'नए भगवान' को पूजने को लेकर क्यों असमंजस में हैं अरुणाचल के आदिवासी?

अरुणाचल

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इमेज कैप्शन, अपने पांरपरिक मिश्मी घर में खड़े सिकोम क्रोम
    • Author, प्रियंका दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, अरुणाचल प्रदेश से लौटकर

दिबांग घाटी के चांगलियांग गांव में रहने वाले 76 वर्षीय तुरखो क्रोम स्थानीय मिश्मी जनजाति के 'नए भगवान' का ज़िक्र सुनते ही हंस पड़ते हैं.

तुरखो की ही तरह, दिल्ली से 2500 किलोमीटर दूर, अरुणाचल प्रदेश के लोहित ज़िले में रहने वाले मिश्मी आदिवसी जनजाति के कई बुजुर्गों के चेहरे पर 'नए भगवान' का ज़िक्र सुनकर विस्मय, कौतूहल और व्यंग में डूबी ऐसी ही हँसी तैर जाती है.

ऐतिहासिक तौर पर मिश्मी निराकार आध्यात्मिक ताक़तों को मानने वाली एक प्रकृति पूजक शिकारी जनजाति रही है. लेकिन बीते तीन दशकों में ईसाई मिशनरियों के साथ-साथ हिन्दू संगठन उन्हें अपने जैसा बनाने में जुटे हैं.

मिश्मी अब अपनी संस्कृति और रीति-रिवाज बचाने के लिए जूझ रहे हैं. इसी कड़ी में सबसे नई चुनौती है प्रकृतिपूजकों के समाज में घंटियों और अगरबत्तियों वाले हिंदू मंदिरों और शिव की तरह दिखने वाले एक भगवान का तेज़ी से प्रसार होना.

'अमिक मताई' नए भगवान का नाम है जिन्हें इन आदिवासियों से जोड़ा जा रहा है.

मिश्मी जनजाति पर बढ़ते हिंदू प्रभाव की पड़ताल करते ही इसके दूसरे सिरे पर नज़र जाती है जो है मिशनरियों का प्रभाव.

पूर्वोत्तर भारत के इस सूदूर कोने में रहने वाले अनुमानित 35 हज़ार मिश्मी आदिवासियों का इतिहास काफ़ी दिलचस्प है.

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इमेज कैप्शन, एक पारम्परिक मिश्मी घर

कौन हैं मिश्मी आदिवासी?

अरुणाचल प्रदेश से गुज़रती लोहित नदी के किनारे बसे मिश्मी जनजाति के लोगों के उद्भव का कोई शोध आधारित या अकादमिक सबूत नहीं मिलता है लेकिन जनजाति के बुजुर्गों को अपनी संस्कृति सृष्टि जितनी ही पुरानी लगती है, जिसके बारे में वे अपने पुरखों से सुनते आए हैं.

बाँस और जंगली लकड़ियों से बने अपने पारंपरिक मिश्मी घर के सामने बैठे तुरखो क्रोम कहते हैं, "मिश्मी समाज इस संसार जितना ही पुराना है. हमने कभी मूर्ति पूजा नहीं की लेकिन हमेशा बहुत श्रद्धा से प्रकृति को पूजा है, जैसे कि नदियों को, पत्थरों को और पेड़ों को. पहाड़ों को तो कई बार ऐसे पूजा है हमने कि उनके पत्थरों का गिरना तक रुक गया है. शिकार पर जाने से पहले, बीमारी में, स्वास्थ में, खुशी में, दुःख में - हम हर स्थिति में प्रकृति को इसलिए पूजते हैं ताकि वह हमारी रक्षा करे".

मिश्मी समुदाय

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इमेज कैप्शन, बेटी जेरेमाई (दाहिने) और पत्नी के साथ तुरखो क्रोम

बलि और पुनर्जन्म

प्रकृति पूजा के साथ साथ सुअर, मुर्ग़े, गाय और मिथुन जैसे जानवरों की बलि देना भी मिश्मी संस्कार का एक अभिन्न अंग है. हालाँकि मिश्मी समुदाय मृत्यु के बाद लाशें जलाता है लेकिन पुनर्जन्म पर विश्वास नहीं करता.

क्वेस्ट जर्नल में प्रकाशित "एथिक्स एंड प्रैक्टिसेस ऑफ़ मिश्मी कम्युनिटी" नाम के शोधपत्र में मनमोहन मीहू, मृदुल कुमार चक्रवर्ती और बरनाली बेजबारूह लिखते हैं, "हत्या, आत्महत्या या दुर्घटना में हुई मृत्यु के विशेष मामलों के अलावा मिश्मी समुदाय मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास नहीं करता. सामान्य मृत्यु के मामलों में आत्मा 'उस पार' जाकर पुरखों की रूहों के साथ मिल जाती है लेकिन असामान्य मृत्यु में ऐसा नहीं होता".

मिश्मी समुदाय के जीवन में ऐसी ही 'स्पिरिट' या 'रूहानी शक्तियों' के महत्व को बताते हुए शोध पत्र आगे कहता है, "मिश्मी समुदाय का विश्वास है कि पेड़ों, नदियों, पहाड़ों, जंगलों और पत्थरों में बसी ये 'रूहानी शक्तियां' उनकी खेती, घर, शिकार, भोजन और स्वास्थ -सबका ख़्याल रखती हैं. इसलिए इन्हें ख़ुश रखने के लिए लोग मिश्मी जनजाति के नियमों का सख़्ती से पालन करते हैं और शामन (मिश्मी पुजारी) के कहे अनुसार बलि भी देते हैं".

धर्म परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियाँ

2011 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार अरुणाचल प्रदेश में 30 प्रतिशत से ज़्यादा आबादी के साथ ईसाई धर्म को मानने वालों की संख्या सबसे ज़्यादा है. 29 प्रतिशत के साथ हिंदू दूसरे स्थान पर हैं लेकिन ख़ुद को हिंदू और ईसाई-दोनों ही समुदायों के इतर एक आदिवासी जनजाति बताने वाले मिश्मियों को लगता है कि इन यह दोनों ही ताक़तें उनकी संस्कृति और विरासत के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर रही हैं.

बीबीसी से बातचीत में लोहित के वन मंडल अधिकारी सोपलान मन्यू, जो कि खुद भी मिश्मी समुदाय से आते हैं, जोड़ते हैं, "हमारे समुदाय के सामने अस्तित्व का संकट आ खड़ा हुआ है. एक तरफ़ ईसाई धर्म स्वीकर कर चुके मिश्मी हैं और दूसरी ओर नए बन रहे हिंदू मंदिरों की वजह से आने वाले वक़्त में हमारे पारम्परिक शामन (मिश्मी पुजारी) का अस्तित्व मिट जाने का ख़तरा है. लेकिन हमारी ऐसी स्थिति में होने का एक कारण यह भी है कि नई पीढ़ी पुराने मिश्मी रीति रिवाजों से अनभिज्ञ है. उन रीति-रिवाजों को जारी रखना भी चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है".

आधुनिकता के मिश्मी समाज पर पड़े प्रभावों के बारे में बताते हुए वह कहते हैं, "जब मैं बच्चा था तो हमने घर में पिता को शिकार पर जाते-आते देखा. उस जमाने में शामन का भी इतना प्रभाव होता था कि बड़ी से बड़ी बीमारी उनकी पूजा से ठीक हो जाती थी. आज के शामन के पास भी उतना प्रभाव नहीं है और शिकार तो क़ानूनी तौर पर पूरी तरह बंद है इसलिए ऐसी मजबूरी की हालत में मिश्मी समुदाय एक सॉफ़्ट टार्गेट बन जाता है".

मिश्मी समुदाय

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इमेज कैप्शन, अमिक मताई - मिश्मी समुदाय के भगवान का 'नया स्वरूप'

आदिवसी कपड़ों में हिंदू भगवान

लोहित ज़िले के सोक्लवाला गांव में रहने वाले तीस वर्षीय नोमेमसो क्रोम को लगता है कि अपने समाज के प्रति समर्पित हर मिश्मी आज धर्म परिवर्तन को लेकर चिंतित और उलझा हुआ है. अपने साठ वर्षीय पिता सिकोम क्रोम के अपने घर के पारंपरिक बारमदे में बैठे नोमेमसो कहते हैं, "मिश्मी सारी सृष्टि को चलाने वाली ताक़त 'अमिक माताई' को मानते हैं लेकिन हमारे पास इस ताक़त का कोई मूर्तिनुमा स्वरूप नहीं था. अरुणाचल विकास परिषद के लोगों ने हमारे गांव में मंदिर बनवा दिया है".

नोमेमसो कहते हैं, "उस मंदिर में शिव की तरह दिखने वाली एक तस्वीर है जिसे मिश्मी कपड़े और शिकार के औजार पकड़ा दिए गए हैं. घंटी हैं, अगरबत्ती है. लेकिन हम ऐसे कभी पूजा नहीं करते थे. हमारी परम्परा में मूर्ति है ही नहीं. विकास परिषद और संघ से जुड़े लोग कहते हैं कि हम अपने धर्म को संरक्षित करें लेकिन मिशनरी से बचने के लिए एक साथ पूजा करना शुरू करें. मंदिर जाएँ".

गाय की बलि को लेकर 'अरुणाचल विकास परिषद जैसे संगठनों की असहजता के बारे में बात करते हुए वह जोड़ते हैं, "उनकी तरफ़ से गाय और मिथुन की बलि देने की प्रथा से भी दूर जाने के लिए कहा जाता रहा है. लेकिन हमारे लिए गाय की बलि बहुत ज़रूरी है - ब्रोकसक नामक वह शक्ति जो हमारे घर की रक्षा करती हैं, उसे गाय की बलि चढ़नी ही होती है. हिंदू संगठन तो हाल ही में आए हैं, इसने पहले कितने ही मिशनरी हमारे दरवाज़ों पर आए और हमसे कहा कि हम शैतानों की पूजा करते हैं और हमें ईसाई बन जाना चाहिए".

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इमेज कैप्शन, पिता सिकोम क्रोम के अपने घर के पारंपरिक बारमदे में बैठे नोमेमसो क्रोम

मिश्मी युवा होने का संकट

नोमेमसो ईसाई और हिंदू में से कुछ नहीं बनना चाहते. उन्हें अपना मिश्मी समाज बहुत प्यारा है. लेकिन वो वर्तमान समय में एक मिश्मी होने के संघर्ष से भी मुँह नहीं मोड़ते.

वे कहते हैं, "मैंने यहीं शिक्षा ली लेकिन इतनी पढ़ाई-लिखाई के बावजूद आज बेरोज़गार हूँ. विकास हमारे दरवाज़े तक नहीं पहुँचा है. रोज़गार के अवसर नहीं हैं. ऐसे में हम अपने माँ-पिता की तरह ठीक से न ही मिश्मी समुदाय के तौर-तरीक़े सीख पाए और न ही आधुनिक दुनिया में शामिल हो पाए. मेरे पिता शिकार करते थे और जंगल से इतनी गहराई से जुड़े हैं कि सिर्फ़ पेड़ों, ज़मीन और वन-उत्पादों के बलबूते रहने खाने का पूर इंतज़ाम कर सकते हैं. मुझे नहीं आते उनके जितने काम".

नोमेमसो और उनके पिता सिकोम हमें अपने गाँव में नया-नया बना 'मिश्मी मंदिर' दिखाने ले जाते हैं. मंदिर में ताला लगा है लेकिन 'लोहित में घूमते हुए अमिक माताई' की कई तस्वीरें हमें देखने को मिलती हैं.

'धर्म चुनने की आज़ादी'

आगे हमारी मुलाक़ात चांगलियांग गांव में मिले तुरखो क्रोम की बेटी 34 वर्षीय जेरेमाई क्रोम से होती है. बैंगलुरु में पढ़ी-लिखी जेरेमी इस मायने में विशेष हैं कि मिश्मी रीति-रीवाजों का पालन कर रहे अपने पूरे परिवार से अलग जाकर दो साल पहले ही उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया है.

बैंगलुरु की नौकरी छोड़ अपने बूढ़े हो रहे माता-पिता के साथ रहने आयी जेरेमी बताती हैं कि उनके परिवार में उन्हें उनका धर्म चुनने की आज़ादी दी. "मैं बहुत तकलीफ़ में थी और ईसाई धर्म में मुझे राहत महसूस हुई इसलिए मैंने अपनी मर्ज़ी से यह चुनाव किया. मेरे परिवार में सभी लोग मिश्मी हैं लेकिन मुझे अपना विश्वास चुनने की पूरी आज़ादी दी गई".

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इमेज कैप्शन, चाओथो मेपोंग और सोयुम टांग

हमें आगे हिंदू धर्म और मिश्मी जीवनशैली के बीच उलझे दो लोग चाओथो मेपोंग और सोयुम टांग मिलते हैं. दोनों ही लोहित ज़िले के वाकरो ब्लॉक के गुंदरी गांव के सरकारी स्कूलों में शिक्षक हैं और 'अमिक माताई' की नई मूर्ति उन्हें ठीक लगती है.

'वक़्त के साथ आगे बढ़ने' का ज़िक्र बार-बार करते हुए सोयुम कहते हैं, "हमारे पूर्वज लँगोटी पहनते थे, लेकिन हम तो नहीं पहन सकते न. लेकिन हम अपने मिश्मी रीति रिवाजों का पूरा पालन करेंगे. ईसाई मिशनरी आकर कहते हैं कि हम शैतान की पूजा करते हैं. इन्ही सब बातों से मिश्मी समाज को बचाने के लिए हम एक मॉर्डन मंदिर बनाएँगे जिसमें एक साथ इकट्ठा होकर पूजा करेंगे".

हालाँकि चाओथो सोयुम की बात से पूरी तरह सहमत नज़र नहीं आ रहे थे. "मूर्ति पूजा तो मिश्मी नहीं करते लेकिन अब समय के साथ सब कुछ बदल ही रहा है तो कितना बचा पाएँगे?"

मिश्मी समुदाय

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इमेज कैप्शन, अरुणाचल विकास परिषद

अरुणाचल विकास परिषद

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े 'अरुणाचल विकास परिषद' यहाँ अमिक मताई विद्या मंदिर नाम से स्कूल चलाता है, यहाँ हमारी मुलाक़ात कई शिक्षकों और छात्रों से होती है.

परिषद के राज्य सचिव बीरेन्द्र कुमार दुबे मिश्मी समुदाय के लोगों पर हिंदू धर्म थोपने के सभी आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहते हैं, "मंदिर बनाने और अमिक मताई की मूर्ति का विचार मिश्मी समुदाय के भीतर से आया है. हमने सिर्फ़ मंदिर बनवाने में मदद की है उनकी. जनता से दान में मिले पैसों से यहां मंदिर बनवाए गए हैं. इसके सिवा हम सिर्फ़ उन्हें अपनी संस्कृति को विदेशी धर्मों से बचाने और संरक्षित करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं".

गाय की बलि चढ़ाने पर आपत्ति जताने के सवाल पर वह जोड़ते हैं, "हमने उन्हें कभी अपने रीति-रिवाज पूरे करने से नहीं रोका. हां, मिश्मी समुदाय में ख़ुद ही कुछ लोगों को इस बात का एहसास हो रहा है कि जानवरों की बलि देने से होने वाला खून-ख़राबा ठीक नहीं".

मिश्मी समुदाय

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इमेज कैप्शन, मिश्मी इंडेजिनेस कल्चर एंड फ़ेथ प्रोमोशन सोसाइटी' के महासचिव अमोसो खांबलाई

किसने 'अमिक मताई' की तस्वीर बनाई

तेजू के तफ़राग्राम में रहने वाले अमोसो खांबलाई 'मिश्मी इंडेजिनेस कल्चर एंड फ़ेथ प्रोमोशन सोसाइटी' नामक मिश्मी समुदाय के एक प्रांतीय जनजातीय संगठन के महासचिव हैं. साथ ही, 'अमिक मताई' की साक्षात स्वरूप रचने वाले लोगों में एक प्रमुख नाम भी.

कभी कभी 'अरुणाचल विकास परिषद' की बैठकों में 'कार्यकर्ता; के तौर पर शामिल होने वाले अमोसो कहते हैं कि आगे आने वाले वक़्त में बहुत सम्भव है कि हिंदुओं की तरह मिश्मी समुदाय के भी मूर्तियों वाले साक्षात कई देवी-देवता होंगे.

'अमिक मताई' के चित्रात्मक स्वरूप के बारे में पूछने पर वे कहते हैं, "हम इस विचार पर 2012 से काम कर रहे हैं, तब जाकर अब अमिक मताई का यह स्वरूप सामने आया है. यह हमारे ईश्वर का पौरुषीय स्वरूप है. हमें उम्मीद है कि इस स्वरूप और मंदिर के ज़रिए हम अपने समुदाय के बच्चों को मिश्मी परम्परा से जोड़े रख पाएँगे".

अमोसो 'ज़रूरत और रिवाज के हिसाब से जानवरों की बलि' देने के पक्ष में तो हैं लेकिन मिश्मी समुदाय की निराकार उपासना के तरीक़ों के ख़त्म होने के सवाल पर ख़ामोश रह जाते हैं.

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कैसे बच पाएगा मिश्मी समुदाय

तेजू शहर में एक टूरिस्ट गेस्टहाउस चलाने वाले 36 तुगासो मन्यू पेशे से वक़ील हैं और अरुणाचल बैप्टिस्ट चर्च काउंसिल के महासचिव भी. अपने जीवन के शुरुआती सालों में संघ के 'अरुण ज्योति' संगठन से जुड़े रहने के बाद तुगासो ने अपने माता-पिता के साथ बाद में ईसाई धर्म अपना लिया.

ईसाई मिशनरियों पर अपना धर्म थोपने और मिश्मी समुदाय की पूजा पद्धति को 'शैतान' या बुराई की पूजने के आरोपों को स्वीकर करते हुए वह कहते हैं, "मैं मानता हूँ कि ख़ुद को ईसाई धर्म का प्रचारक बताने वाले कुछ लोगों ने मिश्मी परिवारों से मिलकर ऐसा कहा होगा. लेकिन उन लोगों को ख़ुद ही बाइबल का ज्ञान नहीं है. बाइबल कभी अपना धर्म थोपने के लिए नहीं कहता- हां, सूचित ज़रूर कर सकता है".

मिश्मी समुदाय में पैदा हुए तुगासो की यात्रा हिंदू धर्म से होते हुए अब ईसाई धर्म तक पहुँच गई है. हालांकि वे खुद लोहित में बन रहे मंदिरों को 'मिश्मी समुदाय की विरासत की ख़िलाफ़' बताते हैं. लेकिन इस छोटी सी जनजाति को संभालने सवारने के सम्भावित प्रयासों के प्रश्न पर ख़ामोश रह जाते हैं.

लम्बी चुप्पी के बाद सिर्फ इतना जोड़ते हैं, "परिधान और त्यौहार तो हम बचा लेंगे लेकिन जहां तक रीति रिवाजों और निराकार पूजा पद्धति के आधार पर मिश्मी समाज को बचाने का सवाल है, मेरे पास इसका ठीक-ठीक जवाब नहीं है".

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