कोरोना वायरस: लॉकडाउन से सूख रही है दार्जिलिंग चाय की हरियाली

    • Author, प्रभाकर मणि तिवारी
    • पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए

कोरोना वायरस के चलते देशव्यापी लॉकडाउन ने दुनिया भर में मशहूर दार्जिलिंग चाय की हरियाली को फीका कर दिया है. इस वजह से पहले फ्लश को भारी नुकसान पहुंचा है.

इस पर्वतीय क्षेत्र के बाग़ानों में सबसे बेहतरीन चाय पहले फ्लश के दौरान चुनी गई पत्तियों से ही बनती है. इसका विदेशों में निर्यात होता है. यही नहीं, अब दूसरे फ्लश पर भी खतरा मंडरा रहा है. लॉकडाउन के चलते इस उद्योग की कमर टूटने का अंदेशा है.

केंद्र सरकार ने शनिवार को आधे मजदूरों के साथ चाय बाग़ानों को चलाने की अनुमति दे दी थी. उसके बाद बाग़ान मालिकों के अनुरोध पर राज्य सरकार ने गुरुवार को महज 15 फ़ीसदी मजदूरों के साथ बाग़ानों को खेलने की अनुमति दी है. लेकिन अब तक जो नुकसान हुआ है उससे अब वैश्विक बाज़ार के भी हाथ से निकलने का ख़तरा पैदा हो गया है.

दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र, तराई और उससे सटे डुआर्स के मैदानी क्षेत्र के छोटे-बड़े 353 चाय बाग़ानों में साढ़े तीन लाख स्थायी और अस्थायी मज़दूर काम करते हैं. उनको रोजाना 176 रुपए की मज़दूरी के अलावा साप्ताहिक राशन दिया जाता है. लेकिन पर्वतीय क्षेत्र के बागानों को इस लॉकडाउन से सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा है.

इस वजह से पहले फ्लश यानी पहली बार हरी पत्तियां तोड़ने के काम को भारी नुकसान पहुंचा है. इस पर्वतीय क्षेत्र के बागानों में सबसे बेहतरीन और महंगी चाय इसी सीज़न में चुनी गई पत्तियों से बनती है. इसका लगभग पूरा हिस्सा विदेशों में निर्यात होता है. यही नहीं अब दूसरे फ्लश पर भी खतरा मंडरा रहा है. अगर 15 अप्रैल को लॉकडाउन खुलता भी है तो चाय की पत्तियां तैयार होने में दो से चार सप्ताह का समय लग जाएगा.

केंद्र ने शनिवार को इन बाग़ानों में 50 फीसदी कर्मचारियों के साथ काम शुरू करने को कहा है. लेकिन राज्य सरकार ने पहले इसकी अनुमति देने से इनकार कर दिया था. इसके अलावा मज़दूरों में भी कोरोना का आतंक है. गुरुवार को चाय उद्योग के प्रतिनिधियों के साथ बैठक के बाद ममता बनर्जी ने इसकी सशर्त अनुमति दे दी.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कहना था, "चाय बाग़ान मालिकों की दलील है कि अगर हरी पत्तियां नहीं चुनी गईं तो वे कुछ दिनों में बेकार हो जाएंगी. इसलिए सरकार ने बारी-बारी से 15 फीसदी मज़दूरों के साथ बाग़ानों में काम शुरू करने की अनुमति दी है. लेकिन वहां सुरक्षा का तमाम उपाय अपनाने होंगे."

पर्वतीय क्षेत्र के बागान मालिकों के संगठन दार्जिलिंग टी एसोसिएशन (डीटीए) के अध्यक्ष बिनोद मोहन कहते हैं, "हम राज्य सरकार के निर्देशों का पालन करेंगे. मजदूरों और उनकी सुरक्षा का मुद्दा हमारी पहली प्राथमिकता है." डीटीए के पूर्व अध्यक्ष अशोक लोहिया कहते हैं, "पहले फ्लश की चाय का लगभग सौ फीसदी निर्यात होता है. इस किस्म की चाय के उत्पादन में नुकसान से बाग़ानों के सालाना राजस्व पर प्रतिकूल असर पड़ना तय है."

दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र के 87 बाग़ानों में हर साल लगभग 80 लाख किलो चाय पैदा होती है. उसका एक-चौथाई उत्पादन पहले फ्लश के दौरान ही होता है. उसके बाद दूसरे फ्लश का कुल उत्पादन में 15 फीसदी हिस्सा होता है. देश के कुल चाय उत्पादन में दार्जिलिंग चाय का हिस्सा भले बहुत कम हो, पूरी दुनिया में इस चाय की भारी मांग है. वर्ष 2011 में यूरोपीय संघ ने इसे जीआई दर्जा दिया था.

डीटीए के अध्यक्ष बिनोद मोहन बताते हैं, "पहले फ्लश से सबसे बेहतरीन और कीमती चाय तैयार होती थी. लेकिन लॉकडाउन की वजह से यह फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई है. लॉकडाउन से पहले महज दो सौ किलो चाय ही तैयार हो सकी थी."

वह कहते हैं कि अप्रैल में लॉकडाउन ख़त्म होने तक इस उद्योग को भारी नुकसान हो चुका होगा. अगर 15 अप्रैल को लॉकडाउन ख़त्म भी हो जाता है तो पौधों के बढ़ जाने की वजह से उनकी पत्तियों से बेहतर क्वालिटी की चाय नहीं तैयार हो सकेगी.

उत्पाद ठप होने से ज्यादातर बाग़ानों के समक्ष मज़दूरी के भुगतान के लिए नकदी का गंभीर संकट पैदा हो गया है. डीटीए ने सरकार से इस मामले में सहायता देने का अनुरोध किया है. इससे पहले मालिकों की शीर्ष संस्था चाय बाग़ान मालिकों की शीर्ष संस्था द कंसल्टेटिव कमिटी ऑफ प्लांटेशन एसोसिएशंस (सीसीपीए) केंद्र सरकार से इस उद्योग को दलदल से उबारने के लिए वित्तीय पैकेज देने की मांग कर चुकी है.

उसका कहना है कि मौजूदा हालत में इस उद्योग के लगभग बारह लाख मजदूरों की रोज़ी-रोटी खतरे में पड़ गई है. इसके अलावा चाय के उत्पादन में गिरावट की वजह से वैश्विक बाजारों के भी हाथ से निकलने का खतरा मंडराने लगा है. संस्था का अनुमान है कि कोरोना के चलते जारी लॉकडाउन की वजह से इस उद्योग को कम से कम चौदह सौ करोड़ का नुकसान होगा.

सीसीपीए अध्यक्ष विवेक गोयनका ने हाल में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री को भेजे एक पत्र में कहा है, "चाय मज़दूरों को वेतन के भुगतान के लिए इस उद्योग को सरकारी समर्थन की जरूरत है."

समिति ने सरकार से तीन महीने तक हर मज़दूर के खाते में हर सप्ताह एक हज़ार रुपये जमा कराने का अनुरोध किया है.

सीसीपीए का कहना है कि चाय उद्योग इस मायने में दूसरे उद्योगों से अलग है कि यहां कुल लागत का 60 से 65 फीसदी मज़दूरों के भुगतान पर खर्च होता है. लेकिन लॉकडाउन के दौरान राजस्व ठप होने की वजह से चाय बाग़ान प्रबंधन मज़दूरों को भुगतान करने में समर्थ नहीं हैं. एक महीने की बंदी के दौरान बिना काम के मज़दूरों को भुगतान करने से कुल लागत में छह फीसदी इजाफा हो जाएगा. इसके अलावा बिक्री में भी पंद्रह फीसदी गिरावट आएगी. दार्जिलिंग टी एसोसिएशन की दलील है कि वैश्विक बाजारों में भारतीय चाय की श्रीलंका और केन्या जैसे देशों की चाय के साथ कड़ी प्रतिस्पर्धा है. ऐसे में अगर दूसरे फ्लश तक भी चाय का उत्पादन शुरू नहीं हुआ कई बाजारों के हाथों से निकलने का गंभीर खतरा है.

पर्वतीय इलाके के चाय बाग़ान मालिकों का कहना है कि इलाके का चाय उद्योग वर्ष 2017 में गोरखालैंड की मांग हुए 104 दिनों के बंद से अब तक नहीं उबर सका है. अब मौजूदा लॉकडाउन से इसकी कमर ही टूट जाएगी. उस समय वैश्विक बाजारों में कई खरीददारों ने दार्जिलिंग चाय को अपनी सूची से हटा दिया था. अब यह दूसरा झटका इस उद्योग के लिए घातक साबित हो सकता है.

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