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कोरोना वायरस: बेहद डरावनी हैं संघर्ष की ये तीन कहानियां
- Author, एना कॉलिंसन
- पदनाम, स्वास्थ्य संवाददाता
चीन के वुहान शहर से शुरू हुआ कोरोना वायरस संक्रमण लगभग पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले चुका है.
हर रोज़ मौत के आंकड़े सैकड़ों की संख्या में बढ़ जाते हैं और हज़ारों की संख्या में संक्रमितों के.
पूरी दुनिया में इस वायरस के कारण डर का माहौल है लेकिन इन सबके बीच उम्मीद की बात सिर्फ़ इतनी है कि बहुत से मामलों में लोग ठीक भी हुए हैं.
जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के आंकड़ों के मुताबिक़, कोविड 19 से जहां अभी तक 48 हज़ार लोगों के मौत की पुष्टि हुई है वहीं क़रीब एक लाख 95 हज़ार से अधिक मामलों में लोग ठीक भी हुए हैं.
कोरोना वायरस से संक्रमित हर शख़्स का एक अलग अनुभव है. कुछ में इसके बेहद सामान्य या फिर यूं कहें कि बेहद कम लक्षण नज़र आए थे तो कुछ में यह काफी गंभीर था. और कुछ तो ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें लक्षण वो थे ही नहीं जिनके बारे में स्वास्थ्य विभाग सचेत करता रहा है. लेकिन एक बार ये पता चल जाए कि आप संक्रमित हैं तो अस्पताल जाने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं बचता.
हमने तीन ऐसे लोगों से बात की जिन्हें संक्रमित पाया गया और उन्हें अस्पताल में रहना पड़ा. ये तीनों मामले एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं लेकिन अस्पताल जाने की इनकी वजह एक ही थी- कोविड19.
'मैं अपने और अपने बच्चे की ज़िंदगी के लिए लड़ रही थी'
दक्षिण पूर्व इंग्लैंड के केंट कस्बे के हेर्ने बे इलाक़े में रहने वाली कैरेन मैनरिंग छह महीने की गर्भवती हैं. होने वाला यह बच्चा उनकी चौथी संतान है. कैरेन को खांसी की शिकायत हुई. यह मार्च का दूसरा सप्ताह था. खांसी के सात उन्हें तेज़ बुखार भी आ रहा था और एक दिन सबकुछ बदल गया.
कैरेन बताती हैं, "मैंने हेल्पलाइन पर फ़ोन किया. मेरी सांस उखड़ रही थी. कुछ ही मिनटों में एक एंबुलेंस मेरे घर के दरवाज़े पर खड़ी थी. मैं वाकई सांस नहीं ले पा रही थी इसलिए उन्होंने मुझे सीधे ऑक्सीजन देना शुरू कर दिया."
जब वो अस्पताल पहुंची तो उन्हें कोरोना वायरस संक्रमित पाया गया. उन्हें निमोनिया की भी शिकायत थी और उसके बाद उन्हें अस्पताल के एक कमरे में अलग-थलग रख दिया गया. हफ़्तों के लिए.
वो बताती हैं, "किसी को भी मेरे कमरे में आने और मुझसे मिलने की इजाज़त नहीं थी. वहां मुझे बहुत अकेला महसूस होता था. दो-तीन दिन तक तो मैं बिस्तर से उठी तक नहीं. यहां तक की टॉयलेट के लिए भी नहीं गई. जब उन्हें मेरी बेडशीट बदलनी होती थी तो मैं दूसरी करवट हो जाती थी. लेकिन मैं बिस्तर से नहीं उतरी."
वो कहती हैं "मुझे सांस लेने में कई बार दिक्क़त होती तो भी मुझे अटेंडेंट के पूरी तरह से तैयार होने का इंतज़ार करना पड़ता. मुझे उसी हालत में कुछ देर रहना पड़ता ताकि जो भी मुझे अटेंड करने आ रहा है वो ख़ुद के सारे सुरक्षा आवरण पहन ले. मेरे परिवार वाले मेरे साथ लगातार फ़ोन पर बात करते रहते ताकि मैं शांत बनी रहूं. मैं बहुत डरी हुई थी. मैं मरने जा रही थी और मेरा परिवार कहता कि वो हर चीज़ के लिए तैयार है."
कैरेन कहती हैं, "मैं हर सांस के लिए जूझ रही थी. ये लड़ाई मेरे और मेरे होने वाले बच्चे के लिए थी."
कैरेन बताती है कि वो उस दिन को कभी नहीं भूल सकतीं जब वो अस्पताल से बाहर निकलीं. वो अपने चेहरे पर ताज़ी और ठंडी हवा को महसूस कर सकती थीं.
वो कहती हैं, "मैंने और मेरे पति गाड़ी में बैठकर घर जा रहे थे. हम दोनों ने मास्क पहन रखा था. लेकिन गाड़ी की खिड़कियां खुली थीं और वो ताज़ी हवा को महसूस कर रही थीं."
कैरेन मानती हैं कि अस्पताल के उन कुछ अकेले गुज़ारे हफ़्तों ने उनकी ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया. उन्हें ये समझ आया कि हर छोटी से छोटी चीज़ का अपना महत्व है.
जैसे हफ़्तों बाद चेहरे को छूने वाली ताज़ी-ठंडी हवा का.
कैरेन अब अस्पताल से घर लौट आई हैं लेकिन घर पर वो सेल्फ़-आइसोलेशन में हैं. लेकिन उन्हें घर में मौजूद दूसरे लोगों की आवाज़ आती है. घर के लोग उनके कमरे में नहीं आते पर बाहर खड़े होकर उनका हौसला ज़रूर बढ़ाते रहते हैं.
वो मानती हैं कि इस संक्रमण ने उन्हें मज़बूत बनाया है. उन्हें आशंका है कि कोरोना वायरस संक्रमण उन्हें उस सलून में हुआ जहां वो काम करती हैं. लेकिन पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हैं.
"मैं सिर्फ़ इतना चाहती थी कि कोई मेरी मदद कर दे"
ये जेसी क्लार्क की कहानी है.
जेसी को पहले दिन से पता था कि अगर उन्हें कोरोना वायरस संक्रमण हुआ तो उनके लिए ख़तरा किसी भी दूसरे संक्रमित शख़्स से कहीं अधिक होगा.
उन्हें किडनी की एक ख़तरनाक बीमारी है और पांच साल पहले उनकी एक किडनी रीमूव की जा चुकी है. 26 साल की जेसी को पहले खांसी आना शुरू हुई और उसके बाद उन्हें सांस लेने में परेशानी होने लगी. ये दोनों लक्षण सामने आने के बाद उनकी चिंता बढ़ी.
कुछ दिन बाद तो उनका चलना-फिरना भी बंद हो गया. उन्हें चलने में दिक़्क़त पेश आने लगी थी.
वो बताती हैं, "मेरी पसलियों, पीठ और पेट के पास बहुत दर्द था.मुझे ऐसा लगता था कि किसी ने मुझे बहुत मारा है."
ब्रिटेन में लॉकडाउन की घोषणा हो चुकी थी. लेकिन जेसी की तकलीफ़ बढ़ती ही जा रही थी. उनके मंगेतर उन्हें अस्पताल लेकर गए. जहां उनके पहुंचते ही उन्हें अलग एक किनारे कर दिया गया. यह सुरक्षा कारणों और एहतियात बरतते हुए किया गया था.
जेसी बताती हैं, "मुझे अकेले में बहुत डर लग रहा था लेकिन मैं एक ऐसी स्थिति में थी जहां मैं सिर्फ़ इतना चाहती थी कि कोई मेरी मदद कर दे मुझे हरे रंग का एक मास्क दिया गया. इसके बाद मुझे उस सेक्शन में ले जाया गया जहां कोविड 19 के दूसरे मरीज़ों को रखा गया था. लेकिन यहां हर एक बेड के बीच एक दीवार थी."
वो बताती हैं, "मेरा कोविड 19 का टेस्ट नहीं किया गया. मेरे डॉक्टर ने मुझे बताया कि वो हर किसी का स्वैब टेस्ट नहीं कर सकते लेकिन यह मानना सुरक्षित रहेगा कि मुझे कोविड 19 है. मेरी छाती में तेज़ जलन हो रही थी."
जेसी को इससे पहले कभी भी सांस लेने में दिक्क़त का सामना नहीं करना पड़ा था.
वो कहती हैं "अगर आपको सही से सांस नहीं आ रही हो तो आप अंदर से डर जाते हैं."
जेसी को अस्पताल में गए छह घंटे हो चुके थे. उनके मंगेतर कार में ही बैठकर उनका इंतज़ार कर रहे थे. लेकिन उन्हें अंदर क्या कुछ चल रहा है इस बारे में कुछ पता नहीं था.
बहुत से लोगों को लग रहा था कि जेसी को यह वायरस उन्हीं से मिला है क्योंकि वो एक कारीगर हैं.
पांच दिन बाद जेसी को अस्पताल से छुट्टी मिली. लेकिन चलने में उन्हें अभी भी परेशानी हो रही थी. लौटने के बाद वो 18-18 घंटे सोती रहीं. कई बार उन्हें खांसी भी आई लेकिन अब वो सांस सही से ले पा रही हैं.
वो कहती हैं, "कुछ युवाओं को लगता था कि उन्हें इस वायरस का कोई असर नहीं होगा लेकिन अब वो इसे गंभीरता से ले रहे हैं."
"हमें इस बारे में बहुत कुछ बताया गया है. ये भी बताया गया है कि इससे युवाओं को ज़्यादा डरने की ज़रूरत नहीं लेकिन डरने की ज़रूरत है."
"मैं एक ऐसे बंद कमरे में था जहां सिर्फ़ काला-घुप्प अंधेरा था"
स्टीवर्ट 64 साल के हैं.
उन्हें पूरा यक़ीन है कि उन्हें ये संक्रमण कॉयर मीटिंग के दौरान ही हुआ होगा.
वो कहते हैं, "हम सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा पालन कर रहे थे लेकिन उस रोज़ गुरुवार को जब कॉयर मीटिंग हुई तो भीड़ कुछ ज़्यादा थी.कुछ ऐसे लोग भी आए थे जिनमें फ़्लू के लक्षण थे."
कुछ सप्ताह पहले हुई इस मीटिंग के दस दिन बाद स्टीवर्ट की हालत ख़राब होने लगी.
"पहले इसका असर बहुत कम मालूम पड़ रहा था. लेकिन बाद में सीढ़ी चढ़ने में असमर्थ महसूस करने लगा. ऐसे सांस लेने लगा जैसे कोई बहुत बूढ़ा आदमी लेता है. कुछ दिन बाद मुझे मूवमेंट में तक़लीफ़ होने लगी. वायरस ने मेरे फेफड़े पर हमला किया था."
उनके परिवार ने फोन करके मदद मांगी जिसके बाद स्टीवर्ट को अस्पताल में भर्ती कराया गया.
वो बताते है कि अस्पताल पहुंचने के बाद उनके कई टेस्ट किये गए और स्वैब टेस्ट भी किया गया.
डॉक्टरों को लगा कि उन्हें कोरोना वायरस संक्रमण है जिसके बाद उन्हें ऑक्सीजन पर रखा गया.
स्टीवर्ट बताते हैं कि उन्हें एक अकेले अंधेरे कमरे में रखा गया था.
वो कहते हैं, "मुझे लगा मेरा जीवन ख़त्म होने वाला है लेकिन मैं जीना चाहता था. मैं अपने भीतर चल रही लड़ाई को महसूस कर सकता था."
कुछ दिन बाद स्टीवर्ट को अस्पताल से छुट्टी मिल गई लेकिन घर पहुंचकर भी वो सेल्फ़ आइसोलेशन में रह रहे हैं. अस्पताल से लौटने के बाद उनकी एक आदत बदल गई है. अब वो पहले की तुलना में बहुत अधिक पानी पीने लगे हैं ताकि उनके फेफड़े और गला पहले की तरह हो सके.
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