कोरोना काल में नॉन बैंकिंग सेक्टर: कंगाली में आटा गीला

    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

विकास मंडल एक युवा उद्यमी हैं. वो दक्षिण दिल्ली के ग्रेटर कैलाश इलाक़े में रहते हैं. लॉकडाउन से पहले वो पश्चिमी बंगाल सरकार के एक गेस्ट हाउस में केयरटेकर थे.

बचे समय में कुछ घरों में खाना बनाने का काम करते थे. उनका सपना था विदेश जाकर बावर्ची का काम करना लेकिन पैसे की तंगी थी तो उनका सपना पूरा न हो सका

वो इन दिनों एक ऑनलाइन ग्रोसरी स्टोर की तरफ़ से दक्षिण दिल्ली के घरों में ग्रोसरी पहुंचाते हैं. उन्होंने देश में कोरोना वायरस के फैलने से पहले, यानी जनवरी में, एक मोटर साइकिल ख़रीदने के लिए लोन अप्लाई किया था. लेकिन बाद में अपन इरादा बदल दिया.

विकास कहते हैं, "मंदी शुरू हो चुकी थी. मोटर साइकिल ख़रीदना मेरी प्राथमिकता नहीं रही थी. मेरे पास एक पुराना स्कूटर पहले से था. मुझ पर और भी क़र्ज़े थे. एक और क़र्ज़ नहीं लेना चाहता था."

विकास मुर्शिदाबाद (पश्चिमी बंगाल) के हैं और दिल्ली उनका "दूसरा घर" है. लॉकडाउन लागू होने के बाद जब सब कुछ बंद हो गया तो वो अचानक से बेरोज़गार हो गए. लेकिन उनका दिमाग़ चलता रहा. वो हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने वालों में से नहीं थे.

क़िस्मत ने उनका साथ दिया और वो लॉकडाउन के दौरान हायर होने वाले 15,000 डिलीवरी बॉयज़ में से एक हो गए.

विकास देश में मोटर साइकिल या वाहन ख़रीदने का इरादा बदलने वाले अकेले इंसान नहीं हैं. भारत में ऐसे लोगों की संख्या बहुत बढ़ गई है जिन पर ज़रुरत से ज़्यादा लोन का बोझ है, जिसके कारण उनकी ख़रीदारी की शक्ति कम हो गयी है

इस मामले पर मुंबई में आर्थिक मामलों के जानकार फिरोज़ बाटलीवाला कहते हैं, "इसका उदाहरण इस तरह से है कि एक इंसान के पास एक छोटी चादर है, जब वो पैरों को ढँकता है तो सर खुल जाता है और जब सर ढँकता है तो पैर खुल जाते हैं. एक परिवार में कई तरह के क़र्ज़े हैं. अब अधिक क़र्ज़ लेने की स्थिति में वो नहीं हैं."

इसका असर डिमांड पर होता है जिसके कारण अर्थव्यवस्था में सुस्ती आती है. ये तो थी बात कोरोना वायरस के फैलने से पहले की.

अब कोरोना वायरस के फैलाव और इसके बाद 3 मई तक लॉकडाउन के बढ़ जाने के कारण मांग ठप, पैदावार ठप और आर्थिक स्थिति डावाँडोल.

उदयोग संघ फ़िक्की की अध्यक्ष डॉक्टर संगीता रेड्डी ने मंगलवार को एक प्रेस रिलीज़ में कहा, "अनुमान है कि पिछले 21 दिनों के लॉकडाउन के कारण भारत को लगभग 40,000 करोड़ रुपए रोज़ाना का नुकसान हो सकता है. अनुमान ये भी है कि अप्रैल-सितंबर 2020 की अवधि में चार करोड़ के क़रीब नौकरियां ख़तरे में हैं. इसलिए ऐसे में एक आर्थिक राहत पैकेज बहुत महत्वपूर्ण होगा."

इससे अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्र बुरी तरह से प्रभावित हो रहे हैं. इस परिप्रेक्ष्य में नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी या एनबीएफ़सी का संकट कई मायने में गंभीर है

ये संकट भारत के सबसे सम्मानित NBFC में से एक, IL & FS में सितंबर 2018 में शुरू हुआ, जब ये कंपनी बैंकों से हासिल किए गए 91,000 करोड़ रुपए के अपने क़र्ज़ को वापस न कर सकी. ये इस बात का एक छोटा सा संकेत था कि डिमांड गिर रही है और अर्थव्यवस्था में सुस्ती आ रही है.

ये वित्तय संकट विश्वास के संकट में बदल गया. रघुवीर मुख़र्जी IIFL Investment Managers के Chief Risk Officer हैं. वो कहते हैं, "ये एनबीएफसी के ख़िलाफ़ विश्वास का संकट था. बैंकों ने उन्हें क़र्ज़ देना बंद कर दिया. म्यूचुअल फंड एनबीएफसी के लिए एक अहम सोर्स था क्योंकि एनबीएफसी को इनसे कम ब्याज दर पर शार्ट-टर्म पर पैसे मिल जाते थे. उन्होंने भी हाथ खींच लिया."

इससे नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल क्षेत्र को बड़े झटके लगने शुरू हो गए और इसकी वजह से देश की अर्थव्यवस्था का विकास दर और गिरने लगा.

एनबीएफ़सी का छोटे कारोबार और व्यापर से क्या संबंध?

नोएडा के गौतम वर्मा अमरीका में सालों से रहते हैं. पैसे बचाकर उन्होंने नोएडा में आठ साल पहले तीन कमरों का एक फ़्लैट बुक किया था. उन्होंने आख़िरी क़िस्त छोड़ कर सारी क़िस्तें अदा कर दी थीं.

उन्हें 2018 में अपने फ़्लैट की चाबी मिलनी थी लेकिन फ्लैट अब तक तैयार नहीं है. इसका कारण है रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन कंपनियों में संकट. इस क्षेत्र को क़र्ज़ देने वाली संस्थाओं में एनबीएफ़सी सबसे आगे है. इस संकट के कारण एनबीएफ़सी के पैसे इस क्षेत्र में फँस गए हैं जिनसे लाखों लोगों को फ्लैट नहीं मिल पाए हैं.

विकास मंडल जैसे उपभोक्ताओं को वाहन लोन के लिए भी एनबीएफ़सी कंपनियों की तरफ़ अक्सर रुख़ करना पड़ता है.

इसके इलावा लघु और मध्यम आकार के उद्यम या व्यवसाय को अधिकतर एनबीएफ़सी संस्थाओं से क़र्ज़ मिलते हैं जिनमें रेस्टोरेंट, साबुन और तेल बनाने वाली कंपनियां शामिल हैं जो भारत की अर्थव्यवस्था की जान हैं.

रघुवीर मुख़र्जी कहते हैं कि लघु और मध्यम आकर के व्यवसाय को पहली मार नोटबंदी से मिली. एनबीएफसी ने इनकी काफ़ी फंडिंग की थी, जिससे लेंडिंग प्रभावित हुई. ये एनबीएफसी के लिए दोहरी मार साबित हुई."

NBFC क्या है और अर्थव्यवस्था के लिए क्यों ये अहम है?

ये कंपनियां कमर्शियल बैंकों के दायरे से बाहर क़र्ज़ देने वाली वित्तीय संस्थाएं हैं, जो देश के उन लाखों छोटे कारोबार को लोन देती हैं जिनकी लागत एक लाख रुपए से लेकर 10 करोड़ रुपए तक है.

वो बड़े क़र्ज़ भी देती हैं. इन संस्थाओं में बैंकों की तरह आप पैसे जमा नहीं करते हैं लेकिन बैंकों की तरह इनसे क़र्ज़ ले सकते हैं.

एनबीएफ़सी छोटे धंधों को क़र्ज़ देने के लिए बैंकों से क़र्ज़ लेती है, म्यूच्युअल फंड से पैसे उठाती है. इसकी फंडिंग के ज़रिए और भी कई होते हैं.

एनबीएफ़सी की अहमियत पर APAC वित्तीय सेवा प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक और भारत में डॉयचे बैंक के पूर्व अध्यक्ष गुणित चड्ढा कहते हैं, "मुझे लगता है कि भारत सहित दुनिया भर में NBFC ऋण देने वाले इको सिस्टम का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है. जो बात मेरे लिए बहुत स्पष्ट है वो ये है कि उन व्यवसायों को ऋण देने में एनबीएफसी की बहुत ही विशिष्ट भूमिका है जो बैंकों के क़र्ज़ों से अधीन हैं."

हाउसिंग, वाहन लोन, वाइट गुड्स उत्पाद, छोटे और मध्यम उद्यम और स्टार्टअप कंपनियों को मुख्य रूप से इन्हीं संस्थाओं से क़र्ज़ मिलता है. ये छोटे और मध्यम उद्यम के लिए ऑक्सीजन का काम करती हैं जो हमारी अर्थव्यवस्था की जान हैं.

इस क्षेत्र के डेटा के अनुसार भारत में 11,000 से अधिक NBFC संस्थाएं हैं जिनमें से लगभग 220 बड़ी मानी जाती हैं और जिनका कुल असेट 25 लाख करोड़ रुपए से अधिक है. इस क्षेत्र की कुछ बड़ी कंपनियों में HDFL, Power Finance Corporation, Bajaj Finance Limited और Muthoot Finance Limited शामिल हैं.

ये हर उस कारोबार को क़र्ज़ देती हैं जिन्हें कमर्शियल बैंक क़र्ज़ देने से कतराते हैं. इन संस्थाओं को RBI सीधे तौर से monitor करता है.

मोटे तौर पर हमारे और आपके रोज़ाना इस्तेमाल करने वाली सभी चीज़ों में इन वित्तीय संस्थाओं का भरपूर दख़ल है. इनका योगदान भारत के लगभग तीन खरब डॉलर वाले GDP में 12 प्रतिशत तक का है.

अगर ये संस्थाएँ छोटे और मध्यम उद्यम को क़र्ज़ देंगीं तो पैदावार बढ़ेगा और डिमांड भी. लेकिन इनके बीच पैसों की कमी के कारण छोटे और मध्यम कंपनियों को क़र्ज़ मिलने का ज़रिया बंद हो जाएगा और इससे मांग गिरेगी जिससे अर्थव्यवस्था में भूचाल आएगा.

खुदरा व्यापर में भी एनबीएफ़सी के क़र्ज़ों का खूब दख़ल होता है. रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष कुमार राजगोपालन कहते हैं कि आरबीआई ने जो उनकी मदद के लिए क़दम उठाए हैं वो काफ़ी नहीं है.

उनके अनुसार एनबीएफ़सी हो या कमर्शियल बैंक वो वेतन और किराए जैसे ख़र्चों के लिए ऋण नहीं देते. ज़ाहिर है इससे नौकरियों पर असर होगा.

कोरोना वायरस का एनबीएफ़सी क्षेत्र पर प्रभाव

अगर लॉकडाउन से पहले ही इन संस्थाओं में संकट था तो इसके बाद इसने और भी गंभीर रूप धारण कर लिया है.

गुणित चड्डा कहते हैं कि संकट एनबीएफ़सी सेक्टर की बड़ी कंपनियों में अधिक आएगा. वो कहते हैं, "कोरोना वायरस का फैलाव अभी जारी है. कोई भी जोख़िम का अनुमान नहीं लगा सकता है. विमानन, हॉस्पिटैलिटी जैसे क्षेत्रों पर असर अधिक होगा. कुछ एनबीएफ़सी कंपनियों पर इसका गहरा असर होगा, ख़ास तौर से उन बड़ी कंपनियों पर जिन्होंने शहरी इलाक़ों में स्थित कारोबारों को अधिक क़र्ज़ दिए हैं."

आर्थिक मामलों के जानकार विवेक कौल कहते हैं कि अगर एनबीएफ़सी का संकट एक बड़ा संकट है और अगर इसे दूर न किया गया तो मोदी सरकार की आर्थिक संकट से उबरने की कोशिशों को एक बड़ा झटका लग सकता है.

रघुवीर मुख़र्जी के विचार में ये संकट रोका न गया तो अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर समस्या पैदा हो जाएगी. वो कहते हैं, "इसका इलाज ये है कि आम आदमी के जन धन योजना के अंतर्गत खातों में पैसे दिए जाएँ. राज्य सरकारों के हाथों में पैसे दिया जाएँ ताकि डिमांड पैदा हो."

वो आगे कहते हैं कि ऐसा न हुआ तो ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोज़गारी से सामाजिक समस्या पैदा हो सकती है.

एनबीएफ़सी का भविष्य

भारत की अर्थव्यवस्था की मदद के लिए RBI ने हाल में कई क़दम उठाए हैं, जिससे कमर्शियल बैंकों में लाखों करोड़ रुपए आए ताकि वो बड़े उद्योग को क़र्ज़ दे सकें. इसने क़र्ज़दारों के लिए तीन महीने के लिए क़र्ज़ों को ना देने की घोषणा की.

लेकिन इससे एनबीएफ़सी को अलग रखा गया. इसका मतलब ये हुआ कि एनबीएफ़सी से जिन लोगों ने या कारोबार ने क़र्ज़ लिए हैं वो तीन महीनों के लिए अपनी क़िस्तें नहीं देना चाहें तो ठीक है. लेकिन एनबीएफ़सी ने जो बैंकों से क़र्ज़ लिए हैं उन पर ये लागू नहीं होता है, यानी इन संस्थाओं को बैंकों को अपने क़र्ज़ों की क़िस्तें वापस करते रहना होगा.

इन संस्थाओं के डेलिगेशन ने हाल में RBI के गवर्नर से मुलाक़ात करके इस बात की मांग की है कि उनके क़र्ज़ों की वापसी पर भी तीन महीने के moratorium का आदेश जारी किया जाए. RBI ने अभी अपना फ़ैसला नहीं सुनाया है.

गुणित चड्डा के विचार में इस सेक्टर को बैंकों और रेगुलेटर का विश्वास वापस हासिल करना होगा. नया बिज़नेस मॉडल ढूंढ़ना होगा. वे कहते हैं, "मुझे लगता है कि कोरोना वायरस के ख़त्म होने के बाद कई एनबीएफसी कंपनियां बंद होंगी जिन्हें बड़ी कंपनियां ख़रीद लेंगी और आगे एक साल के बाद इसके दोबारा ज़िंदा होने की शक्ति पैदा होगी."

विकास मंडल जैसे आम आदमी को शायद इस बात का अंदाज़ा नहीं कि इनकी रोज़मर्रा की ज़रूरतें किस क़दर इस सेक्टर की अच्छी सेहत पर निर्भर है.

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