कोरोना वायरस: महाराष्ट्र के इन कलाकारों की ज़िंदगी बनी 'तमाशा'

    • Author, अमृता कदम
    • पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता

"हम अपने घुंघरुओं की आवाज़ की बदौलत ज़िंदा रहते हैं. दस लोगों का हमारा परिवार सिर्फ़ हमारी आमदनी पर ही जीता है. लेकिन अब सब कुछ ठहर गया है. हमारे सामने यह सवाल खड़ा हो गया है कि हम अपने बच्चों को क्या खिलाएं."

उषा काले बेबसी के साथ यह कहती हैं. उषा काले आर्ट सेंटर में काम करती हैं. कोरोना वायरस की वजह से नियमित तौर पर होने वाले यहाँ के आयोजन रद्द कर दिए गए हैं. इसकी वजह से 'तमाशा' कलाकार ख़ाली हैं. उनके पास कोई काम नहीं. उषा काले भी इनमें से एक हैं.

वो कहती हैं, "सभी कलाकार अपने-अपने घर जा चुके हैं. अगर कोई हमें बुला ही नहीं रहा तो हम और क्या कर सकते हैं?"

तमाशा, महाराष्ट्र की एक मशहूर लोक कला है. कई और समूहों और आर्ट सेंटर्स ने इसे ज़िंदा रखा हुआ है. अभी भी सुदूर ग्रामीण इलाक़ों में पूजा-पाठ और मेले के दौरान तमाशा कलाकारों को बुलाया जाता है.

आम तौर पर हिंदू कैलेंडर के चैत्र माह में महाराष्ट्र के कई गांवों में पूजा-पाठ का आयोजन होता है. यह तमाशा कलाकारों के लिए सबसे अच्छा समय होता है. ये मार्च, अप्रैल और मई के तीन महीनों में साल भर के लिए अपनी कमाई करते हैं.

लेकिन इस साल कोरोना वायरस के कारण पैदा हुए संकट से इन आयोजनों को रद्द करना पड़ा है. चूंकि कोरोना वायरस से बचने का सबसे अच्छा उपाय भीड़-भाड़ वाली जगह से बचना है, इसलिए सरकार की ओर से देश भर में लॉकडाउन की धोषणा की गई है.

महाराष्ट्र में भी कहीं भी भीड़ ना इकट्ठा हो, इसके लिए क़दम उठाए गए हैं. इसके लिए गांव के स्तर पर होने वाले पूजा के आयोजनों और मेलों को भी रद्द कर दिया गया है.

जबकि इसी दौरान कई गांवों से तमाशा कलाकारों को आमंत्रण भेजा जा चुका था. कई छोटे-बड़े गांवों से तमाशा समूहों को होने वाली कमाई करोड़ों तक में पहुँच जाती है.

पिछले साल पर नज़र डाले तो इन महीनों में सौ से ज्यादा तमाशा समूहों की बुकिंग हुई थीं लेकिन अभी सारे आर्ट सेंटर और तमाशा टेंट ख़ाली पड़े हुए हैं.

तमाशा थियेटर ऑनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष और न्यू अंबिका आर्ट सेंटर के डायरेक्टर अशोक जाधव कहते हैं, "बारिश के मौसम से पहले के तीन महीने हमारी कमाई के महीने होते हैं. बारिश के मौसम में कलाकार ख़ाली पड़े रहते हैं. इन तीन महीनों में ही सिर्फ़ उनकी कमाई होती है.''

न्यू अंबिका आर्ट सेंटर में 175 कलाकार काम करते हैं. वो सब अपने अपने घरों को लौट गए हैं. ये सभी महाराष्ट्र के अलग-अलग ज़िलों के हैं.

अशोक जाधव कहते हैं, "सामान्य तौर पर ढोलकी तमाशा के हम कम से कम 30 कार्यक्रम करते हैं. इन तीन महीनों में लगभग 80-90 जगहों पर हम कार्यक्रम करते हैं. एक कार्यक्रम के लिए हमें लाख से दो लाख मिलते हैं और पूरे सीजन में 80 लाख से एक करोड़ रुपए हम कमाते हैं. इस पैसे से हम सफ़र का ख़र्च और लगभग 150 कलाकारों की सैलरी निकालते हैं."

वो बताते हैं, "तमाशा समूहों में काम करने वाले ये कलाकार कॉन्ट्रैक्ट पर काम करते हैं. उन्हें हर हफ्ते कार्यक्रमों के आधार पर भुगतान किया जाता है. लेकिन कोरोना के कारण कोई भी कार्यक्रम नहीं हो पा रहा है. ऐसे वक्त में हम कलाकारों की कोई ख़ास मदद भी नहीं कर पा रहे हैं."

वो आगे कहते हैं, "हालांकि हम उन्हें पैसे तो नहीं दे पा रहे हैं लेकिन उन्हें ज़रूरत की चीज़ें देकर उनकी मदद करने की कोशिश हम कर रहे हैं. हम उन्हें राशन का सामान दे रहे हैं. अगर कोई हमसे मदद मांग रहा है तो किराने वाले से उन्हें उधार पर सामान देने को कह रहे हैं और दुकानदारों से यह वादा कर रहे हैं कि हम उसका भुगतान करेंगे."

बच्चों को खिलाने की मुसीबत

उषा काले 16 मार्च को अपने घर बीड ज़िले के केज गांव लौट आई हैं. इसके कुछ ही दिन के बाद लॉकडाउन की घोषणा हो गई और वो अपने गांव में फंसी रह गईं. लौट कर जाने के भी कोई फ़ायदा नहीं था क्योंकि तमाशा के कार्यक्रम भी फ़िलहाल बंद हो गए हैं.

वो बताती हैं, "हमारे घर में कुछ नहीं है. आर्ट सेंटर ही हमारा घर है और वहां इन महीनों में जो कमाई होती है, उससे ही साल भर की हमारी आमदनी निकलती हैं. कोरोना की वजह से अब सब कुछ रुक गया है. अब आने वाला साल हमारे लिए मुश्किलों भरा रहेगा. यह हमारी ज़िंदगी की त्रासदी है. इसलिए हमें लगता है कि कम से कम हमारे बच्चे पढ़-लिखकर अच्छी ज़िंदगी जिएँ. लेकिन हमारे पास अब पैसे ही नहीं हैं. हमारे बच्चों का क्या होगा?"

उषा काले केज गांव में अपने भाई के घर रुकी हुई हैं. उनके भाई ऑटोरिक्शा चलाते हैं. लेकिन अब उनका काम भी बंद पड़ा हुआ है. उषा काले के दो बेटे हैं. उनमें से एक नौवीं में पढ़ता है और अपनी बहन के साथ आनंदग्राम में रहता है. उनका दूसरा बेटा पहली क्लास में पढ़ता है. उनके भाई का भी अपना परिवार है.

वो कहती हैं, "भाई ऑटोरिक्शा चलाता है. उसकी आमदनी भी अधिक नहीं है. हम उसे कुछ पैसे भेजते हैं. सिर्फ़ मैं ही नहीं मेरी तरह दूसरे भी पैसे बचाकर अपने घर वालों को भेजते हैं. यहां एक की कमाई पर 10-12 लोग खाने वाले हैं. आर्ट सेंटर के मालिक हमारी कितनी मदद कर सकते हैं? उनकी आमदनी ख़ुद चौपट हो रखी है."

सरकार ने ज़रूरतमंदों के लिए राशन की व्यवस्था करने की बात कही है. कुछ जगहों पर राशन बांटा जा रहा है. जब मैंने उषा काले से पूछा कि क्या आपको कोई ऐसी मदद मिली है?

तो उन्होंने इससे इनकार किया.

उन्होंने बताया, "अब तक हमें कोई राशन नहीं मिला. हमारा नाम ज़रूर नोट करके ले गए लेकिन राशन कब मिलेगा, यह नहीं बताया."

उन्होंने सरकार से मदद की उम्मीद लगा रखी हैं. वो कहती हैं, "हम कलाकार हैं. सरकार को हमारी मदद करनी चाहिए. हम दाने-दाने को मोहताज हैं. आर्ट सेंटर बंद पड़े हुए हैं. अगर सरकार हमारी मदद नहीं करती है, तो हम मर जाएंगे."

तमाशा समूह कैसे काम करते हैं?

मशहूर तमाशा कलाकार और तमाशा समूहों के मालिकों के एसोसिएशन के अध्यक्ष रघुवीर खेडकर इसका जवाब देते हैं. वो ख़ुद कांताबाई सतारकार तमाशा मंडल नाम से एक ग्रुप चलाते हैं.

वो बताते हैं, "महाराष्ट्र में दस बड़े और 90 छोटे तमाशा ग्रुप हैं. बड़े ग्रुप में 100 से 120 कलाकार होते हैं और छोटे ग्रुप में 40 से 60. बारिश का मौसम ख़त्म होने के बाद दशहरा के समय फिर से तमाशा का आयोजन शुरू होता है. लेकिन ये टेंट में होते है और इसकी टिकट की क़ीमत 50 से 70 रुपए तक होती है. हम होली तक इसका आयोजन करते हैं लेकिन इससे हमें बहुत आमदनी नहीं होती. हमारा सीजन रंग पंचमी से शुरू होता है और बुद्ध पुर्णिमा तक चलता है. कमाई के लिहाज से ये बड़ा सीजन होता है हमारे लिए.''

इस दौरान एक गांव में पूरे दिन के लिए बुकिंग होती है कभी-कभी दो तीन दिनों के लिए भी लगातार बुकिंग रहती है, एक बुकिंग के लिए एक और डेढ़ लाख से पौने तीन लाख तक की आमदनी होती है. सीजन के दौरान बड़े ग्रुप 90 लाख तक कमाते हैं और छोटे ग्रुप अपने रेट के अनुसार कमाते हैं.

रघुवीर बताते हैं, "तमाशा ग्रुप में काम करने वाले कलाकार कॉन्ट्रैक्ट पर काम करते हैं. बारिश के तीन महीनों में कलाकार अपने घर रहते हैं. हम उन्हें सात महीने के पैसे देते हैं. इन दो महीनों की कमाई में ही उनकी सैलरी निकलती हैं."

"अब कोरोना की वजह से काम बंद पड़ा हुआ है इसलिए हम बहुत नुक़सान झेल रहे हैं. मेरे ग्रुप में 110 कलाकार हैं. हमारे पास नौ गाड़ियां हैं. जब कोरोना की ख़बर आनी शुरू हुई तो हमने हर कलाकार को एक-एक हज़ार रुपए दिए और उन्हें अपने-अपने घरों को लौटने को कह दिया. हमने सोचा था कि 31 मार्च तक सब ठीक हो जाएगा. हमें कुछ बुकिंग भी मिलने वाली थी. लेकिन अब सब कुछ ठप पड़ गया है."

नोटबंदी से भी बेहाल रहे हम

रघुवीर बताते हैं, "हम नोटबंदी से भी बेहाल रहे थे. उस साल हमें प्रोग्राम करने के बहुत कम आमंत्रण मिले थे. उसके बाद सूखा पड़ गया. 2019 में चुनाव ही थे. हमारे काम के महीनों में आचार संहिता लागू थी. इसके बाद भारी बारीश और बाढ़ से राज्य बेहाल था. दशहरा और दिवाली के समय भी बारिश हुई. हम किसानों की आमदनी पर ही निर्भर रहते हैं लेकिन किसान बाढ़ और अब कोरोना की मार से अपना सबकुछ गंवा बैठे हैं. हम बड़े संकट का सामना कर रहे हैं."

जब हमने उनसे पूछा कि लोक कलाकारों को लेकर सराकर की कोई योजना है तो उन्होंने बताया कि सारी योजनाएँ बुजुर्ग कलाकारों के लिए हैं.

"आम दिनों के लिए तो ये ठीक है लेकिन इस मुश्किल वक्त में हम सरकार से मदद की उम्मीद करते हैं. अगर वो दो महीने की सैलरी हमारे कलाकारों को दे दे तो यह बड़ी मदद होगी. अगर सरकार इस समय हमारी मदद नहीं करती है तो हम अपने पैरों पर दोबारा नहीं खड़े हो पाएंगे."

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