कोरोना: शिमला में फंसे कश्मीरी मज़दूर, घर लौटने को बेचैन

कश्मीरी मज़दूर

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    • Author, अश्विनी शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, शिमला से

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स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

जामा मस्जिद के दरवाज़े पर स्थानीय पुलिस ने दस्तक दी तो 42 साल के कश्मीरी प्रवासी मज़दूर अब्दुल रशीद के चेहरे पर डर और आशंकाएं तैर गईं. उनकी बेबसी कई बार ग़हरी उदासी में बदल जाती है.

पुलिस मस्जिद में रह रहे 130 प्रवासी मज़दूरों की गतिविधियों पर नज़दीकी नज़र रखती है. इन मज़दूरों को यहां 'ख़ान' भी कहा जाता है. प्रशासन ने ग़ैर-सरकारी संगठनों के सहयोग से इन मज़दूरों तक राशन पहुंचाया है लेकिन इन्हें मस्जिद से बाहर निकलने की अनुमति नहीं है.

अब्दुल रशीद ने उदासी भरे लहज़े में बीबीसी को बताया, "हमारे लिए ये वक़्त किसी बुरे सपने जैसा है. कोई काम नहीं है. शहर में सबकुछ बंद है. पुलिस ने हमें मस्जिद के भीतर रहने और एक दूसरे से दूरी बनाए रखने की सख़्त हिदायत दी है. मेरे पास अपना ध्यान रखने के लिए अब कोई पैसा नहीं बचा है. मेरे पास अब खाने को भी कुछ नहीं है. ये सब बहुत परेशान करने वाला है. अब मैं वापस अपने घर लौटना चाहता हूं लेकिन सरकार कोई मदद नहीं कर रही है."

ब्रितानी दौर के चर्चित मॉल रोड के पास शहर के केंद्र में स्थित ये जामा मस्जिद अब कश्मीरी प्रवासी मज़दूरों के रहने का ठिकाना बन गई है. यहां से गुज़रने वाली मॉल रोड भी इन दिनों वीरान हैं.

कश्मीर से आए ये ख़ान आमतौर पर सामान ढोने का काम करते हैं लेकिन कई और कार्यों में इनकी विशेषज्ञता है. ख़ासकर कमर पर बोझ रखकर होटलों, दुकानों और बाज़ारों में पहुंचाने में. पूरे शिमला में ये लोग सामान ढोते हैं और दूसरे काम करते हैं.

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शिमला की 'लाइफ़ लाइन'

शिमला की पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था में इन प्रवासी मज़दूरों की अहम भूमिका है. इन्हें इस शहर की जीवनरेखा माना जाता है लेकिन इन दिनों ये कश्मीरी प्रवासी मज़दूर ग़हरे संकट में हैं.

लॉकडाउन की वजह से वो फंस गए हैं. उनके पास कोई काम नहीं हैं. वो पूरा दिन खाली बैठे रहते हैं. वो लॉकडाउन से सबसे ज़्यादा प्रभावित लोगों में हैं. और इन बेहद मुश्किल हालातों में वो अपने घरों से भी दूर हैं.

अब जब लॉकडाउन के आगे बढ़ने के आसार हैं, ये कश्मीरी मज़दूर अपने आप को फंसा हुआ महसूस कर रहे हैं.

जामा मस्जिद के अध्यक्ष मोहम्मद रियाज़ कहते हैं, "शुरुआत में इन लोगों को लगा था कि लॉकडाउन जल्द ही ख़त्म हो जाएगा लेकिन अब वो बेचैन हैं और डरे हुए हैं. वो नहीं जानते कि कितने दिन और उन्हें इस तरह बेकार रहना होगा. अगर सरकार यातायात की व्यवस्था करे तो वो अपने घरों को लौट जाएंगे. उन्हें संक्रमण होने का भी डर है."

पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक शिमला में 7000-8000 कश्मीरी ख़ान हैं जो अनंतनाग, बारामुला, शोपियां या कुलगाम जैसे ज़िलों से हैं. वो अपने घर से शिमला आते-जाते रहते हैं. जब काम नहीं होता तो ये वापस घाटी लौट जाते हैं.

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प्रशासन ने घर लौटने की मांग ठुकराई

शुरुआत में जामा मस्जिद में 200 प्रवासी मज़दूर रह रहे थे लेकिन जब पुलिस ने दूरी बनाने पर ज़ोर दिया तो कुछ को दूसरी जगहों पर भेज दिया गया. कुछ कश्मीरी ख़ान किराए पर रहते हैं लेकिन यहां भी वो एक साथ ही रहते हैं और खाना बनाते हैं.

शिमला के डिप्टी कमिश्नर अमित कश्यप ने कहा, "मैंने जामा मस्जिद के तीन खाली हॉल उनके रहने के लिए खुलवा दिए. उनसे दूरी बनाने के लिए कहा गया है और वो ऐसा करने के लिए राज़ी भी हो गए हैं. हमने उनके खाने का इंतेज़ाम किया है. किसी को भूखा नहीं रहने दिया जाएगा."

कुछ दिनों के लिए कर्फ्यू में ढील के दौरान उन्हें कुछ देर के लिए बाहर निकलने दिया गया और सामान ढोने का काम करने दिया गया ताकि दूध, ब्रेड, बटर और रोज़मर्रा की ज़रूरतों की आपूर्ति बनी रही.

हालांकि ज़िला प्रशासन ने उनकी बस किराए पर लेकर घाटी लौटने की मांग को ख़ारिज कर दिया है.

शिमला के डिप्टी कमिश्नर कहते हैं, "हिमाचल प्रदेश में कर्फ़्यू है. राज्य की सीमा पर आवाजासी पूरी तरह बंद है. हरियाणा, पंजाब और जम्मू-कश्मीर में भी यही स्थिति है. प्रवासी मज़दूरों या दूसरों को आने-जाने की अनुमति न देने के सख़्त आदेश हैं. लोगों से कहा गया है, वो वहीं रहें जहां वो हैं.''

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लॉकडाउन के बाद भी उम्मीद नहीं दिखती

कश्मीरी मज़दूर शारीरिक रूप से तगड़े और मज़बूत होते हैं. वो रात-दिन काम करते हैं और एलपीजी सिलेंडर, खाद्य पदार्थ, राशन, फर्नीचर, लगेज, घरेलू ज़रूरत की दूसरी चीजें, टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन जैसे सामान कमर पर लाद कर घर-घर पहुंचाते हैं.

शिमला के पहाड़ी रास्तों पर कमर पर भारी बोझा लादकर इधर-उधर पहुंचाने में उन्हें महारत हासिल है.

कई कश्मीरी प्रवासी मज़दूर तो यहां रहते-रहते पर्यटक गाइड और होटल एजेंट तक बन गए हैं. ऐसा करके वो अतिरिक्त आमदनी करते हैं.

कश्मीरी मज़दूरों की चिंता सिर्फ़ लॉकडाउन नहीं है बल्कि अनिश्चितता का माहौल भी है. वो न सिर्फ़ बेकार बैठे हैं बल्कि शिमला में इन्हीं दिनों शुरू होने वाला पर्यटन सीज़न भी कोरोना वायरस की वजह से बर्बाद होने की कगार पर है.

लॉकडाउन के बाद जब होटल और रेस्तरां खुलेंगे तब भी पर्यटक शायद ही यहां आएं. शहर में व्यापार भी पूरी तरह ठप पड़ा है.

अनंतनाग के रहने वाले ग़ुलाम रसूल कहते हैं, "अगर सैलानी शिमला नहीं आएंगे तो हम यहां क्या करेंगे? खाली बैठेंगे और भूखे मरेंगे? पर्यटन के सीज़न के दौरान हम अच्छा कमा लेते हैं और पैसा अपने परिवारों को भेजते हैं. अच्छा होता कि हम कश्मीर लौट पाते और अपने बच्चों के साथ रहते. अभी हमारी सबसे बड़ी चिंता है कोरोना वायरस का फैलना और खाने की कमी."

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घर लौटने की बेचैनी

एक अन्य कश्मीरी मज़दूर मंज़ूर ख़ान उनकी हां में हां मिलाते हुए कहते हैं, "इस वक़्त हम सिर्फ़ अपने परिवार के पास लौटना चाहते हैं. हमें घर जाना है इसलिए हमने डीसी साहिब से बस का इंतेज़ाम करने की ग़ुहार लगाई है और हम किराया देने को तैयार हैं.'

शिमला पुलिस ने सोशल डिस्टेंसिंग को लागू करने के लिए क़दम उठाए हैं. कुछ मज़दूरों से मस्जिद के बाहर जाने के लिए कहा गया है. उन्हें नीचे बाज़ार में एक दूसरी इमारत में रखा गया है. लेकिन स्थानीय लोगों ने पुलिस के इस क़दम का विरोध किया क्योंकि इस तंग इलाक़े में संक्रमण का ख़तरा था. पुलिस ने अपना क़दम वापस ले लिया और अब सभी 129 प्रवासी मज़दूर मस्जिद में रह रहे हैं.

शिमला के पुलिस अधीक्षक उमापति जामवाल ने कहा, "हम ये सुनिश्चित कर रहे हैं कि मस्जिद के भीतर ये लोग एक दूसरे से दूरी बनाए रखें. जो मज़दूर कर्फ़्यू में छूट के वक़्त बाहर काम के लिए जाते हैं, वो बाक़ी मज़दूरों के संपर्क में ना आएं. ये भी सच है कि वो मौका मिलते ही वापस लौटने के लिए बेचैन हैं."

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लॉकडाउन में हिमाचल

हिमाचल प्रदेश में अभी तक कोरोना संक्रमण के 32 मामले सामने आए हैं जिनमें से 24 तब्लीग़ी जमात से जुड़े हैं. पंजाब से सटा उना ज़िला जहां 14 मामले हैं, हॉटस्पाट है.

वहीं ज़िला सोलन भी प्रभावित हैं. यहां दिल्ली के निज़ामुद्दीन से लौटकर लोग आए हैं. इसके अलावा कांगड़ा, चंबा और सिरमौर ज़िले भी प्रभावित हैं.

मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर लॉकडाउन को बढ़ाने के पक्ष में हैं. सरकार महीने के अंत तक ब्लॉक स्तर तक टेस्ट कर लेना चाहती है.

मुख्यमंत्री का कहना है कि अभी हालात ऐसे नहीं है कि लॉकडाउन खोला जाए, ख़ासकर प्रभावित पांचों ज़िलों में. अभी तक आठ लोग शिमला और कांगड़ा ज़िला अस्पतालों में संक्रमण से ठीक हुए हैं. इनमें छह तब्लीग़ जमात से हैं.

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