उठा-पटक के इस दौर में विश्वास का सवाल: बीबीसी महानिदेशक टोनी हॉल

यहां आकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई है, पिछली बार, मुझे क़रीब दो बरस पहले दिल्ली आने का मौक़ा मिला था.
उस समय बीबीसी यहां अपने न्यूज़ ब्यूरो के बड़े विस्तार का जश्न मना रही थी. उस वक़्त बीबीसी ने चार भारतीय भाषाओं में अपनी सेवाएं शुरू की थीं. हमारा लक्ष्य जो पहले भी था और आज भी है, वो ये है कि बीबीसी के विश्वसनीय समाचारों को इस देश के करोड़ों लोगों तक पहुंचाएं.
मैंने इसके बारे में फिर से उस समय सोचा जब मुझे पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली के निधन की दुखद सूचना मिली. क्योंकि जब मैं यहां आया था, तो मुझे उनसे बात करने का अवसर मिला था. हमने सत्तर के दशक में आपातकाल के बारे में उनके अनुभवों पर चर्चा की थी. उस समय, अरुण जेटली लगभग 18 महीने तक जेल में बंद रहे थे.
अरुण जेटली ने मुझे बताया था कि उस समय वो अपना छोटा सा ट्रांज़िस्टर चोरी-छुपे जेल तक ले जाने में सफल रहे थे. और सुबह 6 बजे जेल के सुरक्षा कर्मियों के सोकर उठने से पहले वो बीबीसी वर्ल्ड सर्विस पर समाचार सुन पाते थे. अरुण जेटली ने मुझे बताया था कि बीबीसी की वो समाचार सेवा जेल में उनके लिए लाइफ़लाइन जैसी थी.
इसके ज़रिए वो ये जान पाते थे कि उनके अपने देश में और दुनिया में उस समय क्या चल रहा था. बीते 90 सालों के दौरान उन्हीं की तरह जेल में, डर में या अनिश्चितता में रहे बहुत से लोगों के लिए बीबीसी लाइफ़लाइन रही है.

लोकतंत्र पर भरोसा
मैं समाचार में भरोसे की थीम पर थोड़ी देर में वापस आउंगा, उससे पहले मैं विश्वास या भरोसे के बारे में और व्यापक रूप से बात करना चाहूंगा. सरकार की लोकतांत्रिक संस्थाओं, कारोबार और मीडिया में विश्वास... मतलब लोकतंत्र में ही विश्वास.
उठा-पटक के इस नए दौर में क्या बदला है और हम मीडिया के लोग इसमें क्या कर सकते हैं, इस पर भी मैं कुछ बात करना चाहूंगा. इस वर्ष की शुरुआत में जब लंदन में एडलमैन ट्रस्ट बैरोमीटर को लॉन्च किया गया था, तो उस समय मैंने अपने विचार रखे थे. आप में से बहुत से लोग जानते होंगे.
ये एक सालाना सर्वे है, जो 28 देशों में कारोबार, सरकार, मीडिया और एनजीओ में लोगों के भरोसे की पड़ताल करता है. इस सर्वे से हमें पिछले बीस वर्षों के दौरान आए परिवर्तनों के बारे में दिलचस्प जानकारियां मिली हैं. ब्रिटेन में बड़ी तस्वीर एकदम साफ़ है: लोकतांत्रिक संस्थाओं में लोगों का विश्वास बहुत कम हो गया है.
आज ज़्यादा से ज़्यादा लोग ये महसूस करते हैं कि राष्ट्रीय परिचर्चाओं में उनकी आवाज़ नहीं सुनी जा रही है. तमाम समुदाय ये महसूस करते हैं कि उनके हितों की रक्षा नहीं हो रही है. मुझे पता है ये एक ऐसा ट्रेंड है जिसे हम थोड़ी या कम मात्रा में पूरी दुनिया में देख रहे हैं. और एक आंकड़ा ऐसा है, जिसे कम से कम मैं तो चौंकाने वाला मानता हूं.

कारोबार पर यकीन
आज हर 10 में से आठ लोगों को अपनी नौकरी गंवाने का डर घेरे हुए है. उन्हें लगता है कि ऑटोमेशन, या मंदी, प्रतिद्वंदिता या फिर अप्रवासियों की वजह से उनकी नौकरी चली जाएगी. ऐसा लगता है कि आशंकाओं की वजह से उम्मीदों का गला घोंटा जा रहा है. आज बहुत से लोग सामाजिक प्रगति में अपना विश्वास गंवाते जा रहे हैं.
आज उन्हें इस बात पर भरोसा नहीं रहा कि कड़ी मेहनत से उनकी ज़िंदगी संवर जाएगी. इसका नतीजा ये है कि लोकतंत्र में और इसकी मूलभूत संस्थाओं में लोगों के विश्वास को क्षति पहुंच रही है. एक ट्रेंड जो हाल के वर्षों में उभरा है, वो ये है कि बहुत से देशों में कारोबार सबसे विश्वसनीय संस्था बन कर उभरा है.
यहां तक कि लोगों का सरकार और मीडिया से भी अधिक, कारोबारी संस्थाओं पर विश्वास है. एक समय था जब लोग समाज की सबसे मुश्किल चुनौतियों के समाधान के लिए अपने राजनेताओं का मुंह ताकते थे. लेकिन, आज बहुत से लोग हैं, जो अपने व्यापारिक नेतृत्व से इन समस्याओं का समाधान करने की अपेक्षा रखते हैं.
आज तीन चौथाई लोग ये मानते हैं कि बड़ी कंपनियों के सीईओ को किसी भी परिवर्तन का नेतृत्व करना चाहिए. न कि उन्हें सरकार के पहला क़दम उठाने का इंतज़ार करना चाहिए. फिर चाहे वो बराबरी की सैलरी हो, या फिर ऑटोमेशन की चुनौती, कार्बन उत्सर्जन का मामला हो या फिर इंटरनेट का नियमन हो.

मीडिया पर भरोसा
हाल ही में मैं एक बड़ी वैश्विक तकनीकी कंपनी के प्रमुख से बात कर रहा था. उन्होंने कहा कि वो ये मानते हैं कि 2030 तक केवल वही कंपनियां बचेंगी, जो नैतिकता से कारोबार करती हैं.
यहां जो बात निश्चित रूप से साफ़ है वो ये कि आज व्यापार में सफलता केवल इस बात पर नहीं निर्भर करती कि आप क्या करते हैं, बल्कि महत्वपूर्ण ये है कि आप कारोबार करते कैसे हैं. और इस संघर्ष में विजेता वही होंगे जो सर्वोच्च आदर्शों का पालन करते हैं.
मैं पुख्ता तौर पर यह भी मानता हूं कि यह बात मीडिया सेक्टर के लिए भी सत्य है. गुज़रा दशक दुनियाभर की मीडिया के लिए एक उथल-पुथल वाला वक़्त रहा है. चंद सालों में ही फ़ेक न्यूज़ (फ़र्ज़ी और झूठी ख़बरें) ने हमारे समाज की नसों में ज़हर घोल दिया है. इससे भरोसा घटा है और लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं अस्थिर हो रही हैं.
पूरी दुनिया में हम देख रहे हैं कि फ़ेक न्यूज़ के चलते हमारी बहस मूल मसलों से भटक रही है. इससे समाज में विभाजन पैदा हो रहा है और वोटरों के फ़ैसलों को इस तरह की ख़बरों के ज़रिए प्रभावित किया जा रहा है. यहां तक कि फ़ेक न्यूज़ के ज़रिए हिंसा फैलाई जा रही है और लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ रही है.

आगे बढ़ाने का प्रोत्साहन
ऐसे देशों में जहां लोकतंत्र ज़्यादा मज़बूत नहीं है और डिजिटल साक्षरता कम है, वहां पर ग़लत सूचनाएं बड़ा संकट बन गई हैं. इस परिस्थिति के और गंभीर होने के ही आसार हैं क्योंकि ग़लत सूचनाओं की जंग हर दिन और ज़्यादा जटिल होती जा रही है.
'डीपफ़ेक' वीडियो टेक्नोलॉजी का मतलब है कि हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहे हैं जहां किसी को भी कुछ भी बोलता या करता हुआ दिखाया जा सकता है.दुनिया में कभी सत्य को झूठ से, निश्चितता को किए जा रहे दावों से और हक़ीक़त को सरासर झूठ से अलग करना इतना मुश्किल शायद कभी नहीं रहा.
सोशल मीडिया के उभार ने इस ट्रेंड की रफ़्तार को बढ़ा दिया है. लोग बड़े पैमाने पर ख़बरों के ऐसे स्रोत पर जा रहे हैं जो उनके नज़रिए के हिसाब से ख़बरें देता हो, न कि उन स्रोतों पर जो उनके नज़रिए को चुनौती देते हों.
सोशल मीडिया के कारण समाज में दूरी बढ़ रही है और इससे किसी भी मामले में केवल एक पक्ष को देखने और उसे आगे बढ़ाने का प्रोत्साहन मिल रहा है. मेरे लिए सबसे ज़्यादा चिंताजनक बात ये है कि पत्रकारों को लगातार अज्ञात लोगों से ऑनलाइन धमकियां मिल रही हैं.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
पत्रकारों की ग़लती केवल यह है कि वे ऐसी चीज़ों की रिपोर्टिंग कर रहे हैं जो कि दूसरे सुनना नहीं चाहते हैं. पारंपरिक पत्रकारिता को अब समाधान की बजाय समस्या के तौर पर देखा जाने लगा है. हर दिन हम पत्रकारों को टारगेट करने, ट्रोल करने या धमकाने की कोशिशें होती देखते हैं ताकि अंततः पत्रकार अपना काम ही करना छोड़ दें.
पत्रकारों को शारीरिक नुक़सान पहुंचाने और उनके साथ हिंसा का भी सामना करना पड़ रहा है. हाल के दंगों में हमने दिल्ली में भी ऐसा होते देखा है. दरअलस ये हमला है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर... बिना किसी डर या पक्षपात के तथ्यों को हासिल करने के हमारे कर्तव्य पर…
सत्ता के सामने सच बोलने पर, चाहे वह कितना ही असुविधाजनक क्यों न हो. एक लोकतंत्र और समाज दोनों हैसियत से इसके गंभीर दुष्परिणाम होंगे. एक ऐसा लोकतंत्र जो कि सत्य तक पहुंच पर नहीं टिका होता है वह सही मायने में एक लोकतंत्र नहीं है…
...और एक समाज, जिसमें बहस के दोनों पक्ष, जो हो रहा है उसका सम्मान करते हुए एक दूसरे से बात नहीं करते, वह एक कमज़ोर समाज होता है. पूरी दुनिया में लगातार बढ़ रहे कोरोना वायरस ने यह साफ़ कर दिया है कि दांव पर क्या लगा है.

इमेज स्रोत, Facebook/ETGlobalBusinessSummit
उथल-पुथल के दौर में भरोसेमंद ख़बरें
इससे पता चलता है कि ये कितना ज़रूरी है कि लोग भरोसा कर सकें उन जानकारियों पर जिनकी उन्हें ज़रूरत हैं और जो उन्हें शांत, नपे-तुले और सटीक तरीक़े से दी जा रही हों. इसी वजह से मैं यह मानता हूं कि हमारे जैसे पारंपरिक मीडिया की ज़िम्मेदारी पहले के मुक़ाबले अब कितनी अधिक अहम हो गई है.
जिन मूल्यों पर हम खड़े हैं, अच्छी पत्रकारिता के जिन सिद्धांतों से हम परिभाषित होते हैं, उनकी ज़रूरत अब से पहले कभी इतनी ज़्यादा महसूस नहीं की गई थी. यह एक बड़े मौक़े का क्षण है.
यह वह वक़्त है जब हमें मीडिया में अपने भरोसे की प्रतिबद्धता को और पुख़्ता करना है और ख़बरों में ईमानदारी के लिए पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा मज़बूती से खड़ा होना है. मैं यहां उन पाँच तरीकों का ज़िक्र करना चाहता हूं जिनके ज़रिए बीबीसी ऐसा करना चाहती है.

हम अपनी वैश्विक पहुंच बढ़ा रहे हैं
बीबीसी इस समय दुनिया के सबसे विश्वसनीय न्यूज़ प्रोवाइडर्स में से एक है. यह राजनीतिक दबाव से मुक्त है और निष्पक्षता और सटीकता के सर्वोच्च मानदंडों के लिए प्रतिबद्ध है. वर्ल्ड सर्विस रेडियो और बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़ के लिए ऑल-टाइम रिकॉर्ड ऑडियंस के साथ हम हर हफ़्ते क़रीब 43 करोड़ लोगों तक पहुंचते हैं.
लेकिन, हम जानते हैं कि हम दुनियाभर में अपने ऑडियंस को और भी बहुत कुछ दे सकते हैं. इसी वजह से हमने 1940 के बाद से पहली बार बीबीसी वर्ल्ड सर्विस का सबसे बड़ा विस्तार पूरा किया है. अब हमारी 42 भाषाओं में मौजूदगी है और हमने नैरोबी से लेकर बैंकॉक और बेलग्रेड तक अपने नए और विस्तारित ब्यूरो खोले हैं.
भारत में हमने चार और भाषाओं में न्यूज़ सेवा शुरू की हैं. ये चार भाषाएं- गुजराती, मराठी, पंजाबी और तेलुगु हैं. हिंदी और तमिल जैसी भाषाओं को मिलाकर भारत में हमें कुल नौ भाषाओं में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इसका मतलब है कि भारत में लाखों और लोग अब बीबीसी न्यूज़ को अपनी भाषा में हासिल कर सकते हैं.

हम फ़ेक न्यूज़ से जंग लड़ रहे हैं
दिल्ली में हमारा ब्यूरो अब पूरे दक्षिण एशिया के लिए वीडियो, टीवी और डिजिटल कंटेंट प्रोडक्शन हब बन गया है. हम अब युवाओं, और ज़्यादा महिलाओं, पारंपरिक न्यूज़ सेवाओं तक जिनकी पहुंच मुश्किल है, को टारगेट कर रहे हैं. यही चीज़ हम पूरी दुनिया में भी करना चाहते हैं.
पिछले साल हमने बीबीसी का 'बियॉन्ड फ़ेक न्यूज़' (फ़ेक न्यूज़ के परे) प्रोजेक्ट शुरू किया. इसमें हमने अपने सभी इंटरनेशनल नेटवर्क्स पर डॉक्युमेंटरीज़, स्पेशल रिपोर्ट और फ़ीचर्स पेश किए. इसका मक़सद हम जिन मसलों के ख़िलाफ़ खड़े हैं उन पर समझ को बढ़ाना और मीडिया साक्षरता में सुधार लाना था.
यहां तक कि वर्ल्ड सर्विस ने भारत, नाइजीरिया और कीनिया से एक ऐसी रिसर्च भी पेश की जिसे पुरस्कार मिला. यह रिसर्च निजी नेटवर्क्स के जरिए फ़ेक न्यूज़ के फैलने से जुड़ी थी. प्रमुख चुनावों के दौरान लोकतंत्र को सपोर्ट करना भी हमारे फ़ोकस का एक अहम हिस्सा रहा है.

फ़र्ज़ी ख़बरों से टक्कर
वर्ल्ड सर्विस के विस्तार के चलते हम अब ग़लत सूचनाओं को उनकी उत्पत्ति पर ही रोकने के लिए काफ़ी कुछ कर पाने की हैसियत में आ गए हैं.
हमने बीबीसी रियलिटी चेक में निवेश किया है. यह हमारी फ़ैक्ट-चेक करने वाली सर्विस है जो कि दावों और उसके उलट दावों की इनके पैदा होने पर ही जाँच करती है और फ़ेक न्यूज़ को रियल टाइम आधार पर ही ख़त्म करती है.
मिसाल के तौर पर, भारत में चुनावों के वक़्त हमारी रियलिटी चेक टीम ने सोशल मीडिया में चलने वाली फ़र्ज़ी ख़बरों की पूरी श्रृंखला को टक्कर दी. इनमें ऐसे फ़र्ज़ी सर्वे भी शामिल थे जिनके बारे में दावा किया जा रहा था कि ये बीबीसी ने कराए हैं. इसका मतलब है सीधे ग्राउंड ज़ीरो से सटीक सूचनाएं हासिल करना और उन्हें लोगों तक पहुंचाना.
इससे भी ज़्यादा हमारा फ़ोकस स्पेशलिस्ट जर्नलिज़्म पर है. हमारा फ़ोकस अपने रिपोर्टर्स पर है जो कि अपने विषय के धुरंधर हैं… जो तथ्यों की विवेचना कर सकें और एक विश्वसनीय निष्कर्ष बता सकें.

इमेज स्रोत, Twitter/ET_GBS
हम जल्दबाज़ी नहीं करते...
बीबीसी की ग्लोबल न्यूज़ सर्विसेज़ के लिए इसका मतलब स्थानीय पत्रकारों से है जो कि वास्तविकता में उन समुदायों का हिस्सा हैं जिनके लिए वे काम कर रहे हैं. इसी वजह से बीबीसी का भारत में विस्तार पूरे देश में 150 नए पत्रकार स्टाफ़ की नियुक्ति के साथ हुआ है.
हाल के दिल्ली दंगों के वक़्त हमारी भारतीय रिपोर्टर योगिता लिमये पूरी दुनिया को ताज़ा अपडेट दे रही थीं. दूसरी ओर फ़ैसल मोहम्मद अली जैसे अन्य भाषायी रिपोर्टर्स भी ख़बरें लोगों तक पहुंचा रहे थे. इन दिनों ख़ुद को आगे बढ़ाने के लिए जल्दबाज़ी में ख़बरें देने का ट्रेंड चल रहा है. इनमें हक़ीक़त कम शोर ज़्यादा होता है.
बीबीसी जर्नलिज़्म पर ज़्यादा निवेश कर रहा है जो कि हड़बड़ी के मुक़ाबले ठहरकर और सोच-समझकर ख़बर देने पर भरोसा करता है. उसे हेडलाइंस बनाने की जल्दी नहीं है. हमारा यक़ीन अपने ऑडियंस को सशक्त करने पर है और इसके लिए हम उन्हें स्थितियों की ज़्यादा जानकारी और ज़्यादा विश्लेषण देना चाहते हैं.
इसका मतलब है खोजी पत्रकारिता पर ज़्यादा फ़ोकस करना. हमारी 'अफ़्रीका आई' टीम इसका एक बड़ा उदाहरण है. यह एक विश्वस्तरीय खोजी यूनिट है. इसे पूरे अफ़्रीकी महाद्वीप में सत्ता की जवाबदेही तय करने के लिए खड़ा किया गया है.

इमेज स्रोत, Getty Images
पत्रकारिता से असली बदलाव
कैमरून की वीडियो फ़ुटेज का यह उनका ही मुश्किल भरा विश्लेषण था जिसके चलते पुख़्ता तौर पर यह साबित हो पाया कि आर्मी ने ही आम महिलाओं और बच्चों का क़त्लेआम किया था. इसी तरह की पत्रकारिता से असली बदलाव को लाने में मदद मिल सकती है.
'अफ़्रीका आई' की कोडाइन कफ़ सीरप के ग़लत इस्तेमाल और इसमें शामिल एक बड़े क्रिमिनल नेटवर्क पर की गई खोजी रिपोर्ट की वजह से वहां की सरकार को तत्काल क़ानून में बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ा. हम 'अफ्रीका आई' की तर्ज़ पर दूसरी जगहों पर भी इसी तरह की खोजी टीमें खड़ी करना चाहते हैं.
हाल में बग़दाद में हमारी खोजी रिपोर्ट में पुरुषों के युवा लड़कियों का शोषण कैसे किया जाए इसकी सलाह देने वाले शिया धर्मगुरुओं का भंडाफोड़ किया गया था. हम भारत समेत अन्य जगहों पर भी ऐसी ही खोजी टीमें तैयार करना चाहते हैं. ख़बरें देने में समय लेने का हमारा एक और मतलब भी है. यह बेहद महत्वपूर्ण है.
इसका मतलब है कि हम दुनिया के भविष्य को तय करने वाली बड़ी थीम्स पर बड़े तौर पर फ़ोकस कर रहे हैं. क्लाइमेट चेंज… बढ़ती और उम्रदराज़ होती आबादी… फ़ीज़िकल और मेंटल हेल्थ की दिक्क़तें… और किस तरह से आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) हमारी ज़िंदगियां तय करेगा जैसी चीज़ों पर हमारा फ़ोकस है.

इमेज स्रोत, Getty Images
ज़मीनी बदलाव लाने पर काम कर रहे हैं...
आने वाले सालों में इन्हीं मसलों से हमें निपटना होगा. पिछली गर्मियों में मैंने पूरी दुनिया के मीडिया संस्थानों को एक ख़ास कॉन्फ़्रेंस में बीबीसी से जुड़ने का न्योता दिया था. यह बीबीसी के पब्लिक सर्विस पावर का हिस्सा है ताक़ि विविध समूहों को आम लक्ष्यों के इर्दगिर्द एकसाथ लाया जा सके.
इस मामले में मक़सद फ़ेसबुक, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, ट्विटर, द वॉल स्ट्रीट जर्नल, द हिंदू और अन्य संस्थानों का एक गठजोड़ तैयार करना था. मक़सद था कि कैसे हम एकसाथ मिलकर दुनियाभर में ग़लत सूचनाओं, पक्षपात और फ़ेक न्यूज़ के फैलते जाल को रोक सकते हैं, कैसे हम ठोस क़दम उठा सकते हैं.
हम इसे ट्रस्टेड न्यूज़ इनीशिएटिव बुलाते हैं. एक स्कीम में हमने एक अर्ली वॉर्निंग सिस्टम शुरू किया ताकि पार्टनर्स को ग़लत सूचनाओं के बारे में अलर्ट किया जा सके और वायरल हो सकने वाली इस तरह की ग़लत सूचनाओं को फैलने से रोका जा सके. हमने इसका ट्रायल दो चुनावों में किया है और यह कारगर है.

इमेज स्रोत, Twitter/rupa_jha
यह एक बड़े पैमाने पर साझा चिंताओं से निपटने का एक अहम उदाहरण है और इससे वास्तविक बदलाव लाया जा सकता है. मैं इसे एक अवसर मानता हूं. एक मौक़ा जिससे लोगों का ख़बरों में विश्वास फिर से पैदा हो सके और उनको मिलने वाली सूचनाओं पर वो भरोसा कर सकें.
नए दशक के शुरुआती साल ये तय करेंगे कि ख़बरों के भविष्य का कौन सा नज़रिया जीतेगा, फ़ेक न्यूज़ वाला या निष्पक्ष और स्वतंत्र समाचार. मेरा मानना है कि ख़बरों में ईमानदारी की जीत हो इसको सुनिश्चित कर ही हम लोकतंत्र और लोकतंत्र की सभी संस्थाओं में विश्वास को मज़बूत करने में सफल हो सकते हैं. तभी हम समाज में भी भरोसा क़ायम कर पाएंगे.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
















