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कोरोना वायरसः लॉकडाउन के दौरान शराब की लत कैसे छोड़ें?
- Author, स्वामीनाथन नटराजन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
कोरोना वायरस के चलते भारत में लॉकडाउन लागू किया गया है. दुनिया के तमाम देश भी लॉकडाउन में हैं. कई देशों में इस दौरान शराब की बिक्री बढ़ गई है.
दूसरी ओर, भारत में इस दौरान शराब की दुकानें बंद हैं. बीबीसी ने केरल में एक ऐसे शख़्स से बात की है जिसने अपने लिए एक मिशन तय किया है. यह शख़्स लॉकडाउन को शराब की अपनी लत छोड़ने के एक मौक़े के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है.
लॉकडाउन के दौर में हर अगले दिन को कैसे काटा जाए और इसके चलते पैदा हो रहे तनाव से कैसे निबटें यह सवाल कई लोगों के ज़ेहन में पैदा हो रहा है.
कुछ लोगों के लिए शराब इस हालात से निबटने का सबसे आसान जवाब है.
सर्वे कंपनी नील्सन के मुताबिक़, अमरीका में 21 मार्च को ख़त्म हुए हफ़्ते में शराब की बिक्री में 55 फ़ीसदी का ज़ोरदार इजाफ़ा हुआ है. यह तुलना पिछले साल मार्च के इसी हफ़्ते के मुक़ाबले की गई है.
यूके और फ्रांस में भी इसी तरह का ट्रेंड देखा गया है. इन देशों में भी शराब की बिक्री बढ़ी है.
शराब की बिक्री में बढ़ोतरी का यह ट्रेंड चिंता का सबब बन रहा है. इससे यह डर पैदा हो रहा है कि लॉकडाउन के दिनों में लोग शराब पर अपनी निर्भरता बढ़ा रहे हैं. इससे लोगों के स्वास्थ्य को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) ने इस महामारी के दौरान तनाव से निबटने के लिए सलाह दी है. संगठन ने चेतावनी दी है कि तनाव को दूर करने के लिए शराब, स्मोकिंग या ड्रग्स जैसी नशे की लत से बचें.
पूरी तरह से रोक
दूसरी ओर, दक्षिण अफ़्रीका और भारत समेत दुनिया के कई देशों ने सामाजिक दूरी का पालन कराने के लिए अपने यहां शराब की बिक्री पर रोक लगा दी है.
इसने रथीश सुकुमारन जैसे लोगों के सामने एक गंभीर चुनौती पैदा कर दी है. सुकुमारन केरल में रहते हैं.
रथीश कहते हैं, "मैं नियमित शराब पीने वालों में हूं. रोज़ शराब नहीं पी पाने और घर के अंदर कैद हो जाने से मैं परेशान हो गया हूं."
47 साल के रथीश फ़िल्म और टीवी इंडस्ट्री के लिए स्क्रिप्टराइटिंग का काम करते हैं. वह ख़ुद को अल्कोहलिक मानते हैं.
शराब छोड़ने का मौक़ा
भारत सरकार ने देश में 21 दिन का लॉकडाउन लागू किया है. इससे रथीश को यह पता चला कि वह शराब पर किस हद तक निर्भर हैं.
ऐसे में उन्होंने शराब की लत को छोड़ने का फ़ैसला किया.
रथीश केरल की राजधानी तिरुअनंतपुरम में रहते हैं. पिछले 25 साल से शराब पी रहे रथीश के लिए इसके बिना रहना एक नया अनुभव था.
वह कहते हैं, 'वीकडेज़ में मैं शाम के वक्त पीना पसंद करता था. लेकिन, छुट्टियों के दौरान में दोपहर से ही पीना शुरू कर देता था.'
चूंकि, उनका कामकाज ट्रैवल से जुड़ा हुआ है, ऐसे में पिछले छह महीने से वह तकरीबन हर दिन शराब पी रहे थे.
वह कहते हैं, "मैं कितनी शराब पीता हूं यह इस बात पर निर्भर करता है कि मैं कहां बैठा हूं. आमतौर पर मैं पांच से छह ड्रिंक्स लेता हूं."
लेकिन उनकी पत्नी शराब नहीं पीती हैं और वह अपने पति को घर पर पार्टी भी नहीं करने देती हैं. ऐसे में ज्यादातर बार रथीश आसपास के पब्स और बार में अपने दोस्तों के साथ शराब पीते हैं.
अपनी इच्छाशक्ति की पड़ताल
भारत में शराब की बिक्री तयशुदा दुकानों के जरिए होती है. कम जगहों पर ही सुपरमार्केट्स में शराब बिकती है.
जैसे ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर में लॉकडाउन का ऐलान किया, रथीश के दोस्त शराब की दुकानों की ओर दौड़ पड़े ताकि आने वाले दिनों के लिए स्टॉक किया जा सके.
इसके उलट रथीश ने तय किया कि वह ऐसा नहीं करेंगे. उन्होंने शराब के बिना रहने की अपनी इच्छाशक्ति को परखने का फ़ैसला किया.
वह कहते हैं, "सरकार के एलान के बावजूद हमारे इलाक़े में शराब की कुछ दुकानें खुली हुई थीं, लेकिन मैंने इसका फ़ायदा नहीं उठाया."
सात दिनों के बाद उनकी हिम्मत जवाब देने लगी.
मदद पाने की कोशिश
रथीश कहते हैं, "मैंने 20 से अधिक लोगों को मदद के लिए फ़ोन किया. मैं किसी भी हालत में थोड़ी शराब चाहता था. लेकिन, मुझे सफलता नहीं मिली."
रथीश के साथ वही दिक्कत पेश आ रही थी जिसे नशे की लत छोड़ने की कोशिश करने वाला दुनिया का कोई भी शख़्स महसूस करता है.
यूके में सरकार ने शराब की दुकानें बंद नहीं कीं. असलियत में सरकार ने इसे आवश्यक सामानों में शामिल कर दिया जिनकी खरीद-फ़रोख़्त लॉकडाउन में भी जारी रह सकती है.
दूसरी ओर, जो लोग शराब की लत छोड़ना या कम करना चाहते हैं उनके लिए लॉकडाउन के चलते काउंसलर्स से आमने-सामने बैठकर चर्चा करना नामुमकिन हो गया है.
नशे की लत से जूझ रहे लोगों को मदद करने वाले एक समूह अल्कोहलिक एनोनीमस (एए) ने इस दौरान ऑनलाइन समूह बनाए हैं.
संस्थान का कहना है कि मार्च की शुरुआत से यूके में एए की हेल्पलाइन पर आने वाली कॉल्स की संख्या में 22 फ़ीसदी का इजाफ़ा हुआ है. कंपनी की चैट सर्विस करीब एक-तिहाई (33 फ़ीसदी) बढ़ गई है.
बेचैनी और गुस्सा
रथीश ने शराब छोड़ चुके अपने कुछ दोस्तों को फ़ोन किया. इन दोस्तों ने रथीश को बताया कि शराब के लिए इस तरह की तीव्र इच्छा उठना स्वाभाविक है.
रथीश कहते हैं कि इन बातों से उन्हें कोई मदद नहीं मिली न ही उनकी बेचैनी कम हुई.
वह कहते हैं, "ऐसा लग रहा था मानो मेरा शरीर बुरी तरह से शराब मांग रहा हो. मैं किसी दूसरी चीज पर फ़ोकस नहीं कर पा रहा था. मैंने मूवी देखने की कोशिश की, लेकिन इससे मैं मन को समझा नहीं पाया."
वह जितना इससे दूर जाने की कोशिश कर रहे थे, उतना ही उनके लिए मुश्किल हो रहा था.
रथीश के मुताबिक, "मैं सारी-सारी रात सो नहीं पा रहा था. मुझे ग़ुस्सा आता था. सुबह होने के वक्त मुझे थोड़ी राहत ज़रूर मिलती थी."
उनके कुछ दोस्त सोशल मीडिया पर मज़े करते हुए की तस्वीरें डाल रहे थे. इससे उन्हें और बुरा लग रहा था.
एक पोस्ट पर तो उन्होंने यह तक लिख दिया कि वह चाहते हैं कि उन पर बिजली गिर जाए.
अल्कोहल विद्ड्रॉल लक्षण बेहद गंभीर हो सकते हैं. इनमें झटके लगना, ग़ुस्सा, चिड़चिड़ाहट जैसी चीज़ें नज़र आती हैं.
रथीश कहते हैं, "मुझे अच्छी तरह से समझ आ गया था कि लोग शराब के लिए इतने बेकरार क्यों हो जाते हैं. शराब पीने की इच्छा वाकई बेहद तीव्र होती है."
डॉक्टर बनाम सरकार
केरल में स्थानीय मीडिया में कुछ ऐसी भी ख़बरें आई हैं जिनके मुताबिक़ लोगों ने लॉकडाउन के बाद शराब नहीं मिलने से आत्महत्या तक कर ली है.
गवर्नमेंट मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी डॉ. जीएस विजयकृष्णन के मुताबिक़, "पोस्टमॉर्टम से केवल मौत के कारण का पता चलेगा, लेकिन मरने के पीछे क्या वजह थी इसके लिए अच्छी तरह से जांच करना ज़रूरी है."
कथित रूप से मौतों की मीडिया रिपोर्ट्स को देखते हुए राज्य सरकार ने शुरुआत में डॉक्टरों से कहा कि वे ऐसे मरीज़ों को शराब की सलाह दें जिनमें शराब न मिलने की वजह से विद्ड्रॉल के लक्षण दिख रहे हैं.
डॉक्टर जी एस विजयकृष्णन ने बीबीसी को बताया, "सरकारी आदेश के चलते कई लोगों ने डॉक्टरों से संपर्क किया और पर्चे पर शराब की परमिशन लिखने की मांग की. कुछ लोगों ने तो डॉक्टरों को धमकी तक दी कि अगर उन्हें सर्टिफिकेट नहीं मिला तो वे ख़ुदकुशी कर लेंगे."
उन्होंने कहा, "ऐसे वक्त पर जबकि हमारा पूरा फ़ोकस कोरोना वायरस से लड़ाई पर है, यह एक नई समस्या हमारे सामने पैदा हो गई."
मेडिकल एथिक्स
मेडिकल एसोसिएशन ने अल्कोहल परमिट जारी करने से इनकार कर दिया. इसके अलावा, एसोसिएशन ने केरल हाईकोर्ट का रुख़ भी किया और सरकार के फ़ैसले को न मानने के लिए एक स्टे ऑर्डर भी ले लिया.
डॉक्टरों का कहना है कि अल्कोहल पर निर्भरता एक बीमारी है और इस तरह के सर्टिफ़िकेट्स देना उनके एथिक्स के ख़िलाफ़ है.
रथीश के मुताबिक़, "मुझे समझ नहीं आ रहा था कि यह मसला कैसे सुलझेगा."
शराब की दुकानें खुलने पर वहां भारी भीड़ जमा होगी और इससे महामारी को कंट्रोल करने की कोशिशें बेमानी हो जाएंगी.
ऑनलाइन शॉपिंग एक ऑप्शन है. रथीश कहते हैं, "लेकिन, कई लोगों के पास इंटरनेट नहीं है. इससे अमीरों को ही फ़ायदा होगा."
कोई और रास्ता नहीं
सभी विकल्प तलाशने के बाद रथीश अब फिर से अपने पुराने लक्ष्य पर आ गए हैं.
उन्होंने कहा, "मैं बिना शराब के रहने के इन दिनों का सकारात्मक इस्तेमाल करने की कोशिश में हूं. मैं यह देख रहा हूं कि क्या मैं अपनी ख़पत पर लगाम लगा सकता हूं."
अपने सेल्फ़-असेसमेंट के मुताबिक़, वह अब इस स्थिति से निबट रहे हैं.
उन्होंने कहा, 'मेरा भरोसा बढ़ रहा है कि मैं शराब उपलब्ध होने पर भी इसके बिना रह सकता हूं.'
वह उम्मीद कर रहे हैं कि उनके अंदर आ रहा बदलाव टिकाऊ होगा.
रथीश कहते हैं, "मैं उम्मीद कर रहा हूं कि मैं अपने दोस्तों के साथ बैठूंगा और बातें करूंगा, लेकिन शराब नहीं पीऊंगा."
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