछ सुधार किया.
महामारियों ने तब मानवीय पलायन को गति भी दी थी. जो क्षेत्र इन महामारियों से ज़्यादा प्रभावित थे, उन्हें छोड़ कर वहाँ की आबादी से कुछ लोग भाग कर किसी दूसरे क्षेत्र में भी जाकर बस गए थे.
मध्य प्रदेश के बुन्देलखंड के एक गाँव के कुछ परिवार याद करते हैं कि उनके पूर्वज बिहार के रहने वाले थे. किन्तु 1920 के आस-पास फैले महामारी के दौर में बिहार छोड़ यहाँ आकर बस गए थे. इस प्रकार महामारियों ने हमारी आबादी के एक भाग को 'स्थायी विस्थापन' के लिए बाध्य भी किया था.
आज कोरोना के समय में हो रहा प्रवासी मजदूरों की घर वापसी या विस्थापन अस्थायी है. जैसे ही कोरोना का असर कम होगा, कामकाज खुलेंगे तो ये लोग फिर अपने उन्हीं शहरों की ओर लौट आएंगे, जिन्हें वे छोड़ कर गए थे. वहीं आज प्रशासन इतना डाक्यूमेन्टेशन पर आधारित है कि स्थायी प्रवसन अब उतना आसान नहीं रहा. दूसरे ज़मीन के भाव भी अब बहुत बढ़ गए हैं. ऐसे में एक जगह छोड़ कर दूसरे जगह जा बसना अब उतना आसान नहीं रहा.
अब हम जहाँ हैं वहीं रहकर कोरोना से हमें जूझना है. सूचनाओं, सुविधाओं और विज्ञान की शक्ति आज हमें उतना बेवस भी नहीं होने देगी, जैसा हम औपनिवेशिक काल में आए महामारियों के दौर में थे. फिर भी हानि तो हानि है, उससे उबरने के जद्दोजहद में आज पूरी दुनिया का मानव समाज लगा है.

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