कोरोना वायरसः कोरोना रोगियों से ही ठीक होंगे कोरोना के रोगी?

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरू से, बीबीसी हिंदी के लिए

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने कोविड-19 मरीज़ों के इलाज के लिए केरल सरकार की ओर से सुझाई गई कॉन्व्लेसेन्ट प्लाज़्मा थेरेपी को मंज़ूरी दे दी है.

केरल सरकार की ओर से गठित एक मेडिकल टास्क फ़ोर्स ने मौजूदा महामारी से निबटने में प्लाज़्मा थेरेपी के इस्तेमाल की सिफ़ारिश की थी.

ये इलाज है क्या?

इसे साधारण तरीक़े से समझा जाए तो ये इलाज इस धारणा पर आधारित है कि वे मरीज़ जो किसी संक्रमण से उबर जाते हैं उनके शरीर में संक्रमण को बेअसर करने वाले प्रतिरोधी ऐंटीबॉडीज़ विकसित हो जाते हैं.

इन ऐंटीबॉडीज़ की मदद से कोविड-19 रोगी के रक्त में मौजूद वायरस को ख़त्म किया जा सकता है.

टास्क फ़ोर्स के एक सदस्य और कोझिकोड स्थित बेबी मेमोरियल हॉस्पिटल में क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट डॉक्टर अनूप कुमार बताते हैं, “किसी मरीज़ के शरीर से ऐंटीबॉडीज़ उसके ठीक होने के 14 दिन बाद ही लिए जा सकते हैं और उस रोगी का कोविड-19 का एक बार नहीं, बल्कि दो बार टेस्ट किया जाना चाहिए“.

ठीक हो चुके मरीज़ का एलिज़ा (एन्ज़ाइम लिन्क्ड इम्युनोसॉर्बेन्ट ऐसे) टेस्ट किया जाता है जिससे उसके शरीर में ऐंटीबॉडीज़ की मात्रा का पता लगता है.

लेकिन ठीक हो चुके मरीज़ के शरीर से रक्त लेने से पहले राष्ट्रीय मानकों के तहत उसकी शुद्धता की भी जाँच की जाएगी.

तिरुअनंतपुरम स्थित श्री चित्रा तिरुनाल इंस्टीच्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ के डॉक्टर देबाशीष गुप्ता ने बताया, “इस मामले में कोई भी छूट नहीं दी जाएगी“.

कैसे निकाला जाएगा रक्त

ठीक हो चुके रोगी के शरीर से ऐस्पेरेसिस विधि से ख़ून निकाला जाएगा जिसमें ख़ून से प्लाज़्मा या प्लेटलेट्स जैसे अवयवों को निकालकर बाक़ी ख़ून को फिर से उसी रोगी के शरीर में वापस डाल दिया जाता है.

डॉक्टर अनूप कुमार ने बताया,”ऐंटीबॉडीज़ केवल प्लाज़्मा में मौजूद होते हैं. डोनर के शरीर से लगभग 800 मिलीलीटर प्लाज़्मा लिया जाता है. इसमें से रोगी को लगभग 200 मिलीलीटर ख़ून चढ़ाने की ज़रूरत होती है. यानी एक डोनर के प्लाज़्मा का चार रोगियों में इस्तेमाल हो सकता है“.

डॉक्टर गुप्ता ने बताया,”ये प्लाज़्मा केवल कोविड-19 रोगियों को चढ़ाया जाएगा, और किसी को नहीं“.

किसे देना होगा और सुधार कितनी जल्दी होगा?

डॉक्टर अनूप कुमार कहते हैं, “ ऐसे लोग जिन्हें बुख़ार, कफ़ और साँस लेने में थोड़ी दिक्कत हो रही है, उन्हें प्लाज़्मा देने की ज़रूरत नहीं है. इसे केवल उन्हीं रोगियों को दिया जाना चाहिए जिनकी हालत बिगड़ रही है और पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं ले पाने की वजह से जिनकी स्थिति गंभीर हो सकती है“.

वो साथ ही कहते हैं कि एहतियात के तौर पर इसे स्वास्थ्यकर्मियों को भी दिया जा सकता है.

इलाज के असर के बारे में वो कहते हैं, “अभी तक जो टेस्ट हुए हैं उनसे लगता है कि 48 से 72 घंटे में सुधार शुरु हो सकता है“.

आगे क्या होगा?

आईसीएमआर से मंज़ूरी मिलने के बाद अब केरल का स्वास्थ्य मंत्रालय ड्रग्स कंट्रोलर-जनरल ऑफ़ इंडिया की मंज़ूरी का इंतज़ार कर रहा है. टास्क फ़ोर्स के सदस्यों को लगता है इसमें ज़्यादा समय नहीं लगेगा.

लेकिन इस टीम के पास क्लीनिकल ट्रायल के लिए समय बहुत सीमित होगा. हालाँकि चीन और दक्षिण कोरिया में इस इलाज का इस्तेमाल हो रहा है.

डॉक्टर अनूप ने बताया, “हमें क्लीनिकल ट्रायल के लिए एलिज़ा टेस्ट किट मँगवाने होंगे. हमने पहले ही ऑर्डर कर दिया है. इन किट्स की पूरी दुनिया में बहुत माँग है.”

केरल में अब तक 80 से ज़्यादा लोग ऐसे हैं जो कोविड-19 से उबर चुके हैं.

डॉक्टर अनूप कहते हैं, “हमें पता लगाना होगा कि इनमें से कितने लोगों ने ठीक होने के बाद क्वारंटीन की मियाद पूरी कर ली है. हमारे पास निश्चित संख्या नहीं है. मगर हम उनमें से अधिकतर लोगों से प्लाज़्मा ले सकते हैं”.

इस इलाज का ख़र्च कितना है?

डॉक्टर अनूप बताते हैं कि इस इलाज में दो से ढाई हज़ार रुपए से ज़्यादा नहीं लगेगा क्योंकि ये इलाज सरकारी अस्पताल में उपलब्ध होगा.

पर प्लाज़्मा थेरेपी क्यों?

इसके पीछे दो बुनियादी कारण हैं.

पहला ये कि कोविड-19 का अब तक कोई इलाज उपलब्ध नहीं है.

दूसरा ये कि संक्रामक रोगों के इलाज के लिए सदियों से प्लाज़्मा वाला इलाज होता रहा है. इससे पहले सार्स, मर्स और एचवनएनवन जैसी महामारियों के इलाज में भी प्लाज़्मा थेरेपी का ही इस्तेमाल हुआ था.

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