Hydroxychloroquine : हिमाचल की फ़ार्मा कंपनियां कैसे कर रही हैं संकट का सामना

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- Author, अश्विनी शर्मा
- पदनाम, शिमला से बीबीसी हिंदी के लिए
हिमाचल प्रदेश की फ़ार्मा इंडस्ट्री का वार्षिक टर्नओवर हर साल 40,000 करोड़ रुपये का है जिसमें से 15,000 करोड़ रुपये की दवाएं विदेशों में निर्यात की जाती हैं.
ये वो जगह है जहां पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्लांट लगे हुए हैं.
ज़िंदगियां बचाने वाली दवाओं और जड़ी-बूटियों की आपूर्ति के साथ ये सांस, अर्थराइटिस, डायबिटीज़, वज़न नियंत्रित करने, डिप्रेशन और मलेरिया के इलाज में काम आने वाली हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन जैसी दवा का उत्पादन करती रही है.
हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन को कोविड-19 से पीड़ित लोगों का इलाज कर रहे स्वास्थ्यकर्मियों के लिए एक ज़रूरी दवा बताया जा रहा है.
लेकिन कोरोना वायरस के चलते शुरू हुए लॉकडाउन को एक महीना बीत चुका है. और इसकी वजह से इस औद्योगिक क्षेत्र में दवाओं का उत्पादन रुका हुआ है.
इसके चलते भारत से लेकर अमरीका में प्रचलित इस औद्योगिक क्षेत्र की दवाओं की आपूर्ति पर भारी असर पड़ा है.
हालांकि, गृह मंत्रालय की ओर से आए विशेष निर्देशों के तहत हिमाचल प्रदेश सरकार ने दवाओं बनवाने के काम को शुरू करवा दिया है. लेकिन इस क्षेत्र का हाल अभी भी संतुष्टि से भरा हुआ नहीं है.
सरकार की ओर से मिली तमाम छूटों के बावजूद यहां पर पहले की तरह काम शुरू नहीं हुआ है.
सरकार ने कंपनियों को ऐसे कर्फ़्यू पास दिये हैं जिनकी मदद से राज्यों और ज़िलों के बीच आवागमन किया जा सकता है और दूसरी जगहों से कामगारों को बुलाया जा सकता है.
सरकारी जानकारी के मुताबिक़, 342 फ़ार्मास्युटिकल यूनिट्स में से 231 ने काम करना शुरू कर दिया है.

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कई रुकावटें भी हैं सामने
सरकार ने दवाओं की पैकिंग के सामान जैसी ज़रूरी चीज़ों की आपूर्ति करने वाली कंपनियों को भी ज़रूरी सहायता दी है ताकि वे भी अपना उत्पादन शुरू कर सकें. सरकार के प्रयासों के सामने कई तरह की रुकावटें भी आ रही हैं.
इनमें से एक रुकावट बद्दी-बरोटीवाला के झरमजरी क्षेत्र में हैं. क्योंकि यहां पर एक महिला की मौत कोरोना वायरस से हो चुकी है. इसके बाद उनके परिवार के चार अन्य लोग भी कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए हैं.
इसकी वजह से इस पूरे क्षेत्र को सील करके हर तरह की औद्योगिक गतिविधियों को रोक दिया गया है.
बीती 14 अप्रैल से बंद होने वाली बड़ी फ़ार्मा कंपनियों में वॉकहार्ड्ट, यूएसवी, वीनस रेमेडीज़, स्माइलेक्स हेल्थकेयर शामिल हैं.
इस क्षेत्र में आद्योगिक गतिविधियों को दोबारा शुरू कराने का काम देख रहे सरकारी अधिकारी हंसराज शर्मा बताते हैं, "बीती अप्रैल में जब झरमजरी इलाक़े को बंद कर दिया गया तो कम से कम 49 औद्योगिक इकाइयों में काम ठप हो गया है. इनमें दवाएं बनाने वाली कुछ बड़ी कंपनियां भी शामिल हैं. अब राज्य सरकार ने चरणबद्ध ढंग से छूट देने का फ़ैसला किया है. उम्मीद करते हैं फ़ार्मा कंपनियां अपना उत्पादन जल्द ही शुरू करेंगी."

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फ़ार्मा कंपनियों के लिए काम शुरू करना क्यों मुश्किल
फ़ार्मा कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती कामगारों को लेकर है क्योंकि कंपनियों की क्षमता 25 से 30 फ़ीसदी तक पहुंच चुकी है.
वहीं, सिपला जैसी बड़ी कंपनियों में ये आंकड़ा 45 से 50 फ़ीसदी तक पहुंच पाया है.
कामगारों में कमी की वजह से इन इकाइयों को दो तीन शिफ़्टों में चलाना संभव नहीं है.
टोरेंट फ़ार्मास्युटिकल्स लिमिटेड के प्रमुख सौमेन मैती कहते हैं, "कामगारों का उपलब्ध न होना, एक बहुत बड़ी समस्या है. हमारे पास हिमाचल प्रदेश के कई कामगार थे. और कई लोग चंडीगढ़ और पंजाब से आने वाले भी थे. ये वजह है कि हम पूरी क्षमता के साथ उत्पादन नहीं कर पा रहे हैं."
वो मानते हैं कि सरकार लगातार कंपनियों की मदद कर रही है ताकि वे अपने कामगारों को सुरक्षित ढंग से बद्दी बुला सकें लेकिन लोग अपने घरों से नहीं निकल रहे हैं. लोगों के मन में कोरोना वायरस को लेकर एक तरह का डर बैठ गया है.
जब उनसे पूछा गया कि वो कब तक अपने पुरानी स्थितियों के लौटने की उम्मीद करते हैं.
इस सवाल के जवाब में मैती कहते हैं, "मैं इस बारे में कुछ भी नहीं बता सकता हूं. इस सबके अलावा कच्चा माल समेत दूसरा माल जो कि आंध्र प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, बेंगलुरु और उत्तर प्रदेश से आता है, वो भी एक समस्या है."
कितनी कंपनियां बनाती हैं हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन
नालागढ़ में तबलीग़ी जमात से लौटे आधे दर्जन लोगों के टेस्ट किए गए जिसके बाद कई यूनिट कंटेनमेंट ज़ोन में आती हैं जिन्हें बंद कर दिया गया है. इन यूनिट में पेनेक्स बायोटेक, मोरपीन लेबोरेट्रीज़, एबॉट इंडिया, सिप्ला इंडिया, डॉक्टर रेड्डीज़, ग्लेनमार्क फ़ार्मा और मेकलियोड्स शामिल हैं.

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ड्रग कंट्रोलर नवनीत मारवा बताते हैं, "कम से कम 51 फ़ार्मास्युटिकल कंपनियों को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन बनाने का लाइसेंस मिल चुका है. 14 कंपनियों ने यह बनानी भी शुरू कर दी हैं और बाकी की कंपनियां ऑर्डर आने का इंतज़ार कर रही हैं ताकि वो डिमांड पूरी कर सकें. अभी तक बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ इलाक़े में कुल 342 फ़ार्मा यूनिट्स हैं जिनमें से 231 में कामकाज जारी रखने को लेकर हम सुनिश्चित हैं."
हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि फ़ार्मास्युटिकल यूनिट में वर्कफ़ोर्स एक बड़ी समस्या है.
इन सबके बावजूद अधिकतर फ़ार्मा कंपनियों का इरादा है कि वो बाकी ज़िलों से अधिक मेनपावर को यहां ला सकें. लेकिन नवनीत मारवा ने दावा किया कि कहीं से भी दवाइयों और सेनिटाइज़र की स्पलाई में कोई कमी नहीं है.
दिग्गज फ़ार्मास्युटिकल कंपनी ज़ाइडस कैडिला हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन भी बनाती है और उसका ज़ोर है कि वो अपनी क्षमता का 50 फ़ीसदी तक संचालन कर सके. रिपोर्ट के अनुसार, डॉक्टर रेड्डीज़ लैब 25 से 35 फ़ीसदी संचालन करने में सक्षम है.
दवाई निर्माता मानते हैं कि उनके कर्मचारियों के न लौटने की वजह बेहतर आवासीय सुविधाओं का न होना भी है. वो यह नहीं जानते कि लॉकडाउन कब हटाया जाएगा. होटल और रेस्टॉरेंट बंद हैं और खाना न मिलना उनके लिए एक बड़ी समस्या है. इसके अलावा परिवहन भी एक बड़ी समस्या है.
एक फ़ार्मास्युटिकल प्लांट के प्रमुख बताते हैं, "कोरोना वायरस के इस दौर में कर्मचारी अपने आप को घरों में ज़्यादा सुरक्षित पाते हैं. बहुत से लोग अपने घरों तक पैदल गए हैं इसलिए वो तब तक वापस नहीं लौटना चाहेंगे जब तक कि वो इस बात को लेकर सुनिश्चित न हो जाएं कि वो जब चाहे वापस जा सकेंगे."

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सरकार दिला रही भरोसा
कन्फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) हिमाचल प्रदेश के पूर्व चेयरमैन अरुण रावत कहते हैं, "कोरोना वायरस संकट का इस उद्योग पर बड़े दूरगामी असर होने जा रहे हैं. कई समस्याएं हैं जिनका यह उद्योग अभी सामना कर रहा है. सिर्फ़ काम शुरू करना चुनौती नहीं है बल्कि सप्लाई चैन, वर्क फ़ोर्स और सहायक इकाइयों को वापस शुरू करना बड़ी चुनौतियां हैं. कइयों को तो पैसों की समस्याएं भी होने जा रही हैं."
अरुण रावत कहते हैं कि लॉकडाउन के बाद जब से सभी उत्पादन गतिविधियां रुक गई हैं तब से काग़ज़, तार और अन्य सामानों जैसे कच्चे माल की कमी हो गई है और अधिकतर माल उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात जैसे राज्यों से आता है, सप्लाई चेन बाधित हुई है तो फ़ार्मा यूनिट कैसे शुरू हो पाएंगी.
राज्य के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर कहते हैं, "हमारे राज्य में दवा निर्माताओं की मांग को देखते हुए हमने कंपनियों को कहा है कि वो अपनी वर्कफ़ोर्स को वापस लाएं जिसके लिए हम उत्पादन को फिर से शुरू करने की सारी सुविधाएं देंगे. उन्हें सलाह दी गई है कि काम के दौरान उन पर नज़र रखी जाए कि वर्कफ़ोर्स सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रही है या नहीं और वो कोविड-19 के ख़तरे में तो नहीं हैं. राज्य सरकार की टीमें इन कंपनियों के साथ मिलकर इनकी सभी समस्याओं को लेकर मिलकर काम कर रही हैं. ट्रकों की उपलब्धता और दूसरी ज़रूरी चीज़ों के लिए पुलिस को कहा गया है."
विपक्ष के नेता और कांग्रेस काल में उद्योग मंत्री रहे मुकेश अग्निहोत्री का मानना है कि अगले कुछ सालों में फ़ार्मास्युटिकल सेक्टर में बड़ा उछाल आएगा.
वो कहते हैं, "मेरे कार्यकाल में बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ इलाक़े को वैश्विक फ़ार्मा सुपर-हब के तौर पर बढ़ावा देने की कोशिशें की गई थीं. कोविड-19 संकट के बाद कुछ राज्य वैश्विक फ़ार्मा कंपनियों को आकर्षित करने में लग सकती हैं. मेरा केंद्र और राज्य सरकार से अनुरोध है कि वो फ़ार्मा कंपनियों की हर संभव मदद करें. ये स्थानीय लोगों के लिए नौकरी और राज्य के लिए धन लाएंगी."



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