दिल्ली हिंसा: राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल समाधान हैं या गहरी समस्या का संकेत?- नज़रिया

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- Author, अरविंद मोहन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
जाने को तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल मंगलवार देर रात को भी दिल्ली के दंगा प्रभावित इलाक़ों में गए थे. लेकिन लोगों से न मिलने या कैमरे की निगाह में न होने की वजह से उनकी तब की यात्रा प्रचारित नहीं हुई. हालांकि, उसका असर ज़रूर दिखने लगा था.
लेकिन बुधवार की शाम जब वे घोंडा, मौजपुर और चौहान बांगर जैसे इलाक़ों में काला चश्मा लगाकर घूमे, तो उनके साथ नवीनतम हथियारों से लैस सुरक्षाबलों का ही नहीं, बल्कि टीवी कैमरों का घेरा भी था. और जिस अंदाज़ में वे लोगों को आश्वस्त कर रहे थे, दरवाज़े खुलवाकर कभी हिन्दी तो कभी उर्दू के दो-चार लफ्ज़ों में ही नहीं, ख़ास अंग्रेज़ी स्टाइल में अंग्रेज़ी बोलकर उनको भरोसा दिला रहे थे.
यह ख़ालिस ग़ैर-राजनैतिक ही नहीं था, अटपटा भी था. वे कुछ ऐसा आश्वासन दे रहे थे, मानो उनको पता नहीं था वरना वे यह सब नहीं होने देते और अब कुछ नहीं होगा.
सीएए क़ानून बनने, एनपीआर और एनआरसी संबंधी घोषणाओं से फैली भ्रांतियां और असुरक्षा, दिल्ली में शाहीन बाग़ बनने और विधानसभा चुनाव में काफ़ी कुछ हो जाने और आंदोलन चलने के बाद उनकी यह नाटकीय एंट्री थी. अभी तक कोई पिछला रक्षा सलाहकार ऐसी भूमिका में नहीं उतरा था.
2002 के गुजरात के दंगों के समय वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और तब उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा ने इस बारे में एक शब्द भी नहीं बोला था. अलबत्ता वाजपेयी ने ही राजधर्म के पालन की बात कही थी.
अजित डोभाल पाँचवे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं. उनसे पहले के चारों राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार कम योग्य थे, कम सक्रिय थे या फिर अपनी ज़िम्मेदारियों को कम समझते थे? ब्रजेश मिश्र, जेएन दीक्षित, एमके नारायण और शिवशंकर मेनन को इस तरह तंग गलियों में घूमते अगर पहले नहीं देखा गया, तो उसकी ठोस वजहें थीं. अब डोभाल राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की भूमिका के लिए नई परिभाषा गढ़ने में लगे हैं.

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राजनीतिक मसले का ताक़त से इलाज?
कहना न होगा कि नए नागरिकता क़ानून से लेकर नागरिकता रजिस्टर बनाने तक की राजनीति में बीजेपी और संघ के शीर्ष से लेकर छुटभैया नेता तक सभी शामिल रहे हैं. उन्होंने शाहीन बाग़ जैसे लोकतांत्रिक प्रतिरोध को भी सांप्रदायिक रूप देने में कोई कसर नहीं छोड़ी.
पर जब उसके नतीजे के तौर पर दंगा हो गया और दिल्ली तीन दिनों तक मार-काट, आगज़नी का अखाड़ा बनी रही, तब सरकार की तरफ़ से ज़िम्मा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को सौंपा गया.
यह बात अटपटी इसलिए भी लगती है कि जब पूरी कैबिनेट दिल्ली में बैठी है, बीजेपी के सारे प्रमुख लोग दिल्ली में हैं, प्रधानमंत्री से लेकर म्युनिसिपलिटी के पार्षद तक दिल्ली में हैं. तब आम लोगों के बीच जाने का ज़िम्मा उस व्यक्ति को सौंपा जाए, जिसका जनता, वोट और लोकतांत्रिक व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है.
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का काम ख़ुफ़िया एजेंसियों में तालमेल बिठाना और प्रधानमंत्री को संवेदनशील मामलों में सलाह देना है. न कि दंगाग्रस्त इलाक़ों का दौरा करके लोगों को समझाना-बुझाना.

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गृहमंत्री क्यों सामने नहीं आ रहे?
सवाल गृह मंत्रालय का भी है और गृहमंत्री का भी, जो शाहीन बाग़ में करंट लगने जैसे सांप्रदायिक बयान देकर विपक्ष के निशाने पर हैं. सो सरकार उन्हें 'छिपाए' और किसी एक मीटिंग करने का ज़िम्मा दे, ये बात तो समझ आती है. लेकिन उनके दोनों डिप्टी भी मैदान से बाहर रखे गए हों, तो हैरानी होती है.
गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय तो दिल्ली पुलिस के शहीद जवान रतन लाल को दी गई सलामी के समय उपस्थित थे. लेकिन जी. कृष्ण रेड्डी तो आख़िर तक राजनीतिक बयानबाज़ी में ही दिखे. उन्हें कोई प्रशासनिक क़दम उठाते हुए नहीं देखा गया.
और डोभाल, जो ख़ुद को डोवल कहना पसंद करते हैं, एक बार गृहमंत्री से ज़रूर मिले, पर उनकी रिपोर्टिंग सीधे प्रधानमंत्री को है. दिल्ली पुलिस का ज़िम्मा अमित शाह के पास है, इसलिए उनसे मिलना ज़रूरी है. लेकिन डोभाल का दर्जा भी कैबिनेट मंत्री का है और उनकी वैसे भी सीधे प्रधानमंत्री तक पहुंच है.
ख़ुफ़िया पुलिस की अपनी नौकरी के दौरान ही बीजेपी और संघ के प्रति नरम रुख़ रखने वाले डोभाल के प्रशासनिक बागडोर संभालने से दिल्ली के दंगों का नियंत्रण मुश्किल होगा या प्रशासनिक फ़ैसलों में पक्षपात ही होगा, यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाज़ी होगा. पर उनको सामने लाना कहीं-न-कहीं राजनीतिक प्रशासन के लोगों को नकारा साबित करता सा दिखता है.

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अजीत डोभाल को बार-बार क्यों आगे किया जा रहा?
मामला अकेले इसी बात का होता, तो बात इतने पर ख़त्म करने में हर्ज़ नहीं होता. हम पाते हैं कि कश्मीर में धारा 370 हटाने के बड़े राजनीतिक फ़ैसले के बाद आम लोगों से मिलने और उन्हें आश्वस्त करने का ज़िम्मा अजीत डोभाल को ही सौंपा गया था और वे संगीनों के साए में टीवी कैमरों के साथ बिरयानी खाते और कहवा पीते नज़र आए थे.
अब यह अलग बात है कि छह महीने से ज़्यादा वक़्त बीतने पर भी कश्मीर के लोग हालात सामान्य होने का इंतज़ार कर रहे हैं और न जाने डोभाल साहब को अपनी बात याद भी है या नहीं.
असल में डोभाल को ही नहीं, किसी भी नौकरशाह और फ़ौजी हुक्मरान को ऐसी बातें याद करने की ज़रूरत नहीं होती. इसकी ज़रूरत तो उन बड़े-छोटे नेताओं को होती है, जिन्हें जनता के पास बार-बार जाना होता है, उनका वोट मांगना होता है, उनसे अपनी सत्ता हासिल करनी होती है, उनको अपने कामों का हिसाब देना होता है, अपनी ग़लतियों के लिए माफ़ी मांगनी होती है.
'इंडियन एक्सप्रेस' के संवाददाता के सवाल पर बीजेपी के महासचिव अनिल जैन ने कहा कि अगर गृहमंत्री दिल्ली की गलियों में दौरा करें, तो संदेश अच्छा नहीं जाएगा. कहना न होगा कि ये बहाना गले से नीचे उतरने लायक़ नहीं है. करे-धरे कोई, और संभालने जाए कोई और. जवाबदेही लेनी हो, तो किसी और को आगे कर दिया जाए.

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शासन की नई शैली
असल में यहां शासन की मोदी की नई शैली दिखती है. सुषमा स्वराज और जेटली के जाने के बाद नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह जैसे गिनती के लोग रह गए हैं, जिनका कोई राजनीतिक वजूद है. बाक़ी सब मोहरे जैसे लोग हैं, जिन्हें मोदी मनमर्ज़ी से नचाते हैं.
जब बड़ा अवसर आए, तो ऐसे लोगों को भी आगे न करना नया बदलाव है. राजनीतिक रूप से जवाबदेह व्यक्ति आगे आएगा, तो पूरी कैबिनेट तक ज़िम्मेदारी आएगी. और अगर अमित शाह सामने आएंगे, तो पूरा सीएए-एनआरसी विवाद सामने आएगा, जिसमें ग़लतफ़हमी फैलाने में ख़ुद उनकी भी भूमिका है.
प्रधानमंत्री रामलीला मैदान से भले खंडन कर चुके हैं कि एनआरसी की कोई तैयारी नहीं है, लेकिन ख़ुद अमित शाह संसद के अंदर यह घोषणा कर चुके हैं. बात ये हो सकती है पर यही मसला होता, तो किसी दूसरे वरिष्ठ मंत्री को मोर्चे पर लगाया जा सकता था.
अजित डोभाल को बार-बार आगे करना इससे आगे का मसला है और किसी लोकतांत्रिक ढंग से चुनी सरकार के लिए ये तरीक़ा अपनाना एकदम ग़ैर-लोकतांत्रिक है. सेना और ख़ुफ़िया एजेंसी से जुड़े लोगों को जनता के बीच भेजना लोकतंत्र के लिए शुभ लक्षण क़त्तई नहीं हैं. किसी भी हिसाब से नहीं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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